| चिन्तामणि मिश्र रोज हर पल और हर जगह आदमी के वेश में वासना से फटी जीभ लपलपाते कुत्ते मासूम बच्चियों, औरतों और दादी- नानी की उम्र तक को, बलात्कार का कभी न मिटने वाला दंश दे रहे हैं। इस पर काबू पाने के लिए कठोर कानून भी बना लेकिन हालात काबू में नहीं आ रहे हैं। अदालतें भी सक्रिय हो गई हैं। ऐसे मामलों के फैसले भी असाधारण तेजी से निपटाए जा रहे हैं किन्तु बलात्कारियों के हौसले बुलन्द हैं। औरतों और बच्चियों में भय की सुनामी ऐसी पसरी है कि तिल-तिल अनजाने अंदेशों से उनकी दुनिया में तनाव और अपमान नत्थी हो गया है। मासूम बच्चियों से लेकर अधेड़ और वृद्ध डर से सहमी-सहमी जिन्दगी जीने के लिए शापित कर दी गई हैं। हांड़-मांस की नन्ही सी बच्ची अब घर के बाहर पड़ोस के अंकल से डरी हुई है, क्योंकि उसने उसे एक खिलौना समझ कर अपनी हवस के लिए रेशा-रेशा तार-तार कर दिया। उसकी मासूमियत अब किसी अंकल से टाफी-चाकलेट नहीं ले पाएगी। हर पराया-अपना मर्द-रिश्ता जीवन भर आतंकित करता रहेगा। बुजुर्ग की जान-पहचान भी डराती रहेगी। अंकल की गोद से भी भय जकड़ लेगा। खौफ के लहू-लुहान दलदल से ता-जिन्दगी गुजरना होगा। अब हमारे समाज में औरतों को लेकर सम्मान और न्यूनतम सहानुभूति भी नहीं बची है। हमारा समाज सदियों से औरतों के प्रसंग में सामंती सोच और उसके ही अनुसार व्यवहार करता आ रहा है। धर्म के पैरोकार पांडव अपनी पत्नी को जुए के दांव में लगा देते हैं। राजसभा में नारी को वस्त्रहीन किया जाता है और राष्ट्र-समाज-धर्म के महानायकों को सक्रिय विरोध करने तक का साहस नहीं होता। अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए औरत को ही अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है और पुरुष अपने सत्ता सुख के लिए अपनी गर्भवती पत्नी को जंगल में छुड़वा देता है। औरतों पर हो रही हिंसा के लिए कानून और न्याय प्रणाली ही अकेले जिम्मेवार नहीं है। इस जिम्मेवारी का सर्वाधिक दायित्व समाज पर है। हजारों साल से औरतों के जीवन में कोई बदलाव नहीं आया है। पहले युद्ध जब होते थे तो दोनों पक्ष की सेनाएं औरतों को ही निशाना बनाती थीं और अब दंगों में भी औरतों को ही भोगना होता है। असल में पितृसत्ता जैसा कुशलतम प्रबंधन अभी तक दुनिया की सफलतम कंपनी ने भी नहीं किया है। यह पुरुष सत्ता का प्रबंध कौशल ही तो है कि जाति, धर्म खान-पान, पहनावा, संस्कृति, परम्परा और यौन-सम्बन्ध भी पुरुष के हाथों में ही है। युग बदले, राज बदले, व्यवस्थाएं बदली, मूल्य बदले, लेकिन हर बदलाव को अपनाता हुआ पुरुष-सत्ता का अजगर टस से मस नहीं हुआ। औरतों को सताने और उनसे जबरन यौन सम्बन्ध बनाने की आसुरी मनोवृति आदिम युग से चली आ रही है, किन्तु इतने बड़े पैमाने पर और दुधमुंही बच्चियों से अस्सी साल की वृद्धाओं के साथ बलात्कार आधुनिक भोगवाद का प्रसाद है। औद्योगीकरण तथा बाजारवाद की अंधी दौड़ ने कृत्रिम समृद्धि और निठल्ले जीवन को बेलगाम वासना के गटर का कीड़ा बना दिया है। आज गांव हो या शहर, हर जगह और हर समय, हर प्रकार का नशा बहुत आसानी से उपलब्ध है। यह नशा विवेक को आसानी से रगेद-रगेद कर खतम कर देता और फिर बलात्कारी के सामने न तो औरत की उम्र होती है और न कोई रिश्ता होता है उसके जेहन में होता है केवल और केवल नारी शरीर जिसे वह पुरुषवादी हेकड़ी से भोगता है। केवल इसे कठोर कानून बना देने से समाप्त कर पाना कभी सम्भव नहीं हो सकता है। हमारा आशय यह कतई नहीं है कि कठोर कानून की जरूरत नहीं है। जरूरत है इसकी। लेकिन समाज को औरतों के प्रति जो दोयम दर्जे की सोच है उसे भी बदलना होगा। हमारी वर्तमान बौद्धिकता की यह विचित्रता है कि यह अपने महान ज्ञानियों, मनीषियों और महापुरुषों,अवतारों, की केवल जय-जयकार करती है उनकी शिक्षाओं, आदर्शो की उपेक्षा करती हैं। लोगों का जीवन आदर्शविहीन, प्रयोजनविहीन और संस्कारविहीन होता जा रहा है। देश की प्रगति को आर्थिक मापदंडों से मापा जाता है। जबकि सामाजिक स्तर पर देश पाताल में जा चुका है। असल में औरतों के सम्मान को बनाए रखने के लिए पुरुषों की सोच को भी बदलने की जरूरत है। दिल्ली में चलती बस में हुए गेंग रेप के बाद हमारे कुछ नेताओं, धर्म की महंती-चादर ओढ़े कतिपय सन्तों ने बेहयाई से जैसे बचन दिए उससे समाज की पितृ सत्ता के दबदबे के दर्शन आसानी से हो जाते हैं। गुजरात दंगों पर लोकसभा में हुई बहस के दौरान तत्कालीन केन्द्र सरकार के एक कैबिनट मंत्री ने पूरी बेशर्मी से कहा था कि औरतों के साथ बलात्कार तो होता ही रहता है, इसमें नया क्या है। यह मंत्री कभी लोहिया का साथी और खांटी समाजवादी था। बलात्कार के लिए महिलाओं को ही दोष मढ़ने की परम्परा कायम है। कह दिया जाता है कि औरते ऐसे कपड़े पहनती है जिससे कामुकता सिर उठाती है। उनके हावभाव को भी दोषी करार दे दिया जाता है। लेकिन चार-पांच साल की बच्ची और अस्सी साल की वृद्धा के साथ क्यों बलात्कार होता है? इनके पहनावा और हावभाव में कामुकता का तत्व कहां तक होता है? कभी मैंने एक दिल छूती अंग्रेजी कविता पढ़ी थी जो मुङो आज भी नहीं भूलती है। उसका हिन्दी अनुवाद कुछ इस तरह से है- रात के समय घर से अकेले मत निकलो, इससे मर्दो को प्रोत्साहन मिलता है। किसी भी समय अकेले मत निकलो, कैसी भी परिस्थिति मर्दो को प्रोत्साहित करती है। घर में मत रहो, घुसपैठिए और सगे सम्बन्धी बलात्कार कर सकते हैं। बिना वस्त्र के मत जाओ, इससे मर्दो को प्रोत्साहन मिलता है। वस्त्रों समेत मत जाओं, किसी भी तरह के वस्त्र मर्दो को प्रेरित करते हैं। बचपन को टाल दो, कुछ बलात्कारी बालिकाओं से बलात्कार करते हैं। बुढ़ापे को टाल दो, कुछ बलात्कारी वृद्धाओं को पसन्द करते हैं। पिता, दादा, नाना, चाचा, ताउ या भाई से रिश्ता तोड़ दो, ये रिश्तेदार हैं जो कभी-कभी, बलात्कार करते हैं। पड़ोसी मत बनाओ, शादी मत करो,क्योंकि बलात्कार शादी में कानूनी है, निश्चिंत होने के लिए स्वयं को मिटा दो। लगभग हर विज्ञापनों में औरत की देह को, उपयोग और उपभोग की चीज बना कर परोसा जाता है, हर चैनल पर यौन शक्तिवर्धक दवाओं के अश्लील विज्ञापन दिखाए जाते हैं। परफयूम के विज्ञापनों में मर्दानगी का पागलपन दिखाया जाता है। ये घातक स्थितियां है इसे हमारा समाज ही पैदा करता है। सामान्य इंसान के रूप में औरत को स्वीकार किया जाना अभी बाकी है। कानून अकेला कुछ नहीं कर सकता। समाज में भी बदलाव की जरूरत है। - लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं। सम्पर्क सूत्र- 09425174450. |
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Saturday, May 25, 2013
बाहर है खतरा तो घर में भी मुश्किल
खटराग चिन्तामणि मिश्र
| चिन्तामणि मिश्र कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की पिछले माह निबन्ध प्रतियोगिता सम्पन्न हुई थी जिसमें कुछ चुने हुए विषयों पर चालीस मिनट में एक निबन्ध लिखना था। इन निबन्धों का मूल्याकंन करने के लिए आयोजकों को पता नहीं कैसे और क्यों सूझ कि इस दिमाग-खाउ बेगार के काम के लिए मैं ही उपयुक्त हूं। इस धारणा के चलते आयोजक संस्था ने मेरे पास प्रतिभागिओं के बत्तीस निबन्ध मूल्याकंन के लिए भेज दिए। मरता क्या न करता, अपनी साख बचाने के लिए इस चालीस डिग्री के आसपास झूल रहे तापमान में निबन्धों को पढ़ने लिए बैठना पड़ा। इन निबन्धों में आधे से भी ज्यादा निबन्ध औसत दर्जे के थे। कुछ निबन्ध अच्छे थे, किन्तु एक निबन्ध ऐसा भी था कि इसे पढ़ कर न केवल मैं चौंक पड़ा बल्कि इसे मैंने पूरे मनो-योग से तीन बार पढ़ा और मूल्याकंन के लिए निर्धारित अधिकतम सौ अंकों में से इस निबन्ध को मैंने सौ अंक भी दे दिए। इस निबन्ध का विषय था- ‘यदि मैं वित्तमंत्री होता।’ निबन्ध में लिखा गया था कि देश में भ्रष्टाचार को लेकर बहुत हल्ला हो रहा है। वास्तव में भ्रष्टाचार बढ़ा है, किन्तु भ्रष्टाचार को बुराई के रूप में देखने का नजरिया अब बदला जाना चाहिए। वित्तमंत्री की हैसियत से मेरी कोशिश होगी कि विदेशों में भेजे जाने वाले भ्रष्टाचार के काले धन को किसी भी हालत में जाने से रोका जाए। इसके लिए कई उपाए किए जाएंगे। जैसे विदेश में जमा रकम की सूचना देने वाले को सरकार उस रकम का आधा पैसा भुगतान करेगी और जिसका पैसा विदेश में जमा होगा उसे विशेष कानून बना कर पांच साल के लिए बिना किसी अदालत में मुकदमा चलाए जेल में सरकार रखेगी। निबन्ध में लिखा था कि अभी भी हमारे देश में कई ऐसे कानून हैं जिनको अदालतों और जमानतों से अलग रखा गया है। इन कानूनों से देश के नागरिकों के मौलिक अधिकारों की हत्या जरूर होती है, किन्तु देश हित में इनका चलन अभी भी हो रहा है। निबन्ध में लिखा था कि भ्रष्टाचार को खतम करने के लिए सरकारों ने ढेरों उपाए किए लेकिन किसी भी उपाए से कभी सफलता नहीं मिली। सरकार डाल-डाल चलती है तो भ्रष्टाचारी तुरन्त पात-पात चलने लगते हैं। ऐसा लगता है कि हमारे देश में भ्रष्टाचार करना हमारी परम्परा में है। यही कारण है कि इसे खत्म नही कराया जा सका। वित्तमंत्री बन जाने पर उनकी सरकार भ्रष्टाचार को रोके जाने के लिए कभी कोई उपाए नहीं करेगी। भ्रष्टाचार के आलोचकों की नजर इस बात पर नहीं जाती कि भ्रष्टाचार से कमाया गया काला पैसा देश की अर्थ व्यवस्था को ही मजबूत करता है। अगर यह काला पैसा विदेश नहीं जा पाता है तो हर भ्रष्टाचारी इसे अपने ही देश में खर्च करता है। वह इस पैसे से घर, मकान बंगला, कोठी बनवाता है। बेटे-बेटियों की शादी में बेतहाशा पैसा खर्च करता है। सराफा बाजार में खरीददारी करता है। मंदिरों, मठों और दरगाहों में सोना-चांदी के साथ नकद रकम चढ़ाता है। जाहिर है इससे वे हजारों लोग जो भवन निर्माण,विवाह शादियों और आभूषण बनाने धर्म को और अधिक विस्तार देने आदि का काम करते हैं उनको आसानी से रोजगार मिलता रहता है। निबन्ध में लिखा था कि भ्रष्टाचार से कमाया गया पैसा अगर देश में ही रहता है तो देश की अर्थ-व्यवस्था को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है। यह काला पैसा शेयर बाजार में लगता है और इसी पैसे से बीओटी सड़कें,बांध, कारखाने बिजली घर रेल लाइनें रिहायशी कालोनियां, अपाटर्मेन्ट, निजी अस्पताल, निजी स्कूल-कॉलेज और निजी विश्वविद्यालय बनाए जाते हैं, जो देश की प्रगति के पैमाने होते हैं और देश की जनता को इनसे लाभ मिलता है। यूरोप से पढ़कर आए अर्थशास्त्री हमेशा कहते हैं कि भ्रष्टाचार से कमाया गया काला पैसा देश में मंहगाई बढ़ाता है। लेकिन वे यूरोपीय अर्थशास्त्र के उन पर-बाबाओं के इस सिंद्वात की अनदेखी कर जाते हैं कि बाजार में वस्तुओं के मूल्य का निर्धारण उपभोक्ता करता है। जब तक ग्राहक की क्षमता किसी वस्तु को क्रय करने की जिस कीमत तक होती है तभी उस वस्तु की उतनी कीमत होती है। इस तरह यह पूरा खेल मांग और आपूर्ति के सिद्वान्त पर टिका है। काले धन और महंगाई का कोई सम्बन्ध नहीं होता है। यह कोरा मिथक है। निबन्ध में लिखा था कि गरीब आदमी अपने पास के एक रुपए में से नब्बे पैसा खर्च कर देता है और दस पैसा बचत में लगाता है। किन्तु अमीर आदमी एक रुपए में से दस पैसा खर्च करता है और नब्बे पैसों की बचत करता है। अपनी इस बचत को वह शेयर बाजार में निवेश कर देता है। जिसका लाभ निजी सेक्टर को मिलता है और अन्त में इससे देश की ही तो प्रगति होती है और देश मजबूत होता है। इसी निबन्ध में एक और उपाय इस भावी वित्तमंत्री ने लिखा कि उनकी सरकार एक हजार और पांच सौ के नोटों का चलन तत्काल प्रभाव से बन्द करेगी और सौ रुपए के नोटों का डिजाइन बदल कर एक पखवारा तक बैंकों में पुराने सौ रुपयों के नोटों को बदलने का काम करेगी। इस अवधि के बाद पुराने सौ रुपए के नोटों का चलन बन्द हो जाएगा। नोटों को बदलने के समय किसी भी प्रकार की पूछ-ताछ नहीं की जाएगी। केवल फोटो लगा पहचान पत्र लाना होगा और बैंक नागरिक का नाम पता तथा पहचान पत्र का विवरण अंकित करके नोट बदल देंगे। बाद में कालेजों तथा विश्वविद्यालय के मास्टरों को नोट बदलवाने वाले नागरिक के घर भेज कर यह कन्फर्म कराया जाएगा कि बदले गए नोट काला धन है या सफेद। इससे वे तमाम लोग जिन्होंने काला धन कमाया है पकड़े जाने के भय से नोट बदलने नहीं आएंगे और अगर किसी ने ज्यादा होशियारी दिखाई तो वह जांच में तो पकड़ा ही जाएगा। मैं जानता हूं कि इस निबन्ध में लिखे गए उपाए असम्भव तो नहीं है, किन्तु इन्हें लागू कर पाना कठिन और अव्यवाहारिक हैं, क्योंकि हमारे राजनेता इसे लागू ही नहीं होने देंगे। यह लोग ऐसी सरकार को ही नहीं चलने देंगे और अविश्वास प्रस्ताव लाकर उस सरकार को ही गिरा दे, जिसमें ऐसा वित्तमंत्री होगा। बहरहाल इस निबन्ध से यह तो साफ हो गया कि हमारे देश का युवा वर्ग देश की दशा-दुर्दशा को लेकर कितना गम्भीर है और इसको सुधारने के लिए चितिंत ही नहीं है बल्कि सोचता-विचारता भी है। हालांकि यह समस्या अर्थशास्त्र से जुड़ी है और इस पर विद्वान अर्थशास्त्री ही कहने के लिए अधिकृत हो सकते हैं, किन्तु यह भी हमारे देश में विचित्र विडम्बना है कि जरूरी नहीं है अर्थशास्त्री ही वित्तमंत्री हो या फिर स्वास्थ्य विभाग का मंत्री डॉक्टर ही हो। कई बार तो अपने देश में शिक्षा मंत्री केवल दसवीं पास बन चुके हैं। - लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं। सम्पर्क सूत्र - 09425174450.Details |
