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Saturday, April 6, 2013

सिंगरौली के संघर्ष का सफर

MONDAY, MAY 28, 2012 PUNY PRASOON VAJPEYI

यह रास्ता जंगल की तरफ जाता जरुर है लेकिन जंगल का मतलब सिर्फ जानवर नहीं होता। जानवर तो आपके आधुनिक शहर में हैं, जहां ताकत का एहसास होता है। जो ताकतवर है उसके सामने समूची व्यवस्था नतमस्तक है। लेकिन जंगल में तो ऐसा नहीं है। यहां जीने का एहसास है। सामूहिक संघर्ष है। एक-दूसरे के मुश्किल हालात को समझने का संयम है। फिर न्याय से लेकर मुश्किल हालात से निपटने की एक पूरी व्यवस्था है। जिसका विरोध भी होता है और विरोध के बाद सुधार की गुंजाइश भी बनती है। लेकिन आपके शहर में तो जो तय हो गया चलना उसी लीक पर है। और तय करने वाला कभी खुद को न्याय के कठघरे में खड़ा नहीं करता। चलते चलिये। यह अपना ही देश है। अपनी ही जमीन है। और यही जमीन पीढ़ियों से पूरे देश को अन्न देती आई है। और अब आने वाली पीढ़ियों की फिक्र छोड़ हम इसी जमीन के दोहन पर आ टिके है। इस जमीन से कितना मुनाफा बटोरा जाता सकता है, इसे तय करने लगे है। उसके बाद जमीन बचे या ना बचे। लेकिन आप खुद ही सोचिये जो व्यवस्था पहले आपको आपके पेट से अलग कर दें। फिर आपके भूखे पेट के सामने आपकी ही जिन्दगी रख दें। और विकल्प यही रखे की पेट भरोगे तो जिन्दा बचोगे। तो जिन्दगी खत्म कर पेट कैसे भरा जाता है ,यह आपकी शहरी व्यवस्था ने जंगलो को सिखाया है। यहां के ग्रामीण-आदिवासियों को बताया है। आप इस व्यवस्था को जंगली नहीं मानते। लेकिन हम इसे शहरी जंगलीपन मानते है। लेकिन जंगल के भीतर भी जंगली व्यवस्था से लड़ना पडेगा यह हमने कभी सोचा नहीं था। लेकिन अब हम चाहते हैं जंगल तो किसी तरह महफूज रहे। इसलिये संघर्ष के ऐसे रास्ते बनाने में लगे है जहां जिन्दगी और पेट एक हो। लेकिन पहली बार समझ में यह भी आ रहा है कि जो व्यवस्था बनाने वाले चेहरे हैं, उनकी भी इस व्यवस्था के सामने नहीं चलती । 
यहां सरकारी बाबुओं या नेताओं की नहीं कंपनियो के पेंट-शर्ट वाले बाबूओं की चलती है। जो गोरे भी है और काले भी। लेकिन हर किसी ने सिर्फ एक ही पाठ पढ़ा है कि यहां की जमीन से खनिज निकालकर। पहाड़ों को खोखला बनाकर। हरी भरी जमीन को बंजर बनाकर आगे बढ़ जाना है। और इन सब को करने के लिये, इन जमीन तक पहुंचने के लिये जो हवाई पट्टी चाहिये। चिकनी -चौड़ी शानदार सड़केंचाहियें। जो पुल चाहिये। जमीन के नीचे से पानी खींचने के लिये जो बड़े बड़े मोटर पंप चाहिये।  खनिज को ट्रक में भर कर ले जाने के लिये जो कटर और कन्वेयर बेल्ट चाहिये। अगर उसमें रुकावट आती है तो यह विकास को रोकने
की साजिश है। जिन 42 से ज्यादा गांव के साढे नौ हजार से ज्यादा ग्रामीण आदिवासी परिवार को जमीन से उखाड़कर अभी मजदूर बना दिया गया है और खनन लूट के बाद वह मजदूर भी नहीं रहेंगे, अगर वही ग्रामीण अपने परिवार के भविष्य का सवाल उठाता है तो वह विकास विरोधी कैसे हो सकता है। इस पूरे इलाके में जब भारत के टाप-मोस्ट उघोगपति और कारपोरेट, खनन और बिजली संयत्र लगाने में लगे है और अपनी परियोजनाओ को देखने के लिये जब यह हेलीकाप्टर और अपने निजी जेट से यहां पहुंचते है।  दुनिया की सबसे बेहतरीन गाड़ियों से यहां पहुंचते है , तो हमारे सामने तो यही सवाल होता है कि इससे देश को क्या फायदा होने वाला है। यहां मजदूरों को दिनभर के काम की एवज में 22 से 56 रुपये तक मिलता है। जो हुनरमंद होता है उसे 85 से 125 रुपये तक मिलते हैं। और कोयला खादान हो या फिर बाक्साइट या जिंक या फिर बिजली संयत्र लगाने में लगे यही के गांव वाले हैं। उन्हे हर दिन सुबह छह से नौ किलोमीटर पैदल चलकर यहां पहुंचना पड़ता है। जबकि इनके गांव में धूल झोंकती कारपोरेट घरानो की एसी गाड़ियां दिनभर में औसतन पांच हजार रुपये का तेल फूंक देती हैं। हेलिकाप्टर या निजी जेट के खर्चे तो पूछिये नहीं। और इन्हें कोई असुविधा ना हो इसके लिये पुलिस और प्रशासन के सबसे बड़े अधिकारी इनके पीछे हाथ जोड़कर खडे रहते है। तो आप ही बताईये इस विकास से देश का क्या लेना-देना है। देश का मतलब अगर देश के नागरिको को ही खत्म कर उघोगपति या कारपोरेट विकास की परिभाषा को अपने मुनाफे से जोड़ दें तो फिर सरकार का मतलब क्या है जिसे जनता चुनती है। क्योंकि इस पूरे इलाके में ग्रामीण आदिवासियों के लिये एक स्कूल नहीं है।  पानी के लिये हेंड पंप नहीं है। बाजार के नाम पर अभी भी हर गुरुवार और रविवार हाट लगता है। जिसमें ज्यादा से ज्यादा गांव के लोग अन्न और पशु लेकर आते हैं। एक दूसरे की जरुरत के मद्देनजर सामानो की अदला-बदली होती है। लेकिन अब हाट वाली जगह को भी हडपने के लिये विकास का पाठ सरकारी बाबू पढ़ाने लगे हैं। धीरे धीरे खादानो में काम शुरु होने लगा है। बिजली संयत्रो का माल-असबाब उतरने लगा है तो कंपनियो के कर्मचारी अफसर भी यही रहने लगे हैं। उनको रहने के दौरान कोई असुविधा ना हो इसके लिये बंगले और बच्चों के स्कूल से लेकर खेलने का मैदान तक बनाने के लिये मशक्कत शुरु हो रही है। गांव के गांव को यह कहकर जमीन से उजाड़ा जा रहा है कि यह जमीन तो सरकार की है। और सरकार ने इस पूरे इलाके की गरीबी दूर करने के लिये पूरे इलाके की तस्वीर बदलने की ही ठान ली है। चिलका दाद, डिबूलगंज, बिलवडा, खुलडुमरी सरीखे दर्जनो गांव हैं, जहां के लोगो ने अपनी जमीन पावर प्लांट के लिये दे दी। लेकिन अब अपनी दी हुई जमीन पर ही गांव वाले नहीं जा सकते। खुलडुमरी के 2205 लोगो की जमीन लेकर रोजगार देने का वादा किया गया।

