Showing posts with label chandrika chandra. Show all posts
Showing posts with label chandrika chandra. Show all posts

Tuesday, March 17, 2015

राष्ट्रीय चेतना की अद्वितीय गायिका : सुभद्रा कुमारी चौहान

                                                                  - चन्द्रिका प्रसाद 'चन्द्र
तेरह अप्रैल, सन् उन्नीस सौ उन्नीस के पहले भी आता रहा है परंतु यह तारीख भारतीय
राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में अंग्रेजों के बर्बरता की कहानी याद दिलानेवाली तारीख बन गई।
बाग-बगीचे देशभर में है परंतु 'जलियावाला बागÓ अकेला ऐसा बाग है जहां अब घूमने और
सैर सपाटे के लिए लोग नहीं अतीत पर आंसू बहाने जाते हैं, जनरल डायर की नृशंसता पर
थूकने जाते हैं। मेले मिलने के लिए होते हैं लेकिन १३ अप्रैल १९१९ के बाद से यहां मेला जख्मों
को याद करने के लिए भरता है। श्रद्धांजलि सभा के रूप में परिवर्तित जलियांवाला बाग, हिंदी
कविता में सुभद्रा कुमारी चौहान की याद दिलाता है। बाग में हुए हत्याकांड पर कितनी ही
कविताएं लिखी गई परंतु सुभद्रा की 'जलियावाला बाग में बसन्तÓ सब पर भारी है। वसंत
आया- यहां कोकिला नहीं काक हैं शोर मचाते। काले-काले कीट भ्रमर का भ्रम उपजाते। कलियां
भी अधखिली मिली हैं कंठक फुल से। वे पौधे वे पुष्प शुष्क हैं अथवा झुल से। आना है ऋतुराज!
किंतु धीरे से आना। यह है शोक स्थान, यहां मत शोर मचाना। कितने ही निरीह बच्चे, स्त्रियां,
बूढ़े इस बाग में गोलियों से भून दिए गए और उसी जनरल डायर को ब्रिटिश संसद ने सम्मानित
किया था। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सुभद्रा कुमारी चौहान एकमात्र ऐसी सेनानी थीं
जिन्होंने अपनी लेखनी के साथ स्वयं आजादी के संघर्ष में भाग लिया। छोटे-छाटे बच्चों को घर में
छोडक़र या साथ लेकर पति लक्ष्मण सिंह के साथ अनेक बार जेल गईं। उनके संघर्ष का कार्य क्षेत्र
जबलपुर था। हिंदी क्षेत्र उन्हें 'झांसी की रानीÓ के बराय नाम याद करता है, ऐसा लगता है जैसे
झांसी की रानी का नाम लक्ष्मी बाई नहीं सुभद्रा कुमारी चौहान था। इस कविता, ने जितनी
लोकप्रियता प्राप्त की शायद ही कोई चरित-काव्य इसके बरक्स हो। 'खूब लड़ी मरदानी वह तो
झांसी वाली रानी थीÓ रचना-काल से लेकर आज तक लोगों को मुंह जबानी याद है। जब कवि
छद्म नाम से राष्ट्रीय भावों को अभिव्यक्त करने लगे थे, तब भी सुभद्रा ने छद्म नही ंकिया-
जाओ रानी! याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी और यह कहने से गुरेज नहीं किया- दिखा गई पथ
सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी। स्त्रियों
के हिस्से में वात्सल्य और करुण रस का ठप्पा लगा दिया गया है, सुभद्रा की कविताएं ओज
भरती हैं, 'मैं नहीं चाहती  रोनाÓ लिखती हैं। वीरों का कैसा हो वसन्त में कहती हैं- भूषण
अथवा कवि चन्द नहीं। बिजली भर दे, वह छन्द नहीं है। कलम बंधी, स्वच्छंद नहीं। फिर हमें
बताए कौन? हंत। वीरों का कैसा हो वसंत। जबलपुर नगर पालिका भवन के सामने सुभद्रा की
मूर्ति को देखते हुए प्रिय सहेली महीयसी महादेवी से कही हुई उनकी पंक्तियां याद आती है- 'मेरे
मन में तो मरने के बाद भी धरती छोडऩे की कल्पना नहीं है। मैं चाहती हूं, मेरी एक समाधि हो,
जिसके चारों ओर नित्य मेला लगता रहे, बच्चे खेलते  रहें, स्त्रियां गाती रहें और कोलाहल होता
रहें इसी मूर्ति अनावरण पर महादेवी ने कहा था- नदियों का कोई स्मारक नहीं होता, दीपक की
लौ को  सोने से मढ़ दीजिए पर इससे क्या होगा? हम सुभद्रा के संदेश को दूर-दूर तक फैलाने
और आचरण में उसके महत्व को माने, वही असल स्मारक है।
सुभद्रा की रचनाओं में वात्सल्य की सहजता और तरलता का प्रवाह है। आज जब बच्चों के
जीवन में बचपन विदा हो रहा है। माँ-बाप निरंतर निषेध और शिक्षा का पाठ पढ़ाते रहते हैं
ऐसे में सुभद्रा की एक कविता बरबस याद आती है। सूरदास के कृष्ण भी मिट्टी खाते थे, यशोदा
ने जब छड़ी लेकर धमकाना शुरु किया तो कृष्ण ने मुंह खोला परंतु वहां माँ को मिट्टी नहीं
संसार दिखा और वे विस्मृत हो गई थी। सुभद्रा के बेटी की सरलता मन मोह लेती है- 'मैं बचपन
को बुला रही थी, बोल उठी बिटिया मेरी। नंदन वन सी फूल उठी, वह छोटी सी कुटिया मेरी।
माँ ओ कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आई थी। कुछ मुंह में कुछ लिए हाथ में, मुझे खिलाने
लाई थी। मैंने पूछा- यह क्या लाई? बोल उठी वह माँ काओ। हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से, मैंने
कहा- तुम्ही काओÓ कौन सा व्यक्ति कौन इन बोलनि पर बलिहार नहीं होगा। बेटी के वात्सल्य
की यह पहली और सर्वश्रेष्ठ कविता है। जबकि सारा साहित्य पुत्र-प्रेम को ही वात्सल्य मानता है।
(स्वतंत्रता संग्राम) आंदोलनों में सुभद्रा की महत्ती भूमिका रही। वे ठकुरानी थी, राजा की पत्नी
थी लेकिन जिसने राष्ट्र प्रेम की चुनरी ओढ़ ली वह तो रंक हो जाएगा। वे हरिजनों के बीच बहुत
समादृत थी। बापू के अस्थि विसर्जन के अवसर पर ६ किलोमीटर पैदल सैकड़ों स्त्रियों के साथ
गईं जबकि अनेक स्त्रियां मोटर कार से गई थीं। कार वालों को सभा में जाने दिया गया और
पैदल वालों को रोक दिया गया। कलेक्टर से सुभद्रा भिड़ गई, कोई भी कांग्रेसी नहीं बोला,
शुक्ल जी, मिश्र जी, सुभद्रा ने कहा जब तक ये स्त्रियां भीतर नहीं जाएगी, अस्थि विसर्जन
कायक्रर्म नहीं होगा। अन्त में सभी को भीतर जाने की स्वीकृति के बाद ही वे मानी। अपनी ही
सरकार के विरूद्ध आजीवन लड़ती रही। पुत्री के कन्यादान की परम्परा पर उन्होंने कहा- मैं
कन्यादान नहीं करूंगी। क्या मनुष्य मनुष्य को दान करने का अधिकारी है? क्या विवाह के
उपरांत मेरी बेटी मेरी नहीं रहेगी। आज के नारी विमर्श के युग के पहले सुभद्रा के इस चिंतन
और क्रियान्वयन पर कितने सवाल उठे होंगे? जातिवाद की संकीर्ण तुला पर ही वर की योग्यता
को अस्वीकार करते हुए सुभद्रा चौहान ने पुत्री सुधा का प्रेम विवाह कथा- सम्राट प्रेमचंद के
सुपुत्र अमृत राय से करने की स्वीकृति दी। 'पथ के साथीÓ में महादेवी ने जिस शिद्दत से सुभद्रा
को याद किया है, वैसा संस्मरण हिंदी की निधि हैं। वे लिखती है - 'अपने इस आकार में छोटे
साम्राज्य को उन्होंने अपनी ममता के जादू से इतना विशाल बना रखा था कि उसके द्वार पर न
कोई अनाहूत रहा और न निराश लौटा। जिन संघर्षों के बीच से उन्हें मार्ग बनाना पड़ा वे किसी
भी व्यक्ति को अनुदार और कटु बनाने में समर्थ थे। पर सुभद्रा के भीतर बैठी सृजनशीलता नारी
जानती कि कांटों का स्थान जब चरणों के नीचे रहता है तभी वे टूटकर दूसरों को बेधन की शक्ति
खोते है। भारतीय गृहणी की सारी कलाएं सुभद्रा के जीवन में विराम पाती थीं। रानी झांसी की
समाधि पर उन्होंने लिखा था- 'यहीं कहीं पर बिखर गई वह, छिन्न विजय माला सी।Ó ऐसा
लगता है जैसे उन्होंने इसे अपने लिए ही लिखा था। माखनलाल चतुर्वेदी ने कहा था- सुभद्रा का
जाना ऐसा मालूम होता है मानो 'झांसी की रानीÓ की गायिका झांसी की रानी से कहने गई
हो, फिरंगी खदेड़ दिया गया और मातृभूमि आजाद हो

Thursday, January 22, 2015

राष्ट्रवादी चेतना के प्रखर कवि ‘निराला’

चन्द्रिका प्रसाद ‘चन्द्र’ 

भारतेन्दु ने देश की विवशता को देखते हुए इकट्ठा होकर रोने और ‘भारत दुर्दशा’ का आख्यान लिखकर जिस राष्ट्रीय चेतना 

की अलख जगाई, उसका परिष्कार ‘भारत-भारती’ ‘एक फूल की चाह’ ‘विप्लव गायन’ से लेकर ‘जागो फिर एक बार’ और ‘शिवाजी 
का पत्र’ के माध्यम से आम हिन्दी जन तक हुआ।  भारतेन्दु की अलख को अनेक कवियों ने स्वर दिया है। मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ आदि अनेक कवियों के बीच छायावादी कविता में सबसे ऊँचा सुर और स्वर महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का था। जयशंकर प्रसाद ने अपने नाटको के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को झंकृत किया, तो निराला ने ‘बस एक बार तू और नाच जा श्यामा’ का आहवान किया। भारतीय स्वतंत्रता का बोध अतीत के पन्नों को पलटते हुए निराला ने 
कराया- ‘जागो फिर एक बार’। आमतौर पर देशवासी यह मानने लगे हैं कि ‘सर्वाइवल आॅफ द फिटेस्ट’ का सिद्धांत दार्शनिक डार्विन 
का है। निराला इससे सहमत नहीं है। वे मानते हैं कि हजारों हजार वर्ष पहले कृष्ण की गीता में यह कहा गया है।  ‘निराला’ कहते हैं- 
‘योग्य जन जीता है’/पश्चिम की उक्ति नहीं/गीता है-गीता है/ स्मरण करो बार-बार/जागो फिर एक बार। भारतीय अतीत की 
गौरवशाली परंपरा का उन्हे जितना ज्ञान और बोध था उतना अन्य किसी कवि की रचनाओं में व्यक्त नहीं हुआ। श्यामा का आहवान 
करते हुए कहते हैं- कितने ही हैं असुुर चाहिए/कितने तुमको हार/लोगों को जागृत करते हुए कहते हैं - सिंही की गोदी से/छीनता रे 
शिशु कौन? मौन भी वह रहती क्या/रहते प्राण रे अजान/ ‘निराला’ दूसरा उदाहरण भी पेश करते हैं कि एक बकरी भी अपनी संतान 
के छिनने पर तप्त आंसू बहाती है इसीलिए ये बार-बार जागने का संदेश देते हैं, यह संदेश विवेकानन्द का था- उत्तिष्ठ जाग्रत......। 
संसार में ऐसे बहुत कम कवि एवं कलाकार हुए हैं जिनका जीवन और साहित्य (कला) दोनों महान हैं। ‘निराला’ जीवन और 
साहित्य दोनों में महान थे। असाधारण कायिक गठन (ग्रीक देवता की तरह) असाधारण स्वर और सुर, महान् रचना कर्म, देशभक्ति, 
अध्यात्म, दर्शन, चिन्तन और अजीब तरह के फक्कड़ पन का नाम है ‘निराला’। अपने जीवन में जितने दुख निराला ने झेले उतने दुःख 
किसी कलाकार कवि ने शायद ही झेले हो, परन्तु ‘निराला’ ने कभी ‘आँसू’ नहीं बहाए। ‘सरोज स्मृति’ उनका एक मात्र शोक गीत है 
और यह गीत संसार भर के शोकगीतों पर भारी है जिसमेें उन्होने आत्म भाव से स्वीकार किया है। - ‘ दुख ही जीवन की कथा रही/क्या 
कहूं आज जो नहीं कही। धन्ये! मै पिता निरर्थक था/कुछ भी तेरे हित कर न सका। उनकी प्रार्थनाओं में दैन्य नहीं, निराशा नहीं है। 
भारती की वंदना करते हुए ‘भारति, जय विजय करे’ की आकांक्षा करते हैं। वे वीणा वादिनी से प्रार्थना, अपने लिए नहीं भारत के लिए 
करते हैं - प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव भारत में भर दे। ‘निराला’ ने छंदो को तोड़ा, कविता को बंधन मुक्त किया लेकिन लय-ताल-
रव-छन्द को नये ढंग से व्यक्त करने का आग्रह किया। वे शब्द-शिल्प कथ्य की नवीनता के एक मात्र कवि है- नव गति, नवलय, ताल-
छंद नव/नवल कंठ, नव जलद मंद्र रव/ नव नभ के नव विहंग वृंद को/ नव पर नव स्वर दो। इतनी नवीनता सिर्फ निराला ने ही हिन्दी 
कविता को दी। कविता, कहानी, उपन्यास, रेखाचित्र, संस्मरण, अनुवाद सभी विधाओं को निराला ने नया रूप दिया। मिर्जा राजा जय 
सिंह के नाम  शिवाजी का पत्र राष्ट्रीय गौरव का अमूल्य दस्तावेज है। जिसमें पारस्परिक वैमनस्य और क्षुद्र स्वार्थ के लिए जय सिंह की 
भांति भारत को पराधीन बनाने वालों से सहयोग करने वाले लोगों की आँखे खोलने के लिए यह पत्र पर्याप्त भर नहीं स्वाधीन भारत के 
लिए भी दिशा संकेत है। भाषा के कई स्तर इस पत्र कविता में मिलते है। ‘तुलसीदास और राम की शक्ति-पूजा’ उनके काव्य का चरमोत्कर्ष है। इन रचनाओं में उन्होने आत्म-मुक्ति की साधना को नारी शक्ति-पूजा के माध्यम से व्यक्त किया है। ‘निराला’ भारतीय संस्कृति के सर्वोत्तम अंश के कवि हैं, परन्तु उन्होने जमीन पर रहने वाले भिक्षुक, दीन, विधवा, पत्थर तोड़ने वाली, झींगुर, महगू, कुकुरमुत्ता को हासिए पर नहीं केन्द्र में रखा। जिस दलित चेतना का परचम लहराने की कवायद आज के दलित लेखक कर रहे हैं उनके बरक्श ‘निराला’ ने उन दलितों के साथ जीवन साझा किया था। 
एकमेव भाव से निराला कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा और चतुरी चमार से एकात्म थे। ‘निराला’ के काव्य में द्वैत नहीं है, जीवन में 
भी तमाम विसंगतियों के वावजूद वे द्विधा मुक्त थे। ‘निराला’ की जीवन पद्वति रवीन्द्रनाथ के समीप थी। वे अच्छे गायक, वादक,कवि 
सब एक साथ थे। वे रवीन्द्र संगीत की तरह निराला-संगीत की रचना कर सके थे। परन्तु जन्मना और कर्मना विपरीत पृष्ठ भूमि के
कारण वे रवीन्द्र की तरह सफल न हो सके। अपनों की दी हुई पीड़ा पर विफरे जरूर- वे कान्यकुब्ज कुल कुलांगार/ खा कर पत्तल में करें 
छेद/ परंन्तु हारे नहीं  इसलिए कि उनमें राष्ट्रीय चेतना के मूल भाव थे जो वैयक्तिक्ता से परे थे। छायावादी कविता में जहाँ निराशा,
करूणा और आत्म पीड़ा का साम्राज्य दिखता है उनके बीच निराला एक मात्र ऐसा कवि हैं जिनकी कविता में ओज, प्रसाद, और सौंदर्य 
के गुण मौजूद हैं। ‘निराला’ ने पात्र और विषय के अनुसार भाषा को चुना- संध्या सुन्दरी, विधवा, जुही की कली आदि रचनाओं में 
जहाँ भाषा का औदार्य और गठन दिखायी पड़ता है वही भिक्षुक तोड़ती पत्थर में खड़ी बोली का सौंदर्य दिखायी पड़ता है। तुलसी दास 
और राम की शक्ति पूजा में सामासिक और आभिजात्य भाषा का प्रयोग निराला को संस्कृत-साहित्य के करीब खड़ा कर देता है। आम 
बोल-चाल और गाली गलौज की भाषा से भी वे ‘कुकुरमुत्ता’ कविता में परहेज नहीं करते- अबे, सुन बे, ओ गुलाब/खून चूसा खाद का 
तूने अशिष्ट/डाल पर इतरा रहा कैपिटलिस्ट/घड़ो पड़ता रहा पानी/तू हरामी खानदानी.‘निराला के काव्य पर वांग्ला साहित्य का प्रभाव है, वे रवीन्द्र, रामकृष्ण, विवेकानन्द और अरविन्द से प्रभावित हैं। उन्होने हिन्दी अपनी पत्नी मनोहरा से सीखी थी। तुलसी के राम कभी ब्रहम ध्यान में लीन होते नहीं दिखते, निराला के राम पूरी पद्वति से 
ध्यान योग से शक्ति की आराधना कर वरदान प्राप्त करते हैं। ‘राम की शक्ति पूजा’ के राम मनुष्य अधिक हैं ईश्वर कम। यह शाक्त 
परंपरा का वैष्णवी परंपरा से निराला-संयोग है। ‘निराला’ भाषा, तेवर और शैली में ही प्रखर नहीं, व्यक्तित्व में भी अभी तक हिन्दी 
का कोई कवि उनके आगे नहीं है अपनी बात तर्क और हठ पूर्वक मनवा लेने में उनका कोई सानी नहीं। 
मो0ः- 9407041430