Friday, May 10, 2013
जेलों को कत्लगाह बना दिया
जेलों को कत्लगाह बना दिया पाकिस्तान की लाहौर जेल में भारतीय सरबजीत सिंह पर उसी जेल में ही बन्द कुछ कैदियों ने प्राण घातक हमला करके मार डाला। इसके पहले भी पाकिस्तान की जेलों में बन्द कई भारतीय कैदियों पर हमले हो चुके है और उनकी मौत हो चुकी हैं। भारत की जेलों में भी ऐसी घटनाएं होती हैं। अभी जम्मू की जेल में एक पाकिस्तानी कैदी पर जेल में ही एक कैदी ने प्राणघातक हमला किया है जिसका इलाज चल रहा है। वैसे इस तरह के हालात पाकिस्तान और भारत की ही जेलों के नहीं है जहां कैदी हमले के शिकार होते हैं।
सारी दुनिया की जेलों की यही कहानी हैं। हालांकि हर सरकार कैदियों के मानवाधिकार की हिफाजत की कसमें खाती रहती हैं, किन्तु कैदियों का जीवन जेल अधिकारियों तथा जेलों में बंद दबंग और माफिया कुनबे के कैदियों के रहम पर ही टिका होता हैं। जेलों में सरकार का कानून नहीं चलता, जेल मैन्युल खेतों में खड़े उस बिजूके की तरह होते हैं जिन्हें किसान जंगली जानवरों से अपनी फसल बचाने के लिए स्थापित कर देते हैं।
ऐसे ही हालात पुलिस हवालात में बन्द कैदियों के हैं। पुलिस अपनी हिरासत में लिए व्यक्ति को अपनी हवालात में उस पर आरोपित अपराध की स्वीकृति के लिए थर्ड डिग्री का बैखौफ इस्तेमाल करती हैं। इन पर ऐसे अमानवीय अत्याचार किए जाते हैं कि सुन कर ही कपड़े खराब हो जाते हैं और पेट के भीतर का सब खाया-पिया बाहर आ जाता हैं। लगातार घन्टों और कई बार कई दिनों तक चलने वाले इस अत्याचार के कारण कैदी के प्राण परमधाम की यात्रा पर निकल जाते हैं और कई बार इनको मार ही दिया जाता है। हमारे देश में अपराधों के अनुपात में पुलिस बल की कमी और सबूत जुटाने के लिए जरूरी दक्षता का अभाव तथा पुलिस संगठन की डडंहाई सोच के चलते हवालात में कैदियों के साथ किए जाने वाले बर्बरता के रूप में सामने आता हैं। अभी सरकार ने संसद को बताया है कि पिछले तीन साल में देश में पुलिस हिरासत में 417 लोगों की मौत हुई हैं।
असल बात तो यह है कि पुलिस के कामकाज के तरीके ज्यादा हिसंक हुए हैं। पुलिस की ज्यादती पर सुप्रीम कोर्ट कई बार चिन्ता प्रगट कर चुका है। सन 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने ग्यारह सूत्री निर्देश जारी किए थे, जिसमें उल्लेख था कि अगर पुलिस किसी को हिरासत में रखे तो किन-किन बातों का पालन करना होगा, लेकिन इनका पालन करना जरूरी नहीं समझ गया। जेलों और हवालातों में कैदियों के साथ होने वाले अमानवीय बर्ताव को लेकर मानवाधिकार आयोग नाराजगी जता चुका हैं किन्तु आयोग की कोई सुनता ही नहीं है ऐसा आभास होता है। जेलों में क्षमता से अधिक कैदी रखे जाते हैं।
हर बैरक में दुगने से भी ज्यादा कैदी बन्द कर दिए जाते हैं। इनमें शैाचालय व पीने का पानी भी मानदंड के अनुसार नहीं होता।
जेलों में भीड़ अधिक होने तथा भ्रष्टाचार की वजह से न तो समुचित भोजन मिल पाता है और न साफ-सफाई हो पाती है।
बीमार कैदियों को चिकित्सा तक सुलभ नहीं होती।
हर जेल का अलिखित कानून है कि कोई भी कैदी इस प्रसंग में अपना मुंह नहीं खोल सकता अगर वह ऐसा करता है तो उसके शरीर को गीले आटे की तरह इस तरह गूंथा जाता है कि सारी जिन्दगी वह इसे भुला नहीं पाता। जेलों में समलिंगी यौन शोषण आम चलन में हैं। दबंग कैदी आम कैदी से अपनी सेवा ही नहीं कराते बल्कि उस पर हिंसक दबाब बना कर नियमित रूप से पैसा भी वसूलते हैं। जेल प्रशासन आज भी लार्ड मैकाले की सोच का कायल है कि कोई भी अपराधिक कानून तब तक कारगर साबित नहीं हो सकता जब तक जेल में कैदियों को प्रताड़ित करने के साधन उपलब्ध न हों। सन् 1836 में जेल सुधार समिति की रपट से असहमत होते हुए मैकाले ने जेलों में अनुशासन बनाए रखने के लिए कठोर नियमों का होना जरूरी बताया था। जेल अधिनियम 1894 इसी पृष्ठभूमि में बना था।
कारावास अपने आप में एक सजा है। जेलों और हवालातों में यातना देना या मानव सुलभ सुविधाओं से कैदियों को वंचित रखना कानून की मंशा नहीं होनी चाहिए। जेलों और पुलिस की हिरासत में होने वाली मौतें सरकारी व्यवस्था का अमानवीय रूप उजागर करती हैं। देश में कैदियों के अधिकारों की किसी को भी परवाह नहीं है। सबसे चिन्ताजनक पहलू तो यह है कि हिरासत में या जेल में हुई मौतों या कैदियों को घायल करने के मामलों किसी की जबाबदेही निर्धारित करने के मामलें में लुंज- पुंज हैं, सटीक कार्यवाही का अभाव हैं। जेल प्रशासन ऐसे मामलों में बड़ी सफाई से यह तर्क देकर बच निकलता है कि कैदी आपस में लड़े हैं और जेल प्रशासन ने खबर पाते ही उचित व्यवस्था की हैं। देश में कौन नहीं जानता कि हमारी जेलों में मुंह मांगा पैसा खर्च करने पर जेल के भीतर हर वह चीज उपलब्ध हो जाती है जिसकी जेल नियमावली में मनाही है।
बहरहाल हवालात और जेल में कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार पर अंकुश तभी लग सकता है जब सरकार और मानव अधिकार आयोग गम्भीरता से कुछ ऐसे उपाए करें जिससे पुलिस तंत्र और जेल प्रशासन को मनमानी का मौका ही न मिले। सरकार की प्राथमिकताओं में जेल विभाग बहुत नीचे आता है। आम नागरिक भी जेलों से कोई सरोकार नहीं रखना चाहता। मीडिया के लिए जेलों के दरवाजे बन्द है जेलों की ऊंची चहारदिवारी के अन्दर झंकना असम्भव है। इस स्थिति में सरकार को संवदेना दिखानी चाहिए। सरकारें आज भी यही सोच रखती हैं कि अपराधी को समाज से दूर रखा जाना ही कारावास का मतलब है। अगर ऐसा ही है तो फिर जेलों पर इतना खर्च करना ही गलत है, अंग्रेजी राज की तरह कैदियों को किसी समुद्र में निर्जन टापू पर छोड़ देना सस्ता विकल्प है।
जेलों की हालत सुधारने के लिए कुछ तात्कालिक कदम तो उठाए ही जा सकते हैं जैसे- हवालातों और जेल के भीतर कैमरे लगाए जाएं और किसी भी हालत में इनको बन्द न किया जा सके। न्यायिक अधिकारी भी नियमित रूप से और कभी-कभी अचानक हवालातों तथा जेलों का निरीक्षण करें। इसके साथ प्रख्यात समाज सेवकों और मीडिया के लोगों की भी समिति हो जो इन जगहों का औचक निरीक्षण करके अपनी रपट सरकार को दें और सरकार ऐसी रपटों पर तुरन्त कार्रवाई भी करें।
- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं।
सम्पर्क सूत्र- 09425174450.
Friday, May 3, 2013
शादी में पैसों का प्रदर्शन
चिन्तामणि मिश्र
शादी में पैसों का प्रदर्शन शादीयों का मौसम कई सप्ताहों का विराम लेकर फिर वापस आ गया है। निमंत्रण कार्ड बटने लगे हैं। बाजार में खुशी का माहौल हैं। हर दुकानदार जबरदस्त कमाई की उम्मीद लगाए है। मैरिज हाल,बैन्ड वाले,घोड़ी वाले और कैटरिंग आदि के धन्धों में दम मारने की फुरसत नहीं है। ऐसेऐसे निमंत्रण कार्ड देखने को मिल रहे है कि भौचक्का होना पड़ रहा है। कई निमंत्रण कार्ड अनोखे और नवीनतम है। एक ऐसा कार्ड मिला जो कार्ड किसी भी एेंगिल से नहीं था, इसका रूप सांध्यकालीन अखबार के आकार का और चार पृष्ठ का था।
इसमें दूल्हें के परिवार के चित्र थे और उनके गुणों का बखान था। एक निमंत्रण पत्र में खुशबू भरी थी, लिफाफा खोलते ही सारा घर महकने लगा। यह महक कई घन्टों तक बनी रही। कई ऐसे निमंत्रण कार्ड मुङो मिल जाते हैं जो अंग्रेजी में ही छपे होते हैं। मजे की बात तो यह है कि इनमें से कई अंग्रेजी न तो बोल पाते हैं और न लिख ही पाते हैं। अपना नाम तक अंग्रेजी में नहीं लिख सकते। अब निमंत्रण कार्ड देने के साथ एक चलन यह भी शुरू हो गया है कि साथ में मिठाई या सूखे मेवों का डिब्बा भी रहता है। देहरादून से मेरे एक मित्र ने अपनी बिटिया की शादी का कार्ड भेजा है जिसे पढ़-देख कर लगता ही नहीं है कि हमारा देश गरीबी से जूझ रहा है। इस शादी में वर और वधु पक्ष के लिए अलग-अलग रंग की ड्रेस पहनने की व्यवस्था की गई है। मित्र ने फोन पर बताया कि अलग अलग ड्रेस और साड़ियां होगीं। शादी के दिन लड़की पक्ष के लिए एक रंग, लड़के वालों के लिए दूसरा रंग। अब मैरिज हाल और मैरिज पंडाल में सम्पन्न होने वाली शादियों का फैशन हट रहा हैं। पांच-सात सितारा वाले होटलों में या फिर किसी मैदान में फिल्मों की तरह भव्य सैट लगवा कर शादियां होने लगी हैं।
आजकल शादियों में अमीर हो या गरीब, एक कार्यक्रम समान होता है और वह है गिद्धभोज। भोज आंगन में घुसते ही कई प्रकार की सलाद के दर्शन होते हैं। सलाद के नाम पर ऐसेऐसे आइटम होते हैं कि समझना कठिन हो जाता हैं। कई प्रकार की चटनी और अचारों की व्यवस्था यही पर होती हैं। फिर शुरू हो जाता है मुख्य भोजन और सहायक भोजन सामग्री के सजे- धजे स्टाल। आधा दर्जन से अधिक किस्म की रोटियां पांच- छह प्रकार की दाल, चार प्रकार का चावल, एक दर्जन वैरायटी की सब्जी, कई प्रकार के रायते, दही बड़े, पूड़ियां और कचोरिया, मिठाईयों की कई किस्में होती हैं। सहायक भोज सामग्री में पानी पूरी, भेल पूरी आलू चाट, समोसा तो होता ही है, दक्षिण भारतीय डिश मसाला डोसा, सादा डोसा, पनीर डोसा, इडली, बड़ा सांभर भी विराजमान रहता है। चाइनीज ने तो ठेठ गांवों में भी जगह बना ली है। मौसम चाहे कंपकपाते जाड़े का हो, किन्तु आइसक्रीम की कई वैराइटी के भी स्टाल होते हैं। बादाम और केशर के दूध के भी दर्शन अनिवार्य है।
अब गिद्ध भोज में फूट्र स्टाल भी जगह पा गया है। कई गिद्ध- भोजों में मैंने पीने का सादा पानी नहीं देखा अब मिनरल वाटर के बिना गिद्ध-भोज अधूरा माना जाने लगा है। मंडप के नीचे बैठ कर पंगत का रिवाज अब कहीं नहीं बचा है। स्वरुचि भोज के नाम पर जो गिद्ध-भोज चल निकला है, उसमें खाने वाले भोजन की टेबिलों पर यह सोच कर इस तरह हमला करते हैं कि अगर सभ्यता और शिष्टाचार के चक्कर में पड़े तो प्लेट थामे ही रह जाएंगे। खिलाने वाले मेजवान में अतिथि सत्कार का कोई भाव नहीं होता। वह पूरी तटस्थता से टहलता रहता है और मन ही मन हिकारत के भाव से सोचता रहता है कि खाना है तो खाओ नहीं तो दफा हो जाओ। अपने यहां भगवान को कई प्रसिद्ध मन्दिरों में छप्पन प्रकार के भोग लगाए जाते हैं। लेकिन अब तो शादियों में तीस-चालीस प्रकार की भोजन सामग्री का आम रिवाज हो गया हैं। पिछले साल मैंने एक शादी में इक्यासी प्रकार की वैरायटी गिनी थी।
मेजबान को इस बात से कोई लेना-देना नहीं होता हैं कि पेटू से पेटू भोजन भट भी हर वैरायटी को चखना ही चाहे तो चख नहीं सकता क्योंकि पेट का असीमित रकबा तो होता नहीं।
दिखावे का चलन तेजी से चल रहा है। अजीब बिडम्बना है कि नव-दौलतिए बने लोग चार पैसा कमाने के बाद प्रसिद्धि पाना चाहते हैं। अपना रुतबा कायम करना चाहते हैं। इसीलिए वे विवाह जैसे आयोजनों में अजीबो गरीब फूहड़ता करते हैं। एक साधारण हैसियत वाला मेजवान पूरे वक्त इस तनाव में होता है कि भोजन घट न जाए किन्तु अब जो दिखावे की शादियां हो रही हैं उनमें इसकी समस्या आती है कि जो कई कुन्टल भोज्य सामग्री बची है उसको कहां और कैसे ठिकाने लगाई जाए।
यह बात अफसोस पैदा करती हैं कि उदारीकरण के साथ हमने जो जीवन शैली अपनाई है वह अपने साथ सुरिुच या संस्कृति नहीं ला रही है। वह सिर्फ पैसों से बनी है। मल्टीप्लेक्स और माल इस तबके के सांस्कृतिक मन्दिर हैं, जहां इनकी शामें कटती हैं। आज लोगों ने धारणा बना ली है कि पैसा ही मानस म्मान दिलाता है। यह वह आर्थिक ऐंठ हैं जो किसी भी सांस्कृतिक आग्रह को अवहेलना और उपहास से देखती है।
अब तो शादी-ब्याह का पूरा ताम-झम ही बाजार के हवाले हो गया हैं। इसके लिए पूरा मैनेजमेन्ट शास्त्र ही विकसित हो गया हैं। शादी के लिए जगह-जगह, सजावट, फेरे, जयमाल, कैटरिंग, वाहनों की पार्किग, घोड़ी, बैन्डबाजा विदाई आदि जितने भी काम है उसकी व्यवस्था दक्ष और व्यवसायिक प्रबंधक कर रहे हैं। अब हमारे समाज में बाजार रीति-रिवाजों के संचालक की भी भूमिका अदा कर रहा है।
समाज की दिशा और दशा बाजार तय कर रहा है।
उपभोक्तावादी संस्कृति के साए बहुत गहरे होने लगे हैं। होटलों में लड़के और लड़की के परिवार मेहमान जैसे आते हैं। रस्म पूरी करके दूसरे दिन अपने-अपने घर चल देते हैं। दोनों पक्षों में आत्मीयता के लिए कोई जगह नहीं होती केवल वैभव प्रदर्शन को ही महत्व दिया जा रहा है। प्लास्टिक के घड़े, लोहे के फोल्डिंग मंडप, छपे हुए स्वास्तिक, तोरण आसानी से उपलब्ध हैं। सांस्कृतिक अराजकता का माहौल फैलता जा रहा है। बनावट और दिखावा सब तरफ हावी हो गया है। अपने रीति-रिवाजों को आउट ऑफ डेट का टैग लगा कर हम विदा कर चुके हैं और हम सांस्कृतिक अराजकता से घिर चुके हैं।
- लेखक वरिष्ठ साहित्कार एवं चिंतक हैं।
सम्पर्क सूत्र - 09425174450.