लेकिन रोजगार मिला सिर्फ 234 लोगो को। आदिवासियों के जंगल को तबाह कर दिया गया है। जिन फारेस्ट ब्लाक को लेकर पर्यवरण मंत्रालय ने अंगुली उठायी और वन ना काटने की बात कही। उन्हीं जंगलों को अब खत्म किया जा रहा है क्योंकि अब निर्णय पर्यावरण मंत्रालय नहीं बल्कि ग्रूप आफ मनिसटर यानी जीओएम लेते हैं । ऐसे में माहान,छत्रसाल,अमेलिया और डोगरी टल-11 जंगल ब्लाक पूरी तरह खत्म किये जा रहे हैं। करीब 5872.18 हेक्टेयर जंगल पिछले साल खत्म किया गया। और इस बरस 3229 हेक्टेयर जंगल खत्म होगा। अब आप बताइये यहां के ग्रामीण-आदिवासी क्या करें। कुछ दिन रुक जाइए, जैसे ही यह ग्रामीण आदिवासी अपने हक का सवाल खड़ा करेंगे वैसे ही दिल्ली से यह आवाज आयेगी कि यहां माओवादी विकास नहीं चाहते हैं। और इसकी जमीन अभी से कैसे तैयार कर ली गई है यह आप सिंगरैली के बारे में सरकारी रिपोर्ट से लेकर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मंचों से सिंगरैली के लिये मिलती कारपोरेट की मदद के दौरान खिंची जा रही रिपोर्ट से समझ सकते हैं। जिसमें लिखा गया है कि खनिज संसाधन से भरपूर इस इलाके की पहचान पावर के क्षेत्र में भारतीय क्रांति की तरह है। जहां खादान और पावर सेक्टर में काम पूरी तरह शुरु हो जाये तो  मेरिका और यूरोप को मंदी से निपटने का हथियार मिल सकता है। इसलिये यहां की जमीन का दोहन किस स्तर पर हो रहा है और किस तरीके से यहा के कारपोरेट के लिये अमेरिकी सरकार तक भारत की नीतियों को प्रभावित कर रही है इसके लिये पर्यावरण मंत्रालय और कोयला मंत्रालयो की नीतियो में आये परिवर्तन से भी समझा जा सकता है । जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री रहते हुये चालीस किलोमिटर के क्षेत्र के जंगल का सवाल उठाया।