Saturday, May 25, 2013

वर्ण, आश्रम और पुरुषार्थ के अंतरभेद!


 चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र
सं सार के सभी जीवों में मनुष्य सबसे असंतुष्ट प्राणी है।
संतुष्टि को वह क्रियाहीनता या मृत्यु मानता है। भारतीय मिथक कहते हैं कि अन्य जीव जन्तुओं के समान ही उसे भी उम्र मिली थी। जीव जंतु अपनी लम्बी उम्र से दुखी थे परंतु मनुष्य अपनी कम उम्र से परेशान और दुखी था। उसने ब्रrा से मदद मांगी और जीव जन्तुओं से उनसे उम्र उधार ली, परंतु वह उधार न कभी देने वाले ने वापस मांगी न उसने दी। इसी कारण अपनी जन्मजात उम्र को पारकर मनुष्य ने परकाया प्रवेश किया और गंध और कुत्ते और कीड़े मकौड़ों की उम्र जीता हुआ शतायु से चिरायु होने के लिए जीवन रक्षक दवाइयो पर टिका है, जो स्वयं का उत्पाद है, लेकिन सांस की डोर किसी और के हाथ है जिसे वह जानने में आदिकाल से लगा है। गॉड पार्टिकल्स भी उसका समाधान नहीं है। कब, जातियां बनी, वर्ण बने, आश्रम बने और पुरुषार्थ कौन श्रेष्ठ है, इस पर लम्बे बहस की गुंजाइश सदैव से रही है। गीता के कृष्ण कहते हैं- चारों वर्ण मेरी सृष्टि हैं जो गुण और कर्म आधारित हैं। कृष्ण-युग और उनके कुछ दिन बाद की कथाओं तक गुण कर्म निर्धारित वर्ण व्यवस्था मिलती है परंतु कालांतर में ब्राrाण के घर में पैदा होने और अपढ़ वेद विहीन होने वाले पुत्र को जाति च्युत नहीं किया गया और धनुर्धर सूत पुत्र को क्षत्रिय नहीं माना गया। तपस्वी शबरी और शम्बूक को जातीय श्रेष्ठता नहीं मिली, शम्बूक की हत्या तो ब्राrाणों के कहने से स्वयं भक्त वत्सल श्रीराम ने की। कृष्ण के युग में ही गुण कर्म की उपेक्षा हुई। एकलव्य, अजरुन से श्रेष्ठ धनुर्धर है, यह द्रोणाचार्य जानते थे अत: बिना गुरु हुए दक्षिणा मांगने के अधिकारी कैसे हो गए? जातीय परिभाषा की स्वीकृति और अस्वीकृति दोनों महाभारत में पर्याप्त हैं। व्यास धीवर कन्या के ऋषि पुत्र हैं और समाप्त होते कुरुवंश के पिता हैं। उन्हें महर्षि का पद प्राप्त है।
महाभारत के कथाकार हैं। सारा कथासूत्र उनके हाथ में है।
आर्य सभ्यता की इस जाति व्यवस्था में बहुत बड़ा प्रश्न है शिल्प और कलाओं का संबंध त्रिवर्णो से नहीं था। विश्वकर्मा को भगवान माना गया परंतु उनकी जाति की हद भी बता दी गई।
यह मानने से गुरेज नहीं होना चाहिए कि कारीगरों, शिल्पकारों को स्वार्थवश आर्येतर जातियों से खींचकर, चौथे वर्ण में लाया गया। ये ही कलाकार आदिकाल से सभ्यता और संस्कृति की कहानी कह रहे हैं। पुरातत्वों में प्राप्त शिल्प त्रिवर्णो के बनाए शायद ही हों। आज भी मिस्त्री अंत्यजों से ही आते हैं। यदि कर्म आधारित जाति होती तो सारे इंजीनियर शूद्र होते। शिल्प और कला नागरिक सभ्यता के चिह्न् हैं। खुदाई में प्राप्त प्राचीन ईंटे किस जातीय सभ्यता की सूचना देती हैं। इन्हें भी जातीय संदर्भ में देखने की जरूरत है। जाति च्युत होने और जातीय श्रेष्ठता के उदाहरण वाल्मीकि और व्यास से लेकर सूत महाराज तक भरे पड़े हैं। तत्वदर्शियों को जाति से ऊपर माना गया। दाऊ बलराम का राज अभिमान इतना जागृत हुआ कि सूत महाराज के व्यास पीठ से उठकर उनका स्वागत न करने के अपराध में हत्या कर दी, फलत: ऋषियों द्वारा निर्धारित दण्ड बलराम को भोगना पड़ा।
सूत, सर्वश्रेष्ठ व्याख्याकार थे, किसी भी ब्राrाण से बढ़कर? ऋषियों ने चार काम्य निर्धारित किये, जिन्हें पुरुषार्थ कहते हैं।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। संसार के आवागमन से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य ने मोक्ष की कामना की। भारतीय मनीषा का एक बहुत बड़ा वर्ग पुनजर्न्म में विश्वास करता है और मानता है कि जीवन चौरासी लाख योनियों में जन्म लेकर अनेक तरह के कष्ट भोगता है, उससे मुक्ति का उपाय तप योग साधना है। प्रहलाद ने ईश्वर से इसी मोक्ष की कामना की थी और कहते हैं कि आज भी आकाश में सप्तर्षि उनकी अभ्यर्थना करते हैं। व्यक्ति का धर्म रिश्तों, सम्बन्धों, समाज और सम्पूर्ण प्रकृति के चर अचर के प्रति कैसा होना चाहिए, यह जानते हुए भी वह धर्म से विरत है। मोक्ष अब किसी पीठाधीश्वर के चिंतन में नहीं है। अर्थ और काम ही वर्तमान पुरुषार्थ के केन्द्र में है। इन दोनों में अच्छा तालमेल है।
जहां अर्थ है वहीं काम का साम्राज्य है। हमारे यहां स्वर्ग की कल्पना में भी यही भौतिक सुख ही तो है। देवराज इंद्र के लोक में समुद्र मंथन के अधिकतर र8 वहीं विराजते हैं। कामधेनु, कल्पवृक्ष, ऐरावत, उच्चैश्रृवा, रम्भा नृत्य सब वहीं तो है। जहां अर्थ है, वहीं काम है, वहीं स्वर्ग भी है। सारे देश के अर्थपतियों की दृष्टि देवराज का जीवन जीने के लिए सारे संसाधन जुटा रही है। अर्थ और काम से मनुष्य कभी संतुष्ट नहीं हुआ। मनुष्य के धतकरमों को हम पशुवत कहकर पशु धर्म का अपमान करते हैं।
पशु पक्षी, वनचर आज भी प्राकृतिक नियमों, अपने धर्म से बंधे हैं, परंतु मनुष्य ने दानवता की सारी सीमाएं लांघी हैं। यह सब प्रत्येक दिन देश संसार देख रहा है। काम एक अनुशासन था, साल, महीने, दिन तय थे, पशुओं पक्षियों के आज भी तय हैं, परंतु मनुष्य विकास के चरम पर खड़ा सभी जातियों से हीन है। अनेक प्राणियों के कुकर्मो का संगम है आज का विकास पुरुष।
आश्रम व्यवस्था भी पक्षपात पूर्ण रही। त्रिवणोर्ं को ही इस व्यवस्था में शामिल किया गया। ब्रrाचर्य आश्रम, पठन-पाठन, खेलने-कूदने, नाते-रिश्तों के पहचानने की उम्र की समयावधि थी। आश्रम व्यवस्था एक जीवन पद्धति थी, एक व्यवस्थित जीवन के लिए। ब्रrा के प्रति जिज्ञासा का भावारोपण इसी उम्र में होता था। पच्चीस वर्ष के बाद वह गृहस्थी बसाता था, पूरे मनोयोग से ब्रrाचर्य की शिक्षा का व्यवहारिक प्रयोगशाला गृहस्थ आश्रम ही था। संतान परिवार के प्रति लगाव इस आश्रम की शर्ते थीं।
पचास वर्ष की इस उम्र तक पुत्र पुत्रियों को दायित्व सौंप, वानप्रस्थ की ओर उन्मुख होना मोह-माया से धीरे-धीरे मुक्त होने की प्रक्रिया थी। वन में रहते हुए भी गृहस्थी में आना जाना लगा रहता था। निर्देश नहीं सलाह देने के लिए, जिस मां बाप ने लड़कों की गृहस्थी में ज्यादा हस्तक्षेप किया और वानप्रस्थी होते हुए भी उन्हें स्वतंत्रता से जीने की आजादी नहीं दी वे ही अधिक दुखी हुए। अंतिम अवस्था सन्यास की थी, जहां वह बोध हो जाता है, जो कि ‘ब्रrा सत्य जगत मिथ्या’ यदि ऐसा नहीं हुआ तो सन्यास का अर्थ ही विकृत हो जाता है।
देश भर में सन्यासी माया मोह में इतने लिप्त हैं जितना शायद ही कोई गृहस्थ हो। सब कुछ छोड़ने की उम्र में वे सर्वाधिक आसक्त हैं। अब इन वृद्धों को कौन समझए कि कहीं भी दो चार इकट्ठे होकर बेटे-बहुओं का दुख रोते वर्तमान समय को दोष देते हर जगह मिल जाएंगे। उनको लगता है कि मेरी गाढ़ी कमाई का उपयोग करते हुए पुत्र बहुएं हमारी सलाह क्यों नहीं लेते? उनके दुखों के अनंत कारण हैं, जिनका समाधान महर्षि व्यास के पास भी नहीं है। अपने रचे हुए सृष्टि से शिकायत का दोषी कौन है? - लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।
सम्पर्क सूत्र - 09407041430.Details

और भाग्य भरोसे रह गए हम..