पुलिस को सुधरने ही नहीं देते
| पुलिस को सुधरने ही नहीं देते मुरादाबाद में बलात्कार की शिकार एक लड़की जब अपने पिता के साथ कोतवाली में रपट लिखाने गई तो पुलिस वालों ने रपट लिखने की जगह पीड़ित लड़की को ही हवालात में बन्द करके पिटाई की और फिर मुंह बन्द रखने की धमकी देकर भगा दिया। ऐसी ही घटना हरियाणा में एक पखवारा पहले घट चुकी है। दिल्ली में ताजा-ताजा पुलिस की कलंक-गाथा ने फिर मुनादी कर दी कि खाकी वर्दी की गुफा का वाशिन्दा संवेदना और मानवीयता से बांझ है। पांच साल की अबोध बच्ची के साथ क्रूरतम बलात्कार के प्रसंग में पुलिस की लीपा-पोती का विरोध करने पर भारतीय पुलिस सेवा के एक अधिकारी ने एक युवती के गालों पर थप्पड़ों की बरसात कर दी । युवती के कान से खून की धारा बह निकली। पुलिस पीड़ितों और उनके हिमायतियों के साथ इसी तरह का व्यवहार करने की आदी हो चुकी है। लेकिन सरकार चलाने का दम्भ भरने वाले नेता पक्की बेशर्मी से पुलिस की कार्यप्रणाली को मानवीय बनाने की जगह पगलैटी- प्राणायाम करते रहते हैं। अब केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने फुलझड़ी छोड़ी है कि सरकार पुलिस तंत्र में सिपाही और हवलदार के पद समाप्त करना चाहती है। पुलिस की निम्न इकाई सहायक सब इंस्पैक्टर से शुरू होगी। पुलिस में भर्ती की योग्यता स्नातक रहेगी । सरकार पुलिस के निचले कर्मचारी के कन्धों पर भी स्टार लगाने जा रही है। यह पहला मौका नहीं है जब सरकार पुलिस सुधार के नाम पर ऐसे धतकरम करती रही है। सरकारें ऐसे डॉक्टर की तरह है जो आंख के मर्ज की दवा करने की जगह दांत की दवा देता है। पुलिस की कार्यशैली और आम जनता के प्रति उसके रवैए को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी अनेकों बार महत्वपूर्ण सुझव व निर्देश दिए हैं। लेकिन किसी भी राज्य सरकार तथा केन्द्र ने इस दिशा में कोई कदम उठाना जरूरी नहीं समझ। देश की बड़ी अदालत कई बार कह चुकी है कि पुलिस तंत्र चरमरा गया है। पुलिस और जनता के मध्य गहरी खाई बन चुकी है और अन्याय का एहसास ऐसा ही बना रहा तो एक दिन लोगों की भीड़ सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाएगी। जाहिर है कि लोगों के बुनियादी अधिकारों के हनन की यह स्थिति पुलिस सुधार की अनदेखी का नतीजा है। औपनिवेशिक जमाने में पुलिस का गठन शासकों का इकबाल बनाए रखने और जनता को निर्ममता से कुचलने के इरादे से किया गया। मगर जनतांत्रिक प्रणाली के छह दशक बाद भी पुलिस का रवैया वैसा ही है बल्कि उससे ज्यादा क्रूर और अमानवीय है। पुलिस के चेहरे को बदलने के लिए सन 2006 में बड़ी अदालत ने अपने आदेश में मुख्य रूप से सात कदम उठाने को कहा था। इनमें पुलिस को राजनीतिकों के अनुचित हस्तक्षेप से मुक्त करना, पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति में पारदर्शिता, कानून व्यवस्था और अपराधों की जांच के काम को अलग-अलग करना, पुलिस शिकायत प्राधिकरण के गठन जैसे सुझव शामिल थे। राष्ट्रीय पुलिस आयोग और पुलिस सुधारों पर गठित रिबेरो समिति, सोली सोहराबजी और पदमनाभैया समितियों ने भी अपनी र्पिोटों में इसी तरह की कई अहम सिफारिशें की थी, लेकिन तमाम सुझव दफना दिए गए। असल में पुलिस का इस्तेमाल राज्य और केन्द्र सरकारें अपने राजनैतिक हित साधने में करती आई हैं। ऐसे में पुलिस तंत्र को सुधारने की इच्छा ही किसी सरकार में नहीं है। इस मनमानी के चलते पुलिस बेलगाम हो गई है। अब हमारे देश में साफतौर पर दो वर्ग हैं। एक वर्ग उन देवताओं का है जिसमें शासक, प्रशासक, नेता-बिरादरी, दलाल, ठेकेदार, माफिया, उद्योगपति, फिल्मों के नचइया-गवइया और धर्मो के गद्दीनसीन महन्त शामिल हैं। दूसरी विरादरी चिरकुटों की है। सत्ता पर कोई भी दल आसीन हो सभी पुलिस को अपना टहलुआ समझते हैं और इसे देवताओं की विरादरी की आव-भगत, उसकी सुरक्षा, उसके जायज-नाजायज हितों की देखभाल में जोते रहते हैं। शेष चिरकुटों की भीड़ के लिए शासकों ने पुलिस को मनमानी करने अपमानित करने, नोचने-खसोटने और हड्डी-पसली तोड़ने के लिए लगा रखा है। इनको यह भी छूट है कि शान्ति-व्यवस्था की ओट में चिरकुटों पर चादंमारी भी कर सकते हैं। ईमानदारी से अगर हकीकत को परखा जाए तो यही निष्कर्ष सामने आता है कि सरकारें पुलिस का बेजा इस्तेमाल करती आ रही है और पूरा पुलिस तंत्र देश और विदेश में बदनाम है। मेरी अक्सर पुलिस के छोटे,मझोले और बड़े अफसरों से बातें इस बिन्दु पर होती रहती हैं। शासकों द्वारा बना दी गई अपनी इस छवि से अधिकतर असंतुष्ट और दुखी हैं। वे अपनी छवि को सुधारना चाहते हैं। ऐसा कतई नहीं है कि पुलिस तंत्र में अच्छे लोग नहीं है। लेकिन यह अच्छापन इनको विभागीय प्रताड़ना के रूप में भोगना पड़ता है। प्रश्न यह खड़ा होता है कि क्या निष्ठा से अपनी ड्यूटी करने वाले पुलिस कर्मी प्रताड़ित किए जाएगें? तब कौन करेगा ईमानदारी से काम? क्या पुलिस के मनोबल को ऐसे ही गिराया जाना सही है। छोटे और मझोले स्तर के पुलिस कर्मचारियों की ड्यूटी और मूलभूत सुविधाओं में गहरी असमानता है। चालिस प्रतिशत को ही सरकारी आवास मिले हैं शेष साठ प्रतिशत गैर सरकारी भवनों में किराए से रहते हैं। अच्छे मकानों के महंगे किराए के कारण इनको गन्दी और असुविधाजनक जगहों में रहना होता है। लगातार दस से बारह और अक्सर इससे भी ज्यादा घन्टों की ड्यूटी करनी पड़ती है। थानों-कोतवालियों में कैन्टीन तक नहीं है। टायलेट नहीं हैं। पीने का साफ पानी नहीं है। अपने और अपने परिवार के लिए वक्त नहीं है। बड़े अधिकारियों के आदेशों का दबाव नेताओं और उनके चमचों की धौंस आदि ऐसी समस्याएं हैं जिसके कारण जल्दी ही इन्हें तनाव, गुस्सा और हीन-भाव अपनी गिरप्त में ले लेता है। इसका नतीजा पुलिस के दमनकारी व्यवहार के रूप में सामने आता है। पुलिस तंत्र को दमनकारी बनाती है। इस तरह हुकुम देने और मनवाने की संस्कृति पुलिस तंत्र में जम गई है, जो जन दमन का रूप ले लेती है। सामाजिक, न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक सशक्त पुलिस तंत्र का होना बेहद जरूरी है, पर निरंकुश पुलिस तंत्र नहीं। पुलिस पर अंकुश जरूरी है, पर इस तरह नहीं कि वह असहाय, प्रताड़ित और हत्योसाहित महसूस करें। पुलिस तंत्र को न तो जनता सुधार सकती और न खुद पुलिसिए यह काम कर सकते है। कठिनाई तो यह है कि सरकारें पुलिस को सुधारना ही नहीं चाहती क्योंकि पुलिस से ही चिरकुटों पर कारगर नियंत्रण रखने और देश के सम्राटों, महाराजाओं, राजाओं, को सत्ता की दूध मलाई का भोग लगाने का परमिट मिलता है। - लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं। सम्पर्क सूत्र - 09425174450. खटराग |
किसानों के साथ बेईमानी
किसानों के साथ बेईमानी अब फिर देश का किसान सरकार के निशाने पर है। केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के नाम पर दस लाख किसानों के गले में रस्सा बांध कर कारपोरेट कम्पनियों के हाथों में सौपने का फैसला किया है। अकूत मुनाफे के लिए इन कम्पनियों के सामने जिस तरह किसानों को परोसा जा रहा है उसका जो नतीजा निकलेगा, वह बेहद भयावह होगा। इनको अपने ही खेत में गिरमिटिया-बंधुआ मजदूर की तरह सपरिवार काम करना होगा और कर्ज के सांप-सीढ़ी वाले खेल में इनके पुरखों के खेत कम्पनियों की मिल्कियत हो जाएंगे । सरकार इन कारपोरेट घरानों को इसके लिए तीन हजार करोड़ रुपए भी दान में दे रही है। यह परियोजना सत्रह राज्यों की बारह लाख हेक्टर जमीन पर चलेगी। इसके लिए ग्यारह लाख किसानों का चयन किया गया है। इस काम के लिए कभी किसानों की रजामन्दी नहीं ली गई, सब कुछ पुलिसिया अंदाज में किया जा रहा है। आजादी के बाद भी किसानों के साथ सरकारें उसी तरह का जुल्म करती जा रही हैं, जैसा गुलामी के समय राजा, जागीरदार और महाजन करते थे। सरकारों ने खेती को घाटे का सौदा बना दिया और बढ़ती मंहगाई की तुलना में अनाज का समर्थन मूल्य घटाया जाता रहा। सन 1953 में देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का येागदान तिरपन प्रतिशत था और अब कृषि का योगदान घटा कर चौदह फीसद कर दिया गया है। सरकार किसानों को उनके खेतों से बाहर निकालने के लिए जानबूझ कर खेती की लागत से समर्थन मूल्य कम निर्धारित करती है। इसके परिणाम बेहद चिन्ताजनक है। छोटे और सीमान्त किसान आत्महत्या करते जा रहें हैं या अपने गावं से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं जहां दिहाड़ी मजदूर बनने के लिए रोज सुबह मजदूरों की मंडी में गुलामों की तरह खुद को किराए पर चढ़ा रहे हैं। रोज यह भी सम्भव नहीं है। कई बार इन्हें काम नहीं मिलता और भूखे रह कर दिन काटने पड़तें हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक 1995 से 2011 तक भारत के तीन लाख किसानों ने कर्ज में डूब जाने के कारण खुदकुशी की है। सरकार जानबूझ कर ऐसे हालात बनाती जा रही है कि छोटे और मझोले किसान अपनी जमीन से पलायन कर दें और व्यापारिक घराने तथा काले धन से बजबजाते नव-दौलतिओं के गोदामनुमा पेट जमीनों का भोग लगाते रहे। सन 1960 में दस ग्राम सोना का भाव 112 रुपए और एक क्विंटल गेहूं का भाव 41रुपए था। अभी सोना 10 ग्राम बत्तीस हजार रुपए में तो एक क्विंटल गेहूं का भाव 1285 रुपए है। क्या करें किसान और कैसे जिन्दा रहे किसान ? अंग्रेजों ने भूमि अधिकरण कानून सन 1894 में बनाया था।
जो सरकार के हितों के संरक्षण के लिए था। इस कानून की धारा चार के अन्तर्गत सरकार एक अधिसूचना जारी करके सार्वजनिक हित के लिए किसी भी सम्पति का अधिग्रहण कर सकती है। संविधान बनाते समय सितम्बर 1949 को मूल अधिकार में सम्पति के अधिकार को जोड़ने के लिए विस्तार से चर्चा हुई किन्तु इसे मूल अधिकार में नहीं जोड़ा गया। इस प्रसंग में अन्तर इतना रहा कि सरकार को अब जमीन अधिग्रहित करने पर मुआवजा देना होगा। लेकिन इससे पीड़ित पक्ष को कोई राहत आज भी नही है। हांलाकि आज हम स्वतंत्र और सार्वभौमिक गणराज्य के नागरिक हैं। सरकार पर मुआवजा देने के लिए बाजार मूल्य की बाध्यता नहीं है और सार्वजनिक हित की भी कोई परिभाषा नहीं है। इसके चलते सरकार किसानों की खेती वाली भूमि चाहे जब सार्वजनिक हित के नाम पर अधिग्रहित करके निजी उद्योगपतियों को सौंपती जा रही है। सामान्य बुद्धि वाला भी यह तो समझता है कि सड़क, रेल, बांध, नहर, अस्पताल, स्कूल आदि के लिए जमीन का अधिग्रहण सार्वजनिक हित है किन्तु निजी उद्योगपतियों को कारखाने लगाने, कालोनी बनाने के लिए सार्वजनिक हित कैसे हो सकता है। देश की कई हजार हैक्टर कृषि भूमि सरकार ने माटी-मोल मुआवजे पर निजी हाथों में सौंप दी है। सरकारी शोषण के कारण और उसके पुलिस पावर के चलते किसान अपने ही पुरखों की जमीन से बेदखल कर दिया गया है। उसे जमीन के वास्तविक बाजार मूल्य की जगह आधा मूल्य भी नसीब नहीं हुआ है।
सरकारी दादागीरी के कारण किसान जमीन हड़पने वालों से किसी भी प्रकार की सौदेबाजी कीमत को लेकर भी नहीं कर पाता है। होना तो यह चाहिए था कि सरकार को निजी उद्योगपतियों और किसान के मध्य आना ही नहीं चाहिए । दोनों पक्ष बातचीत करके जमीन की कीमत तय करते । ऐसा होने पर किसान दिन- दहाड़े की जा रही सरकारी डकैती से बच जाता। जमीन हस्तांतरणीय सम्पदा है। जिसे भूमि चाहिए उसे भूमि की पूरी कीमत भी चुकानी चाहिए। भूमि के मालिकों को भूमि अधिग्रहण की वही कीमत मिलनी चाहिए जो उन्हें अपने लिए भूमि खरीदने के लिए दूसरों को देनी पड़ती है। यही न्याय का तकाजा है।
लेकिन किसानों से कौड़ियों के भाव जमीन लेकर उद्योगपतियों और कारपोरेट घरानों को सरकारें सौंप रही हैं। खेती लायक जमीन का रकबा घटता जा रहा है और कारखाने, मॉल, मनोरंजन स्थल कालोनियों का जंगल फैल रहा है। सरकारें किसान को नाममात्र की सहायता या सबसिडी देकर दहाड़ मार कर रोती है कि सबसिडी के कारण देश की अर्थ व्यवस्था लड़खड़ा रही है, किन्तु कॉरपोरेट कम्पनियों को हजारों करोड़ रपए उदारता से दान दे रही है। देश की आर्थिक नीतियां समाजवाद की परिधि से बाहर निकाल कर उदारवाद के साथ नत्थी कर दी गई है। आर्थिक उदारवाद हर किसी को अपनी मेहनत और जायजाद की कीमत लगाने का हक देता है तो किसान को यह अधिकार क्यों नहीं दिया जा रहा है। खेती भूख मिटाने की व्यवस्था, है तिजोरी भरने की नहीं है। इसे धनतंत्र का हिस्सा बना कर दौलत बटोरने और गिद्ध-भोज के लिए जो गिरोह निकल पड़े हैं उनको रोका जाना चाहिए किन्तु यहां तो इनको सरकार ही सुविधाएं और संरक्षण दे रही है। इनको रोकेगा कौन? किसान को पराश्रित और लाचार बना कर राष्ट्रीय विकास योजना के नाम पर उसकी धरती से शहरों की तरफ रगेदने का षड़यंत्र शुरू है। खेती-किसानी के प्रति सरकारों का रवैया और नजरिया बदलना चाहिए। यह समझना ही होगा कि प्रकृति में किसान का खेत ही ऐसी जगह है जहां उत्पादन होता है। कारखानों में प्रकृति के उत्पादनों का केवल रूप-परिवर्तन भर होता है। पैदा कुछ भी नहीं होता है। यह सच्चाई भी समझनी चाहिए कि खेतों में जो उपजता है वह जीने के लिए आवश्यक है। विकल्पहीन है। खेती ही वह आधार है जिसके ऊपर समृद्धि के महल खड़े हैं।
- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं। सम्पर्क-09425174450.
Friday, April 12, 2013
बाजार की गोद में बैठा है मीडिया..काटजू क्या कर लोगे!
चिन्तामणि मिश्र
आजकल देश के पत्रकारों को लेकर फिर से एक बहस चल रही है कि पत्रकारों की न्यूनतम योग्यता का निर्धारण होना चाहिए। इस फुलझड़ी में इस बार आग लगाने का काम प्रेस कौसिंल के अध्यक्ष काटजू साहब ने किया है। वे सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज रहे हैं और जब से सरकार ने उनका विस्थापन प्रेस कौन्सिल में अध्यक्ष के पद पर किया है तभी से नाना प्रकार के बयान देने और बतकही के लिए उनको प्रसिद्धि मिल रही हैं। यह अलग बात है कि अब लोग उनके प्रवचनों को गम्भीरता से नहीं लेते । अस्सी प्रतिशत भारतीयों को मूर्ख कह कर वे खबर बन गए थे और मोदी पर टिप्पणी करके विवाद के झूले में झूलते हुए अब उन्होंने पत्रकारों के लिए न्यूनतम योग्यता तय करने की वकालत कर डाली है। कानून और फैसलों के अपने लम्बे कैरियर में काटजू साहब हमेशा चर्चा में तो रहे लेकिन उनकी अब जो बयानबाजियां हो रही है उससे ऐसा लगता है कि वे मीडिया के शीर्ष पर रहने की अपनी आन्तरिक ललक को पूरा करने में जुटे हैं। उनको इससे कोई मतलब नहीं है कि उनके कथन कितने व्यवहारिक या कितने अव्यवहारिक हैं। अभी उन्होंने फिल्म अभिनेता संजय दत्त की सजा को माफ करने के लिए बयान दिया और इसके लिए बकायदा महाराष्ट्र के राजपाल को आवेदन भी भेज दिया। पत्रकारिता में आई गिरावट के लिए उन्होंने पत्रकारों को ही अपराधी घोषित कर दिया है।
असलियत जानने का अगर प्रयास किया होता शायद वे देख पाते कि आज गिरावट इस देश में किस क्षेत्र में नहीं है? सरकार, बाजार, धर्म, पूरा सरकारी तंत्र और खुद न्याय पालिका गिरावट से लोट-पोट हो रही है। इन सभी संस्थानों में तो उच्च शिक्षित तथा व्यवसायिक दक्षता से लबालब लोग काम कर रहे हैं। शायद उन्हें भूल गया है कि अखबार समाज का आइना होते हैं। जैसा समाज होगा वैसे ही अखबार और उसमें काम करने वाले पत्रकार भी होंगे। पत्रकार भी हमारे ही समाज से आते हैं और हमारे ही समाज में रहते हैं।
यह दावा कोई भी नहीं कर रहा है कि पत्रकार बिरादरी में सभी साफ-सुथरे और पाक-साफ लोग ही हैं। पत्रकारिता स्तर भी गिर रहा है, इससे काटजू साहब ही नहीं देश के बुद्धिजीवी नागरिक भी चिंतित हैं। हर जगह कुछ गन्दी मछलियां होती हैं किन्तु इसके कारण पूरे तालाब की मछलियों को दोषी घोषित कर देना न्याय नहीं होगा। अखबार बहुत से ऐसे लोग भी निकाल रहे हैं जिनका लक्ष्य ईमानदारी नहीं होता है। लेकिन ऐसे लोगों की मजबूरी को कभी काटजू साहब ने देखने की कृपा नहीं की है।
शासन,प्रशासन औार समाज के अन्याय से लगातार प्रताड़ित हुए आदमी के पास अदालत जाने या पुलिस के पास अपनी फरियाद करने का ही चारा होता है। इन दोनों संस्थानों में आम नागरिक के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है, कितना समय और धन खर्च होता है इसे सभी जानते हैं काटजू साहब यह न जानते हो यह किसी के गले नहीं उतरने वाला है। हमारे देश में जब अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाया था, तब उन्होंने अपने चाटुकारों को कई प्रकार की उपाधियों से नवाजा था। इनमें एक उपाधि रायबहादुर की भी थी। अब अंग्रेज तो नहीं है और सरकारी स्तर पर रायबहादुर की उपाधि भी किसी को नहीं मिलती, किन्तु कुछ लोग अपनी धमक बनाए रखने के लिए कोई मांगे या न मांगे किन्तु अपनी राय जरूर देते रहतें हैं। हमको इस बात से भी कभी परहेज नहीं होता कि उनकी राय किस हद तक बेतुकी हैं। काटजू साहब भी गाहे-बगाहे राय बहादुर की भूमिका में अवतरित हो जाते है। पीड़ित नागरिक के पास तब तीन विकल्प बचते हैं- पहला तो यह कि अपना भाग्य खराब कह कर रोज लातें खाता रहे, दूसरा विकल्प है कि वह बन्दूक उठा ले और अपने साथ हुए अन्याय का बदला लेने खुद पुलिस,जज और जल्लाद की भूमिका करने लगें। अब जो तीसरा रास्ता बचता है वह है कि अपना खुद का अखबार ही निकालने लगे। बड़े पैमाने पर न सही छोटे स्तर पर बुलेटिन की तरह अखबार निकाल कर जो उसे घाव मिले हैं उनमें मलहम लगा ले और बदला भी चुकाता रहे।
कोई भी समझदार ऐसे लोगों के द्वारा अखबार निकालने के काम को सही नहीं कहेगा, लेकिन जब हमारी व्यवस्था में ही दीमक लगी है तो फिर चारा ही क्या बचता है। अकबर इलाहाबादी ने अस्सी साल पहले ही शेर के माध्यम से कह दिया था कि‘ जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।’ कुछ ऐसे पेशे हैं जिनमें किसी योग्यता की ज्यादा अपरिहार्यता नहीं होती है। कबीर और रैदास, मीराबाई तथा सूरदास जैसे बहुत सारे नाम हैं जिन्होने किसी स्कूल की देहरी कभी पार नहीं की थी किन्तु वे जो कुछ तथा जितना कुछ रच गए हैं कि उसे आज भी सारी दुनिया में कालजयी माना जाता है। असल बात पर काटजू साहब ने ध्यान ही नहीं दिया है। समस्या पत्रकारों के कारण नहीं है और न पत्रकारों के कारण मीडिया में भटकाव ही आया है। समस्या की शुरुआत हुई है मीडिया को बाजार की गोद में बैठा देने से। आज मीडिया को पत्रकार संचालित नहीं कर रहे हैं। उस पर बाजार का नियंत्रण है। बाजार बेचने और मुनाफा बटोरने के सिद्वांत पर चलता है। उसकी गुणवत्ता की जगह यूज एंड थ्रो की नीति होती है।