पर्यावरण के अंतर्राष्ट्रीय एनजीओ ग्रीन पीस ने यहा के ग्रामीण आदिवासियों पर पडने वाले असर का समूचा
खाका रखा। लेकिन आधे दर्जन कारपोरेट की योजना के लिये जिस तरह अमेरिका, आस्ट्रेलिया से लेकर चीन तक का मुनाफा जुड़ा हुआ है। उसमें हर वह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी गई जिनके सामने आने से योजनाओ में रुकावट आती। इस पूरे इलाके में चीन के कामगार और आस्ट्रेलियाई अफसरो की फौज देखी जा सकती है। अमेरिकी बैंक के नुमाइन्दे और अमेरिकी कंपनी बुसायरस के कर्मचारियों की पहल देखी जा सकती है। आधे दर्जन पावर प्लांट के लिये 70 फीसदी तकनीक अमेरिका से आ रही है। ज्यादातर योजनाओ के लिये अमेरिकी बैंक ने पूंजी कर्ज पर दी है। करीब 9 हजार करोड से ज्यादा सिर्फ अमेरिका के सरकारी बैंक यानी  बैक आफ अमेरिका का लगा है। कोयले का संकट ना हो इसके लिये कोयला खादान के ऱाष्ट्रीयकरण की नीतियों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। खुले बाजार में कोयला पहुंच भी रहा है और ठेकेदारी से कोयला खादान से कोयले की उगाही भी हो रही है। कोयला मंत्रालय ने ही कोल इंडिया की जगह हिंडालको और एस्सार को कोयला खादान का लाइसेंस दे दिया है। जो अगले 14 बरस में 144 मिलियन टन कोयला खादान से निकालकर अपने पावर प्लांट में लगायेंगे। तमाम कही बातों के दस्तावेजों को बताते दिखाते हुये हमने ख दान और गांव के चक्कर पूरे किये तो लगा पेट में सिर्फ कोयले का चूरा है। सांसों में भी भी कोयले के बुरादे की घमक थी। और संयोग से ढलती शाम या डूबते हुये सूरज के बीच सिंगरौली में ही आसमान में चक्कर लगाता एक विमान भी जमीन पर उतरा । पूछने पर पता चला कि सिगरौली में अमेरिकी तर्ज पर हिंडालको की निजी हवाई पट्टी है जहा रिलायस,टाटा,जिदंल,एस्सार , जेयपी समेत एक दर्जन से ज्यादा कारपोरेट के निजी हेलीकाप्टर और चार्टेड विमान हर दिन उतरते रहते हैं। और आने वाले दिनो में सिंगरौली की पहचान 35 हजार मेगावाट बिजली पैदा करने वाले क्षेत्र के तौर पर होगी। जिस पर भारत रश्क करेगा।

भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या!