चंद्रिका प्रसाद चन्द्र 
अहं ब्रrास्मि’ और ‘स्वयमेव मृगेन्द्रता’ का उद्घोष करने वाला देश, ईश्वराधीन और भाग्यवादी कैसे हो गया? सब कुछ वह करता है, हम निमित्त मात्र हैं, ‘उसके’ हाथ की कठपुतली हैं, डोर उसी के हाथ में है, जैसा नचाता है,       नाचते हैं, कभी लकड़ी के डर से, कभी प्रेम भरी पुचकार से। उस नंदी बाबा की तरह जो पैर पर लाठी लगने से दाता को आशीष में पैर उठा देता है। परिवार और स्वजन मोह से ग्रस्त कुरुक्षेत्र के खड़े अजरुन को समझने के सारे तर्क जब निष्फल हो गए तब कृष्ण ने उसे अपना विराट रूप दिखाया। और सबको मरा हुआ दिखाया, तब भी अजरुन ने गांडीव नहीं उठाया। अंत में कृष्ण ने सब कुछ छोड़कर अपनी शरण में आने को कहकर आश्वस्त भाव से युद्ध के लिए प्रबुद्ध किया। गीता के उपदेश निश्चेष्ट और अकर्मण्यता के विरुद्ध प्रवृत्ति के मार्ग पर चलने के हैं। लोक में गीता पढ़ना वजिर्त है, शायद इसलिए कि वह महाभारत का अंश है और महाभारत पढ़ने की लोक स्वीकृति नहीं है, क्योंकि वह युद्ध ग्रंथ है और युद्ध की समाप्ति के साथ का निव्रेद भाव अशांति उपजाकर मरने के लिए स्वर्गारोहरण का छद्म करता है। भारतीय बहुसंख्यक वर्ग ‘गॉड पार्टिकल’ की सूचना के बावजूद ईश्वर की मूर्ति स्थापना में लगा है। ऋषियों ने ज्ञान बल से ईश्वर चिंतन की अनुभूति की परंतु अपनी शक्ति को कमतर नहीं माना और इसकी स्थापना से इंकार नहीं किया कि उसने ही ईश्वर को जन्म दिया। साकार, निराकार और ‘नहीं होने’ के तर्क भी दिये परंतु चिंतकों के तमाम निषेधों के बीच लोक ने ईश्वर को इंकार नहीं किया। वह धरती पर मरता खपता रहा, उसका भाग्य वह अदृश्य ईश्वर लिखता रहा । वह इसे ब्रrा वाक्य मानता रहा कि ‘जो विधना ने लिख दिया, छठी रात के अंक। राई घटे न तिल बढ़े, रहुरे जीव निशंक।’ लेकिन उस भाग्य-लेख की लिपि किसी के पल्ले कभी नहीं पड़ी। सब कुछ हो जाने पर ‘यही भाग्य में लिखा था’ का स्वीकार भाव की परिणति ही उसकी निष्पत्ति रही, इसे ही भाग्य-बोध कहा गया।
भाग्य पर जीने वालों ने भाग्य से समझोता कर प्रतिरोध की संस्कृति को द्वार के बाहर ही रखा। इसी कारण इतने विशाल देश का भाग्य हमेशा विदेशी आकर लिखते रहे। कितनी संख्या में यवन, शक और हूण आए और हमारी भाग्यवादिता का मजाक उड़ाते हम पर शासन करते रहे। सकिंदर भाग्यवादी नहीं था, वह अपनी शक्ति से अनेक देशों पर विजय करते अंत में भारत पहुंचा था। सीमावर्ती पश्चिमी जनपदों में विजयी हुआ था परंतु लड़ते लड़ते थक चुका था। अपने देश तक वापस नहीं पहुंच सका।
अपना भाग्य, अपने कर्मो से विश्व इतिहास में लिख गया। विश्व विजेता भले ही न रहा हो, विश्व विजेता कहलाया। बाबर कितनी सेना लेकर आया लेकिन उसकी सल्तनत ने कई पीढ़ियों तक हम पर शासन किया। कर्म का यह सिद्धान्त हमारे देश में राम और कृष्ण से पहले भी था, परंतु हमने उन्हें अमानवीय या अतिमानवीय मानकर हाशिए पर डाल दिया। पिद्दी जैसे लोगों के सामने घुटने टेकने की अनगिनत कहानियां हमारे इतिहास में दर्ज हैं। आपसी मनमुटाव और भेदभाव में अम्भीक बनकर यवनों को निमंत्रित करते रहे। मुहम्मद गोरी और महमूद गजनवी के दंश को देश भोगता रहा। अंधभक्ति की अति तो तब हुई जब सोमनाथ के महंतों ने शिव की मूर्ति पर ही विश्वास कर कि ‘स्वयं सोमनाथ ही गजनवी का संहार करेंगे’ महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करते रहे और मूर्ति गजनवी के गदे के प्रहार से खण्ड-खण्ड हो गई। मंदिर में स्थापित मूर्तियां अन्यायी को दण्ड देगी, यह मनोभावना आज भी हमारी आस्तिकता का मेरुदण्ड है? पद्मनाभि मंदिर के उस गर्भ गृह को खोलने की इजाजत देने की शक्ति किसी व्यवस्था के पास नहीं है। मंदिरों में जमा असंख्य र8राशि जो ‘डम्प’ पड़ी है वह किसकी है और किसके काम आएगी? क्या वह जनता की गाढ़ी कमाई नहीं है जिसे राजाओं ने छुपाकर धर्मप्राण जनता को ठगा था, ईश्वर और उसके घर के नाम पर।
परम्पराओं के अत्यधिक दबाव से अक्सर हमने वर्तमान को समझने में भूल की। व्यापार की भीख मांगने वालों ने न सिर्फ हम पर शासन किया, हमारा इतिहास भी लिखा, हमें अपनी तरह बाहर से आया हुआ घोषित भी किया और जाते जाते सम्प्रदाय का वह विष बो गए जो आज भी फलफूल रहा है। उनके आने के पहले हमारे सम्प्रदाय संघर्ष की कहानी इतनी विषाक्त नहीं थी। डेढ़ सौ वर्ष की अंग्रेजी संस्कृति ने हमारी हजारों वर्षो की भारतीय संस्कृति की चूलें हिला दीं। आज भी हम उनके स्वागत में लाल दरी बिछाते हैं। वे जो हमारा कोहिनूर, तख्त-ए-ताउस चुरा ले गए। वे जिन्होंने लाल किले की छतों के फानूस, हीरे, नग, नोच लिए । वे जो हमारे बादशाहों की कोर्निश, हाथ जमीन पर रख सिर घुटने तक झुकाकर करते थे, आज उनकी भाषा और धोखा देने वाली संस्कृ ति का गुणगान करते नहीं थकते और वे हमें अपना पिछलग्गू समझते हैं। गोरी और गजनवी ने हमारी संस्कृति नहीं छीनी थी, धन लूटा था जिसे हम हाथ का मैल कहते थे, वे देश के आदर्श नहीं बने थे लेकिन अंग्रेज हमारे आदर्श बने हैं, हम भारतीय भाषाओं का विशाल भण्डार लिए अंग्रेजी में सोच और लिखकर ‘बुकर पुरस्कार’ पाने पर गर्वित हैं। भोजन, भारत का करके इंग्लैण्ड, अमेरिका में सांस ले रहे हैं। किस मुंह से हम विवेकानन्द, गांधी, रवीन्द्र का नाम लेते हैं। नाम स्मरण भक्ति का स्वरूप हो सकती है। उनके कार्यो को समय की आवश्यकतानुसार नया स्वरूप देना ही उन्हें याद करना है। कितनी अजीब विसंगति है कि गीता का कर्मयोग संतों और सन्यासियों की व्याख्या तक सीमित रह गया। उसे गांधी विनोबा, तिलक और अरविन्द ने जिस तरह समझ, उस तरह देश के निर्माताओं ने नहीं समझ।
हमने इतिहास से कभी सबक नहीं लिया, कदाचित इसीलिए हम हर बार पराजित होते रहे। राष्ट्रीय गान की तरह शब्द के अर्थ से परहेज करते हुए गाते रहे- ‘एक धोखा खा चुके हैं, और खा सकते नहीं’परंतु कभी विश्वास करते हुए कभी दबाव वश वार्ताओं की परिणामहीन परम्परा का निर्वाह करते रहे, कर रहे हैं। कभी कच्छ के रण का, कभी सियाचिन का कभी मेघालय, नागालैण्ड की सीमारेखा का रोना देश के सामने रोते रहे। हम न तो ठीक से किसी के विरोधी हो सके न मित्र। यह जानते हुए भी कि अमेरिका और चीन किसी के मित्र नहीं हो सकते, एकतरफा दोस्ती का हाथ बढ़ाते रहे। अमेरिका विश्व के लिए सिरदर्द ‘दादाभाई’ है। भारत उसके लिए सिर्फ उसका कबाड़ खरीदने के लिए बाजार है, चीन का भी सबसे बड़ा बाजार भारत है। हमने अपनी अस्मिता से समझोता कर लिया। अमेरिका-चीन नहीं बन सके परंतु क्यूबा और इजराइल से भी कुछ नहीं सीख सके। रूस जैसे मित्र को भी हाशिए पर डाल दिए। ‘अहं ब्रrास्मि’ दार्शनिकों के हिस्से में चला गया लेकिन मृगेन्द्र तो हम स्वयं थे, कहां गए वे भाव जो हमारे जीवन मूल्य थे।
- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।
सम्पर्क सूत्र - 09407041430. 

Friday, May 10, 2013

शिक्षा का तीर्थ विश्वभारती


हमारे देश में एक ऐसा भी समय था कि विदेश यात्रा करने वाले को विधर्मी होने की आशंका से देखा जाता था, इसी कारण देश की तमाम प्रतिभाएं स्थानीयता में सिमटकर रह गईं।
मोहनदास करमचंद गांधी की मां ने लंदन पढ़ते जाते समय अनके शर्ते रखीं और गांधी ने उनका पालन करने का वचन दिया। बावजूद इसके, देश के जो भी लोग विदेश गए उन्होंने न सिर्फ देश में अपितु विश्व में विशिष्ट पहचान बनाई। शांति निकेतन (विश्वभारती) के रवीन्द्र संग्रहालय में नोबल पुरस्कार की प्रतिकृति (मूल पदक चोरी चले जाने के बाद) देखते हुए मैं सोच रहा हूं कि गांधी, अफ्रीका वकील बनकर गए थे, ..महात्मा.. बनकर लौटे। कहते हैं कि ..महात्मा.. का विरुद रवीन्द्र ने बापू को दिया तो बापू ने भी रवीन्द्र को ..गुरुदेव..कहा। विवेकानन्द शिकागो धर्म सभा में गए और ..स्वामी.. होकर जगत विख्यात हुए। यूं भारत की अपनी वर्तमान सीमा में ही अनेक जगत और गुरु हैं। सुभाषचन्द्र बोस ने आईसीएस की उपाधि ठुकराई, ..नेताजी.. के नाम से प्रसिद्ध हुए और सिंगापुर में आजाद हिन्द फौज की स्थापना की, विश्व की सबसे बड़ी शक्ति से लोहा लिया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जितनी विदेश यात्राएं की, आज तक शायद ही किसी भारतीय कवि ने इतनी यात्राएं की हों। रवीन्द्र ने दुनिया देखी अपनी दृष्टि से, दुनिया ने भारत को व्यावसायिक दृष्टि से भी देखा और अब भी देख रहा है। रवीन्द्र ने विश्व-यात्रा में आधुनिकता और भारतीय परम्परा पर गंभीर चिंतन किया।
आधुनिकता के शोर और भौतिकता के बीच वे भारतीयता के एकमात्र ऋषि हैं जिन्हें विश्व ने ..विश्वकवि.. माना। विश्व के अनेक देशों ने उन्हें सुना और भारत को जाना। ..नोबल.. की राशि उन्होंने ..भारती..को सौंप दी। रवीन्द्र ने देश के विद्यापीठों, मुस्लिम और हिन्दू विद्यालय देखे थे। भारती (सरस्वती) को वैश्विक बनाकर ..विश्वभारती.. की स्थापना की। बाद में वे विश्वगुरु हो गए, किसी विरुद से नहीं, विश्व की अठारह विदेशी भाषाएं विश्वभारती के आंगन में आज मुखरित हैं, अविरोधी और अकुंठ भाव से, परिवर्धित और पल्लवित होती हुई।
..अथातो जिज्ञासा.. जिन उपनिषदों का आर्षवाक्य हो, उसके अध्येता भूल गलती के डर से ज्ञान के कपाट बंद कर देंगे तो सत्य, द्वार से दस्तक देकर चला जाएगा।
महात्मा गांधी से प्रभावित होकर सीएफ एन्ड्रूज अपना देश छोड़कर बापू के पास रहकर ..दीनबन्धु.. हो गए। परंतु जीवन के उत्तरार्ध में एन्ड्रूज ने सारा जीवन रवीन्द्र के सम्पर्क में शांति निकेतन में बिताया। गांधी, रवीन्द्र के वैयक्तिक जादू से चकित थे। एन्ड्रज की मृत्यु गांधी शांति निकेतन गए और 1945 में..एन्ड्रज मेमोरियल अस्पताल.. की स्थापना पर रवीन्द्र के निधन के बाद भी गए और ..श्यामली.. में रुककर साबरमती की कलाहीनता को महसूसते रहे। जोरासांको का राजप्रसाद भले ही भव्य रहा हो उस जैसे प्रासाद देश में अनेक हैं, लेकिन शांतिनिकेतन श्री निकेतन, उत्तरायण, श्यामली और पुनश्च, विश्व भर में अकेले और अद्वितीय हैं। रवीन्द्र के अभिजात्य की भव्यता आकर्षित करती थी। जवाहर लाल नेहरु अनेक बार शांति निकेतन गए। इंदिरा 1931 में कला विभाग के प्रथम वर्ष में भर्ती हुई। गुरुदेव ने उनका नाम ..प्रियदर्शिनी.. रखा। रवीन्द्र को नामकरण का शौक था पत्‍नी भवतारिणी का नाम बदलकर ..मृणालिनी.. रखा। जवाहरलाल अपनी बेटी को संसार के किसी भी संस्थान में पढ़ा सकते थे परंतु रवीन्द्र का सानिध्य संस्कार के लिए अधिक उचित मान कर एकमात्र संतान को बाल्यावस्था में शांतिनिकेतन के हवाले कर दिया। पुरा भारतीय न तो विदेश गए न अपनी कला को जाने दिया। भारत के अनेक उत्पाद आज विश्व में सवरेपरि हैं। पतंजलि का योग सर्वमान्य हुआ जबकि यह देश में भी छिपाकर चोरी में किया जाता था। गांधी एक नाम नहीं विश्व का कोई भी ऐसा देश नहीं है जहां गांधी की प्रतिमा न हो और जिसे अहिंसा का देवदूत न माना जाता हो। भारतीय शास्त्रीय संगीत का परचम लहराने वाले पंडित रविशंकर जिनके सितार की बंदिश देश की पहचान है और भारतीय नृत्यों पर विश्व थिरकता है। यूनिसेफ 2001 में केरल के कुड़ीअट्टम नृत्य को विश्व धरोहर के रूप में मान्यता दी है। रवीन्द्र मात्र विश्व कवि नहीं थे। वे चित्रकार, शिल्पकार, गायक, वादक, अभिनेता, निर्देशक और संगीत के राजदूत थे। रवीन्द्र संगीत न सिर्फ बंगाल् और बांग्लादेश में गूंजता है, वरन भारतीय संगीत का मूल आनंद भाव लिए विशिष्ट बन गया है। भारत और बांग्लादेश के अनेक अंतरविरोधी समस्याओं के बावजूद दोनों देश एक ही भाव से रवीन्द्र की 150 वीं जयंती संयुक्त रूप से मना रहे हैं। यह राजनीति पर साहित्य और कला की अघोषित विजय है। बंगाल् का जातीय बोध श्लाघ्य है। देश का राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान बंगाल् के कवियों के नाम है। हिन्दी कवि भारत भारती लिखता है त् बांग्ला कवि विश्वभारती की कल्पना भर नहीं करता, उसे साकार करता है। शांति निकेतन को देखते हुए उसके अतीत की अनदेखी नहीं की जा सकती। किसी संस्थान को समग्र रूप से देखने के लिए उसके अतीत को भी देखना पड़ता है। वर्तमान से क्षुब्ध होना और भविष्य के प्रति चिंतित होना मनुष्य का स्वभा है। जहां बैठकर कभी आचार्य द्विवेदी ने ..अशोक के फूल.. लिख् थे, वहां उपजी गाजर घास और सीढ़ी तक ..आचार्य निवास.., मौसमी झड़-झंखाड़ों की गिरफ्त में है।
2013 विश्व कवि के नोबल का शताब्दी वर्ष है। देश और विदेशों में भी किसी भारतीय साहित्यकार की जयंती इतन् धूमधाम से नहीं मनाई गई। गीत-संगीत, नृत्य और नाटकों के साथ उन्हें याद किया जा रहा है। रवीन्द्र की परिकल्पना का ही परिणाम है कि विश्व में आश्रम कल्पना का एकमात्र शिक्षा केन् ..विश्वभारती.. सम्पूर्ण कला सम्पदा अपने में सहेजे है। प्रारंभ तो शांतिनिकेतन महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर का आवास मात्र था।
इस परिसर में भारत की संस्कृति दिखती है क्षेत्रीय होकर नहीं, वैश्विक होकर। हम हिन्दी वाले इसे हजारी प्रसाद के निबंधों, नंदलाल, रामकिंकर के चित्रों एवं रवीन्द्र के संगीत के माध्यम से जानते हैं। यूरोप, अमेरिका, कनाडा, चीन, जापान, श्याम, ईरान् जावा, वाली, मलाया, श्रीलंका की यात्राएं एक बार नहीं अनेक बार रवीन्द्र ने की। जिनकी बाहें सारी धरती को अपने आगोश में लेने सक्षम थी, वे कितने अकेले, एक अंतरंग मित्र के पत्र के जवा में गुरुदेव ने लिखा था- ..तुम्हारे लिए यह मुश्किल है कि कितने गहरे अके लेपन से भरा हूं। मेरा बाजार मूल्य काफी बढ़ गया है, पर निजी मूल्य कम हो गया है। आज रवीन्द्र की कायिक उपस्थिति हमारे बीच नहीं है परंतु विश्वभारती देखते हुए ह निरंतर आपाद मस्तक उनके जादुई व्यक्तित्व के साथ संग होते है - लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।
सम्पर्क सूत्र - 09407041430