मुक्त बाजार व्यवस्था की जब हमने अपने यहां घुसपैठ करा ही ली है तो उसका प्रसाद भी तो हमें लेना ही पड़ेगा। ज्यादा गड़बड़ी खबरिया चैनलों में है। चौबिस घंटे के इन चैनलों में आधा-धापी और जो मारामारी तथा प्रतिस्पर्धा हो रही है वह अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए करना इनकी मजबूरी है और इसके चलते पेशे के प्रति जो दायित्व होना चाहिए वह नहीं होता । टीआरपी सारे देश के दर्शकों का प्रतिनिधित्वि नहीं करती, लेकिन चालाक लोगों ने इसे ही लोकप्रियता का पैमाना बना लिया है। प्रिंट मीडिया के साथ ऐसा नहीं है। काटजू साहब को इलेक्ट्रॉनिक और प्रिन्ट मीडिया को एक साथ अभियुक्त के कठघरे में खड़ा करके अभियोग नहीं लगाना चाहिए। हमारे ही देश में नहीं बल्कि सारी दुनिया में अखबारों और पत्रकारों पर हमेशा आरोप लगते रहे हैं। पत्रकारिता में गिरावट को रोकने के लिए काटजू साहब के ऐसे सतही निदान देने से बीमारी से निजात नहीं पाया जा सकता है। मीडिया पर वैसे ही अप्रत्यक्ष रूप से सरकारों और बड़े व्यापारिक घरानों का दबाब है अब काटजू साहब सरकारों को निमंत्रण दे रहे हैं कि वे मीडिया पर नकेल कसे ताकि पिछवाड़े से लोकतंत्र में तानाशाही प्रवेश कर ले। वैसे भी सरकारें तो मीडिया के पंख कतरने के लिए सब कुछ करने के लिए हाथ-पांव मारती ही रहती हैं।
असलियत जानने का अगर प्रयास किया होता शायद वे देख पाते कि आज गिरावट इस देश में किस क्षेत्र में नहीं है? सरकार, बाजार, धर्म, पूरा सरकारी तंत्र और खुद न्याय पालिका गिरावट से लोट-पोट हो रही है। इन सभी संस्थानों में तो उच्च शिक्षित तथा व्यवसायिक दक्षता से लबालब लोग काम कर रहे हैं। शायद उन्हें भूल गया है कि अखबार समाज का आइना होते हैं। जैसा समाज होगा वैसे ही अखबार और उसमें काम करने वाले पत्रकार भी होंगे। पत्रकार भी हमारे ही समाज से आते हैं और हमारे ही समाज में रहते हैं।
यह दावा कोई भी नहीं कर रहा है कि पत्रकार बिरादरी में सभी साफ-सुथरे और पाक-साफ लोग ही हैं। पत्रकारिता स्तर भी गिर रहा है, इससे काटजू साहब ही नहीं देश के बुद्धिजीवी नागरिक भी चिंतित हैं। हर जगह कुछ गन्दी मछलियां होती हैं किन्तु इसके कारण पूरे तालाब की मछलियों को दोषी घोषित कर देना न्याय नहीं होगा। अखबार बहुत से ऐसे लोग भी निकाल रहे हैं जिनका लक्ष्य ईमानदारी नहीं होता है। लेकिन ऐसे लोगों की मजबूरी को कभी काटजू साहब ने देखने की कृपा नहीं की है।
शासन,प्रशासन औार समाज के अन्याय से लगातार प्रताड़ित हुए आदमी के पास अदालत जाने या पुलिस के पास अपनी फरियाद करने का ही चारा होता है। इन दोनों संस्थानों में आम नागरिक के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है, कितना समय और धन खर्च होता है इसे सभी जानते हैं काटजू साहब यह न जानते हो यह किसी के गले नहीं उतरने वाला है। हमारे देश में जब अंग्रेजों ने हमें गुलाम बनाया था, तब उन्होंने अपने चाटुकारों को कई प्रकार की उपाधियों से नवाजा था। इनमें एक उपाधि रायबहादुर की भी थी। अब अंग्रेज तो नहीं है और सरकारी स्तर पर रायबहादुर की उपाधि भी किसी को नहीं मिलती, किन्तु कुछ लोग अपनी धमक बनाए रखने के लिए कोई मांगे या न मांगे किन्तु अपनी राय जरूर देते रहतें हैं। हमको इस बात से भी कभी परहेज नहीं होता कि उनकी राय किस हद तक बेतुकी हैं। काटजू साहब भी गाहे-बगाहे राय बहादुर की भूमिका में अवतरित हो जाते है। पीड़ित नागरिक के पास तब तीन विकल्प बचते हैं- पहला तो यह कि अपना भाग्य खराब कह कर रोज लातें खाता रहे, दूसरा विकल्प है कि वह बन्दूक उठा ले और अपने साथ हुए अन्याय का बदला लेने खुद पुलिस,जज और जल्लाद की भूमिका करने लगें। अब जो तीसरा रास्ता बचता है वह है कि अपना खुद का अखबार ही निकालने लगे। बड़े पैमाने पर न सही छोटे स्तर पर बुलेटिन की तरह अखबार निकाल कर जो उसे घाव मिले हैं उनमें मलहम लगा ले और बदला भी चुकाता रहे।
कोई भी समझदार ऐसे लोगों के द्वारा अखबार निकालने के काम को सही नहीं कहेगा, लेकिन जब हमारी व्यवस्था में ही दीमक लगी है तो फिर चारा ही क्या बचता है। अकबर इलाहाबादी ने अस्सी साल पहले ही शेर के माध्यम से कह दिया था कि‘ जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।’ कुछ ऐसे पेशे हैं जिनमें किसी योग्यता की ज्यादा अपरिहार्यता नहीं होती है। कबीर और रैदास, मीराबाई तथा सूरदास जैसे बहुत सारे नाम हैं जिन्होने किसी स्कूल की देहरी कभी पार नहीं की थी किन्तु वे जो कुछ तथा जितना कुछ रच गए हैं कि उसे आज भी सारी दुनिया में कालजयी माना जाता है। असल बात पर काटजू साहब ने ध्यान ही नहीं दिया है। समस्या पत्रकारों के कारण नहीं है और न पत्रकारों के कारण मीडिया में भटकाव ही आया है। समस्या की शुरुआत हुई है मीडिया को बाजार की गोद में बैठा देने से। आज मीडिया को पत्रकार संचालित नहीं कर रहे हैं। उस पर बाजार का नियंत्रण है। बाजार बेचने और मुनाफा बटोरने के सिद्वांत पर चलता है। उसकी गुणवत्ता की जगह यूज एंड थ्रो की नीति होती है।
मुक्त बाजार व्यवस्था की जब हमने अपने यहां घुसपैठ करा ही ली है तो उसका प्रसाद भी तो हमें लेना ही पड़ेगा। ज्यादा गड़बड़ी खबरिया चैनलों में है। चौबिस घंटे के इन चैनलों में आधा-धापी और जो मारामारी तथा प्रतिस्पर्धा हो रही है वह अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए करना इनकी मजबूरी है और इसके चलते पेशे के प्रति जो दायित्व होना चाहिए वह नहीं होता । टीआरपी सारे देश के दर्शकों का प्रतिनिधित्वि नहीं करती, लेकिन चालाक लोगों ने इसे ही लोकप्रियता का पैमाना बना लिया है। प्रिंट मीडिया के साथ ऐसा नहीं है। काटजू साहब को इलेक्ट्रॉनिक और प्रिन्ट मीडिया को एक साथ अभियुक्त के कठघरे में खड़ा करके अभियोग नहीं लगाना चाहिए। हमारे ही देश में नहीं बल्कि सारी दुनिया में अखबारों और पत्रकारों पर हमेशा आरोप लगते रहे हैं। पत्रकारिता में गिरावट को रोकने के लिए काटजू साहब के ऐसे सतही निदान देने से बीमारी से निजात नहीं पाया जा सकता है। मीडिया पर वैसे ही अप्रत्यक्ष रूप से सरकारों और बड़े व्यापारिक घरानों का दबाब है अब काटजू साहब सरकारों को निमंत्रण दे रहे हैं कि वे मीडिया पर नकेल कसे ताकि पिछवाड़े से लोकतंत्र में तानाशाही प्रवेश कर ले। वैसे भी सरकारें तो मीडिया के पंख कतरने के लिए सब कुछ करने के लिए हाथ-पांव मारती ही रहती हैं।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं।
Saturday, April 6, 2013
यादों की गठरी में होली के रंग
चिन्तामणि मिश्र
फागुन का महीना मौज-मस्ती, रंग-उमंग और पकवानों के नाम सदियों से हमारी संस्कृति की पासबुक में दर्ज हैं. लोक जीवन में फागुन और होली की जोड़ी का बखान कालीदास से लेकर लोक कवि ईसुरी ने स्वाभविकता और सहजता से इस तरह किया है कि वे राजदरबारों, मंदिरों से लेकर चैपालों, खेत- खलिहानों में समान रूप से लोक कंठ की थाती हो गए। होली फागुन शुक्ल अष्टमी से समाज में अपने आगमन की सूचना दे कर आठ दिन प्रकृति तथा मनुष्य दोनों को बाहर व भीतर रस- रंग में डुबा कर, बहा कर विदा हो जाती है। ऐसी लोक मान्यता है कि इसी अवधि में भगवान शिव ने कामदेव को भस्म किया था। होली सारे उत्तर भारत में मनाई जाती है। हर क्षेत्र और हर बस्ती होली और फाग के आयोजन में एक-बद्धता नहीं है। सब का अपना अलग-अलग शास्त्र और पुराण है। सतना की होली भी कभी इतनी प्रसिद्ध थी कि आसपास के रजवाड़ों के लोग भारी संख्या में आते और होली का आनन्द लेते थे। लगभग डेढ़ सौ साल की उम्र समेटे सतना की बस्ती आज की तरह उबाउ और आत्म केन्द्रित पहले कभी नही था। साठ साल पहले तक यह शहर नाचते-गाते जीवन्त लोगों की बस्ती था। लोक पर्वो में सामूहिक उल्लास में रचा-बसा और कबीला जैसा लगता था।
उस दौर में बस्ती में आधा दर्जन से ज्यादा अमीर नही थे और शेष आबादी कठिनाई से दो जून की सूखी रोटी का जुगाड़ कर पाती थी लेकिन त्यौहारों में अमीरी-गरीबी के बीच की दीवार ढह जाती थी आज हमारे शहर में नोटों का अम्बार लगा है। यह अब कुबेर की बस्ती हो गई है। अब लोगों में तीज-त्यौहारों सामुदायिक भावना नहीं रह गई है। लोग पहले से ज्यादा होली पर पैसा खर्च करते हैं, लेकिन सभी का उल्लास निजी होता है। अब इस बस्ती में न तो पहले जैसी उमंग दिखती है और न पहले की तरह चुहल होती है। हर होली में एक अनजाना सा बेगानापन और औपचारिकता पसरी रहती है।
सतना में सन 1950 तक होली का जो रूप रहा वह तीखा तो था, किन्तु शालीन, मस्ताना और दोस्ताना रहा। होली और फाग को इस बस्ती के महाजनों ने हमेशा जीवन्त बनाए रखा।
होली की आग और रंगों की बौछार के साथ कुछ घन्टे ही सही, गरीबी और अमीरी की दीवार लुप्त हो जाती थी। हर होली में मैकू मेहतर सबेरे सेठ दिगनलाल के दरवाजे पर गले में नगड़िया डाले, रंगों से सराबोर हाजिर हो जाता और सेठ का नाम लेकर कबीरा गाता। सड़क पर मजमा लग जाता। लोग उसके आने के पहिले से ही एकत्र हो जाते। सेठ थोड़ी देर बाद बाहर निकलते मैकू के पास आते और दोनों हाथों में भरी गुलाल उस पर छोड़ कर खुद कबीरा गाते। मैकू भी उनको गुलाल-अबीर से नहला देता। फिर सेठ जी उसे नए कपड़े तथा नकद देकर विदा करते।
इसके बाद होरिहारों की भीड़ का मैकू नेतृत्व करता हुआ बस्ती के हर महाजन के यहा जाता और रंग- गुलाल के साथ कबीरा के बोल गूंजते ।
बस्ती में सारा दिन कई जगह भंग-भंडारा आयोजित होता।
इसके लिए कभी चन्दा नहीं उगाहा गया। बस्ती में होली जलने के दूसरे दिन नौ बजे के आसपास रंग खेलने की शुरूआत होती थी। धनी लोग पीतल की पिचकारी से और शेष लोग टीन या बांस की पिचकारी से रंग डालते। सेठ-महाजनों के घरों के सामने तथा मंदिरों के बाहर रंगों से भरे बड़े-बड़े कुंड रखे होते थे। खाली हो जाने पर इन्हें फिर से भर दिया जाता था यह सिलसिला दो बजे मध्यान्ह तक चलता था। फिर लोग जगतदेव तालाब, नया तालाब, नारायण तालाब, रावना टोला तालाब, व्यंक्टेश मंदिर का तालाब, पुकनी तलैया अपनी सुविधा के अनुसार नहाने के लिए जाते थे। शाम को प्रसिद्ध मंदिरों में देव दर्शन का सिलसिला शुरू हो जाता, वहां एक दूसरे को तिलक लगा कर होली की बधाईंया देते । इसी दिन शाम को डालीबाबा के मंदिर में मेला लगता था वहां भजन, राई, विरहा की प्रतियोगिता होती। कुछ महाजन अपने बगीचों में होली की रात मुजरा, फाग गायन प्रतियोगिता का आयोजन करते थे इसमें निमंत्रित लोगों को ही प्रवेश मिलता था। बस्ती में कई दशक तक इस अवसर पर महा- मूर्ख सम्मेलन, कवि सम्मेलन और नगड़िया प्रतियोगिताए होती रही। इसमें जन साधारण की भागीदारी थी। सन 1948 की होली सतना में यादगार होली अनायास हो गई। सतना बस्ती रीवा रियासत के अर्न्तगत थी, किन्तु रीवा के शासक कभी इस बस्ती की होली में शामिल नही हुए। 8 मार्च 1948 को पन्नीलाल चौक में होली का जुलुस पहुंच ही रहा था कि स्टेशन की तरफ से आते हुए तांगे को लोगों ने घेर लिया। लोग अन्नदाता की जय, बांधव गद्दी की जय, महाराजा गुलाब सिंह की जय के नारे लगाने लगे।
वास्तव में तांगे पर बैठी सवारी महाराजा गुलाब सिंह थे। उन्हे लोगों ने पहचान लिया था। उनको केन्द्र सरकार ने रियासत से बाहर निकाल दिया था और सरकारी देख-रेख में इलाहाबाद में नजरबन्द करके रखा था। वे सुरक्षा गार्डो को चकमा देकर आ गए थे। महाजनों ने उन्हें तांगें से उतार कर अबीर-गुलाल से रंग दिया, सड़क पर ही उनकी नजर-न्यौछावर की गई। बाद में उनको आज के मनोहर होटल की इमारत में ठहराया ।
सतना की होली गाथा एक अजीब परम्परा की कथा छोड़ देने से अधूरी रह जाएगी। उन दिनों होली के दिन बस्ती के लोग जब रंग खेलने के लिए जुटते थे तभी प्रमुख सड़क से एक अर्थी निकाली जाती थी। अर्थी में एक व्यक्ति सफेद कफन लपेटे लेटा रहता था। लोग बारी-बारी से अर्थी में कन्धा देते और राम नाम सत्य है बोलते चलते। अर्थी के आगे एक आदमी मिट्टी की हड़िया लिए चलता, इसमें जलता हुआ कंडा होता था। यह नकली अर्थी उस सरकारी अफसर या कर्मचारी की निकाली जाती थी जिससे बस्ती का महाजन वर्ग परेशान रहता था। यह अर्थी मरघट नहीं जाती थी बल्कि इसे उस अफसर के निवास के सामने रख देते थे और लोग अधिकारी का नाम ले लेकर जबरदस्त सामूहिक विलाप करते थे। फिर अर्थी में लेटे आदमी को अर्थी से बाहर निकाल कर अर्थी जला दी जाती थी। विरोध प्रगट करने और बदला लेने का यह खालिस सतनवी तरीका था।
इसका नतीजा हमेशा बस्ती के पक्ष में होता और अर्थी वाला अधिकारी अपना ट्रांसफर करा लेता था। आज हम होली मनाते हैं किन्तु यह औपचारिक होती है। होली हमारी संस्कृति का इकलौता उत्सव है जिसमें किसी आकांक्षा की पूर्ति का द्वंद्व नहीं है। अब हम अपने पुरखों की तरह खुले मन से कोई उत्सव नहीं मनाते। केवल उत्सव की प्रेत साधना करते हैं, क्योंकि हमने मन की पुकार को सुनना ही बन्द कर दिया है।
- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं।
सम्पर्क सूत्र - 09425174450. खटराग चिन्तामणि मिश्र
अब बेटियां पीहर नहीं आतीं
चिन्तामणि मिश्र
अब बेटियां पीहर नहीं आतीं स भ्य और शहरातू बनने की ललक ने लोगों को अपनी गर्भनाल से ऐसा काटा है कि आदमी निपट अकेला जिन्दगी को जी रहा है। हकीकत तो यह है कि जी नहीं रहा बल्कि जिन्दगी को ढो रहा है। कैसी विडम्बना है कि आज उसके पास वह सब कुछ है जिसका जिक्र स्वर्ग और जन्नत में उपलब्ध होने का उल्लेख हजारों सदियों से होता आ रहा है। लेकिन आदमी ने इसे धरती में पाने के लिए और अपने पास टिकाने के लिए उमंग,उल्लास,आपसदारी,नातेदारी,आत्मीयता को विदाई देकर तनाव, दुख, लालच, अधीरता, पर-पीड़न से लिपट कर जीना सीख लिया है। इस तरह जीना भी नहीं जिया जा रहा है जीने की नौटंकी की जा रही है। जीवन के संगीत और उसकी सहज लय से काटती उसे अलग करती यह आधा-धापी है। लाभ-लोभ, खुदगर्जी, संवेदनहीनता और अंधे सुखवाद, नपुंसक भोगवाद की मरीचकाओं ने आदमी को अंधेरी सुरंग में ढकेल दिया है।
विडम्बना तो यह है कि हम इसे विकास का नाम देकर आधुनिक होने की खुद ही मुनादी भी कर रहे हैं। असल में बाजार के मोहक जाल की गिरफ्त में सुध-बुध खोकर अपनी सांस्कृतिक धरोहर तथा सामाजिक सरोकारों और अपनी अस्मिता को ही कफनाते जा रहे हैं। जीवन में रचे-बसे पारिवारिक नाते-गोते, पर्व,उत्सव कुटुम्ब के मंगलकाज और लोक जीवन के जो रंग हमें जिलाए थे, उन्हें पश्चिम से आया भौतिकवादी अजगर धीरे-धीरे निगल रहा है। व्यक्ति, परिवार, समाज और देश अब बाजार के नियंत्रण में है। दासता का ऐसा विकराल उदाहरण मानव इतिहास में पहले कभी दर्ज नहीं हुआ। अब हम मनुष्य नहीं उपभोक्ता में ढाल दिए गए हैं, जैसे टकसाल में सिक्के ढाले जाते हैं। यह ऐसा बाजार है जिसमें सोचना-विचारना मना है। पूरा समाज आत्म-छलना में जी रहा है। आधुनिकता का बाजारवादी मायावी मायाजाल किसी को भी मन के भीतर जाने की इजाजत देना तो दूर भीतर झंकने की इजाजत तक नहीं देता है।
खून तक के रिश्ते असहज हो रहे हैं। आत्मीयता को औपचारिकता की मखमली रजाई ओढ़ा कर सम्बन्धों की रस्में अदा की जा रही हैं। बेटियां और बहुएं अपनी मां से कभी अब यह मनुहार नहीं करती, पत्र नहीं लिखती, संदेशे नहीं भेजती कि सावन आ रहा है पिता को भेज कर मुङो पीहर बुला लो। संदेशे और पत्र लिखने की अब जरूरत नहीं रह गई है। यह सब करना अब आउट ऑफ डेट हो गया है। उनके पास मोबाइल फोन आ गया है। वे मोबाइल फोन से रोज अपनी मां से बात कर लेती हैं।
क्या खाया, क्या पकाया, कौन आया और कौन गया से लेकर सारी बातें जो महीनों बाद पीहर पहुंच कर कभी बिटिया अपनी मां से करती थी, अब हर दिन बल्कि हर पहर हो रही है। कोसों का फासला कम हो गया है। जब मन किया मोबाइल का बटन दबाया और बातों का सिलसिला शुरू। न आने-जाने की परेशानी और न साज-सामान सहेजने का झंझट। कभी पीहर जाने के लिए उतावली रहने वाली बेटियां-बहुएं अब नहीं जाने का बहाना खेाजती हैं। अमीर खुसरो ने कभी लिखा था- अम्मा मेरे बाबुल को भेजो री, कि सावन आया। बेहद मार्मिक यह ठुमरी अब सूफियों, निर्गुनियों और बाउलों के कंठ की कैद में रह गई है।
हिन्दी ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं में बेटिया ससुराल में छत- छप्पर की मुड़ेर और आंगन में लगे पेड़ पर बैठे कौवे से अपने पीहर जा कर अपनी मां के पास संदेशा ले जाने की मनुहार करने का व्यापक और मार्मिक चित्रण किया गया है।
हाईटेक हुए गृहस्थ परिवारों ने अमीर खुसरो की ठुमरी के सम्मोहन और इसकी वेदना में उतरना ही छोड़ दिया है। मोबाइल ने सुविधा तो दी है लेकिन कई चीजे खत्म भी कर दी है। सूचना तंत्र के विस्फोटक विकास ने हमारी संवेदनाओं को मार दिया है।
किसी ब्याहता का पीहर जाना केवल पीहर जाना नहीं होता था।
बल्कि इसके पीछे सामाजिक तानाबाना होता था। पीहर जा कर बेटी अपनी बचपन की यादों के बही-खातों को टटोलती, संगीसहे िलयों की खेाज खबर लेती और बचपन में जिन आंगन, गलियों, बगीचों में, पनघट तथा अमराईयों में खेली, झूलाझू ली, गुड़ियों के ब्याह रचाए, सपने देखे उन्हें सहेजने उनको छूने का आनन्द लेती थी। पीहर जाने के पीछे एक यह भी उत्सुकता होती थी कि उसकी गैर-हाजरी में घर में क्या खरीदा गया। बेटियां यह भी बूझने की कोशिश करती थीं कि अम्मा ने बहू के लिए बेटी से ज्यादा तो कुछ नहीं खरीद लिया अगर बेटी को ऐसा लगता था तो वह तुनक कर कहती थी अब तो मैं पराई हो गई हूं।
अपनी बहु के लिए ही सब कुछ करोगी। बिटिया की इस शिकायत पर अम्मा मनाती और समझती थी कि ऐसा नहीं है।
लेकिन आधुनिक होने की चाह ने रिश्तों की ताजगी और गर्माहट ही खतम कर दी है। पीहर से लौटती बिटिया की आंखों में थरथराते आंसू अम्मा को भी रुला जाते थे। पति को पत्नी के लौट आने का बेसब्री से तब इन्तजार रहता था। जिस पत्नी से वह तंग आ चुका होता, उसके नहीं रहने पर उसे तन्हाई डसने लगती।
पति-पत्नी के बीच की एकरसता को खत्म करने का मौका भी पीहर यात्रा के कारण सहज ही सुलभ हो जाता था। रिश्तों की गर्माहट को महसूस करने का मौका मिलता था। मोबाइल ने जिन्दगी की ताजगी को ही लील लिया। रूठने मनाने और शिकायत अब बीते जमाने की बात हो गई है, क्योंकि अब बेटियां पीहर नहीं जाती है। ब्याह के शुरुआती दिनों में पीहर छूट जाने का दुख होता है लेकिन समय गुजर जाने के बाद ससुराल ही प्यारा लगने लगता है। जो थेाड़ी कसर मोबाइल से रह गई थी वह इन्टरनेट ने पूरी कर दी। कैमरा लगाया और पूरा पीहर देख लिया, घूम लिया। मां की भी सूरत देख ली और पीहर की दीवारों का रंग भी जान लिया। हमने जाने-अनजाने अपने लिए कैसा बंद समाज और आधुनिकता के नाम पर कैसी बेड़िया बनाई हैं कि नाते-गोते तकनॉलाजी के चूल्हे पर फ्राई हो रहे हैं। हम इसे ही छाती पीट- पीट कर सभ्य, शिष्ट और सामाजिकता के खोखले शब्दों की माला का जाप करके मगन हो रहे हैं।
तकनॉलाजी एक सीमा तक ही साध्य है। वह हमें जिस तरह नचाती है हम उसी तरह नाचते हैं। आधुनिक सभ्यता की उपलब्धियों के बारे में किसी को भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए।
दरअसल यह अर्थ-व्यवस्था का विकासवाद समाज और मनुष्य विरोधी है। हम हजारों साल से अपनी माटी अपने संस्कार सहेज कर रखने वाले लोग थे, किन्तु भूमंडलीकरण का पिशाच हमें हमारे गौरवशाली परम्परा और शक्तिदाता संस्कारों की खिल्ली उड़ा कर विश्वास तथा आस्था के कपाट बन्द करने के लिए उकसाता- ललचाता है। - लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं।
सम्पर्क सूत्र - 09425174450.