 सचिन कुमार जैन
भूख क्यों पैदा होती है? इस सवाल का जवाब दीजिए! जवाब- क्योंकि शरीर और अपना काम करने के लिए उर्जा की जरूरत पूरी करने के लिए भोजन की जरूरत होती है और उसी जरूरत की अभिव्यक्ति है भूख। अगला सवाल यह की पेट की भूख किससे दूर होती है! स्वाभाविक है कि खाने से, रोटी से! यह सामग्री कहां से मिलती है? कारखाने से या प्रकृति से, बाजार से जंगल से, जमीन से, पानी से! जब भरपेट खाना नहीं मिलता है तब भूख वंचितों की जीवन की सहयात्री हो जाती है।

अब भूख का जन्म सरकार की नीतियों की कोख से होता है। उस सरकार की कोख से, जो यह मानती है कि खाद्यान्न और खाना उद्योगों और चिमनी वाले कारखानों में उपजता है। वह सरकारें जो यह मानती हैं कि जमीन बांझ हो जाए तो कोई समस्या नहीं है, नदी सूख जाए तो कोई संकट नहीं है, जंगल उजड़ जाए तो भी अस्तित्व संभव है। वह प्राकृतिक सम्पदा को निजी संपत्ति का दर्जा देने को तत्पर है क्योंकि उसे रोटी की पूंजी से ज्यादा मुद्रा की पूंजी से मुहब्बत है। वह अपने इस पागलपन में यह भूल जा रही है कि भोजन के बिना जीवन संभव नहीं है और भोजन खदानों से नहीं निकलता है, वह तो खेत में लहलहाता है और जंगल में बिखेरा जाता है। बस सोच का यही विरोधभास हमारे सामने भुखमरी से संकट के रूप में सामने है। हम बड़ी बात छोड़ दें और केवल आदिवासियों की बात करें तो बात थोड़ी और स्पष्ट होती है। शिक्षित लोग बता रहे हैं कि आदिवासियों के बच्चे ज्यादा कुपोषित हो रहे हैं। सरकार की तमाम योजनाओं में आदिवासियों को वंचित, पिछड़ा या आदिम समूह कहा जाता है। उन्हें छोड़कर बाकी समाज "विकसित" हो गया है। पर लोग वास्तव में सच जानना नहीं चाहते हैं।

मध्यप्रदेश के डिंडोरी, मंडला, बालाघाट, सीधी और सिवनी जिले के बैगा और गोंड आदिवासी जंगल से 25 तरह के मशरूम, 5 तरह की शहद, 28 तरह के कंद, 45 तरह की भाजियां लाते थे। यह उनकी खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य को सुरक्षित रखता था। इस संपदा को लौटाने के लिए सरकार को जंगल की कटाई रोकनी पड़ेगी, पर क्या सरकार इसके लिए तैयार है? आदिवासियों को जंगल से ही आंवला, औषधीय पौधे, इमली, चिरौंजी, हर्रा-बहेड़ा, तेंदू, महुआ मिल सकता है, जो उनकी आजीविका को एक ठोस आधार प्रदान करेगा।

महाकौशल के इलाकों में 30 साल पहले 56 तरह के अनाज मिलते थे। आज लोग केवल 24 के बारे में जानते हैं, 28 तरह के कंदमूल में से 13 के बारे में जानकारी है, 45 तरह के फल- फूल में से 21 की और 54 तरह की सब्जी-भाजी में से 27 की जानकारी उपलब्ध है। जिन्हें आज सरकार पिछड़ी बताती है, वे 262 तरह की सामग्री का अपने खाने में उपयोग करती थीं। तो पिछड़ा और गरीब कौन है? बालाघाट के सिंगौरी गांव में विस्थापित जीवन जी रही बरको बाई ने कहा "देख भईया, भोपाल से आया है। हमने सब सुन लिया। अब तुम हमार बात सुनीस। हमका जंगल से भगा देईस तो हमार तो रोटी चला गया। सरकार बस दाना देकर मुर्गी लड़ाई, अब नहीं। हमें कहता है तुमने जमीन पर कब्जा किया है। अब छोड़ो। सैंकडों साल से रह रहे थे। अब कहते हैं हम अवैध हो गए। कोई ये न बताई कि कहां जाई। अब जंगल न जा सके, जानवर न पाल सके, देवता न पूज सके, कंदा भाजी मिलता था पेट भरती का, अब वह उनके कब्जे में है।" विकास की मौजूदा अवधारणा ने आदिवासियों के गुजारे की मूल व्यवस्था को तोड़कर रख दिया है। इसी कारण आज यही समुदाय सबसे ज्यादा भूख और सामाजिक असुरक्षा का शिकार हुआ। मध्यप्रदेश में सिंचित खेती का रकबा कुल क्षेत्र का लगभग 37 प्रतिशत है, लेकिन 10 फीसदी से कम आदिवासी इलाकों में ही सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। उनकी जमीनें ऊबड़खाबड़, पठारी और असमतल है। रागी, कोदो, कुटकी, सांवा, दलहन आदि पौष्टिक अनाजों को, जिन्हें आज मोटा अनाज कहा जाता है, असल में बारीक अनाज होता है। इनका उत्पादन कम होता गया, पर आज भी प्रदेश को पौष्टिक अनाज का 90 फीसदी हिस्सा इन्हीं आदिवासी इलाकों से मिलता है।