Friday, May 3, 2013

मां के समझदार पूतों की करतूत्

 चंद्रिका प्रसाद चंद्र 
मां के समझदार पूतों की करतूत ह म संसार के एकमात्र ऐसे देश के निवासी हैं, जिसके पूर्वजों ने प्रकृति के प्रारूपों से मानवीय रिश्ते कायम किये। आकाश को पिता, धरती को माता कहा। मां के रिश्ते को सबसे बड़ा रिश्ता इसलिए कहा कि उसने न सिर्फ मनुष्य बनाया। हम मां के विरुद्ध एक शब्द भी सुनने को तैयार नहीं थे। मां के बरक्स हमने पृथ्वी को मां कहा-‘माता भूति: पुत्राेहं पृथक्या:’। जब जननी भी पेट में न रख सकी, उसने नवें महीने धरती को सौंप दिया। फिर भी कर्त्तव्य विमुख नहीं हुई, चूम-चाट, धो-पोंछकर छाती से लगाकर धरती पर खड़ा किया। नदी को हमने मां कहा, उसमें नहाए, पानी पिया, अघ्र्य दिया, जल को ही जीवन माना। भारतीय मनीषा ने गाय को भी मां कहा। जब जननी पिलाने में अशक्त हुई, इस नई मां ने पोषण दिया। कहते हैं जब अनाचार चरम पर हुआ, धरती थक गई, तब उसने गाय का रूप धारण करके प्रार्थना की थी और उसकी प्रार्थना सुनी गई थी। क्या ऐसा आज नहीं दिख रहा कि ये सारे रिश्ते दांव पर हैं। जननी, पुत्र सुख से विरत है, गायें तभी तक मां हैं, जब तक दूध देती हैं। नदी का पानी जहर बन चुका है, उद्गम तक प्रदूषित है और पेड़-पौधों, वनस्पतियों, जड़ी बूटियों, अनाज-फसलों वाली सत्तर प्रतिशत धरती का भाग खदानों, कांक्रीट के महलों, सड़कों की भेंट चढ़ चुका है। इसी देश में सात हजार किस्म की वनस्पतियां, तीस हजार किस्म के अनाज, एक हजार किस्म के आम और हजारों किस्म की औषधियां उपजती थीं। लोक कथा है कि मनुष्य और अनाज के किस्मों के संख्या बल पर हुए विवाद में मनुष्य की संख्या एक अधिक पाई गई और अनाज का वह अधिकारी हो गया। अजीब विरोधाभास है कि जिसे हमने पूजा, उसी को सबसे अधिक हानि भी पहुंचाई। प्रकृति के उपयरुक्त सारे उपादानों का दोहन भर नहीं किया, उसे विद्रूप भी किया। विकास के नाम पर प्रकृति का सारा संतुलन बिगड़ गया। धरती क्षमा का रूप होती है लेकिन क्षमा की भी सीमा होती है। उसकी कसमसाहट का अहसास अनेक बार होने के बावजूद हम आत्मविश्लेषण के लिए तैयार नहीं हैं।
कुछ कॉरपोरेटों के हितार्थ हम, राजा सगर के औलादों की तरह धरती को खोदकर पहाड़ और कुएं बना रहे हैं। हजारों साल के वासिंदे पुनर्वास की तलाश में भटक रहे हैं। विस्थापन के दर्द को विज्ञान की विकास भाषा नहीं जानती। जिन्हें हमने मां कहा, उन्हीं की सबसे अधिक दुर्गति की। देश के किसी भी नदी का पानी पीने लायक नहीं रहा। ग्लेशियरों में भी पॉलीथीन की पन्नियां बह रही हैं। पवित्रता का भाव मात्र बोधकथा बनकर रह गया है।
विश्व में अन्य किसी देश में नदियां इतनी प्रदूषित नहीं हैं। जर्मनी के बीचो-बीच बहने वाली राइन नदी की शुद्धता पर जर्मनी गर्व करता है। एक भी कचरा फेंकने पर सजा और जुर्माना दोनों का प्रावधान है। संसार की सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है। अकृतज्ञता हमारे स्वभाव में सांस लेने लगी है। हमारा पानी निरंतर उतरता जा रहा है। प्रकृति के सबसे बड़े दान को हम बोतलों में भरकर बेचने लगे हैं। बादलों का पानी तो बिका ही, आंखों का पानी भी बिकने को है।
साधारण और सीधेपन का उदाहरण हमारे मुहावरों में गाय से दिया जाता है। गाय का दूध-मूत्र-गोबर सब कु छ विशिष्ट है परंतु उसे भी सम्प्रदाय से जोड़कर संकीर्ण कर दिया। उसे तभी तक माता कहा जब तक वह दूध देती रही। गायों की वृद्धावस्था, जननी मां की वृद्धता के समान है। पुत्रों के परिवार की परिभाषा में मां-बाप नहीं हैं, कभी होते थे। सम्मिलित परिवार में एक का सुख-दुख सारा परिवार साझ करता था। बिना अपेक्षा के मां ने पुत्र को आदमी बनाया था, वही मां उपेक्षा की शिकार अकेला जीवन जीने को मजबूर है। सरकार ने कानून बनाया कि जो लड़के मां बाप का संरक्षण नहीं करते, उन्हें दंडित किया जाए, लेकिन तमाम कष्टों को ङोलते हुए भी किसी मां-बाप ने बेटों के विरुद्ध मुकदमा नहीं दर्ज कराया। पौत्र-पौत्री के लिए उनके हाथ आज भी दुआ के लिए ऊपर उठे हैं। टूटते परिवारों ने मां बाप के उत्तरार्ध जीवन को दयनीय बना दिया। जो कभी किसी से पुत्रों के लिए झुके नहीं, उन्हीं पुत्रों को देखने की अंतिम आस लिए जी रहे हैं और पुत्र पुन्नाम नरक में उन्हें भेज रहे हैं। हां, यह जरूर हुआ है कि पुत्रियों ने बाप मां की सेवा का संकल्प लेकर बेटी होते हुए भी मां का दायित्व निभाने की एक सर्वथा नई परम्परा डाली है। बेटियां जो कभी पूज्या हुआ करती थीं। जिन्हें देखते दुलारते और उनके पराया धन होने के नाते बरबस आंखें भर आया करती थीं, उनके साथ होते दुष्कर्म देखकर शर्म को भी शर्म आती होगी परंतु देश के जिम्मेदार नेताओं के बयान सुनकर, देश आश्चर्य चकित है। उनके लिए दुष्कर्म विरोधी कानून महज बेशर्म-बकवास बनकर रह गया। किस अतीत पर गर्व और किस वर्तमान पर शर्म करें। अतीत में द्रोपदी दिखती है तो वर्तमान में अनामिकाएं? शुद्धतावादी ड्रेसकोड की बात करते हैं, परंतु पांच और सात वर्ष की बेटियां कौन सी उत्तेजक परिधान और अंग दिखाने लायक हैं। मनुष्य की रुग्ण मानसिकता ने पशुता को भी पीछे छोड़ दिया।
धरती हमारी मां है। वह हर वस्तु अपने पास रखती है, इसलिए धात्री है, धरती है। बहुत कुछ मां बेटों से छिपाकर अपने भीतर रखती है। अनेक तरह के र8 उसने संभालकर छिपा रखे हैं, वह वसुंधरा कहलाती है। मनुष्य को उसने चेतना दी कि अपने काम भर के र8 निकाल लो। लेकिन मनुष्य ने धरती की हालत उस मुर्गी की तरह कर दी जो रोज सोने के दो अण्डे देती थी, मुर्गीपालक ने सोचा महीने भर में साठ अंडे तो देगी ही, रोज-रोज दो-दो की प्रतीक्षा से बेहतर है कि भीतर स्थित साठ अंडे एक ही दिन में क्यों न निकाल लें। मुर्गी को चीर दिया गया। एक भी अण्डे नहीं मिले। मनुष्य भी धरती से सारा धन निकाल लेने के लिए अत्याधुनिक मशीनें लेकर पिल पड़ा। धरती ने बेटों को निराश नहीं किया, परंतु वह गाय की तरह ठांठ-बांझ, नदी की तरह सूखी और वृद्धा मां की तरह बेघर हो गई। इस सभी ने अपना धर्म नहीं छोड़ा, लेकिन हमने धर्म त्याग दिया। हम देख रहे हैं, कि हमारे पहाड़ ठूंठ खड़े हैं, पेड़-वनस्पतियों रहित पहाड़ आकर्षित नहीं विकर्षित करते हैं। आंकड़े बताते हैं कि नब्बे फीसदी संसाधनों का उपयोग पांच प्रतिशत आबादी करेगी और शेष लोग कैसे गुजारा करेंगे यह सोचने की बात है। विनाश की पृष्ठभूमि हमने तैयार कर ली है, फिर भी धरती का दोहन बंद नहीं किया।
प्रकृति का संतुलन, रिश्तों का प्रचलन, सम्बन्धों का निर्वाह हमने सोच समझकर बिगाड़ा है। हम सर्वनाश की आधारशिला पर खड़े हो स्वर्गारोहण की तैयारी में हैं।
- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।
सम्पर्क सूत्र- 09407041430.

गुरुदेव के स्वप्न का मायालोक


चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र
गुरुदेव के स्वप्न का मायालोक हि न्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के 65 वें राष्ट्रीय अधिवेशन में म.प्र. के हिन्दी साहित्य सम्मेलन का प्रतिनिधि एवं सम्मेलन की स्थाई समिति का सदस्य होने के कारण पिछले तीन दिनों से शांति निकेतन में हूं। सम्मेलन की कार्यसमिति ने शांतिनिकेतन में अधिवेशन इसलिए रखा कि यह वर्ष कवीन्द्र रवीन्द्र एवं स्वामी विवेकानन्द के जन्म का 150 वां और गुरुदेव के नोबल पुरस्कार का सौंवा वर्ष है। गुरुदेव, बंगाल और भारत की वैश्विक साहित्य जगत में स्थापना का शताब्दी वर्ष, सम्मेलन ने एतिहासिक यादगार तरीके से मनाया। देश भर के राज्यों के प्रतिनिधि हिन्दी सेवियों के दिल दिमाग में तीन दिन तक सिर्फ रवीन्द्रनाथ अपनी विभिन्न रूपाकृतियों में छाए रहे। कभी उनका अभिजात्य याद आता कभी उनकी तरल सरल एकला चलो की चिंता मग्न छवि, मनों को कुरेदती रही। क्या स्वप्न थे, उन मनीषी के, जिसने सारी सम्पत्ति आश्रम के विद्यार्थियों के लिए लुटा दी। शांति निकेतन चलता रहे, इसके लिए गुरुदेव ने नाटक लिखे, अभिनय निर्देशन करते रहे। गीत-संगीत सब कुछ लिखते, कम्पोज करते हुए कभी स्वास्थ्य का ध्यान ही नहीं रखा। परम्परा और आधुनिकता के समन्वय के वे प्रथम भारतीय कवि कलाकार थे।
शांति निकेतन घूमते हुए उनके विभिन्न आवासों को देखेंगे तो बिना चमत्कृत हुए नहीं रह सकते। विशाल अट्टालिका, स्थापत्य और विशाल कलायुक्त रवीन्द्र सदन (उदयन) का निर्माण उनके निर्देशन में एक तरफ, तो मिट्टी के घर श्यामली में जीवन के उत्तराद्र्घ में आवास निवास दूसरी तरफ अध्यापकों के रहने के लिए ‘गुरुपल्ली’ फूस का छाजन, पौत्रियों के रहने के लिए नूतन घर परंतु छत, घासपूस की, उत्तरायण, उदयन, कोर्णाक, नूतन घर, श्यामली, कोई ऐसी जगह नहीं जहां नंदलाल बसु, रामकिंकर बैज या अन्य कलाकारों की उकेरी हुई कलाकृतियां न हों। कलाकृतियों में पुराण कथाएं हैं, साहित्य है और हैं अदभुत ग्राम्य दृश्य जो भारतीय सांस्कृतिक एकता की कहानी कहते हैं। गुरुदेव ने साबरमती आश्रम देखा था, उसके पहले महात्मा गांधी शांति निकेतन गए थे। गुरुदेव ने 1935 में ‘श्यामली’ (मिट्टी के घर) में गृहप्रवेश किया था। गुरुदेव की मृत्यु के बाद बापू ‘45’ में शांतिनिकेतन गए और ‘श्यामली’ में ही रुके। अपने वैभवपूर्ण अतीत को याद करते हुए काले आवरण में सजा (काले को श्याम कहता हुआ) ‘श्यामली’ पूरी सज धज से दर्शन के लिए आमंत्रित करता है। आज भी चारों तरफ में वृक्षों से घिरे इस घर के सामने, विद्वत गोष्ठियां या उद्घाटन समारोह कर गुरुदेव की स्मृति का सामीप्य लाभ प्राप्त करते हैं। अद्वितीय और दर्शनीय शांति निकेतन, भारतीय संस्कृति की अतुलनीय धरोहर है।
सांस्कृतिक संध्या में उपनिषदों के स्नेत, बंगाल के ‘बाउल गीत’ चैतन्य महाप्रभु की भक्ति विह्वलता की याद ताजा कर रहे थे। भटियाली और ‘भवाई गीतों’ का आनंद जहां बंगाल की ग्राम्य संस्कृति की झंकी पेश करता है वहीं ‘ढिमरिहाई’ गीतों की लय में सचिन दा, का गाया ‘सुन मेरे साथी, सुन मेरे मितवा, सुन मेरे बंधू’ गीत याद आता रहा। शालीन और भव्य परिधान में सजी धजी विश्वभारती की छात्राएं संगीत तथा ताल की लय में मुग्ध कर रही थीं। भारतीय संगीत उत्तेजक नहीं आह्लादमय होता है, इसीलिए उसमें ब्रह्मानंद की अनुभूति होती है। भारतीय संगीत नटराज और नटनागर की देन है, शायद इसीलिए इसके प्रारंभ में इनकी मुद्राओं की अभ्यर्थना की प्रस्तुति होती है। बंगाल ने मैथिल कोकिल विद्यापति को इतना आत्मसात कर लिया है कि वे उन्हें बांग्ला कवि मानते हैं। बंगाल की यह गर्वोक्ति बिना किसी असहमति के स्वीकार की जा सकती है कि उनके कवि के लिखे गीत दो देशों के राष्ट्रगीत है। उन्होंने गुरुदेव के अतिरिक्त देश को रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, राममोहनराय, अरविन्द, पाल और सुभाष दिए। एक समय यह मुहावरा प्रचलित था- ‘आज बंगाल जो सोचता है कल वही भारत सोचता है।’ यह अतिरंजित बात नहीं, इतिहास यथार्थ है।
गुरुदेव ने विश्व के अनेक देशों का भ्रमण किया। कला और साहित्य रूपों को देखा और सभी को आत्मसात करके भारतीय दृष्टि दी। वे भारतीय शुद्घतावाद के अहं से मुक्त व्यक्ति भी थे, कलाकार भी, वे बुद्घ के अनात्मवाद और उपनिषदों के आत्मवाद के समन्वित रूप थे शायद इसीलिए उन्होंने लिखा है- बुद्घ ही विश्व विजेता हैं, सिंकदर नहीं। हिन्दी साहित्य में नारी की उपेक्षा को लेकर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के लेख की चिंता के मूल मे रवीन्द्र नाथ की ही प्रेरणा थी। जिसने हिन्दी साहित्य में स्त्री विमर्श को साकेत, यशोधरा, वैदेही वनवास, प्रिय प्रवास, उर्मिला के माध्यम से काव्य की धारा ही बदल दी।
कवीन्द्र, रवीन्द्र ने न सिर्फ बांग्ला साहित्य को नई दिशा दी, समूची भारतीय भाषाओं ने उनसे प्रेरणा ग्रहण की। पाश्चात्य जीवन की ओर आकर्षित आज के भारत को देख गुरुदेव का 1941 में लिखित ‘सभ्यता का संकट’ लेख स्मरण आता है‘ मानव जाति को पीड़ित करने वाले महामारी का पाश्चात्य सभ्यता की मज्जा से जन्म हुआ है। हमारे अभागे, असहाय, पराधीन देश की दरिद्रता में क्या हमें इस चीज का आभास नहीं है। मेरा विश्वास था कि सभ्यता का दान ही योरप की आंतरिक सम्पत्ति है। आज जब जीवन से विदा होने का दिन समीप आ रहा है, मेरे इस विश्वास का दिवाला निकल चुका है। मैं आशा करता हूं कि मुक्तिदाता पूर्व दिगंत से आएगा।’ विश्व के फलक पर आज भी रविन्द्र की प्रासंगिकता है।
‘ऐन ओपेन स्कूल’ पाठ पढ़ा था, हाई स्कूल में। सम्मेलन का पत्र आते ही उस स्कूल को देखने के सपनो को पंख लग गए।
कहानी, उपन्यास, पढ़ने का चस्का भी शरदचंद्र को उपन्यासों को पढ़कर ही लगा। हिन्दी में शरद, बंकिम, रवीन्द्र के उपन्यासों के अनुवाद ने संवेदना की भाषिक सीमा लांघी और हिन्दी का अनुवाद जगत धन्य हो गया। पाठकों और लेखकों को दिशा मिली अन्यथा कोलकाता और बंगाल, हिन्दी लोक में ‘छ: छ: पैसा, चल कलकत्ता’ या ‘बंगाले का जादू’ था, जहां औरतें, पुरुषों को दिन में भेंड़ा बना कर रखती थीं। इस मायालोक का भ्रम बंगाली लेखकों ने पहले ही तोड़ दिया था। शांति निकेतन का जादू पूरे देश के सिर पर चढ़कर बोलते पिछले तीन दिनों से देख रहा हूं। बौद्घिकता, कलात्मकता और नैसर्गिकता का ऐसा सामंजस्य देख विस्मय विमुग्ध हृदय, कृष्ण के विश्वरूप सा आभासी मायालोक में भटक जाता है। धरती पर हम, जैसों के लिए इससे बड़ा कोई तीर्थ नहीं? शांति निकेतन में होना, गुरुदेव के संग साथ होना है।
- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।
सम्पर्क - 09407041430. लोकायन 