त्योहारों में अब वो बात कहां!
चिन्तामणि मिश्र
बाजार ने हम सभी को उपभोक्ता बनाने के साथ हमारा बहुत कुछ हमसे छीन लिया है। इस बहुत कुछ में हंसना और मुस्कराना भी शामिल है। हम मुस्कराते भी है तो औपचारिकता के साथ आधा इंची मुस्कान होती है। हमारे चेहरे पर। ऐसी मुस्कान ओढ़ी हुई और कृत्रिम होती है। हमारे होली-दीवाली आदि त्यौहार बाजार से पैदा नहीं हुए हैं। होली में तो सभी बराबर हो जाते हैं, इसे मनाने के लिए अमीर होना अनिवार्य नहीं है। अखबारों के विज्ञापनों की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि ये बाजार के नहीं भारतीय जीवन और ऋतुओं से निकले त्यौहार हैं। इनका भारत के लोगों से जैविक सम्बन्ध है। हर त्यौहार मात्र आनन्द, उल्लास और मिठाई-पकवान का ही नाम नहीं है। इनके माध्यम से हम पारिवारिक और सामाजिकता के नाते-गोते मजबूत करते हैं। अगर इनमें कभी-कहीं गांठ लग जाती है तो इन त्यौहारों में उसे प्रेम-स्नेह से सुलझ लेते हैं। अब तो हम आपसदारी का ही श्राद्ध कर रहे हैं। हमारे स्वार्थ तथा हमारे अहम् ने रिश्तों को ही बांझ करना शुरू कर दिया है। त्यौहारों में मित्रों, परिचितों के साथ परिवार के लोगों से मिलने और उन्हें यथा उचित प्रणाम, नमस्कार, चरण स्पर्श करने, आशीष देने-लेने की परम्परा न जाने कितनी सदियों से हमारे यहां थी किन्तु अब हम एक ही छत के नीचे रह कर भी ऐसे मौकों में अबोलेपन और अपरिचय के साथ जी रहे हैं। अंहकार का प्रेत अपने सिर पर आज हर कोई रख कर अकेला जी रहा है। प्रसन्न हो रहा है।
पिछले दिनों अपनी बस्ती की होली देख कर घर लौटा और लगभग भोर होने तक जागता तथा सोचता रहा कि हमें क्या होता जा रहा है। हम ऐसा कैसा जीवन जीने लगे हैं कि हमारी जिन्दगी से अतीत के सरोकार, हमारे रीति-रिवाज, हमारी संस्कृति धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। अभी ज्यादा समय नहीं बीता है जब होलिका दहन की तैयारी हर परिवार में दस दिन पहिले से शुरू हो जाती थी। घर की साफ-सफाई और लिपाई-पुताई होती थी। होली पर पकवान बनाए जाते थे। इस अवसर पर गुझिया और मठरी जरूर बनती थी। घर में गोबर के रोज बल्ले बनाए जाते थे, इनमें आर-पार छेद होता था और इनको धूप में सुखाया जाता था। होली के दिन इन बल्लों की सुतली में पिरो कर माला बना ली जाती थी जिस जगह होली जलाई जाती थी वहां लोग अपने साथ एक बड़ा बांस ले जाते थे जिसके सिरे पर गेहूं और चने की बाल और बल्ले की माला बधीं होती थी। लोग बांस के साथ जलती होली की परिक्रमा करते और बांस को होली की लपटों का स्पर्श कराते। बल्ले की माला होली में डाल देते थे। घर लौटते तो होली की कुछ आग साथ लेकर आते। घर के आंगन में या छत पर गोबर के बल्लों की माला रखी जाती, इसके मध्य में बांस का टुकड़ा खड़ा करके इसकी पूजा होती फिर बाहर की होली से लाई गई आग से घर की होली जलाई जाती। घर के सभी लोग, महिलाओं सहित इस होली की परिक्रमा करते थे। अब घरों में होली जलाने का रिवाज शहरो में नहीं बचा है। होली के दिन लाल मिर्च राई तथा नमक मिला कर हर सदस्य की नजर उतारी जाती थी और इसे होली में डाल दिया जाता। अब हम सभ्य हो गए हैं, इन पर हमारी आस्था नहीं है। ऐसे परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जो अब होली के दर्शन तक करने नहीं जाते हैं। घरों में होली पर पकवान बनाना बन्द हो गया है। अब तो बाजार से ही खरीद कर लाने का रिवाज है।
होली के दूसरे दिन फाग में घर और बाहर रंग, गुलाल, अबीर से हर कोई जमकर एक दूसरे को सराबोर कर देता था। कोई बुरा नही मानता था। आनन्द तथा उल्लास की जीवन्त अनुभूति होती थी। अब सब कुछ खतम होता जा रहा है। पिछले एक दशक से होली औपचारिकता बन कर रह गई है। यह ऐसा त्यौहार है जो किसी वर्जना किसी कुंठा तथा किसी भी प्रकार के भेदभाव को नहीं मानता। होली तो वर्जनाओं का त्यौहार है। हमारा समाज वर्जनाओं का समाज है। वर्ग, वर्ण, जाति, स्त्री-पुरुष और आचार-विचार के आधार पर इतनी सीमा रेखाएं खिंची हुई हैं जिन्हें लांघने की मनाही है सिर्फ होली के दिन ये वर्जनाएं टूटती हैं। रंगों के साथ मनुष्य का तनाव-कुंठाएं भी बह जाती हैं। छोटे लोग बड़ो पर हंसते हैं, उन्हें रंग देते हैं तथा अपनी सामाजिक जकड़न से बाहर आ जाते हैं। अगले दिन भले ही दुनिया फिर से वैसी हो जाती हो, लेकिन समानता का जो क्षण बनता है वह एक त्यौहार हो जाता है। हंसी-ठिठोली, हास्य-परिहास, कही- अनकहनी की सौगात लेकर होली आती है, किन्तु अब हमने अपने आपको तथा इसी के चलते अपने समाज को इतना प्रगतिशील और इतना आधुनिक-सभ्य बना लिया है कि होली और उससे जुड़े क्रिया-कलाप गंवारू लगते हैं। होली ही क्यों हमने अपनी संस्कृति से निकले हर त्यौहारों के साथ इसी तरह की तटस्थता अपना ली है।
किन्तु असलियत यह है कि उसकी प्रसन्नता नकली तथा दिखावटी है। रिश्ते सिमटने लगे हैं। अब लोगों के मध्य जीवन्त संवाद का समय खतम हो गया है। हमारे त्यौहारों पर बाजारवाद ने कब्जा कर लिया है। जीवन और मौत भी बाजार की वस्तु बना दिए गए हैं। अब तो बाजार ही त्यौहार तय करता है उसकी रूपरेखा निर्धारित करता है। पश्चिम से आयात किए गए त्यौहारों ने हमारे पारम्परिक त्यौहारों को समाज निकाला दे दिया है। सुख अब आनन्दमय नहीं रह गया और दुख भी कातर नहीं रहा। केवल अपना ही लाभ और अपना ही जीवन समृद्धिशाली बना कर जो दावे किए जा रहे हैं वे कोरे पाखंड हैं। अपनी माटी और अपनी संस्कृति की गर्भनाल से कट कर हर कोई पेड़ पर लटके बैताल की तरह बेजान और मरी हुई जिन्दगी जी रहा है। यह जीना नहीं है, जीने के नाम पर जिन्दगी ढोने का धतकरम किया जा रहा है। यह बड़ा विचित्र समय है।
जीवन स्नेह और प्रेम के लिए तरस रहा है। पैसा हर मर्ज की दवा बन गया है। तेज जीवन शैली और आधुनिक सभ्यता ने उल्लास के क्षण कम कर दिए हैं। गांव अभी अपने त्यौहारों को बचाए हुए हैं। जिनको विदेश-पलट हमारे अर्थशास्त्री निम्न वर्ग का टैग लगाते रहते हैं वे भी पुरखों की जातीय धरोहर को सहेजने का काम कर रहे हैं। किन्तु कब तक यह होता रहेगा क्योंकि बाजार की ताकते सब कुछ का व्यापारीकरण करने में पूरी ताकत से जुटी हैं।
पिछले दिनों अपनी बस्ती की होली देख कर घर लौटा और लगभग भोर होने तक जागता तथा सोचता रहा कि हमें क्या होता जा रहा है। हम ऐसा कैसा जीवन जीने लगे हैं कि हमारी जिन्दगी से अतीत के सरोकार, हमारे रीति-रिवाज, हमारी संस्कृति धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। अभी ज्यादा समय नहीं बीता है जब होलिका दहन की तैयारी हर परिवार में दस दिन पहिले से शुरू हो जाती थी। घर की साफ-सफाई और लिपाई-पुताई होती थी। होली पर पकवान बनाए जाते थे। इस अवसर पर गुझिया और मठरी जरूर बनती थी। घर में गोबर के रोज बल्ले बनाए जाते थे, इनमें आर-पार छेद होता था और इनको धूप में सुखाया जाता था। होली के दिन इन बल्लों की सुतली में पिरो कर माला बना ली जाती थी जिस जगह होली जलाई जाती थी वहां लोग अपने साथ एक बड़ा बांस ले जाते थे जिसके सिरे पर गेहूं और चने की बाल और बल्ले की माला बधीं होती थी। लोग बांस के साथ जलती होली की परिक्रमा करते और बांस को होली की लपटों का स्पर्श कराते। बल्ले की माला होली में डाल देते थे। घर लौटते तो होली की कुछ आग साथ लेकर आते। घर के आंगन में या छत पर गोबर के बल्लों की माला रखी जाती, इसके मध्य में बांस का टुकड़ा खड़ा करके इसकी पूजा होती फिर बाहर की होली से लाई गई आग से घर की होली जलाई जाती। घर के सभी लोग, महिलाओं सहित इस होली की परिक्रमा करते थे। अब घरों में होली जलाने का रिवाज शहरो में नहीं बचा है। होली के दिन लाल मिर्च राई तथा नमक मिला कर हर सदस्य की नजर उतारी जाती थी और इसे होली में डाल दिया जाता। अब हम सभ्य हो गए हैं, इन पर हमारी आस्था नहीं है। ऐसे परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जो अब होली के दर्शन तक करने नहीं जाते हैं। घरों में होली पर पकवान बनाना बन्द हो गया है। अब तो बाजार से ही खरीद कर लाने का रिवाज है।
होली के दूसरे दिन फाग में घर और बाहर रंग, गुलाल, अबीर से हर कोई जमकर एक दूसरे को सराबोर कर देता था। कोई बुरा नही मानता था। आनन्द तथा उल्लास की जीवन्त अनुभूति होती थी। अब सब कुछ खतम होता जा रहा है। पिछले एक दशक से होली औपचारिकता बन कर रह गई है। यह ऐसा त्यौहार है जो किसी वर्जना किसी कुंठा तथा किसी भी प्रकार के भेदभाव को नहीं मानता। होली तो वर्जनाओं का त्यौहार है। हमारा समाज वर्जनाओं का समाज है। वर्ग, वर्ण, जाति, स्त्री-पुरुष और आचार-विचार के आधार पर इतनी सीमा रेखाएं खिंची हुई हैं जिन्हें लांघने की मनाही है सिर्फ होली के दिन ये वर्जनाएं टूटती हैं। रंगों के साथ मनुष्य का तनाव-कुंठाएं भी बह जाती हैं। छोटे लोग बड़ो पर हंसते हैं, उन्हें रंग देते हैं तथा अपनी सामाजिक जकड़न से बाहर आ जाते हैं। अगले दिन भले ही दुनिया फिर से वैसी हो जाती हो, लेकिन समानता का जो क्षण बनता है वह एक त्यौहार हो जाता है। हंसी-ठिठोली, हास्य-परिहास, कही- अनकहनी की सौगात लेकर होली आती है, किन्तु अब हमने अपने आपको तथा इसी के चलते अपने समाज को इतना प्रगतिशील और इतना आधुनिक-सभ्य बना लिया है कि होली और उससे जुड़े क्रिया-कलाप गंवारू लगते हैं। होली ही क्यों हमने अपनी संस्कृति से निकले हर त्यौहारों के साथ इसी तरह की तटस्थता अपना ली है।
किन्तु असलियत यह है कि उसकी प्रसन्नता नकली तथा दिखावटी है। रिश्ते सिमटने लगे हैं। अब लोगों के मध्य जीवन्त संवाद का समय खतम हो गया है। हमारे त्यौहारों पर बाजारवाद ने कब्जा कर लिया है। जीवन और मौत भी बाजार की वस्तु बना दिए गए हैं। अब तो बाजार ही त्यौहार तय करता है उसकी रूपरेखा निर्धारित करता है। पश्चिम से आयात किए गए त्यौहारों ने हमारे पारम्परिक त्यौहारों को समाज निकाला दे दिया है। सुख अब आनन्दमय नहीं रह गया और दुख भी कातर नहीं रहा। केवल अपना ही लाभ और अपना ही जीवन समृद्धिशाली बना कर जो दावे किए जा रहे हैं वे कोरे पाखंड हैं। अपनी माटी और अपनी संस्कृति की गर्भनाल से कट कर हर कोई पेड़ पर लटके बैताल की तरह बेजान और मरी हुई जिन्दगी जी रहा है। यह जीना नहीं है, जीने के नाम पर जिन्दगी ढोने का धतकरम किया जा रहा है। यह बड़ा विचित्र समय है।
जीवन स्नेह और प्रेम के लिए तरस रहा है। पैसा हर मर्ज की दवा बन गया है। तेज जीवन शैली और आधुनिक सभ्यता ने उल्लास के क्षण कम कर दिए हैं। गांव अभी अपने त्यौहारों को बचाए हुए हैं। जिनको विदेश-पलट हमारे अर्थशास्त्री निम्न वर्ग का टैग लगाते रहते हैं वे भी पुरखों की जातीय धरोहर को सहेजने का काम कर रहे हैं। किन्तु कब तक यह होता रहेगा क्योंकि बाजार की ताकते सब कुछ का व्यापारीकरण करने में पूरी ताकत से जुटी हैं।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एव चिंतक हैं।
Thursday, March 14, 2013
सूरज की परिक्रमा मेरे गर्भ से गुजरती है
चिन्तामणि मिश्र
छब्बीस फरवरी को संसद ने कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ किए जा रहे यौन उत्पीड़न के खिलाफ रोक लगाने सम्बन्धी कानून को पास कर दिया है। इसके तहत ऐसी शिकायतों को नब्बे दिनों के अन्दर निपटारा करना जरूरी बना दिया है। बलात्कार की शिकार महिलाओं को त्वरित न्याय दिलाने के लिए फास्ट कोर्ट भी गठित कर हो गई हैं और बलात्कार के लिए कठोर सजा का भी प्रावधान किया गया है।
सरकार और महिला संगठनों सहित बहुत से सामाजिक संगठनों की सोच है कि इस तरह की व्यवस्था से महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर अंकुश लगेगा, किन्तु ऐसा हो पाना आसान नहीं है। हमारे देश में महिलाओं से जुड़े हुए अपराधों के लिए अभी अड़तालिस कानून हैं। जब तक कानून लागू करने वालों की मानसिकता नहीं बदलती और सामाजिक ढांचा पुरुष एकाधिकार की सार्वभौमिकता से बाहर नहीं निकलता तब तक महिलाओं के साथ अन्याय की घटनाएं कम होना सम्भव नहीं है।
जरूरत इस बात की है कि कानूनों का इस्तेमाल इस प्रकार किया जाए कि अपराधिक प्रवृति के लोग खौफ खाए और ऐसे अपराध की जांच करने वाली एजेन्सी हर कदम पर संवेदनशील भी हों ।
यौन शोषण के खिलाफ नया कानून लागू हुए कई सप्ताह बीत गए किन्तु बलात्कार रोज हो रहे हैं। यहां तक कि दिल्ली में ही बलात्कार बन्द होने का नाम नहीं ले रहे हैं। चौबीस घन्टे में सात बलात्कार पुलिस ने दर्ज किए हैं। यह तब हो रहा है जब देश की विभिन्न अदालतों ने बलात्कार के मामलों में सुनवाई और फैसले की अवधि कुछ सप्ताह कर दी है। ऐसा लगता है कि औरतों की मुसीबत में तब तक सुधार नहीं हो सकता तब तक समाज और कानून लागू करने वाले लोगों के भीतर संवेदना का अकाल रहेगा। पुलिस आज तक नागरिकों के मित्र के रूप में अपनी छवि बनाने में कामयाब नहीं हुई है।
दरअसल, हमारे राजनेताओं को पुलिस का जनविरोधी चेहरा ही पसन्द है, क्योंकि अपने स्वार्थ के लिए उनको पुलिस का नाजायज इस्तेमाल करना ही रास आता है। आम आदमी और आम औरत के लिए पुलिस का आचरण भय और मनमानी का है। अभी मुजफरपुर रेलवे स्टेशन पर चलती ट्रेन से एक बुजुर्ग महिला को रेलवे सुरक्षा बल के सिपाहियों न धक्का देकर डिब्बे से बाहर फेक दिया और यह औरत गाड़ी के नीचे आ कर मर गई । इसकी गलती केवल इतनी थी कि उसके पास एक्सप्रेस ट्रेन का टिकिट था और वह गलती से शताब्दी ट्रेन में चढ़ गई थी।