जब सिंचाई की बात होती है तो यह क्यों नहीं देखा जाता कि कम पानी वाले स्थानों पर पौष्टिक अनाज की परंपरा और व्यवहार वाली अर्थव्यवस्था रही है। सिर्फ गेहूं और चावल की ही बात क्यों? जबकि हम जानते हैं कि चावल में 6.8 ग्राम् प्रोटीन और 0.7 मिलीग्राम आयरन होता है, परन्तु बाजरा में 10.6 ग्राम प्रोटीन और 16.9 मिलीग्राम आयरन होता है गेहूं में 11 मिलीग्राम केल्शियम है, लेकिन रागी या नाचनी में 344 मिलीग्राम कैल्शियम होता है। अपने गांव की थाली में से रागी गायब है पर बड़ी कंपनी रागी से नूडल्स बना कर बाजार में यह कह कर बेंच रही है कि इससे बच्चों का विकास होगा और वे स्वस्थ नागरिक बन जायेंगे। ब्रिटानिया कंपनी ने रागी से बना बिस्किट बाजार में बेचना शुरू किया। वे प्रचार करते हैं कि मधुमेह के मामले में रागी बिस्किट बहुत उपयोगी उत्पाद है। जब् एक बड़ी कंपनी बाजार में आकर विज्ञापन दिखाकर ऊंची कीमत पर वस्तु बेचती है तो समाज को उस पर ज्यादा विश्वास होता है और जब समाज के ज्ञान और व्यवहार की बात होती है तो प्रकृति से रागी, कोदो, कुटकी, महुआ लेने वाले आदिवासी समाज को पिछड़े समुदाय का दर्जा दिया जाता है।

अखबारों में अक्सर सामने आता है कि आदिवासी घास की रोटी खा रहे हैं। असल में यह सावा नाम की घास है। उसमें गेहूं से ज्यादा प्रोटीन और आयरन होता है। ये जलवायु परिवर्तन से जमकर मुकाबला कर सकते हैं। यदि हम स्थानीय पौष्टिक अनाजों के उत्पादन और उपयोग को प्रोत्साहित करने के साथ यह सुनिश्चित करें कि ये आदिवासियों की थाली तक पहुंचे तो काहे का कुपोषण!! बैतूल में गुरुवा गांव के किसान भैयालाल कहते हैं कि सरकारी योजना की कोई बात मत करो। अधिकारी हमें गेहूं और धान के बीज देकर समझते हैं कि ये उगाओ, अच्छे भाव मिलेंगे। जब खेत में पानी नहीं है तो पानी पीने वाली इन फसलों को उगाकर हम जिंदा कैसे रहें? डिंडोरी के लमतु बैगा के मुताबिक, अधिकारी जानते ही नहीं हैं कि बैगा किस तरह की खेती करते हैं। वे आये और धान का बीज बांट गए। कोदो- कुटकी के बीज तो उनके पास होय नी, हमारी फसल के बारे में न वो पूछे, ना वो कुछ जाने। बिना कोदो कुटकी खाए और, मक्के का पेज पिए बिना हमार जात का पेट ही न भरे। अब आप ही सोचिये पिछड़ा अज्ञानी और नादान कौन है?