शांति निकेतन का हिन्दी भवन परिसर

                                                     चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र
अठारह मार्च 2013 की दोपहर! मैं अपने साथी प्रसिद्घ कहानीकार, उपन्यासकार महेश कटारे के साथ, शांति निकेतन के हिन्दी भवन परिसर में अशोक वृक्ष की छाया में खड़ा हूं। महेश की यायावटी ने देश के उन सभी शक्तिपीठों का परिभ्रमण कर भर्तृहरि पर सशक्त उपन्यास ‘कामिनी काय कांतारे’ लिखा है, जिन पीठों से भर्तृहरि का नाता रहा। अशोक वृक्ष के लाल स्वतक देखकर अभिभूत हूं। हमारे यहां के अशोक वृक्षों से भिन्न ये पेड़ है। उनमें खिले लाल फूल देखकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी बरबस याद आते हैं कि पता नहीं किन युवतियों के पद प्रहार से ये पुष्पित हुए हैं। आचार्य द्विवेदी बेहद सनकी लेखक थे। सच तो यह है कि संसार के सारे श्रेष्ठकर्म सनक की ही उपज हैं। जब पेड़ पौधों पर आ गए तो उन सारे उपेक्षितों पर शास्त्रीय विद्वता और भावुक मन से ऐसे मेहरबान हुए कि वे सभी निबंध, निबंध-छंद के मानक बन गए। अशोक, शिरीष, कुटज, देवदारु, आम, सभी खास हो गए। बंगाल में हिन्दी और फिर शांति निकेतन में हिन्दी भवन? हिन्दी भाषी चिंतकों के ध्यान में क्या कभी यह आया है कि उनके भी आसपास कहीं बांग्ला या कोई भारतीय भाषा भवन हो? हिन्दी भवन के निर्माण के सूत्रधारों में से प्रमुख का संबंध विन्ध्यप्रदेश से रहा है। शांतिनिकेतन का नाम आते ही मन मष्तिस्क में एक सुन्दर दुबले पतले ऋषि तुल्य व्यक्ति की तस्वीर उभरती है, जिनकी कल्पना ने शांतिनिकेतन को विश्व भारती बनाया। पं़ बनारसी दास चतुर्वेदी, सी.एफ़ एन्ड्रूज जिन्हें देश दीनबंधु के नाम से जानता है, के घोर प्रशंसक थे। एन्ड्रूज के कहने पर वे राजकुमार कालेज इंदौर की नौकरी छोड़कर चौदह महीने शांति निकेतन में रहे। चतुर्वेदी ने अनेक वर्षो तक हिन्दी अखबार ‘विशाल भारत’ का परचम लहराया। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे गंभीर व्यक्ति को हंसते बहुत कम लोगों ने देखा था। चतुर्वेदी उनकी इस समाधि को तोड़ने वाले अकेले व्यक्ति थे। ‘रेणुका’ रचना जब चतुर्वेदी जी ने गुरुदेव के चरणों रखी तो उसे उठाकर उलटने-पलटने लगे। बनारसीदास अंग्रेजी में बोले- ‘गुरुदेव मैं आपसे कह चुका हूं कि जब तक आप हिन्दी नहीं सीखेंगे, तब तक मैं बांग्ला नहीं सीखूंगा।’ गुरुदेव ने किंचित मुस्कुराते हुए कहा- ‘पंडित! जीवन भर मैंने तो कभी कुछ सीखा ही नहीं। हिन्दी मैं पढ़ लेता हूं, संभवत: उसका अर्थ भी समझ लेता हूं, किंतु शब्दों के साथ जो वातावरण लिपटा होता है, उसे मैं नहीं समझ पाता।
सच तो यह है कि शब्दों के साथ लिपटे हुए वातावरण का ज्ञान मुङो अपनी भाषा को छोड़कर और कहीं भी नहीं होता।’ काश!
अंग्रेजी भाषा की अनिर्वायता की वकालत करने वाले गुरुदेव से कुछ सीख पाते।
हिन्दी भवन की सीढ़ी पर बैठकर मैं सोचने लगा। पढ़ा था कि एक दिन प्रात: भ्रमण में बनारसीदास चतुर्वेदी और आचार्य द्विवेदी हंसते बतियाते थे, चतुर्वेदी जी ने द्विवेदी जी से कहा- ‘यहां हिन्दी भवन बनेगा।’ अपने इस जागृत स्वप्न की चर्चा चतुर्वेदी जी ने गुरुदेव से की। वे प्रसन्न हुए। गुरुदेव की खोज, क्षिति मोहन सेनर, नंदलाल बसु और आचार्य हजारी प्रसाद के अतिरिक्त हर विषय और विधा में निष्णात अध्यापक और ‘विजनरी’ मनीषी थे। सन् 35 से 38 के मध्य चतुर्वेदी के प्रयास से, गुरुदेव के आशीष और आचार्य के सहयोग से भव्य हिन्दी भवन का निर्माण हुआ जिसकी दीवारों पर तत्कालीन चित्रकारी के नमूने आज को चुनौती दे रहे हैं। यह दुखद आश्चर्य है कि न तो शिलान्यास और न ही लोकार्पण के अवसर पर चतुर्वेदी जी वहां उपस्थित रहे। पं. जवाहर लाल नेहरु ने भवन का लोकार्पण किया। पं़ चतुर्वेदी ‘विशाल भारत’ छोड़कर टीकमगढ़ के ओरछा महाराज, जो उनके शिष्य थे, आ गए और साढ़े चौदह वर्ष वहां रहे। उनकी सांसें शांति निकेतन की हवाओं में हैं, लेकिन वहां के हिन्दी भवन का छात्र बनारसीदास के बारे में कुछ नहीं जानता। विन्ध्यप्रदेश की विधानसभा से राज्य सभा के लिए जब एक सामान्य व्यक्ति का नाम पं़ नेहरु ने देखा तो बोले- ‘क्या विन्ध्य प्रदेश में कोई पढ़ा लिखा आदमी नहीं है।’ तब किसी ने चतुर्वेदी जी का नाम सुझया। पं. जी चतुर्वेदी की ख्याति से परिचित थे। वे लगातार दो अवधि तक राज्यसभा के नामित सदस्य रहे। हिन्दी भवन की न तो नींव की ईंट में और न कंगूरे की छत में बनारसीदास का नाम है, लेकिन बिना उनके इस भवन की कल्पना नहीं की जा सकती। हिन्दी भवन के प्रथम आचार्य हजारी प्रसाद विशुद्घ पारम्परिक पंडित और ज्योतिषाचार्य थे। गुरुदेव ने ‘हंड्रेड पोयम्स आफ कबीर’ का अनुवाद करके जो भूमिका प्रस्तुत की, उसने आचार्य को कबीर का उत्तराधिकारी बनाकर दूसरी परम्परा की नींव रखी। काशी का पंडित हिन्दी में कबीर कहलाया, खंडन मंडन से दूर, पांडित्य से भरपूर ।
‘हिन्दी भवन’ के निर्माण के बाद 13 जनवरी 38 के पत्र में चतुर्वेदी जी ने गुरुदेव को एक पत्र लिखा- मेरे प्यारे गुरुदेव, अब जब कि हमारे मित्र दीनबंधु सीएफ एन्ड्रूज का अपने आश्रम में हिन्दी भवन स्थापित करने का स्वप्न साकार हो रहा है, मैं आपके चरणों में एक विनम्र भेंट समर्पित करने का सम्मान पा सकता हूं।
मैं अपने भाई श्री राम शर्मा की सहायता से पांच सौ रुपए पांच वर्ष के लिए एक माली रखने के लिए एकत्र कर लूंगा जो नीचे लिखे इक्कीस वृक्षों के छोटे से कुंज की देखभाल कर सके। हम उन्हें ‘एन्ड्रूज निकुंज’ कहकर पुकारेंगे। वटवृक्ष एक, पांच अशोक, पांच मौलश्री, पांच आम, पांच परिजात। पेड़ हैं, सुगंध है पर पानी देने वाला कोई माली नहीं दिखा। इस पुराने अंतेवासी पंडित ने गुरुदेव को लिखा था-‘गुरुदेव! आप जानते हैं, मैं शांतिनिकेतन का पंडा रहा हूं, गत बीस वर्षो से मैं वहां यात्रियों को ले जाता रहा हूं और हजारी प्रसाद द्विवेदी मेरे सहायक पंडा हैं। हमें अपने पंडायन पर उचित गर्व है। ‘विशाल भारत’ में छपे आचार्य द्विवेदी के एक लेख पर उनकी टिप्पणी थी- यह आदमी (हजारी प्रसाद द्विवेदी) हम सबसे आगे जाएगा।’ उनका यह आशीष अक्षरश: फलित हुआ। गुरुदेव से आचार्य द्विवेदी अपनी शालीनता वश कहते थे- ’दर्शन करने आया हूं।’ जब कभी कोई आचार्य जी का मित्र गुरुदेव का दर्शनेच्छु हुआ करता था और वे उन्हें गुरुदेव से मिलाने ले जाते, वे कहते - ’दर्शनार्थी लेकर आए हो क्या? मैं इस बात को शिद्दत से स्वीकारता हूं, यदि आचार्य द्विवेदी शांति निकेतन न गए होते, गुरुदेव की संगत न मिली होती तो वे मात्र ज्योतिषाचार्य व्योमकेश शास्त्री बनकर बनारसी पंचांग लिख रहे होते और हम कितने ही अशोक के फूलों से वंचित रह जाते।’ हिन्दी साहित्य में संस्कृत की संस्कृति का समावेश ही न हो पाता, हिन्दी का सांस्कृतिक लालित्य समस्त आधुनिक चिंतन के साथ आचार्य जी के निंबंधों उपन्यासों में जीवंत हो उठा है।
- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं। सम्पर्क- 09407041430. लोकायन 

Friday, April 12, 2013

संभवामि युगे-युगे

 चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र
 धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, पाप-पुण्य की जितनी चर्चा महाभारत पुराण में है, उतनी किसी अन्य भारतीय काव्य या पुराण में नहीं। वेदव्यास परोपकाराय, पुण्याय, पापाय, परपीड़नम्, की अवधारणा कर रहे हैं, स्वयं महाभारत में उपस्थित हैं, परंतु धर्म की परिभाषा परिस्थितिवश बदलते हुए पाप को भी पुण्य कहने में गुरेज नहीं करते। युधिष्ठिर और धर्मराज आज समाज का सबसे बड़ा व्यंग्य है। यह उस व्यक्ति के लिए कहा जाता है जो धर्म-अधर्म को अपने वाकजाल में उलझकर अपना कार्य हल कर लेता है। कृष्ण, युधिष्ठिर को झूठ बोलने के लिए प्रेरित करते समय सूत्र देते हैं- ‘यदि झूठ बोलने से किसी की प्राण रक्षा होती है तो वह सत्य से भी बढ़कर धर्म है, उसे झूठ का पाप नहीं लगता।’अपने को धर्म और धर्म के साथ रहने वाला कृष्ण, भीम द्वारा अश्वत्थामा नाम के हाथी के मरने पर अफवाह फैलाते हैं, कि अश्वत्थामा (द्रोण-पुत्र) मर गया। अजेय द्रोण इस बात के प्रमाण के लिए युधिष्ठिर की सत्यता पर विश्वास करते हुए प्राण त्याग देते हैं। सारे अजेय कौरवों के प्राण अधर्म आधारित हैं और सभी भूमिकाओं में कृष्ण पूरी सन्नद्धता से महाभारत के अठारह दिनी युद्ध में सक्रिय हैं। इसी कारण बर्बरीक की निर्णायक टिप्पणी ही एकमात्र सत्य है कि मैंने महाभारत में सिर्फ एक व्यक्ति को लड़ते देखा है, समस्त कौरवों के विरुद्ध वे कृष्ण हैं। स्वयं वह भी कृष्ण का शिकार, युद्ध के पहले हो चुका था और रणक्षेत्र के ऊपर आकाश में ‘सेटेलाइट’ की तरह स्थित था। महाभारत के युद्ध खेल का ‘नान प्लेइंग’ कैप्टन कृष्ण बिना चक्र सुदर्शन उठाए खेल रहा था। प्रत्येक ‘टर्निग प्वाइंट’ पर खड़ा कृष्ण अपनों को दिशा निर्देश देता रहा।
सम्पूर्ण विश्व साहित्य में कृष्ण जैसा चरित्र कहीं भी देखने को नहीं मिलता। महाभारत के कृष्ण इतने समर्थ होते हुए भी सहनीय नहीं हो सके। लोक, कृष्ण-नीति का प्रशंसक नहीं है, परंतु वही कृष्ण भागवत पुराण में लीला पुरुषोत्तम योगेश्वर होकर उत्तर चरित्र में ब्रrा हो जाते हैं। युधिष्ठिर की लोक में अस्वीकार्यता का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि शायद कोई व्यक्ति अपने पुत्र का नाम युधिष्ठिर रखता हो।
निरंतर महाभारत का जीवन जीने वाले समाज में ‘गरुड़ पुराण’ जैसे डरावने दृश्यों वाली रचना का भी पाठ मृत्योपरांत होता है परंतु महाभारत पुराण का पाठ अशुभ मानते हुए वजिर्त है, जबकि महाभारत मानवीय प्रवृत्तियों का इतना बड़ा भंडार है, जिसके बारे में कहा जाता है कि जो कहीं नहीं है वह भी इसी में है और जो यहां नहीं है वह फिर कहीं नहीं। न्याय, दर्शन, भौतिकी, आध्यात्म सब कुछ महाभारत के पात्रों की जीवन पद्धति में है। इसका अपाठय़ होना सामाजिक विसंगति है।
रणक्षेत्र में घायल दुर्योधन कृष्ण पर आरोपों की झड़ी लगा देता है-‘मेरे साथ कपट युद्ध करने के लिए पांडवों को आपने उकसाया, आपकी आज्ञा से अजरुन ने शिखंडी की ओट से भीष्म को मारा, द्रोण से अस्त्र रखवाने के लिए अश्वत्थामा के मरने की अफवाह पांडवों ने आपकी प्रेरणा से फैलाई, आपकी आज्ञा से अजरुन ने रथ का पहिया निकालते हुए नि:शस्त्र कर्ण को मारा, आपके संकेत से भीम ने नाभि के नीचे गदा प्रहार कर मेरी जंघाएं तोड़ीं। पांडवों ने मुङो युद्ध से नहीं अधर्म से पराजित किया।’ माना कि दुर्योधन के अधर्म कम नहीं थे। वह घोषित खलनायक है परंतु कृष्ण महानायक हैं।
महाभारत, अभिशापों और वरदानों का मिथ है। जिसके वरदान ही अभिशाप बन जाते हैं। हर योद्धा शापित है, हर वरदानी। इतने ढेर सारे आरोपों को ङोलने वाले कृष्ण भी अपने संचित कर्मो की दुहाई देते हुए अश्वत्थामा के ब्रrास्त्र से मृत जन्मे शिशु परीक्षित के लिए प्रार्थना करते हैं- ‘यदि मैंने पूर्ण सात्विक जीवन जिया हो तो अभिमन्यु पुत्र जीवित हो जाय।’ कृष्ण के जीवन की सात्विकता की कसौटी की शान क्या है? कौन कहे? व्यास, कृष्ण के सभी धतकरमों के नयिक पैरोकार हैं। महाभारत के दिग्गज योद्धा भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, दुर्योधन से अनेक जगहों पर असहमत होते हुए भी उसके साथ हैं, उसके लिए युद्ध करते हैं, परंतु आत्मा से पांडवों के साथ हैं, क्या इसे भी धर्म कहेंगे? अपनी मृत्यु का रहस्य बताते हैं, निष्ठा का ऐसा उदाहरण अन्य किसी ग्रंथ में नहीं मिलता। ‘रामायण’ के असहमत पात्र रावण का साथ छोड़ देते हैं। विभीषण किसी तरह रावण को धोखा नहीं देता, रावण भी उसकी तरफ से निश्चिंत है। शत्रु के साथ है,शत्रु है, परंतु भीष्म-द्रोण आदि कौरवों के साथ होते हुए भी पांडवों के हित चिंतन में लगे हैं। दुर्योधन पर दबाव भी बनाते हैं परंतु वह उन्हें राजाज्ञा सुनाता है- ‘राजन! युद्ध या शांति दोनों आपके हाथ में है।’ गदा युद्ध का अप्रतिम योद्धा सुयोधन अपने कर्मो से दुर्योधन की संज्ञा पाता है। भीष्म प्रतिज्ञा अटल रहने का प्रतीक बनी तो शकुनि धूर्तता का पर्याय। एकलव्य का अंगूठा लेकर समाज में निंदित होने वाले आचार्य द्रोण शिष्य और पुत्र मोह की पहचान बनकर गुरु के अवमूल्यन का कारण बन गए। धृतराष्ट्र का अंधत्व पुत्र मोह के लिए शाश्वत प्रतीक बन गया। पता नहीं ‘अंधा बांटे रेवड़ी चीन्ह-चीन्ह कर देइ’का निहितार्थ क्या है? अंधों के पहचानने में शरीर की कौन सी इंद्रिय काम करती है।
पतिव्रता कुंती और द्रोपदी लोक के अस्वीकृत नाम हैं।
महाभारत, हर युग का शाश्वत यथार्थ है। पैतिृक उत्तराधिकार महाभारत के पहले पारिवारिक परम्परा थी। धृतराष्ट्र मोहग्रस्त अवश्य थे परंतु पांडवों के प्रति सहृदय हमेशा रहे।
दुर्योधन के उद्धत स्वभाव से दुखी रहते थे, उसके मतों से सर्वथा सहमत कभी नहीं थे। आज जब देश में लोकतंत्र है। इस लोकतंत्र के अपने राजतंत्र हैं। अपनी ही वंश परम्परा का राज्यारोहण कराने में देश के समूचे दलों के अधिपति लगे हैं। लोकशाही के प्रतिनिधियों का रहन-सहन उनकी तरह नहीं है। जिन लोगों ने उन्हें चुना है। महाभारत के धृतराष्ट्र जन्मांध थे, परंतु आज के धृतराष्ट्र आंख होते हुए भी पुत्रों की आंख से देखते हैं, उन्हीं के लिए सब कुछ करते हैं। देवराज इंद्र अपने पुत्र अजरुन के लिए क्या नहीं करते। उसे अजेय बनाने के लिए दिव्यास्त्रों की व्यवस्था करते हैं। कर्ण का कवच कुण्डल मांग लेते हैं। अजरुन का पुत्र मोह अभिमन्यु की मृत्यु के बाद कृष्ण के समझने पर भी समाप्त नहीं होता। अपनी बहन के पुत्र के पुत्र के लिए (परीक्षित) कभी किसी के सामने हार न मानने वाले कृष्ण प्रार्थना लीन हो जाते हैं। स्वार्थो में लिप्त होने के बाद भी धर्म की स्थापना करने के लिए संभवामि युगे-युगे का उद्घोष करते हैं।
क्या आने वाला युग महाभारत काल से भी गर्हित होगा? - लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।
सम्पर्क सूत्र - 09407041430. 