जिन पर सुरक्षा का दायित्व है वे ही लोगों के प्राण ले रहे हैं। यह सरकारी आंतक है क्योंकि इसे सरकार की ही पुलिस कर रही है। ऐसी घटनाएं रोज हो रही है। कौन इनकी नकेल कसेगा? असल में हमने ऐसा वातावरण ही नहीं बनाया जिससे महिलाएं और लड़कियों का अपने शरीर पर हक हो और वे पुरुष हिंसा से मुक्त जीवन जी सके। औरतों को उपभोग की वस्तु समझने की मानसिकता के चलते वे न तो अपने घर में सुरक्षित हैं और न बाहर उनको सुरक्षा मिल पाती है। हम ऐसा समाज बनाने में लगे हैं जहां विज्ञापनों और फिल्मों में औरत को लगभग नग्न दिखा दिया जाता है। हमारे देश के सेन्सर बोर्ड को, मुन्नी बदनाम हुई, शीला की जवानी और मै तंदूरी मुर्गा हूं यार- गटका ले मुङो अलकोहल जैसे गानों से आपत्ति नहीं है। शायद ऐसे गानों को मंजूरी देते समय सेन्सर बोर्ड के मेम्बर मस्त होकर झपकी लेते रहते हैं। एक विज्ञापन में दिखाया जाता है कि कोई विशेष सेविंग क्रीम चुबंन के ही लिए लगाया जाती है। एक विज्ञापन हम सब को चाकलेट खाने की एक अनोखी कला सिखाता है। एक बिस्कुट का विज्ञापन पति को शंका में डाल देता है और वह भागता हुआ घर आता है। एक से जी नही भरता, ये दिल मांगें मोर जैसे वाक्य जब बच्चों और युवाओं के कान में पड़ते हैं तो इनका अर्थ कोई उन्हें नहीं समझता। वे खुद समझ कर अपने तरीके से इसका प्रयोग शुरू कर देते हैं। सड़क पर चलती हर लड़की या औरत उन्हें मुन्नी और चमेली ही नजर आने लगती है। आप कागज पर कानून बनाते रहिए और औरतों लड़किओं का जीना दूभर करते रहिए, समाज की बखिया उधेड़ते रहिए । नतीजा वही होगा जो सामने हैं। हकीकत बेहद कड़वी है, किन्तु जैसा हमारे देश में चल रहा है उससे तो लगता है कि महिलाओं का शारीरिक शोषण करने का माहौल देश की सरकारें ही बना रही हैं। सरकारों ने हर कालोनी,मुहल्लों,गांवों में शराब की दुकानें बड़ी उदारता से खोल दी हैं। मेरी बस्ती में तो मरघट में ही शराब की दुकान खोल दी है। सरकारी रिपोर्टे ही चुगली कर रही है कि अधिकांश यौन अपराधी नशे में पाए गए ।
सरकारें स्कूल और अस्पताल खोलने के लिए पैसा न होने का विधवा विलाप करती है और साकी बन कर जाम भरती है। इसी के साथ हमारे धर्म गुरूओं ने समाज को औरतों के पक्ष में झकझोरने की दिशा में ईमानदारी से अपनी ताकत का इस्तेमाल कभी नहीं किया। इनके प्रवचनों,तकरीरों, में अगले जनम में स्वर्ग तथा जन्नत में प्रवेश करने तथा वहां मनमाफिक सब कुछ करने का प्रवेश पत्र पाने का तरीका तो बताया जाता है, लेकिन इस संसार में सही और सलीके से रहने के लिए ऐसी सिखावन नहीं दी जाती कि लोग इस संसार को भी जन्नत बना ले।
सदियों से अधिपत्य जमाने का अभ्यस्त धर्म भला औरतों को पुरुष समाज के शोषण से आजाद कैसे होने दे सकता है। धर्म की दिलचस्पी शोषण का चक्रव्यूह तोड़ने में नहीं, बल्कि उसे मजबूत बनाने में है। यह कैसी आजादी हमारी हथेलिओं में रख दी गई है कि जिसने सामाजिक चक्रव्यूह को बदला ही नहीं, आज भी औरतों के गोपन अंगों के साथ जोड़ कर सार्वजनिक रूप से गालियां दी जाती हैं। हर गाली में मां-बहिनों के साथ बलात्कार होता है। समाज बलात्कार को आम घटना मान रहा है। प्रत्येक अपराध का बीज समाज में मौजूद होता है। समाज ही उन परिस्थितियों को जन्म देता है जिनसे अपराध के लिए आदमी को बढ़ावा मिलता है। किसी अनाम कवि ने कहा था- मैं औरत हूं/आकाश मेरी बैसाखियों पर टिका है/ इंद्रधनुष मेरी आंखों का काजल है/ सूरज की परिक्रमा मेरे गर्भ से गुजरती है/ पर अफसोस/मेरी अभिव्यक्ति की बयार अभी आना बाकी है।
इस बयार को लाने के लिए समाज और सरकारें सक्रिय हों। अब सरकारों और समाज को बजरबट्टू का खेल दिखाना बन्द करना चाहिए। जरूरत कागजी कानूनोंे की नहीं है, जरूरत है कानून व्यवस्था और समाज की सोच के सड़ांध को विदा करने की।
- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं।
सम्पर्क सूत्र - 09425174450.
Saturday, February 9, 2013
खाये जाओ खिलाये जाओ बुद्धू बनाए जाओ
चिन्तामणि मिश्र
भारत में प्राथमिक और माध्यमिक सरकारी स्कूलों में छात्रों की मिड डे मील योजना दुनिया की सबसे बड़ी मुफ्त स्कूली भोजन योजना है और भ्रष्टाचार की गोद में बैठी यह परियोजना दुनिया का सबसे बड़ा लूट-खसोट का कार्यक्रम भी है। तामिलनाडु और गुजरात से शुरू हुई यह योजना अब देश भर में चल रही है। इस योजना को शुरू करने का मकसद स्कूलों में दाखिलों और हाजरी में वृद्धि करना, बच्चों में कुपोषण कम करना, जातिभेद खत्म करके बच्चों में आपसदारी बढ़ाना है। इसको पूरे देश में लागू हुए एक दशक से अधिक हो गया है किन्तु कड़वा सच यह भी है कि पूरी दुनिया में कुपोषित बच्चों की मौत में आज भी हमारा देश दूसरे स्थान पर है। कुपोषण से मरने वाले बच्चों को बचाने के लिए छह साल तक के बच्चों पर ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि कुपोषण से मरने वाले बच्चों की उम्र छह साल तक की है।
सरकार को इन बच्चों के कुपोषण से लड़ना चाहिए जो खाने के अभाव में जिन्दा ही नहीं बचते है। इन बच्चों के मां-बाप का सपना शिक्षित होना नहीं बल्कि उनका जीवित बचे रहना है। यह जरूर है कि दोपहर के इस फोकट-भोजन के कारण स्कूलों में छात्रों की हाजरी बढ़ी है, किन्तु आधे से ज्यादा छात्र भोजन ग्रहण करने के बाद स्कूल से चले जाते हैं। अगर एक बार मान भी लिया जाए कि इस योजना से छात्रों के दाखिले और हाजरी में इजाफा हुआ है तो शिक्षा का स्तर जस का तस क्यों है? इस योजना का मकसद शिक्षा का स्तर बढ़ाना नहीं है, जो अपने आप सरकार के षड़यंत्र को बेनकाब कर रही है। हाजरी बढ़ाने से क्या हासिल होगा अगर पढ़ाई का स्तर नहीं बढ़ता है।
इस फोकट के भोजन कार्यक्रम ने पहले से ही चौपट पढ़ाई को पाताल में धकेल दिया है। स्कूलों में एक शिक्षक नियमित रूप से भोजन-पानी की व्यवस्था में लगा रहता है। रसद, नून-तेल- लकड़ी मंगवाना, रसोइयों से काम लेना, भोजन वितरित कराना और बर्तनों की देखभाल करने का काम जिम्मे में होने से वह किसी भी दिन कक्षा में प्रवेश ही नहीं करता है। स्कूल का हेडमास्टर कैश-बुक लिखने, स्टाक रजिस्टर भरने, बाउचर्स एकत्र करने में रोज कई घन्टे गुजारता है। इस तरह दो मास्टर रसोईया और भंडारी बना दिए गए है। सरकार का अंधतत्व इतना प्रबल है कि उसे नहीं दिखता कि दो मास्टरों की कक्षाओं के छात्रों को कौन पढ़ाता है, क्या भूत पढ़ाते है? एक तरफ बच्चों को एक वक्त का पोषक आहार देने के लिए करोड़ों रुपए सरकार लगा रही है और दूसरी तरफ बेहद घटिया भोजन बच्चों को परोसा जा रहा है। हर स्कूल में भ्रष्टाचार का बजबजाता कुन्ड बन गया है, जिसमें संस्था प्रधान उसका भंडारा सहायक मास्टर तैर रहे हैं, इस तैराकी में वे भी डुबकी लगा कर अपना इहलोक बनाने में जुटे हैं, जिनको निगरानी का काम सौंपा गया है। इस योजना को बनाने और लागू करने वालों को बुद्धि का अजीर्ण है। वे इतना भी नहीं समझ पाए कि एक बच्चे को एक जून का खाना देकर स्कूल जाने का लालच देने का जाल सफल नहीं हो सकता है। गरीब परिवार का बच्चा काम करके पूरे परिवार के लिए दो जून का खाना जुटा लेता है। बच्चे के श्रम से पूरे परिवार का पेट जुड़ा है न कि एक बच्चे की एक वक्त की भूख से।
स्कूलों में कई बच्चे भोजन के वक्त अपनी थाली लेकर आ जाते है और भोजन लेकर वापस चले जाते हैं। ऐसे बच्चें आसपास के खेतों में या सड़कों पर चल रहे निर्माण कार्य में अथवा मवेशी चराने के कामों में लगे हैं। इनके नाम स्कूलों में दर्ज हैं, इनको रोज स्कूल में उपस्थित भी दिखाया जा रहा है। ऐसी नौटंकी करने से किसी का भी भला नहीं हो रहा है। भ्रष्टाचारी जोंको का गिरोह जरूर मुटिया रहा है। स्कूलों में भंडारा चलाने का मकसद शिक्षा का स्तर बढ़ाना बताया गया है लेकिन शिक्षा का स्तर जस का तस ही है। फोकट के एक-जूनी भोजन से शिक्षा का स्तर कैसे बढ़ेगा, इसे सरकार ने आज तक नहीं बताया है। वैसे सरकार की प्राथमिकता में सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा प्रदान करने का प्रबन्ध करना है ही नहीं। शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षक होते हैं इनका कोई दूसरा विकल्प नहीं होता है, किन्तु सरकार शिक्षकों को मवेशी चराने वाले चरवाहों से अधिक और कुछ मानती ही नहीं।
प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के शिक्षकों के वेतन, सेवा शर्ते, सरकार के चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी से भी ज्यादा बदतर हैं। उपर से सरकार का हर विभाग इनका माई-बाप है। शिक्षकों को शिक्षा देने के काम में न लगा कर नाना प्रकार के ऐसे काम दिए गए हैं, जिनका शिक्षा से कोई सम्बन्ध दूर-दूर तक नहीं है। सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तो दूर यहा शिक्षा देने का माहौल ही नदारत है क्योंकि सरकार पर्दे के पीछे निजी स्कूलों को आगे बढ़ाने के काम में लगी है। इसके लिए शिक्षक दोषी नहीं हैं अगर सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर नहीं उठ रहा है तो इकलौती दोषी सरकार तथा एसी-कुटिया में बैठ कर बेतुकी योजना बनाने वाली थकी-हारी बूढ़ी नौकरशाही है जिसे मैदानी हकीकत और उसकी दुश्वारियों का ज्ञान ही नहीं है।
अगर सरकार वास्तव में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा तथा छात्रों का स्तर सुधारना चाहती है, तो शिक्षा में प्रयोग करने से बचना होगा। शिक्षा को आईएएस गिरोह के चंगुल से बाहर निकाल कर शिक्षाशास्त्रियों के सुपुर्द किया जाए। आजादी के एक दशक तक देश में यही प्रक्रिया थी। इसके परिणाम बहुत बेहतर थे। पढ़ाने का तरीका तथा समय और परीक्षाओं पर नियंत्रण, पाठक्रम एवं निरीक्षण शिक्षाशास्त्रियों के हाथ में होना चाहिए। इसके साथ जो बहुज जरूरी है कि शिक्षकों से गैरशिक्षिकीय कामों में बेगारी लेना बन्द किया जाए।
छात्रों को स्कूलों में भंडारा के माध्यम से उनको मानसिक रूप से भिखारी बनाने से हम उनका और देश का भला नहीं कर रहे हैं। असल लक्ष्य शिक्षा का स्तर उठाना है। निजी शिक्षा संस्थानों में शिक्षा का स्तर इसीलिए ऊपर है क्योंकि वहा शिक्षकों से बेगारी नहीं ली जाती, उन पर ऐंठू नौकरशाही का दबाव नहीं है। शिक्षक केवल पढ़ाने का काम करते है। वहां रोज फोकट का खाना मांगने के लिए छात्र हाथ नहीं फैलाते। शिक्षा को गैर-शिक्षकीय नौकरशाही ने तबाह किया है। शिक्षक में आज भी क्षमता है कि वह देश के भविष्य को गढ़ सकता है उसे संवार सकता है। हमने उसे अवसर ही कब दिया है।
सरकार को इन बच्चों के कुपोषण से लड़ना चाहिए जो खाने के अभाव में जिन्दा ही नहीं बचते है। इन बच्चों के मां-बाप का सपना शिक्षित होना नहीं बल्कि उनका जीवित बचे रहना है। यह जरूर है कि दोपहर के इस फोकट-भोजन के कारण स्कूलों में छात्रों की हाजरी बढ़ी है, किन्तु आधे से ज्यादा छात्र भोजन ग्रहण करने के बाद स्कूल से चले जाते हैं। अगर एक बार मान भी लिया जाए कि इस योजना से छात्रों के दाखिले और हाजरी में इजाफा हुआ है तो शिक्षा का स्तर जस का तस क्यों है? इस योजना का मकसद शिक्षा का स्तर बढ़ाना नहीं है, जो अपने आप सरकार के षड़यंत्र को बेनकाब कर रही है। हाजरी बढ़ाने से क्या हासिल होगा अगर पढ़ाई का स्तर नहीं बढ़ता है।
इस फोकट के भोजन कार्यक्रम ने पहले से ही चौपट पढ़ाई को पाताल में धकेल दिया है। स्कूलों में एक शिक्षक नियमित रूप से भोजन-पानी की व्यवस्था में लगा रहता है। रसद, नून-तेल- लकड़ी मंगवाना, रसोइयों से काम लेना, भोजन वितरित कराना और बर्तनों की देखभाल करने का काम जिम्मे में होने से वह किसी भी दिन कक्षा में प्रवेश ही नहीं करता है। स्कूल का हेडमास्टर कैश-बुक लिखने, स्टाक रजिस्टर भरने, बाउचर्स एकत्र करने में रोज कई घन्टे गुजारता है। इस तरह दो मास्टर रसोईया और भंडारी बना दिए गए है। सरकार का अंधतत्व इतना प्रबल है कि उसे नहीं दिखता कि दो मास्टरों की कक्षाओं के छात्रों को कौन पढ़ाता है, क्या भूत पढ़ाते है? एक तरफ बच्चों को एक वक्त का पोषक आहार देने के लिए करोड़ों रुपए सरकार लगा रही है और दूसरी तरफ बेहद घटिया भोजन बच्चों को परोसा जा रहा है। हर स्कूल में भ्रष्टाचार का बजबजाता कुन्ड बन गया है, जिसमें संस्था प्रधान उसका भंडारा सहायक मास्टर तैर रहे हैं, इस तैराकी में वे भी डुबकी लगा कर अपना इहलोक बनाने में जुटे हैं, जिनको निगरानी का काम सौंपा गया है। इस योजना को बनाने और लागू करने वालों को बुद्धि का अजीर्ण है। वे इतना भी नहीं समझ पाए कि एक बच्चे को एक जून का खाना देकर स्कूल जाने का लालच देने का जाल सफल नहीं हो सकता है। गरीब परिवार का बच्चा काम करके पूरे परिवार के लिए दो जून का खाना जुटा लेता है। बच्चे के श्रम से पूरे परिवार का पेट जुड़ा है न कि एक बच्चे की एक वक्त की भूख से।
स्कूलों में कई बच्चे भोजन के वक्त अपनी थाली लेकर आ जाते है और भोजन लेकर वापस चले जाते हैं। ऐसे बच्चें आसपास के खेतों में या सड़कों पर चल रहे निर्माण कार्य में अथवा मवेशी चराने के कामों में लगे हैं। इनके नाम स्कूलों में दर्ज हैं, इनको रोज स्कूल में उपस्थित भी दिखाया जा रहा है। ऐसी नौटंकी करने से किसी का भी भला नहीं हो रहा है। भ्रष्टाचारी जोंको का गिरोह जरूर मुटिया रहा है। स्कूलों में भंडारा चलाने का मकसद शिक्षा का स्तर बढ़ाना बताया गया है लेकिन शिक्षा का स्तर जस का तस ही है। फोकट के एक-जूनी भोजन से शिक्षा का स्तर कैसे बढ़ेगा, इसे सरकार ने आज तक नहीं बताया है। वैसे सरकार की प्राथमिकता में सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा प्रदान करने का प्रबन्ध करना है ही नहीं। शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षक होते हैं इनका कोई दूसरा विकल्प नहीं होता है, किन्तु सरकार शिक्षकों को मवेशी चराने वाले चरवाहों से अधिक और कुछ मानती ही नहीं।
प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के शिक्षकों के वेतन, सेवा शर्ते, सरकार के चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी से भी ज्यादा बदतर हैं। उपर से सरकार का हर विभाग इनका माई-बाप है। शिक्षकों को शिक्षा देने के काम में न लगा कर नाना प्रकार के ऐसे काम दिए गए हैं, जिनका शिक्षा से कोई सम्बन्ध दूर-दूर तक नहीं है। सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तो दूर यहा शिक्षा देने का माहौल ही नदारत है क्योंकि सरकार पर्दे के पीछे निजी स्कूलों को आगे बढ़ाने के काम में लगी है। इसके लिए शिक्षक दोषी नहीं हैं अगर सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर नहीं उठ रहा है तो इकलौती दोषी सरकार तथा एसी-कुटिया में बैठ कर बेतुकी योजना बनाने वाली थकी-हारी बूढ़ी नौकरशाही है जिसे मैदानी हकीकत और उसकी दुश्वारियों का ज्ञान ही नहीं है।