लेखक विकास सम्वाद केंद्र से जुड़े जाने-माने समाज विज्ञानी हैं।

प्रसारण के डिजिटलीकरण की जिद


सौमित्र रॉय
पहले एंटीना, फिर केबल और अब छतरी। कल का बुद्धू बक्सा आज बाजार की दौड़ में समझदार हो गया है। दिसंबर 2011 में संसद ने कानून पारित कर इसे तकनीकी रूप से ताकतवर भी बना दिया है। केबल टीवी नेटवर्क (नियमन) कानून 1995 की धारा 9 में संशोधन से डिजिटल टीवी प्रसारण अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। इसको सरकार की बचकानी जिद कहें या बाजार का बढ़ता दबाव, यह मान लिया गया है कि जिसके पास सामर्थ्य होगी वह बिना गुण-दोषों को परखे इसे मान लेगा और बाकी आखिर में मानने पर मजबूर हो ही जाएंगे। यह पूछे बिना कि आखिर सरकार को अचानक टेलीविजन प्रसारण का डिजिटलीकरण करने की क्यों सूझी? केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय इसे एक ऐसी पारदर्शी व्यवस्थाओं की शुरुआत बता रही है, जो टीवी उपभोक्ताओं की वास्तिविक संख्या यानी 20 करोड़ परिवारों की जानकारी देगा। इससे फर्जी उपभोक्तावाद के रूप में केबल ऑपरेटरों की काली कमाई बंद होगी। सर्विस टैक्स और मनोरंजन कर की ज्यादा वसूली होगी।

लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि डिजिटलीकरण की अनिवार्यता से एक स्पष्ट विभाजन की स्थिति बनेगी। यानी जो डिजिटल टीवी देख पाने में समर्थ हैं और वे जो इसकी हैसियत नहीं रखते। केंद्र सरकार डिजिटलीकरण की प्रक्रिया के पीछे जिस पारदर्शिता का दावा कर रही है, उसकी हवा देश के चार महानगरों में पिछले साल ही निकल चुकी है। इसके बावजूद दूसरे चरण में भोपाल, इंदौर और जबलपुर समेत देश के 38 बड़े शहरों में इसे 31 मार्च तक अनिवार्य रूप से लागू किया जा रहा है। यह प्रक्रिया तकरीबन आधार कार्ड जैसी है, जिसका कोई वैज्ञानिक व प्रमाणिक आधार नहीं है। टीवी प्रसारणकर्ताओं और मास्टर ऑपरेटर्स के लिए तो यह फायदे का सौदा है, क्योंकि बैठे-बिठाए उन्हें 70 प्रतिशत तक ज्यादा कमाई होगी। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में उपभोक्ता बंधुआ हो जाएगा। इसका दर्द उसे अभी से महसूस हो रहा है। सौ फीसदी डिजिटलीकरण के दावे से सजे दिल्ली और मुंबई में स्थानीय केबल ऑपरेटरों ने उपभोक्ताओं की पूरी जानकारी भरे बगैर उन्हें घटिया सेट टॉप बॉक्स (एसटीबी) थमा दिए। इसके लिए दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के द्वारा तय 800 रुपए से ज्यादा लिए गए।

इस दलील पर कि 800 रुपए में तो घटिया एसटीबी आएगा। लेकिन 1500 रुपए देने के बाद भी प्रसारण की गुणवत्ता पहले से भी घटिया है। ट्राई ने बीआईएस मानक के एसटीबी मुहैया कराने की हिदायत दी है, लेकिन पहले चरण और अब दूसरे चरण के शहरों में भी इस तरह के डिब्बों की संख्या 30 प्रतिशत से भी कम है। इसका खामियाजा उपभोक्ताओं को भुगतना होगा, क्योंकि उन्हें इस पूरी प्रक्रिया की कोई तकनीकी जानकारी नहीं है। इसे सेवाओं का तकनीकी विभाजन भी कहा जा सकता है, क्योंकि 20 करोड़ परिवारों में से उपभोक्ताओं का 80 फीसदी केबल प्रसारण पर निर्भर हैं। इन्हें पहली पीढ़ी की गुणवत्ता वाले प्रसारण से काम चलाना होगा, जबकि बाकी के 20 फीसदी घरों में छतरी से सीधे पहुंच रहा डायरेक्ट टू होम (डीटीएच) तीसरी और चौथी पीढ़ी का है।