Saturday, April 6, 2013

आत्मा की आवाज सुनें

अंधकार का साम्राज्य बहुत बड़ा है, इसीलिए ऋषि को कहना पड़ा कि मुङो अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। विचित्र बात तो यह है कि यह अंधकार हमें दिखता नहीं, यह हमारे अंतस में है, हमें नियंत्रित करता है। हर अच्छा काम करने से रोकता और गलत करने के लिए प्रेरित करता है। मनुष्य और पशु में यही एक मूलत: अंतर है कि मनुष्य के पास विवेक नामक सोचने-विचारने की शक्ति है। एक विवेकशील व्यक्ति सत और असत के बीच का अंतर जानता है। मन या आत्मा के अंदर उठते दुविधा का समाधान विवेक द्वारा ही संभव है। असत के प्रभाव में जब आत्मा दब जाती है तब वह अमानुष हो जाता है।
सत् की आत्मा तब भी जीवित रहती है, मरती नहीं। वह डाकू था, लूटना- मारना ही उसका काम था। अपने परिवार को पालने का उसने यही जरिया अपनाया था। एक दिन उसी रास्ते से वीणा बजाते देवर्षि निकले। डाकू ने उनको लूटना चाहा। नारद के पास कुछ था नहीं, खाना-तलाशी ली। निराश हुआ। उसने वीणा छीनकर मारा-पीटा भी कि कैसा भिखारी है इतनी मंहगी वीणा लिए है, पास में एक पैसा भी नहीं। नारद परेशान। बिना वीणा के नारद का अस्तित्व ही क्या? उन्होंने विनती की, भाई वीणा दे दो, मैं इसके बिना जी नहीं सकता। डाकू ने वीणा का एक तार झनझनाया। आपाद मस्तक उसकी ध्वनि से डाकू हिल गया।
उसने वीणा लौटाते आदेश दिया- बजाओ! नारद ने वीणा के तार छोड़े। संगीत ने उसे मोह लिया, रोने लगा फिर बोला, यह अदभुत है, मैं इसे लूंगा। नारद ने उसकी बात मान ली और बोले- बताओ! तुम यह पाप कर्म क्यों करते हो। उसने कहा- इसी से परिवार का पोषण करता हूं। नारद ने कहा- कि अपने मां-बाप- पत्‍नी से जाकर पूछो कि क्या इस पाप कर्म के फलाकन में वे भी भागीदार हैं। उसने कहा, क्यों नहीं होंगे? नारद ने कहा- जाओ!
पूछकर आओ, यदि वे कहेंगे कि ‘हां’ तो मैं वीणा तुम्हें दे दूंगा।
मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा। डाकू रस्सी से उनको पेड़ में बांधकर दौड़ता घर गया। मां-बाप से पूछा- उन्होंने कहा कि हम लोगों को पालना तुम्हारा धर्म है। कैसे पालते हो, क्या करते हो, तुम्हारे कर्मो का फल तो तुम्हें ही मिलेगा। पत्‍नी ने भी यही कहा- तुम्हारे पाप-कर्म का फल तो तुम्हें ही भोगना पड़ेगा।
लौटकर रस्सी खोलते वह लगातार रोता रहा। नारद ने उसे समझया। सांत्वना दी- अभी कुछ नहीं बिगड़ा, तुम्हारी सोई हुई आत्मा जाग गई है, तुम राम नाम के जाप की साधना करो। डाकू से राम कहते नहीं बनता था। ‘मरा-मरा’ कहते ‘राम राम’ होता रहा। डाकू की ऐसी समाधि लगी कि दीमकों ने उसके शरीर को ढक लिया। एक घनघोर आध्यात्मिक बरसात ने उसे धो- पोंछकर ऋषि बना दिया। वह तत्व ज्ञानी हो गया। एक दिन कुटी के सामने बैठा था, सामने पक्षी का जोड़ा केलि में निमग्न था।
बहेलिए ने उसे बाण मारा। फड़फड़ाता एक पक्षी मर गया, दूसरे को रोता देख ऋषि द्रवित हो उठे। उनके मुंह से लोकभाषा का अनुष्टुय (छन्द) अनायास निकल पड़ा। वे चकित हुए कि यह शाप शोक से श्लोक कैसे हो गया? ऐसे मौके पर नारद पुन: प्रकटे और बोले- हे ऋषि वाल्मीकि! आपके मुंह से आदि श्लोक निकला, आप कवि हैं। जिस नाम का जाप आपने अपनी साधनावस्था में किया है, उसी की कथा आप लिखें। नारद ने कथा कही और डाकू, ऋषि- महर्षि होते हुए ‘रामायण’ का कवि हो गया।
बुझते दिये में तेल डालकर प्रकाश का आनंद लेने के जितने आख्यान हमारे शास्त्र पुराण और इतिहास में भरे पड़े हैं शायद ही अन्य किसी संस्कृति में हो। परिवार, रिश्ते-संबंध से मोहग्रस्त अजरुन को कृष्ण जैसे मित्र ने दृष्टि दी और उस अदभुत वाणी ने विश्व को नया दर्शन दिया। नेपोलियन पराजित होने पर हताश कमरे में लेटा था। उसकी दृष्टि निर्मिमेष छत पर लगी थी। उसने देखा कि एक मकड़ी अपना घर (जाला) बुन रही है। बार-बार जाला टूट जाता। जाला के केन्द्र में अपने रहने के लिए धागे जोड़ती, वे टूट जाते। नेपोलियन देख रहा था, सोच रहा था कि यह मूर्ख नाहक परेशान है, इसका ठिकाना नहीं बनेगा। तभी उसने देखा कि जाले के बीच में बने अपने घर में वह निश्ंिचत बैठी है। नेपोलियन की हताश आत्मा जाग उठी। उसने अपने समस्त निराश सैनिकों को एकत्र किया। उतिष्ठ! जागृत का उद्घोष किया और जीवन का सबसे निर्णायक युद्ध लड़ा, जो विश्व इतिहास में अमर हो गया। अंगुलीमाल और आम्रपाली को बुद्ध मिल गए। उनकी सुप्त आत्मा उदबुद्ध हो गई। ईसा ने उनके लिए भी प्रार्थना की जो उन्हें सूली पर चढ़ा रहे थे, परंतु उनके अंदर ईसा का नकार भरा था, उनकी आत्मा सोई थी, वे नहीं जाग सके।
जिसने अपनी आत्मा को चिरनिद्रा में सुला दिया इतिहास उन्हें भी याद करता है, चंगेज खां, तैमूरलंग और नादिरशाह के रूप में।
सकिंदर ने बालू पर लेटे संत से कहा था- जो कुछ भी मांगना हो, विश्वविजयी सकिंदर से मांग लो। संत ने कहा- सकिंदर! तू मुङो क्या दे सकता है? मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि हे ईश्वर! तू मुङो अगले जन्मों में पशु-पक्षी, कीड़े-मकौड़े कुछ भी बना देना, मैं दुखी नहीं होउंगा, मेरी प्रार्थना है कि तू मुङो सकिंदर न बनाना।
कहते हैं कि सकिंदर को अपनी हीनता का आभास हुआ और वह यूनान लौट गया। उसके अंदर का सुकरात जाग गया। राम ने राज्य ठुकराया। कृष्ण सर्वजयी होते हुए भी एक दिन के लिए भी राजसिंहासन पर नहीं बैठे। बुद्ध ने राज्य त्याग दिया। जिसके राज्य में सूर्य नहीं डूबता था उस एडवर्ड अष्टम ने प्रेम के लिए राज्य को तिलांजलि दे दी। महात्मा गांधी ने, जयप्रकाश नारायण ने सत्ता का त्याग किया। उन्हीं के देश में सत्ता के लिए राम, बुद्ध, गांधी का जाप करते हुए उनके अनुयायी कितने तरह का धतकरम करते हैं, देश जानता है। इनके भी आत्मा है, संदेह होता है? लोक, हरनि-गुननि (संदेह) के भ्रम में कभी नहीं रहा।
प्रत्येक समस्या के समाधान के लिए उसने गुनने-धुनने (गुनान) का समय दिया है। उसका मुहावरा है रात गाभिन (गर्भिणी) होती है। रात भर चिंतन मनन यानी गुनान करने पर पक्ष-प्रतिपक्ष स्वयं बनकर आत्मा की सुप्त आवाज सच्चा और सही रास्ता बना देती है। तटस्थ मूल्यांकन हमेशा सही परिणाम लाता है। हमारे राजनेता, प्रशासक यदि अपनी कई पीढ़ी की व्यवस्था न कर केवल वर्तमान के लिए अतीत के उदाहरणों से अपनी सुप्त आत्माओं को जगा सकें, तो यह अपना देश आज भी गवरेन्नत हो सकता है। जागृत व्यक्ति जानबूझकर सोने का बहाना करे, उसे कौन जगा सकता है। देश का लोक जाग और देख रहा है।
उसकी आत्मा कभी सोती नहीं। ‘दिनकर’ कहते हैं- ‘तब होता है भूडोल, बवंडर उठते हैं। जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढ़ाती है।’समय, आत्मा की आवाज सुनने का आ गया है।
- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं। सम्पर्क- 09407041430.