अगर सरकार वास्तव में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा तथा छात्रों का स्तर सुधारना चाहती है, तो शिक्षा में प्रयोग करने से बचना होगा। शिक्षा को आईएएस गिरोह के चंगुल से बाहर निकाल कर शिक्षाशास्त्रियों के सुपुर्द किया जाए। आजादी के एक दशक तक देश में यही प्रक्रिया थी। इसके परिणाम बहुत बेहतर थे। पढ़ाने का तरीका तथा समय और परीक्षाओं पर नियंत्रण, पाठक्रम एवं निरीक्षण शिक्षाशास्त्रियों के हाथ में होना चाहिए। इसके साथ जो बहुज जरूरी है कि शिक्षकों से गैरशिक्षिकीय कामों में बेगारी लेना बन्द किया जाए।
छात्रों को स्कूलों में भंडारा के माध्यम से उनको मानसिक रूप से भिखारी बनाने से हम उनका और देश का भला नहीं कर रहे हैं। असल लक्ष्य शिक्षा का स्तर उठाना है। निजी शिक्षा संस्थानों में शिक्षा का स्तर इसीलिए ऊपर है क्योंकि वहा शिक्षकों से बेगारी नहीं ली जाती, उन पर ऐंठू नौकरशाही का दबाव नहीं है। शिक्षक केवल पढ़ाने का काम करते है। वहां रोज फोकट का खाना मांगने के लिए छात्र हाथ नहीं फैलाते। शिक्षा को गैर-शिक्षकीय नौकरशाही ने तबाह किया है। शिक्षक में आज भी क्षमता है कि वह देश के भविष्य को गढ़ सकता है उसे संवार सकता है। हमने उसे अवसर ही कब दिया है।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं।
Friday, February 1, 2013
गाँधी वध से ज्यादा संगीन है उनके विचारों की हत्या
चिन्तामणि मिश्र
गांधी ने 9 अक्टूबर 1945 को जवाहर लाल नेहरू को पत्र लिखा था कि मैं हिन्द स्वराज्य में लिखी राज्य पद्धति पर कायम हूं, किन्तु नेहरू ने दो दिन बाद उनको उत्तर देते हुए पत्र लिखा कि मैंने बीस साल पहले उसे पढ़ा था और तब भी वह मुझे असलियत से परे लगा था। अड़तीस साल हो गए जब हिन्द स्वराज्य लिखी गई थी तब से दुनिया पूरी तरह बदल गई है। इस तरह गांधी के मनपसन्द राजनैतिक उत्तराधिकारी नेहरू ने उनके दर्शन-सिद्धान्तों में पलीता लगाते हुए उन्हें बता दिया कि देश उनके सिद्धांतों पर नहीं चलेगा। वैसे जहां तक गांधी दर्शन के साथ स्वयं गांधी बहुत दूर तक नहीं चल सके। अहिंसा की नींव पर खड़े गांधी की प्रथम विश्व महायुद्ध में सक्रिय भागीदारी थी और दूसरे विश्व महायुद्ध में अंग्रेजों की सेना में भारतीयों को शामिल हो जाने की अपील उन्होंने की थी। कांग्रेस में ऐसे कई नेता थे जिन्होंने गांधी के इस कदम का विरोध किया था। आम आदमी को बड़ी उलझन होती है जब वह भगत सिंह और अन्य क्रान्तिकारियों की फांसी की सजा के बदले जाने के लिए वायसराय से अपील न करने के लिए इंकार करते गांधी को देखता है और दूसरी ओर गांधी को अंग्रेजों की हिंसा के लिए भारतीयों को सेना में भरती होने की अपील करते देखता है। देश के विभाजन पर उनकी प्रतिक्रियाए इतिहास की धरोहर हैं। अपने मृत शरीर पर देश के विभाजन होने की भीष्म प्रतिज्ञा करने के बाद बंटवारा मान लेने वाले गांधी को इतिहास किस तरह याद करेगा, लिखना यहां अनुचित होगा। लेकिन गांधी ने सत्य अहिंसा के लिए जो जीवन्त मौका देश विभाजन के समय मिला था उसे गंवा दिया।
तत्कालीन घटनाक्रम जो इतिहास बन गया है उसके भीतर प्रवेश करने पर साफ समझ में आ जाता है कि देश विभाजन के प्रसंग में गांधी को अंधेरे में रखा गया और अगर साफ-साफ कहना पड़े तो बे-हिचक कहा जा सकता है कि गांधी के साथ निर्मम विश्वासघात किया गया। उन्हें मौत का खौफ या जीवन का कोई मोह अचानक जकड़ बैठा था, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु यह हकीकत है कि उनको धोखा दिया गया। इसे किसने किया यह बताने की जरूरत नहीं है। गांधी स्वदेशी अर्थव्यवस्था के समर्थक थे किन्तु सत्ता में आते ही उनके अनुयायियों ने आधुनिक औद्योगीकरण का रास्ता पकड़ लिया। गांधी चाहते थे कि आजाद भारत का संविधान विकेन्दीकरण के आधार पर बनना चाहिए। उनकी धारणा थी कि प्रदेशों की स्वायत्तता ही स्वराज्य को विकसित करेगी। प्रदेशों के विकास में केन्द्र की शक्ति निहित है, अन्यथा केन्द्र सर्वग्रासी बन जाएगा। गांधी की बात कांग्रेस ने अनसुनी कर दी और न सिर्फ केन्द्र को महाबली बनाया बल्कि प्रदेशों की स्वायत्ता पर आक्रमण करने के अधिकार भी केन्द्र सरकार ने अपने हाथ में रख लिए। औद्यौगिक केन्द्रीकरण के कारण बड़े शहरों और महानगरों की बात छोड़िए मझोले शहरों तक में अतिक्रमण के नाम पर झुग्गियों को बुलडोजरों से साफ करने का काम चलता रहता है। कोई यह देखना नहीं चाहता कि ये लोग कहां से आए हैं और क्यों आए हैं। मूल संविधान में पंचायतों का उल्लेख नहीं था, जबकि गांधी दर्शन ग्राम पंचायतों को शक्ति सम्पन्न बनाने की बात करता है। बाद में पंचायतों के गठन का संविधान में समावेश तो किया गया किन्तु पंचायतों को राज्य के आधीन रख दिया और राज्यों ने पंचायतों को अधिकार विहीन रख कर उनके सिर पर नौकरशाही को बैठा दिया। पंच, सरपंच विकास के लिए पूरी पंचायत की रजामन्दी होने पर भी एक ईट तक नहीं रख सकते जब तक नौकरशाही न चाहे। पंचायती राज्य के नाम पर पंचोंसर पंचों को नौकरशाही ने भ्रष्ट होने का प्रशिक्षण जरूर दे दिया।
गांधी ने प्रकृति की ओर वापस लौटने के सिद्धान्त पर बहुत जोर दिया था। खेती के लिए प्राकृतिक खाद की सिफारिश करते हुए उन्होंने साफ किया था कि फसल को औद्योगिक उत्पादन की प्रक्रिया की तरह देखेंगे तो धरती को बांझ बना देंगे। हम यह नहीं कह सकते कि भारत के भविष्य के बारे में गांधी ने जो आशा की थी और जो रास्ता सुझया था वह सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन गांधी को बिना कसौटी पर परखे खारिज कर देना गांधी के साथ अन्याय तो होगा ही ऐसा करना देश हित में भी सही नहीं होगा। हमारे देश ने हमेशा अपने जीवन और अपनी संस्थाओं में परिवर्तन किए भी हैं। देश की यह प्रतिभा अभी मिटी नहीं हैं। हमारे लिए जरूरी केवल यह होना चाहिए कि हम जड़ हो चुकी अपनी इस धारणा को बदलें कि गांधी का नाम मजबूरी हैं। गांधी- दर्शन को एक बार कुहासे से बाहर लाना चाहिए और उसकी परख करनी चाहिए। परख के बाद ही यह तय किया जा सकता है कि गांधी-दर्शन का औचित्य क्या और कितना है। आज गांधी की तरफ लौटने की जरूरत है।
महात्मा गांधी ने भारत में लगभग बत्तीस साल आजादी के लिए विभिन्न आन्दोलनों का नेतृत्व किया और देश पर शासन कर रहे अंग्रेजों की बिदाई के गवाह भी रहे। यदि 30 जनवरी 1947 को गोडसे ने उनका वध न किया होता तो वे भारत को गणतंत्र बनते और संविधान की पवित्र पोथी के दर्शन करते हुए देश को संविधान अंगीकृत करने के भी साक्षी होते। वे जब इस धरती से विदा हुए तब भारत सार्वभौमिक अधिकार सम्पन्न गणतांत्रिक राष्ट्र बनने से कई साल दूर था। गांधी के सामने भारत को डोमेनियन स्टेटस का दर्जा जरूर मिल गया था और राजकाज ब्रिटिश ताज की चौधराहट में अंग्रेज गर्वनर जनरल के आधीन था। गांधी ने आजादी के लिए जितनी ईमानदारी से अपना योगदान दिया वह लोक-विदित तो है ही, किन्तु आजाद भारत कैसा होगा, उसकी शासन व्यवस्था किस तरह संचालित होगी, इसका उन्होंने चिन्तन भी किया और इसे सन् 1909 में हिन्द स्वराज्य नाम से पुस्तक लिखी। हिन्द स्वराज्य गांधी दर्शन का मैनफेस्टो है। गांधी बहुआयामी चिन्तक थे। होना तो यह चाहिए था कि आजादी मिलने के बाद देश का संचालन गांधी के बताए रास्ते से किया जाता लेकिन ऐसा नहीं किया गया और गांधी- दर्शन को परखने तथा आजमाने का अवसर ही नहीं आया। गांधी का चिन्तन आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्था पर बड़े अधिकार के साथ विवेचना करता है। हिंसा, साम्प्रदायिकता, भोगवाद, बैर-भाव का उन्होनें जमकर विरोध किया और स्वदेशी, अहिंसा, कुटीर उद्योग, चर्खा-खादी, समरसता अपनाने पर जोर दिया किन्तु गांधी के सपने कभी आकार नहीं ले सके, वे सपने ही रहे। हकीकत कड़वी है, किन्तु सच्चाई यही है कि गांधी दर्शन की देश की सत्ता पर विराजने वालों ने राजघाट में समाधि दे दी। गांधी का अपने अन्त समय तक वही सपना रहा जो उन्होंने हिन्द स्वराज्य में देखा और दिखाया था।
गांधी ने 9 अक्टूबर 1945 को जवाहर लाल नेहरू को पत्र लिखा था कि मैं हिन्द स्वराज्य में लिखी राज्य पद्धति पर कायम हूं, किन्तु नेहरू ने दो दिन बाद उनको उत्तर देते हुए पत्र लिखा कि मैंने बीस साल पहले उसे पढ़ा था और तब भी वह मुझे असलियत से परे लगा था। अड़तीस साल हो गए जब हिन्द स्वराज्य लिखी गई थी तब से दुनिया पूरी तरह बदल गई है। इस तरह गांधी के मनपसन्द राजनैतिक उत्तराधिकारी नेहरू ने उनके दर्शन-सिद्धान्तों में पलीता लगाते हुए उन्हें बता दिया कि देश उनके सिद्धांतों पर नहीं चलेगा। वैसे जहां तक गांधी दर्शन के साथ स्वयं गांधी बहुत दूर तक नहीं चल सके। अहिंसा की नींव पर खड़े गांधी की प्रथम विश्व महायुद्ध में सक्रिय भागीदारी थी और दूसरे विश्व महायुद्ध में अंग्रेजों की सेना में भारतीयों को शामिल हो जाने की अपील उन्होंने की थी। कांग्रेस में ऐसे कई नेता थे जिन्होंने गांधी के इस कदम का विरोध किया था। आम आदमी को बड़ी उलझन होती है जब वह भगत सिंह और अन्य क्रान्तिकारियों की फांसी की सजा के बदले जाने के लिए वायसराय से अपील न करने के लिए इंकार करते गांधी को देखता है और दूसरी ओर गांधी को अंग्रेजों की हिंसा के लिए भारतीयों को सेना में भरती होने की अपील करते देखता है। देश के विभाजन पर उनकी प्रतिक्रियाए इतिहास की धरोहर हैं। अपने मृत शरीर पर देश के विभाजन होने की भीष्म प्रतिज्ञा करने के बाद बंटवारा मान लेने वाले गांधी को इतिहास किस तरह याद करेगा, लिखना यहां अनुचित होगा। लेकिन गांधी ने सत्य अहिंसा के लिए जो जीवन्त मौका देश विभाजन के समय मिला था उसे गंवा दिया।
तत्कालीन घटनाक्रम जो इतिहास बन गया है उसके भीतर प्रवेश करने पर साफ समझ में आ जाता है कि देश विभाजन के प्रसंग में गांधी को अंधेरे में रखा गया और अगर साफ-साफ कहना पड़े तो बे-हिचक कहा जा सकता है कि गांधी के साथ निर्मम विश्वासघात किया गया। उन्हें मौत का खौफ या जीवन का कोई मोह अचानक जकड़ बैठा था, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है, किन्तु यह हकीकत है कि उनको धोखा दिया गया। इसे किसने किया यह बताने की जरूरत नहीं है। गांधी स्वदेशी अर्थव्यवस्था के समर्थक थे किन्तु सत्ता में आते ही उनके अनुयायियों ने आधुनिक औद्योगीकरण का रास्ता पकड़ लिया। गांधी चाहते थे कि आजाद भारत का संविधान विकेन्दीकरण के आधार पर बनना चाहिए। उनकी धारणा थी कि प्रदेशों की स्वायत्तता ही स्वराज्य को विकसित करेगी। प्रदेशों के विकास में केन्द्र की शक्ति निहित है, अन्यथा केन्द्र सर्वग्रासी बन जाएगा। गांधी की बात कांग्रेस ने अनसुनी कर दी और न सिर्फ केन्द्र को महाबली बनाया बल्कि प्रदेशों की स्वायत्ता पर आक्रमण करने के अधिकार भी केन्द्र सरकार ने अपने हाथ में रख लिए। औद्यौगिक केन्द्रीकरण के कारण बड़े शहरों और महानगरों की बात छोड़िए मझोले शहरों तक में अतिक्रमण के नाम पर झुग्गियों को बुलडोजरों से साफ करने का काम चलता रहता है। कोई यह देखना नहीं चाहता कि ये लोग कहां से आए हैं और क्यों आए हैं। मूल संविधान में पंचायतों का उल्लेख नहीं था, जबकि गांधी दर्शन ग्राम पंचायतों को शक्ति सम्पन्न बनाने की बात करता है। बाद में पंचायतों के गठन का संविधान में समावेश तो किया गया किन्तु पंचायतों को राज्य के आधीन रख दिया और राज्यों ने पंचायतों को अधिकार विहीन रख कर उनके सिर पर नौकरशाही को बैठा दिया। पंच, सरपंच विकास के लिए पूरी पंचायत की रजामन्दी होने पर भी एक ईट तक नहीं रख सकते जब तक नौकरशाही न चाहे। पंचायती राज्य के नाम पर पंचोंसर पंचों को नौकरशाही ने भ्रष्ट होने का प्रशिक्षण जरूर दे दिया।
गांधी ने प्रकृति की ओर वापस लौटने के सिद्धान्त पर बहुत जोर दिया था। खेती के लिए प्राकृतिक खाद की सिफारिश करते हुए उन्होंने साफ किया था कि फसल को औद्योगिक उत्पादन की प्रक्रिया की तरह देखेंगे तो धरती को बांझ बना देंगे। हम यह नहीं कह सकते कि भारत के भविष्य के बारे में गांधी ने जो आशा की थी और जो रास्ता सुझया था वह सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन गांधी को बिना कसौटी पर परखे खारिज कर देना गांधी के साथ अन्याय तो होगा ही ऐसा करना देश हित में भी सही नहीं होगा। हमारे देश ने हमेशा अपने जीवन और अपनी संस्थाओं में परिवर्तन किए भी हैं। देश की यह प्रतिभा अभी मिटी नहीं हैं। हमारे लिए जरूरी केवल यह होना चाहिए कि हम जड़ हो चुकी अपनी इस धारणा को बदलें कि गांधी का नाम मजबूरी हैं। गांधी- दर्शन को एक बार कुहासे से बाहर लाना चाहिए और उसकी परख करनी चाहिए। परख के बाद ही यह तय किया जा सकता है कि गांधी-दर्शन का औचित्य क्या और कितना है। आज गांधी की तरफ लौटने की जरूरत है।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं।
Thursday, January 24, 2013
तन्हाई में धकेला था सुभाष को
चिन्तामणि मिश्र
गांधी अपनी अंहिसा की थ्योरी पर बहुत गहरे धंसे थे और उनका समस्त चिन्तन अंहिसा और धर्म पर आधारित और प्रेरित था। उनके लिए लक्ष्य तक पहुंचने के लिए साधन की पवित्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी जितनी कि साध्य। गांधी ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति सद्भावना रखते थे। भारत में डोमिनियन स्टेटस के रूप में गांधी सीमित स्वतंत्रता के पक्षधर थे। इसके विपरीत सुभाष ब्रिटिश सत्ता का कोई अंश भारत में नहीं चाहते थे। सुभाष इसके लिए कोई भी रास्ता अपनाने के पक्षधर थे। इंग्लैण्ड में अरईसीएस की परीक्षा पास करने के बाद सुभाष ने मई 1921 में नौकरी छोड़ी और धधकती देशभक्ति लेकर भारत आए। देश के लिए उनके इस बलिदान ने उन्हें युवा पीढ़ी का नायक बना दिया था। सुभाष 6 जुलाई को बम्बई पहुंचे और इसी दिन दोपहर को मणिभवन में पहली बार उनकी गांधी से मुलाकात हुई। इस पहली मुलाकात में ही उन पर गांधी का अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा।