डिजिटलीकरण की अनिवार्यता के कारणों को समझते समय हमें यह देखना होगा कि आखिर पूरी प्रक्रिया की कमान किसके हाथ होगी? आप अपने हाथ में टीवी का रिमोट होने पर चाहे जितना इतराएं, पर असल में इसका नियंत्रण केंद्र सरकार के हाथ में होगा। वह जब चाहे, केबल प्रसारण पर रोक लगा सकती है।

टीवी पर दिखाए जा रहे विज्ञापनों को भी केंद्र सरकार नियंत्रित करेगी। चूंकि डिजिटलीकृत प्रसारण एनक्रिप्टेड यानी नकल न किए जा सकने योग्य होंगे, तो इस स्थिति में स्थानीय चैनलों और शहर के विज्ञापनों पर भी रोक लग जाएगी। उपभोक्ता तब झक मारकर वही देखने पर मजबूर होगा, जो उसे प्रसारणकर्ता और मल्टी सिस्टम ऑपरेटर दिखा रहा है। डिजिटलीकरण के दूसरे चरण में पहले चरण के मुकाबले पांच गुना ज्यादा खर्च आ रहा है, क्योंकि लगभग आधा भारत इसके दायरे में आ जाएगा। केंद्र ने केबल टीवी प्रसारण में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाकर 74 फीसदी कर दी है। यह पैसा न तो शहरी निम्न मध्य वर्गीय उपभोक्ताओं की सुविधा बढ़ाने के लिए लगाया जा रहा है और न ही गांव के आखिरी व्यक्ति के लिए। कंपनियों ने तैयारी कर ली है। उनके लिए 122 करोड़ उपभोक्ताओं का खुला बाजार है। वे खास उपभोक्ता वर्ग के लिए चैनल तैयार कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर हाई डेफिनिशन में होंगे। इन्हें देखने के लिए पूरा टीवी और सेट टॉप बॉक्स बदलना होगा। कुछ चैनलों के गुच्छे नए सिरे से तैयार हो रहे हैं, क्योंकि लोगों में उनकी मांग है। नतीजा यह होगा कि उपभोक्ताओं को जहां डिजिटल केबल प्रसारण के लिए प्रति माह 170 से 200 रुपए का वादा किया जा रहा है, उनसे आने वाले समय में 300 रुपए वसूले जाएंगे।

आजकल सरकार कानून और नीतियां अलग-अलग बनाती है और दोनों में भिन्न बात कही जाती है। कानून हकदारी की बात करता है तो नीतियां भेदभावपूर्ण होती हैं। इस मामले में भी केंद्र सरकार ने केबल उपभोक्ताओं से प्रतिमाह लिए जाने वाले शुल्क के निर्धारण का हक एमएसओ और स्थानीय केबल ऑपरेटरों पर छोड़ दिया। सरकार इस बात की भी कोई गारंटी नहीं दे रही कि शहरी निम्न वर्गीय परिवारों और आगे चलकर गांव के गरीब परिवारों से रियायती दरों पर शुल्क वसूला जाएगा। पेट्रोल- डीजल की तरह सब कुछ बाजार भरोसे है। बाजार अपनी मनमानी करेगी और सरकार चुपचाप देखती रहेगी। इस प्रक्रिया में लाखों परिवार सूचनाओं और मनोरंजन के पिटारे का लुत्फ उठाने से वंचित हो जाएंगे। आखिर में हार मानते हुए उन्हें अपने घरेलू बजट का एक हिस्सा सरकार और केबल ऑपरेटरों की जिद के आगे न्योछावर करना होगा।

निश्चित रूप से यह हकदारी देने के बजाय टेलीविजन जैसे सूचना-संचार के अहम साधन से वंचितों को दूर करने वाला कदम है। हालांकि व्यापक मध्यमवर्गीय समाज को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसके सामने सवाल भेदभाव का नहीं, मनोरंजन की मजबूरी का है। तेजी से आधुनिक हो रहे सिनेमाहॉल और मल्टीप्लेक्स में मनोरंजन 300 रुपए से ज्यादा महंगा है। सही मायनों में यही वर्ग उपभोक्ता है। गरीब, वंचितों को कौन पूछता है।

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं व विकास संवाद संस्था से जुड़े