मर्यादा की कसौटी पर धर्म


 चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र 
 हम नहीं जानते कि धर्म नामक ढाई मात्रिक शब्द का पहला प्रयोग किसने किया लेकिन इतना जानते हैं इसका प्रयोग सम्प्रदायों के लिए किसी भी काव्य, पुराण-इतिहास में नहीं किया गया। सच तो यह है कि हम, मनुष्य के उस धर्म की बात करते हैं, जो उसने किया वह हिन्दू, इस्लाम, ईसाई धर्म जैसे रोग गस्त बीमारी से मुक्त प्रत्येक मनुष्य का सहज धर्म है। मनुष्य द्वारा किया गया कर्म ही धर्म की संज्ञा पाता गया। किसी के लिए धर्म, स्वधर्म बना तो अन्यों के लिए अधर्म भी। धर्म की सर्वमान्य परिभाषा कभी नहीं बनी, किसी भी युग में। इसी कारण आपद्धर्म और परमधर्म भी चर्चा और संवाद के विषय बने। धर्म, संवाद का विषय था विवाद का नहीं परंतु इस शब्द की दुर्गति इसके जन्मते ही शुरु हो गई। धर्म की स्थापना का गुणानुवाद करते गाते राम-कृष्ण भी आए और जो कुछ भी लोक में करणीय-अकरणीय किया उसे धर्म कहा। राम के जन्म की धार्मिकता को अनेक चुनौतियों में, वानरराज बालि का कथन अधिक प्रासंगिक है- व्याघ की तरह मारना, छिपकर, दो युद्धरत भाईयों में, बिना दूसरे को सुने परखे एक का हो जाना कौन सा धर्म था? धर्म की कसौटी यदि न्याय है तो हमारे आदर्श चरित्रों ने अपने अधर्मो को भी धर्म कहकर उसे न्यायोचित ठहराया। कृष्ण कहते हैं - जहां मैं हूं, वहीं धर्म है और जहां धर्म है वहीं विजय है।
पिता-पुत्र, भाई-चाचा इत्यादि नाते रिश्तों को धर्म से मत जोड़ो सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज।किस धर्म की स्थापना में कृष्ण लगे हैं, शायद न्यायोचित अधिकार मांगने से न मिले तो लड़कर ही, युद्ध-धर्म से प्राप्त किया जा सकता है। और युद्ध और प्रेम में सब सही है का मुहावरा भी धर्माधारित है। धर्म की बातें सबसे अधिक महाभारत में हैं। व्यास, भीष्म, विदुर, धृतराष्ट्र यदि धर्म का पालन करते दिखते हैं तो भीम, कर्ण, कुन्ती, द्रौपदी भी समान भाव से धर्म का पालन करते हुए प्रश्न भी खड़े करते हैं।
व्यास, पांडवों के पक्षधर कवि हैं, उन्होंने कौरवों को दरकिनार किया, जबकि दोनों उनकी संतान हैं। व्यास, युधिष्ठिर को धर्मराज सत्यवादी कहते हैं परंतु धर्म राज के झूठ और व्यसन ने, पूर्वज भरत के भारत में महाभारत करा दिया। बिना स्वार्थ के निष्काम कर्म करने वाले भीष्म और कर्ण स्वधर्म का पालन करते हैं, इन्हें राज्य नहीं चाहिए था। इनका धर्म, राज्य संरक्षण और मित्र धर्म का निर्वाह था।
महाभारत की कथा में जहां भी मोड़ आया है, वहां युधिष्ठिर खड़े हैं। महाभारत के वे नायक हैं, क्योंकि फल की प्राप्ति उन्हें होती है, पांडवों में ज्येष्ठ हैं। युद्ध में अस्थिर, धीर, मृदु, लज्जाशील वदान्य हैं। कर्ण उन्हें ‘वेदपाठरत ब्राrाण’ कहकर निरादृत करता है परंतु चालाक भी कम नहीं हैं। अजरुन के लक्ष्यवेध और विवाह के बाद युधिष्ठिर का यह कहना कि आज अद्वितीय भिक्षा लाए हैं, किस सत्य को उद्घाटित करता है। विश्व के किसी भी काव्य- पुराण-इतिहास की सबसे अभागी स्त्री, द्रौपदी है जिसको अनिच्छा से पांच पुरुषों में बंटने के लिए दिन या महीने निश्चित किये गए।
युधिष्ठिर द्यूतासक्त हैं, सभापर्व और विराट पर में हम जुएं का प्रभाव देखते हैं। धन-सम्पत्ति सब जुएं में हार जाने पर युधिष्ठिर ने चारो भाईयों सहित द्रौपदी को दांव पर लगा दिया। अपने को हार जाने पर युधिष्ठिर दूसरे को दांव पर कैसे लगा सकते हैं? यह द्रौपदी का सम्पूर्ण सभा से प्रश्न था। आश्चर्य तो यह है कि भीष्म भी द्रौपदी का साथ नहीं देते। कहते हैं- सब सत्व खोकर भी दास का अपनी पत्‍नी पर स्वामित्व बना रहता है। भरी सभा में द्रौपदी के पक्ष में धृतराष्ट्र पुत्र विकीर्ण कहता है- द्यूत एक राजोचित व्यसन है, व्यसनग्रस्त राजा जो कुछ करता है वह नगण्य है। दास होने के बाद युधिष्ठिर का द्रौपदी को दांव पर लगाना अवैध है। युधिष्ठिर से किंचित सहमत होते हुए कहता है कि यह जुआं अपनी प्रेरणा से नहीं शकुनि की उत्तेजना से खेला था। द्रौपदी पांच भाईयों की पत्‍नी थी किंतु युधिष्ठिर ने अनुजों की अनुमति लिए बिना ही उसे दांव पर रख दिया था अतएव यह द्यूत अग्राह्य है। विकर्ण द्वारा कही गई धर्मसम्मत बात पर धर्मराज की सफाई कोई मायने नहीं रखती। क्या इस बात की पुनव्र्याख्या आज आवश्यक नहीं है कि इतने झूठ, छल, प्रपंच रचने-करने वाले को धर्मराज कहकर कब तक लकीर पीटते रहेंगे।
व्यास, महाभारत युद्ध को धर्मक्षेत्र कहते हैं। मामा शल्य को कौरव पक्ष में गए जानकर धर्मराज कहते हैं- मामा! आप मुङो वचन दीजिए कि कर्ण-अजरुन के युद्ध के समय आप कर्ण के सारथी होते हुए भी उसके मनोबल को हतोत्साहित करेंगे। मेरे लिए यह कुकर्म आपको करना ही होगा। युधिष्ठिर के इस निंदनीय प्रस्ताव को वंदनीय और धर्माचारित तो नहीं ही कहा जाएगा। दूसरी तरफ कृष्ण ऐसे सारथी हैं। जो हर समय अजरुन को उत्साहित भर नहीं करते, सभी को मरा हुआ दिखाकर अजरुन को आश्वस्त भी करते हैं। द्रोण ऐसे महायोद्धा हैं जिनका रथ धरती से कुछ ऊपर उठकर चलता है, उनको मारने के लिए कृष्ण, युधिष्ठिर से द्रोण के मर्म पर सांघातिक चोट करने वाला इतिहास का सबसे बड़ा मिथ्या (झूठ) नरो व कुंजरो उच्चरित करा के रथ को जमीन पर गिराने का धर्म निर्वाह कराते हैं। हाथी और घोड़े कितने ही युद्ध में मरे होंगे। हाथी का नाम ˜अश्वत्थामा पहले कभी चर्चा में नहीं था।
हाथी के मरने का सत्य द्रोण की मृत्यु का कारण बना। जानते हुए भी धर्मराज का अर्धसत्य कृष्ण के शंखध्वनि में खो गया और पुत्र की मृत्यु मान द्रोण ने देह त्याग दिया।
महाभारत का युद्ध चरम पर है। कर्ण-अजरुन आमने सामने हैं।
पाण्डवों को पकड़ कर छोड़ देना कर्ण का कौतुक है। दोनों अदभुत धनुर्धर, दोनों की काट दोनों के पास है। कर्ण के तरकस में एक ऐसा सर्पबाण है, जो बार-बार कर्ण को प्रत्यंचा पर चढ़ाने के लिए प्रेरित करता है। अजरुन का परम शत्रु अश्वसेन फुफकार रहा है। जन्म से ही पार्थ का शत्रु है। क्षण में अजरुन को खत्म कर सकता है, परंतु कर्ण, मनुष्यों की इस लड़ाई में सर्प की सहायता नहीं लेता- कहता है- तेरी सहायता से जय तो मैं अनायास पा जाऊंगा। आने वाली मानवता को, लेकिन क्या मुख दिखलाऊंगा।कर्ण का धर्म, उसकी सम्पूर्ण जीवनशैली सभी पाण्डवों पर भारी पड़ती है। रथ के पहिए को निकालने के लिए युद्ध-धर्म की बात करता है, कृष्ण, अजरुन को कर्ण का सिर (निहत्थे) धड़ से अलग करने की धर्मसम्मत सलाह देते हैं, क्योंकि जहां वे हैं वहीं धर्म है। जरासंध और दुर्योधन की मृत्यु के पीछे कौन सा धर्म है। कृष्ण के कथन पर पूरा पांडव समाज संचालित है। युधिष्ठिर जब स्वधर्म की बात करते हैं कि स्वधर्म में निष्ठा ही तपस्या है, स्वधर्म में स्थिरता ही स्थैर्य है तब प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि उनका स्वधर्म उन्हें क्या धर्मराज की संज्ञा देता है और उनका परिपालन क्या वे करते हैं? स्वर्गारोहण में हिमालय के पाद देश की स्वर्णरेणु छूते ही द्रौपदी के पांव फिसल गए, वह गिर पड़ी। पांचों पतियों ने मुड़कर भी नहीं देखा वरन धर्मराज युधिष्ठिर ने भीम से कहा-˜मुड़कर न देखो! आगे आ जाओ!-
 लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।
सम्पर्क सूत्र - 09407041430. 

Thursday, March 14, 2013

सीता का अंतिम बयान


मैं सीता हूं। वाल्मीकि ने मेरी कहानी नहीं लिखी। मैं किसका बीज हूं,किसकी कोख में पली,कोई नहीं जानता। मेरी दारुण जन्मकथा काव्य इतिहास के पन्ने में इसलिए नहीं है कि वह समाज का आदर्श पृष्ठ नहीं हो सकता। सभी धरती पर जन्म लेते हैं,मैं धरती से पैदा हुई। यह संयोग था कि उसी दिन महाराज जनक के हल जोतने का शुभ मुहुर्त था,जो तदयुगीन राजकीय परम्परा थी और मैं खेत में सद्य: जाता के रूप में मिली और जनक नंदिनी कहलाई। कन्याजन्म नहीं हुआ बल्कि कन्या मिली। किस अशुभ घड़ी में मैं जन्मी,कोई नहीं जानता लेकिन जिसे मैं मिली वे निहाल हो गए। ऐसा भी नहीं कि वे पुत्रियों के लिए कल्पते रहे या उन्हें पुत्री इष्ट यज्ञ करना पड़ा हो। मेरी ही समवयस्क उनकी तीन जायज पुत्रियां थीं। जन्म से अवांछित,अयाचित,मैं नामधारी पिता शीलध्वज जनक के लिए चिंता का कारण बन गई। वे उस समय के सबसे बड़े दार्शनिक राजा थे। जिनको विदेह राज कहा जाता था। ऋषि-महर्षियों के तत्व चिंतन का समाधान मेरे पिता जनक से मिलता था। हो सकता है कि जनक घर में पहली किलकारी मेरी गूंजी हो,एतदर्थ बधाव बजा हो,परंतु रोचन कहां भेजू,यह सोचकर महाराज ने उत्सव न किया हो।
कुछ ही दिनों में उर्मिला,मांडवी,श्रुतिकीर्ति के जन्मते ही मेरा ही जन्मोत्सव हुआ। मैं दीदी थी। मां सुनयना और पिता की सबसे प्यारी पुत्री के रूप में लोक और काव्य ने मुङो ही जाना।
मैं सुन्दर थी,ऐसा लोक ओर काव्य में वर्णित है। विद्वान राजा और पिता ने जाने क्या सोचकर मेरा स्वयंवर रचाया। और विरोधाभास यह कि शर्ते भी तय कर दीं। हैं न विचित्र बात।
स्वयंवर याने अपने मन से वर का चुनाव। शर्त यदि होती तो मेरे तरफ से होनी थी। स्वयंवर का पहला सार्वजनिक प्रयोग मुझ पर किया गया। धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने की शर्त स्वयंवरा की नहीं,पिता की थी। देश-देश के राजा स्वयंवर में आये थे। मैं पार्वती पूजन के लिए पुष्प वाटिका गई थी। वहां मैंने राम को देखा और मन ही मन उन्हें अपना वर मान लिया। यह पूरी तरह मेरे अंतर्मन का भाव था। राम ने मेरे भाव को समझ। धनरुभग हुआ लेकिन पूरी प्रक्रिया तक पिता अपनी प्रतिज्ञा से दुखी रहे,इसीलिए मेरी अन्य बहनों के लिए कोई के लिए कोई स्वयंवर कोई शर्त नहीं रखी। मेरे साथ तीनों बहनें भी भरत,लक्ष्मण और शत्रुघ्न के साथ बिना किसी स्वयंवर परम्परा के साथ ब्याही गईं। माताओं का असीम प्यार ससुराल में पाकर मैं अपने वर्तमान पर खुश थी।
राज-परम्परा के अनुसार महाराज दशरथ ने ज्येष्ठ पुत्र राम का राज्याभिषेक करने की तैयारी की। सारे अयोध्या ने देखा कि विमाता के दो वरदानों से आबद्ध दशरथ ने राम को चौदह बरस का वनवास और भरत को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित करने में आत्मबलिदान भी कर दिया। राम को वनवास मिला। उनके न चाहते हुए भी मैं उनके साथ वन गई। साथ में लक्ष्मण भी गए।
राम के हर कष्ट में मैं भागीदार रही। दुख मेरी नियति में था। मैंने दुखों को सहलाया। पूरी अयोध्या का लोकमत राम के साथ था।
लक्ष्मण ने पिता को कामातुर कहा। राजाज्ञा का उल्लंघन करने की सलाह दी। राम ने लोकमत को ठुकराकर राजाज्ञा का पालन किया। वन में भी खुश थी मैं,इसलिए कि राम मेरे साथ हैं।
वाल्मीकि की पूरी कथा के केन्द्र में राम थे। उन्हें महामानव के रूप में प्रतिष्ठापित करने का संकल्प आदिकवि के मन में था,इसीलिए राम अपने जीवन के प्रारंभ से लेकर अंत तक लीला करते हैं। निष्कम्य,निष्करुण,निष्कलुस रहकर वे अपने कुल,राज और स्वधर्म का पालन पूरी निष्ठा से करते रहे। वे निर्लिप्त जीवन जीते रहे। हां! रावण द्वारा अपहरित होने पर मेरे प्रति उनका विलाप संलिप्तता प्रदर्शित करता है।
अशोक वाटिका में हनुमान मेरे लिए जीवन का संदेश लेकर आए। मैं उनके साथ चलने के लिए तैयार थी परंतु हनुमान तो सिर्फ पता लगाने आए थे,साथ में लाने का आज्ञापत्र नहीं था।
मेरा अपहरण राम के पुरुषार्थ के लिए चुनौती था। विवाद की शुरुआत राम ने सूर्पनखा की कान नाक-काट कर दी थी। बहन के अपमान का बदला मेरा अपहरण करके उसने लिया। लेकिन जब भी वह मुङो राजरानी या पत्‍नी बनाने की बात करने आता,हमेशा मंदोदरी को साथ लेकर आता। मंदोदरी के दिल पर तब क्या गुजरती होगी,मैं महसूस करती हूं,क्योंकि मैं एक पत्‍नी हूं।
राम ने रावण का वध किया। मैं ललक रही थी कि राम,सीधे मुङो लेने,देखने, मेरे आंसू पोंछने आएंगे,लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
राम का आदेश था कि मैं सुस्नाता तथा दिव्य वस्त्र धारण करके आऊं। पालकी में नहीं,पैदल चलकर,लज्जा को स्वदेह में विलीन करके,राक्षसों,वानरों,भालुओं के सामने से होकर आऊं। लक्ष्मण,सुग्रीव,हनुमान को भी यह निर्णय अच्छा नहीं लगा। उन लोगों ने अनुमान लगाया कि राम के मन में पत्‍नी के प्रति प्रेम नहीं रह गया। राम ने कहा था- सुनो,तुम्हारे लिए,रावण द्वारा स्पर्श जनित दोष के परिमाजर्न के लिए एवं स्वयं के सम्मान रक्षार्थ रावण का वध किया था। तुम घसीटी जाकर रावण के अंक में थी,उसने तुम्हें कुदृष्टि से देखा था। तुमको ग्रहण करने में हमारे कुल-गौरव का क्या होगा। जनक नंदिनी! तुम्हारे प्रति अब मेरे मन में कोई चाह नहीं है। न्याय करना ही यथेष्ठ नहीं, न्याय दिखना भी चाहिए के अनुसार त्रिलोक वासियों को साक्षी मानकर मेरी परीक्षा ली गई। प्रख्यात वंश की कुलवधु सीता ने अग्नि परीक्षा दी। मैं निष्पाप थी,शायद यह पहली और आखिरी अग्नि परीक्षा किसी पति परायणा पत्‍नी द्वारा दी गई थी।
राम का राज्याभिषेक हुआ। मैं महारानी बनी। कुछ दिन सुख के बीते। मेरे सतीत्व को लेकर लोकापवाद फैला। राम जानते थे कि यह लोकापवाद मिथ्या है परंतु उन्होंने मुङो घर से निकाल दिया। मैं गर्भिणी थी। वाल्मीकि के आश्रम में वनवासियों ने मुङो शरण दी। मेरे पति ने मुङो घर से निकालकर एक झूठ को सच साबित कर दिया। लोकापवाद का सामना करते हुए यदि वे सारी प्रजा के सामने कह देते-सीता निदरेष है,लोकापवाद मिथ्या है और मैं स्वत: सीता के साथ निष्कासित जीवन जिऊंगा। जब मेरा निष्कासन हुआ था,वे मेरे साथ गईं थी,अब मैं उनके साथ जा रहा हूं। लेकिन राम ने ऐसा कुछ नहीं किया। वनवास में मैं अपने पुत्रों के साथ जीती रही। ऋषि,लव-कुश को रामकथा के गीतों का अभ्यास कराते रहे। मेरी अंतिम आस थी,शायद राम को कभी अपनी गलती का अहसास हो और मुङो वापस लेने मनाने आएं। मैं धरती की बेटी थी वही मेरी अंतिम शरण्य है। मां ! मैं आ रही हूं,तुम्हारी गोद में,जैसे तुमने जन्म में मुङो गोद लिया था,अंत में भी उसी तरह अपने में छिपा लो। - लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।
सम्पर्क सूत्र - 09407041430. लोकायन चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र 

Monday, February 25, 2013

संतों! देखहुं जग बौराना!


चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र
बिना किसी निमंत्रण पत्र के आस्था के महाकुम्भ, पुण्यों से भरा, प्रयाग में पिछले एक माह से छलक रहा है। वे बड़भागी हैं जिन्हें अमृत की वह बूंद जो कभी घड़े से छलकी थी पवित्र कर गई होगी, परंतु मुहूर्त के उन क्षणों का लाभ सिर्फ अखाड़े के साधु संतों को ही मिला होगा, क्योंकि आम जनता के लिए रास्ते रुके हुए थे। कहते हैं गंगा, जमुना, सरस्वती के संगम पर महाकुम्भ एक धार्मिक महोत्सव ही नहीं है, आस्थाओं संस्कृतियों विश्वासों का महापर्व भी है। यदि गंगा स्नान से पुण्य नामक पदार्थ मिलता है, ऐसा विश्वास है तो निश्चित रूप से यह अंधविश्वास से अधिक कुछ नहीं है। हमारी वैज्ञानिक सोच को क्यों तब काठ मार जाता है जब हम आस्था के नाम पर ठगे जाते हैं।

अंधविश्वासों और रुढ़ियों के विरुद्ध हम क्यों सवाल नहीं उठाते? हमारा समाज का राजनैतिक वर्ग जो विकास की बात करते हैं, शायद इसलिए चुप रहते हैं, कि यह धर्म का क्षेत्र है। इसकी आंच से हम झुलस जाएंगे। हमसे तो बेहतर नानक, कबीर और रैदास थे जो कठौती में गंगा रखते थे। वैसे भी गंगा ब्रहम्मा के कमण्डल में बहुत वर्षो तक अवस्थित रही। लाखों लोग स्वर्ग की पंक्ति के लिए महीने भर से कल्पवास कर रहे हैं। घर के प्रपंचों में ईश्वर चिंतन हो नहीं पाता। गंगा किनारे प्रपंच कम हो जाते हैं, कौन जाने? संसार का सबसे बड़ा मेला प्रयाग में उमड़ता है। मेला मिलने से होता है, यहां भीड़ में कौन किससे मिलता है, हां बिछड़ने वालों की उद्घोषणा लगातार होती रहती है। इस आस्था में ज्ञान की मौजूदगी का अभाव है। यदि इस आस्था को धर्म कहते हैं तो मुझे विवेकानन्द की वह उद्घोषणा याद आती है कि मैं धर्म और आध्यात्म की भूमि भारत हूं, मैं महान हूं, परंतु मैं दरिद्र, वंचित, शोषित भारत हूं-यह मेरा सच है और इस सच के आगे मैं धर्म और आध्यात्म को तिलांजलि देता हूं। मेरा धर्म दरिद्र दुखी भारत है।

हमारे जीवन की सबसे बड़ी विसंगति ढोंग है जिसे हम पीढ़ी दर पीढ़ी ढोते हुए गौरवान्वित होते रहे हैं। ढोंग को हमने साध कर महिमामंडित किया है। धर्म के नाम पर निर्थक अवैज्ञानिक रूढ़ियां और तात्विक विवेचन रहित आचार परम्पराएं चल पड़ती हैं। सच तो यह है कि धर्म के मूल तत्व को रूढ़ियों ने कमजोर किया है। महाभारत कहता है कि जो धर्म किसी अन्य धर्म के विरुद्ध जान पड़ता है, वह धर्म ही नहीं है। जो धर्म अविरोधी होता है, वस्तुत: वही धर्म है। "धर्म तो बांधते धर्म न ए धर्म: कुधर्म तत्/अविरोधी तु यो धर्म: सधर्मो मुनिसत्तम।" धर्म को बाह्यचारों और आडम्बरों से ढ़ककर हमने उसका स्वरूप ही बदल दिया। इस पाप और पुण्य की परिस्थिति जन्य परिभाषाएं रचते हुए हम पाप धोते रहे, पुण्य कमाते रहे। इस व्यवसायिक कारोबार में आत्मा मरती रही, जिसकी अनदेखी करते रहे।

जिन्होंने धर्म को गंभीरता से ग्रहण नहीं किया, उसकी अनिवार्यता में उनका विश्वास नहीं। जिन्होंने उसमें विश्वास किया उसका व्यक्तित्व भी विभाजित रहा। विश्व जीवन का एक भाग वह है जो ईश्वरमय है, जिसमें सभी जीव एक है, जिसके अणु-अणु में ईश्वर का वास है। किंतु जो व्यवसाय और जीविका का संसार है, उसे वे ईश्वर से विछिन्न मानकर चलते हैं तथा यह समझते हैं कि इस व्यवसायी विश्व में अशांति और संघर्ष, विरोध और दुराव तथा छल और प्रपंच सभी क्षम्य है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन कहते हैं ऐसे लोग वस्तुत: पलायनवादी कहे जाएंगे। वे व्यवसाय की दुनिया में जब थक जाते हैं, तभी केवल विश्राम पाने के लिए धर्म की दुनिया में आते हैं। धर्म उनके लिए मात्र कवच है। वे रूप बदलकर आए कालनेमि से भिन्न नहीं है।

विवेकानन्द की पीड़ा को समझने का देश ने प्रयत्न ही नहीं किया। कंठी माला, आरती, घंटे, स्नान-ध्यान में मग्न लोग यह देख ही नहीं रहे हैं कि देश विकास के नाम पर किस चारित्रिक पतन की ओर जा रहा है। आस्था और अंधविश्वास के कारण देश कितनी बार पराजित हुआ, यह बताने गजनवी और गोरी नहीं आएगा, रूप बदलकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आ रही हैं। हमारी भाषा बदल गई है, विकास की भाषा मातृभाषाएं नहीं रह गई।

आश्चर्य है कि धर्म ने सबसे अधिक विनाश भारत का किया और धर्म को अफीम की संज्ञा देने वाले मार्क्‍स यूरोप में पैदा हुआ। पोप के दरवाजे पर प्रश्न चिन्ह लगाने वाला मार्टिन लूथर यूरोप में जन्मा जिसने स्वर्ग की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए, भारत में भी कमोवेश यही स्थिति तब भी थी आज भी है। गनीमत है कि देश किसी धर्म का मुखापेक्षी नहीं है। धर्म न तो पुस्तकों में है न सिद्धान्तों में, धर्म आचरण और अनुभूति में निवास करता है। हिंसा सर्वथा त्याज्य नहीं है। एक बार किसी ने विवेकानन्द से पूछा- "कोई शक्तिशाली व्यक्ति यदि किसी दुर्बल का गला टीप रहा हो, तो हमें क्या करना चाहिए! स्वामीजी ने तड़ाक से उत्तर दिया-क्यों? बदले में उस शक्तिशाली की गर्दन टीप दो। क्षमा भी कमजोर होने पर अक्षम्य है, असत्य और अधर्म है, युद्ध उससे उत्तम धर्म है।" वास्तविक शिव की पूजा निर्धन और दरिद्र की पूजा है। केस्टा नामक भूखे संथाल को भोजन करा कर उन्होंने कहा था "तुम साक्षात नारायण हो। आज मुझे संतोष है कि भगवान ने मेरे समक्ष भोजन किया।" यह महाभाव क्या किसी संत साधु महात्मा में बचा है। साधुओं के इन अखाड़ों की पंगत में क्या किसी दरिद्र नारायण को प्रसाद मिलता है। धर्म सभा में विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित होते हुए भी विवेकानन्द ने कभी अपने को जगतगुरु नहीं माना, जबकि अपने देश में महामण्डलेश्वर और जगतगुरुओं के धतकरम सारा देश देखते हुए भी मौन है। पाप का कुम्भ भरा होते हुए भी फूट नहीं रहा है। पता नहीं यह कुम्भ किस धातु का बना है। यदि फूट गया तो आस्था समाप्त हो जाएगी। कुम्भ फूटेगा नहीं, वह आस्था के बल पर पुष्ट है।

जिस देश के छ: करोड़ हाथ पुण्य प्राप्त कर चुके हों, उस देश में दामिनियां सुरक्षा की गुहार लगाए? भ्रष्टाचार के लिए जनता सड़कों पर उतरे? वे पवित्र हाथ ही यदि व्यवस्था सुधार में उठ जाएं तो देश का अतीत गर्वित होकर वर्तमान को आशीषे! लेकिन उन हाथों में तो पाप धोया है, प्रायश्चित किया है। देश के सबसे बड़े संत गांधी विवेकानन्द या किसी ने भी स्नान और कल्पवास से मुक्ति और मोक्ष की बात नहीं कही। कुम्भ में एकत्रित साधु संतों के स्वास्थ्य को देखकर यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि कॉरपोरेट भारत के बाद देश की पूंजी कहां है? सोने के भगवान से लेकर सोने के सिंहासन तक इन्हीं के पास भरे पड़े हैं और सोने के भाव ने आम आदमी का सोना मुश्किल कर दिया है। वह सोता है तो सपने देखता है, जागता है तो छटपटाता है। प्रयाग के सेक्टरों, घाटों पर मुक्तिकामी लोगों की बिलबिलाती इच्छाओं को देख कबीर चिंतित है-"संतों! देखहु जग बौराना।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।

Saturday, February 9, 2013

जब आवै संतोष धन..


चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र
गरीबी में भी हमारे पास संतोष और सुख की पूंजी थी। यह मार्क्‍स की पूंजी से भिन्न थी। इसमें भौतिक सुख भले न रहा हो आत्मिक सुख था। प्रगति और आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम शामिल क्या हुए, पुरानी पूंजी भी बचा नहीं पाए और उस जगह पर पहुंचते हैं जहां कोई अपना नहीं दिखता दूर-दूर तक।
विरासत की यह पूंजी अब सिर्फ यादों में है। जिनके लिए सपने देखे थे, उनने भी अपने सपने पाल लिए, अर्थ की इस रेस में घर- परिवार पत्‍नी पुत्र, भाई-बहन, दादा-दादी, काका-काकी, नाना- नानी, मित्र-पड़ोसी के रिश्ते सिर्फ स्मृतियों में रह गए। संयुक्त परिवार खत्म हुए तो समाज, व्यक्ति केन्द्रित हो गया। पति-पत्‍नी और पुत्र पुत्री में परिवार की संज्ञा सिमट गई। अधिक से अधिक पैसा कमाने की प्रवृत्ति में मां-बाप ने बच्चों पर विराम तो लगाया, उन्हें "पालना घर" भेजकर या दाई (नौकरानी) के हवाले सौंपकर मुक्ति पा ली। स्नेह-ममता, दुलार-चुम्बन की उस उम्र के सपने को रौंद दिया। बच्चे ने बहन नहीं देखी, काका-काकी, दादा-दादी नहीं देखी। ये रिश्ते संबंध थे, लेकिन उनसे परिचित कराना पिछड़ापन और प्रगति में बाधक मान लिया गया। जिन संबंधों से संवेदना सहयोग के बीज उगते हैं, वे बोए ही नहीं गए। परिणाम यह हुआ कि संवेदित प्रसंगों में भी ये लड़के विगलित नहीं होते।

मनुष्य के सर्वश्रेष्ठ करुण भाव से तिरोहित हो गए। भावनात्मक शून्यता से पले बढ़े ये लड़के यदि आपराधिक प्रवृत्ति की ओर उन्मुख हुए तो दोष किसका? हम अक्सर अपने को दोषमुक्त करने के लिए इसे समाज में फैली विकृतियों, टीवी, इंटरनेट पर डालकर छुट्टी पा जाते हैं। हमने कभी अपने बच्चों के लिए समय नहीं निकाला। उन्हें आधुनिकता के इतने उपकरणों में घेर दिया कि उनका संसार ही मशीनी हो गया। प्रसिद्ध कवि पाव्लो नेरुदा ने कहा था-"हमारी सारी प्रगति और आधुनिकता बेकार है, अगर हम इन नन्हें फूलों को नहीं बचा पाए।" जहां हम खड़े हैं, वहां से पीछे लौटना तो असंभव है, लेकिन जो हमारी पहचान थी उसके बारे में ठहरकर सोचने और दौड़ के इस क्रम में जिसका "टारगेट" ही न दिख रहा हो, उस पर चिंतन मनन करना क्या आवश्यक नहीं दिखता? जिस देश के चिंतन की महान परम्पराएं रही हों। जिसने जीवन को समझने के लिए विराट ग्रंथ रचे वही देश झिलमिलाते आभासी सुख की अंधेरी गलियों में खो जाए। दुख में मल्हार गाने वाले, सुखों को चुनौती देते रहे हैं। टुकड़ों-टुकड़ों में सुख की तलाश करने वाले लोगों के भद्दार किस्सों से इतिहास भरा पड़ा है। लोक और समाज में वे कभी भी आदरणीय नहीं हुए। शहरों में फैले भ्रष्टाचारी तंत्र से ध्यान बंटाने के लिए शासन का विकेन्द्रीकरण गांवों की समावेशी संस्कृति को लीलता जा रहा है। काम करने वाले हाथों को मनरेगा का झुनझुना और गरीबी अति गरीबी रेखा का राशन थमाकर निठल्ले और कामचोरों की फौज खड़ी करके सरकारें निर्विकार भाव से खुश हैं।

प्रगति और विकास के नाम पर सुरसा के विशाल मुंह की तरह फैलते शहरीकरण, उद्योगीकरण और उदारीकरण के भयानक जंगल में कुटीर उद्योग, खेती, पशुपालन दम तोड़ रहे हैं। और इनसे जुड़े गांव जवार हर क्षण आशंका के साए में जी रहे हैं कि पता नहीं कब सरकारें, कॉरपोरेटों के लिए उनकी जमीन और आम निस्तारी जंगल पर कंक्रीट के महल खड़ी कर दें। छोटे उद्योगों, खेती, पशुपालन से जुड़े लोगों के ऊपर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। माल कल्चर, मॉस कल्चर को समाप्त करने के दहलीज पर खड़ी कह रही है, "तुम्हें पिछड़ा गरीब नहीं रहने देंगे, रोजगार देंगे" और वह टेक्निकल नान टेक्निकल के नाम पर ठगा जा रहा है। गांव शहर बन रहे हैं, गांव की आत्मीयता शहरी होकर व्यक्ति केन्द्रित होती जा रही है। गांवों में बसने वाले हिन्दुस्तान की कल्पनाएं सिर्फ कविताओं में रह जाएंगी। सुजलासुफला, शस्य श्यामला धरती अधिनायकों का जय-जयकार करती हमें हमारे अतीत को चिढ़ाएंगी।

अमीरी की दौलत में हमने अपनी आत्मा, देश और सभ्यता को पूरी तरह दरकिनार कर दिया। लोक व्यवहार और गीतों पर रीमिक्स ने कब्जा कर लिया है। लड़की की विदाई पर न सिर्फ पूरा गांव दुखी होता था वरन लोकगीतों में तो पशु पक्षियों के भी रोने और उदास होने के स्वर मिलते थे। खूंटे से बंधी गाय और भैंसे उदास और चारा-पानी, खाना पीना छोड़कर लड़की को जाते हुए देख रही हैं कि इसी के हाथ से इतने दिनों तक हमने दाना-सानी-भूसा खाया था। पशुता और मनुष्यता का पार्थक्य समाप्त करने वाले भाव गीत स्मृतियों में हैं। उन्हें जीवन्त रखने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हुआ जा सका। बड़े और छोटे के बीच के अनुशासन की सीमा रेखा खत्म करने का अभिशाप समाज के ऊपर है, किंबहुना हम सबके ऊपर। नौकर के रहते हुए अपने बेटों से अतिथियों के आवभगत, सत्कार के संस्कार अनजाने ही मिल जाते थे। दूसरों के सामने उठने बैठने-बात करने का संस्कार सहज रूप से मिलने के दिन व्यस्तताओं ने छीन लिए। जब से स्कूल जाना शुरु हुआ तब से हर विषय और कार्य की घंटी बजने का क्रम सेवा निवृत्ति तक कायम रहा। लेकिन घर रूपी स्कूल की घंटी बिना बजे और बजाए आज भी बज रही है। उसके कालखण्ड कभी नहीं बदले। वह घंटी सचेत करने की है, समाज के आत्म चेतन की यह घंटी नहीं बज रही है, उसे बजाना, सुनना और समझना भी होगा, क्योंकि हमारा सब कुछ धीरे-धीरे छिनता जा रहा है। हमारा संतोष,सुख भी दूसरों पर निर्भर है। जो नितांत निजी था वह अब प्रश्नांकित है। यह मंथन का समय है अन्यथा हम मिट जाएंगे।

शिष्टता और सभ्यता आचरण के विषय हैं। व्यवहार से हम व्यक्ति के संस्कार का मूल्यांकन करते हैं। तमाम वैश्विक उपलब्धियों के बाद आचरण में अपने माटी के संस्कार से विलग हो अपनी संस्कृति का क्षरण है। गरीबी और अमीरी भारतीय दर्शन में तरु की छाया और हाथ का मैल थी। इसका संबंध दिल और दिमाग से था। बड़े-बड़े अमीर दिल से गरीब और गरीबों की अमीरी के अनेक उदाहरण हमारी थाती हैं। गरीबों में दान की विराट परम्परा आज भी गावों में है। उनके कमाई का कुछ प्रतिशत दूसरों के लिए भी है। अर्थ की इस अंधी दौड़ मे रिश्ते और सम्बन्ध हाशिए पर हैं। गजनवी सारा लूट का माल हाथ में लेकर जन्नत में जाना चाहता था। मृत्यु के समय बंधी मुट्ठी खुल गई। धन की कोई सीमा नहीं है, संख्याएं अनंत हैं। धन सुख का किंचित साधन हो सकता है, साध्य नहीं। निश्चिंतता की नींद धन संग्रह में नहीं है। मन की लगाम को कसकर जीवन का अर्थ जीवन के लिए जीना, करना ही सच्चा मनुष्यत्व है।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।