गांधी के मन में भी सुभाष के प्रति सदैव शंकाएं रही। गांधी को लगता रहा कि सुभाष का अंहिसा में कोई विश्वास नहीं है। सन् 1928 के कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में सुभाष की फौजी जनरल की वर्दी की गांधी ने निन्दा की थी। सुभाष की तुलना में गांधी ने नेहरू के अन्दर का लचीलापन और भावुक अस्थिरता देख ली थी और वे आश्वस्त हो गए थे कि नेहरू को धीरे-धीरे अपने अनुरूप ढाल लेंगे। यह सम्भावना गांधी को सुभाष के प्रति कभी नहीं दिखी। इसके विपरीत सुभाष अपने मार्क्सवादी तथा गांधी विरोधी विचारों में दृढ़ होते गए। सन् 1929 में गांधी ने जवाहर लाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनवा दिया। नेहरू ने अध्यक्ष बनने पर अपनी कार्ययमिति में सुभाष को नहीं लिया। यह गांधी की सबसे बड़ी जीत थी। सन 1936 में कांग्रेस में वामपंथियों का भी एक प्रवाह तैयार हो गया था। कांग्रेस के भीतर ये सब वामपंथी संगठित हो रहे थे। इस प्रवाह को रोकने के लिए सुभाष ही सबसे उपयुक्त थे, उनका इन पर जबरदस्त प्रभाव था। गांधी ने मजबूरी में अध्यक्ष के लिये सुभाष का चयन किया। उन्होंने हरिपुरा अधिवेशन के एक माह पहले नवम्बर 1937 को सरदार पटेल को पत्र में लिखा- मैंने देखा कि सुभाष किसी भी तरह निर्भर करने योग्य नहीं है, फिर भी कोई दूसरा अध्यक्ष नहीं हो सकता है।
ध्यान देने की बात है कि सुभाष के जोर देने के बाद भी नेहरू ने उस वर्ष कांग्रेस का महामंत्री बनने से इंकार कर दिया। सुभाष के लिए सबसे बड़ा टकराव और चुनौती का एक बिन्दु सरदार पटेल भी थे। हरिपुरा अधिवेशन में सुभाष का अध्यक्षीय भाषण अंग्रेज सरकार को संघर्ष और युद्ध की खुली चुनौती के रूप में था। सुभाष ने अपने इस भाषण में कांग्रेस की विदेश नीति पर कहा कि अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटेन के विरोधी देशों से भारत अपनी आजादी के लिए ब्रिटेन के विरुद्ध उनका साथ देगा। उन्होंने औद्योगीकरण का भी पक्ष लिया और उद्योगों पर राष्ट्रीय नियंत्रण की बात कही। यह गांधी की नीति के विरुद्ध था। 1938 के अन्त तक गांधी और सुभाष के मध्य मतभेद बहुत गहरे हो गए थे। गांधी को सुभाष एक बड़ी चेतावनी के रूप में दिखने लगे थे, उन्होंने तय किया कि त्रिपुरी में होने वाले अधिवेशन का अध्यक्ष सुभाष को नहीं होना चाहिए। गांधी दूसरी बार सुभाष को कांग्रेस अध्यक्ष क्यों नहीं चाहते थे, इसका एक कारण के एम मुंशी की किताब पिलग्रिमेज में दर्ज है। मुंशी ने लिखा है कि जब वे बम्बई में कानून मंत्री थे तब केन्द्रीय गुप्तचर विभाग की रिपोर्ट में उन्होंने पढ़ा था कि सुभाष कलकत्ता में जर्मन कांउसिल के सम्पर्क में थे और उसके साथ किसी व्यवस्था पर बातचीत कर रहे हैं। मुंशी ने लिखा है कि मैंने यह सूचना गांधी को दी थी और गांधी ने सुभाष के विरुद्ध यह कड़ा रुख अपनाया ।
सुभाष दूसरी बार अध्यक्ष बनना चाहते थे किन्तु गांधी ने इंकार कर दिया था। उन्होंने पट्टाभि सीतारमैया को अध्यक्ष के लिए अपना उम्मीदवार बनाया और सुभाष के मुकाबले पट्टाभि सीतारमैया चुनाव हार गए। इस हार को गांधी पचा नहीं सके। पट्टाभि सीतारमैया की हार को अपनी हार सार्वजनिक रूप से कह दी। सुभाष अध्यक्ष पद पर आ जरूर गए थे, किन्तु उन्होंने जो अपनी कार्यसमिति बनाई उसने उनका बहिष्कार कर दिया और अन्त में उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। तीन मई 1939 को सुभाष ने एक नए दल फारवर्ड ब्लॉक के गठन की घोषणा कर दी। यह कांग्रेस के अन्दर ही दूसरा मंच था। इसे जयप्रकाश, नरेन्द्र देव,पटेल, नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद आदि ने कांग्रेस को कमजोर करने की कार्यवाही माना। सुभाष को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया। कुछ समय बाद द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया। सुभाष ने देश छोड़ दिया और विदेश में भारत की आजादी के लिए जो किया वह सर्वविदित है।
सुभाष के प्रयासों की कितनी भूमिका भारत की आजादी में रही इसका आकलन तो इतिहास करेगा, पर देश की जनता के दिलों में सुभाष ने जो जगह बनाई, उसे अनुभव करने के लिए किसी इतिहास की जरूरत नहीं है। उस दौर में कांग्रेस और उसके कामकाज के अंत:पुर में जो तथा जैसा घट रहा था, उसकी तुलना महाभारत से की जा सकती है। कौन कब निष्ठाएं बदल रहा है, कौन फुसफुसाती संधियां कर रहा है तथा कौन चक्रव्यूह रच रहा है, स्पष्ट दिखाई देता है। संशय,अविश्वास, प्रतिबद्धता के कोहरे में साफ दिखता है कि सुभाष को सब तरफ से घेर कर, धीरे-धीरे निहत्था किया जाता रहा और वे अपनी असंदिग्ध देशभक्ति से ओत-प्रोत होकर चक्रव्यूहों के द्वार भेद नहीं पाए। उन्हें राजनीति में तनहाई की ओर लगातार धकेला गया।
गांधी के मन में भी सुभाष के प्रति सदैव शंकाएं रही। गांधी को लगता रहा कि सुभाष का अंहिसा में कोई विश्वास नहीं है। सन् 1928 के कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में सुभाष की फौजी जनरल की वर्दी की गांधी ने निन्दा की थी। सुभाष की तुलना में गांधी ने नेहरू के अन्दर का लचीलापन और भावुक अस्थिरता देख ली थी और वे आश्वस्त हो गए थे कि नेहरू को धीरे-धीरे अपने अनुरूप ढाल लेंगे। यह सम्भावना गांधी को सुभाष के प्रति कभी नहीं दिखी। इसके विपरीत सुभाष अपने मार्क्सवादी तथा गांधी विरोधी विचारों में दृढ़ होते गए। सन् 1929 में गांधी ने जवाहर लाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बनवा दिया। नेहरू ने अध्यक्ष बनने पर अपनी कार्ययमिति में सुभाष को नहीं लिया। यह गांधी की सबसे बड़ी जीत थी। सन 1936 में कांग्रेस में वामपंथियों का भी एक प्रवाह तैयार हो गया था। कांग्रेस के भीतर ये सब वामपंथी संगठित हो रहे थे। इस प्रवाह को रोकने के लिए सुभाष ही सबसे उपयुक्त थे, उनका इन पर जबरदस्त प्रभाव था। गांधी ने मजबूरी में अध्यक्ष के लिये सुभाष का चयन किया। उन्होंने हरिपुरा अधिवेशन के एक माह पहले नवम्बर 1937 को सरदार पटेल को पत्र में लिखा- मैंने देखा कि सुभाष किसी भी तरह निर्भर करने योग्य नहीं है, फिर भी कोई दूसरा अध्यक्ष नहीं हो सकता है।
ध्यान देने की बात है कि सुभाष के जोर देने के बाद भी नेहरू ने उस वर्ष कांग्रेस का महामंत्री बनने से इंकार कर दिया। सुभाष के लिए सबसे बड़ा टकराव और चुनौती का एक बिन्दु सरदार पटेल भी थे। हरिपुरा अधिवेशन में सुभाष का अध्यक्षीय भाषण अंग्रेज सरकार को संघर्ष और युद्ध की खुली चुनौती के रूप में था। सुभाष ने अपने इस भाषण में कांग्रेस की विदेश नीति पर कहा कि अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटेन के विरोधी देशों से भारत अपनी आजादी के लिए ब्रिटेन के विरुद्ध उनका साथ देगा। उन्होंने औद्योगीकरण का भी पक्ष लिया और उद्योगों पर राष्ट्रीय नियंत्रण की बात कही। यह गांधी की नीति के विरुद्ध था। 1938 के अन्त तक गांधी और सुभाष के मध्य मतभेद बहुत गहरे हो गए थे। गांधी को सुभाष एक बड़ी चेतावनी के रूप में दिखने लगे थे, उन्होंने तय किया कि त्रिपुरी में होने वाले अधिवेशन का अध्यक्ष सुभाष को नहीं होना चाहिए। गांधी दूसरी बार सुभाष को कांग्रेस अध्यक्ष क्यों नहीं चाहते थे, इसका एक कारण के एम मुंशी की किताब पिलग्रिमेज में दर्ज है। मुंशी ने लिखा है कि जब वे बम्बई में कानून मंत्री थे तब केन्द्रीय गुप्तचर विभाग की रिपोर्ट में उन्होंने पढ़ा था कि सुभाष कलकत्ता में जर्मन कांउसिल के सम्पर्क में थे और उसके साथ किसी व्यवस्था पर बातचीत कर रहे हैं। मुंशी ने लिखा है कि मैंने यह सूचना गांधी को दी थी और गांधी ने सुभाष के विरुद्ध यह कड़ा रुख अपनाया ।
सुभाष दूसरी बार अध्यक्ष बनना चाहते थे किन्तु गांधी ने इंकार कर दिया था। उन्होंने पट्टाभि सीतारमैया को अध्यक्ष के लिए अपना उम्मीदवार बनाया और सुभाष के मुकाबले पट्टाभि सीतारमैया चुनाव हार गए। इस हार को गांधी पचा नहीं सके। पट्टाभि सीतारमैया की हार को अपनी हार सार्वजनिक रूप से कह दी। सुभाष अध्यक्ष पद पर आ जरूर गए थे, किन्तु उन्होंने जो अपनी कार्यसमिति बनाई उसने उनका बहिष्कार कर दिया और अन्त में उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। तीन मई 1939 को सुभाष ने एक नए दल फारवर्ड ब्लॉक के गठन की घोषणा कर दी। यह कांग्रेस के अन्दर ही दूसरा मंच था। इसे जयप्रकाश, नरेन्द्र देव,पटेल, नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद आदि ने कांग्रेस को कमजोर करने की कार्यवाही माना। सुभाष को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया। कुछ समय बाद द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया। सुभाष ने देश छोड़ दिया और विदेश में भारत की आजादी के लिए जो किया वह सर्वविदित है।
सुभाष के प्रयासों की कितनी भूमिका भारत की आजादी में रही इसका आकलन तो इतिहास करेगा, पर देश की जनता के दिलों में सुभाष ने जो जगह बनाई, उसे अनुभव करने के लिए किसी इतिहास की जरूरत नहीं है। उस दौर में कांग्रेस और उसके कामकाज के अंत:पुर में जो तथा जैसा घट रहा था, उसकी तुलना महाभारत से की जा सकती है। कौन कब निष्ठाएं बदल रहा है, कौन फुसफुसाती संधियां कर रहा है तथा कौन चक्रव्यूह रच रहा है, स्पष्ट दिखाई देता है। संशय,अविश्वास, प्रतिबद्धता के कोहरे में साफ दिखता है कि सुभाष को सब तरफ से घेर कर, धीरे-धीरे निहत्था किया जाता रहा और वे अपनी असंदिग्ध देशभक्ति से ओत-प्रोत होकर चक्रव्यूहों के द्वार भेद नहीं पाए। उन्हें राजनीति में तनहाई की ओर लगातार धकेला गया।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं।
Friday, January 18, 2013
दीवालों से न दरवाजों से घर बनता है घरवालों से
चिन्तामणि मिश्र
मकान सब के होते हैं। कोई खुद के मकान में रहता है तो कोई किराए के मकान में रहता है। कुछ लोगों के मकान आधुनिक तकनीक से पक्के होते हैं और कुछ के मकान कच्चे और खपरैल वाले होते हैं। देश में बहुत बड़ी आबादी झुग्गी झोपड़ी में रहती है। इसके निवासी अपने इस आशियाने को भी मकान ही कहते हैं। बहुत से ऐसे भी भाग्यशाली होते हैं, जिनके कई मंजिल के मकान में सैकड़ों कमरे होते हैं। मकानों की एक किस्म बंगलों और कोठियों के नाम से भी पुकारी जाती है। सन् 1947 तक जो शासक बिरादरी किलों, कोठियों और गढ़ी में रहती थी, अब उन्हीं की संशोधित शासक बिरादरी कोठी और बंगलों में ही रह रही है। पुराने शासकों को नए शासकों ने जब से घर-बाहर किया है, तभी से किला और गढ़ी देख-भाल के अभाव में जर्जर हो कर धराशाही होने की कगार पर आ गए। कुछ में होटल खुल गए। सरकारी नौकरशाही के निवास का नामकरण थोड़ा विचित्र है। हमारे भूतपूर्व अंग्रेज मालिकों ने अपने वेतन भोगियों की जो जाति निर्धारित की थी, उसके अनुसार इनके निवास-स्थान का नामकरण होता है। तहसीलदार के सरकारी आवास को बंगला कहा जाएगा और इसी के बगल में इतने ही भूखन्ड में, इतने ही कमरों और बरामदे होने पर भी इसे क्वाटर का नाम दिया जाएगा, क्योंकि इसमें क्लर्क रहता है।
मकान जिन्दगी गुजारने की शरणस्थली होते हैं। इस बात से मकान पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि कुछ लोग मकानों में सारी उम्र अशान्त, तनाव, कुंठा, अलगाव, क्रोध, धमंड, अहंकार और भय को बदंरिया के मरे बच्चे की तरह अपनी छाती में चिपकाए हुए गुजार देते हैं। हर मनुष्य के मन में बस एक ही ललक होती है कि किसी तरह उसका भी एक घर हो जाए। वैसे हर आदमी की इच्छा होती है कि उसका मकान, घर की तरह हो। लेकिन घर बनाने के लिए जो बुनियादी चीज परम जरूरी है उस पर कभी कोई ध्यान ही नहीं देता है। लोग सारी जिन्दगी भौतिक और विलासता की महंगी से महंगी चीजें मकान में एकत्र करते रहते हैं सुख सुविधा का ढेर लगा देते हैं, किन्तु घर नहीं बना पाते। घर को लेकर हर कोई सपनें देखता है। सन्यासी, साधु, बाबा, महात्मा भी घर बनाने और उसे सजाने में जुटे हैं। यह अलग बात है कि अपने इन मकानों को आश्रम, मठ, अखाड़ा और मंदिर का नाम देकर गृहस्थ से खुद को अलग दिखा कर दिखावा कर रहे हैं। अब वह समय नहीं रहा जब सन्यासी-बाबा खुले आसमान या पेड़ के नीचे रहते थे और महाराजा जनक दशरथ से लेकर सिकन्दर-अशोक जैसे प्रबल प्रतापी सम्राट मिलने के लिए हाथ बांधे वहां खड़े होते थे। जंगलों में पहाड़ों की गुफा में रहने के भी दिन बीत गए। वह नगर और महानगर आबाद करता है। भीमकाय और गगनचुम्बी पक्के, मजबूत मकान बना कर रहने लगा है। कंक्रीट की उगाई मीनारों में माचिस की डिब्बी जैसे फ्लैट नाम की आधुनिक गुफाओं में धरती और आकाश के बीच टंगा हुआ "स्वीट होम" का कीर्तन कर रहा है।
आज लोगों के अपने घरों में बेहद कीमती पत्थर, टाइल्स, विदेशी सेनेटरी सामग्री लाखों का फर्नीचर सपनों वाला शयनकक्ष और किचन हैं। टॉयलेट और बाथरूम देख कर हमारे जैसे चिरकुटों को तो लगने लगता है कि यहीं पसर कर सो जाए। ऐसे मकानों में जा कर मैं सोचने लगता हूं कि क्यों इतना रुपया खुद अपने लिए जेल का निर्माण कराने के लिए खर्च किया है? खिड़की, रौशनदान, बालकनी, बरामदें होते हैं, किन्तु सभी में लोहे की मोटी छड़ों का ऐसा जाल लगा होता है कि चिड़ियों का भी प्रवेश असम्भव है। पूरी दुनिया से कट कर हम अपनी ही बनाई गुफा में समा जाते हैं। पहले के ऋषि-मुनि पूरे जगत से कट कर ध्यान "समाधि" लगाते थे आज हम काल्पनिक भय के मारे बन्दी बन कर जी रहे हैं। इन घरों में से खुला आसमान भी नहीं दिखता है, क्योंकि एसी ने उसे भी छीन लिया है।
आधुनिकता की चूहा दौड़ में आंगन और बरामदें वाले घरों का समय हमने विदा कर दिया है। स्वाभाविक खुलापन उपलब्ध नहीं है। लोग मुहल्ला छोड़कर कालोनियों में रहने लगे हैं। मुहल्लेदारी हमारी सामाजिकता की पहली सीढ़ी थी। अब फ़्लैट ने सब काट दिया है। हर फ्लैट का द्वार हमेशा बन्द रहता है। किसी का किसी से कोई संवाद नहीं है। बाहर से काम करके आइए और अपने फ्लैट में समा जाइए। अगल-बगल और आमने-सामने रह कर भी लोग वर्षो अबोले रहे आते हैं। संवाद की स्थिति कभी नहीं बनती। सामाजिकता के लिए कोई जगह नहीं बचती। हालांकि नएपन या अजनबीपन को विर्सजित करने का पहला चरण है संवाद। आज के मकानों में भौतिक सुखसुविधा तो भरपूर है किन्तु सामाजिकता के लिए कोई जगह नहीं है। सरोकार से कट जाना ही नियति बन गई है। इन आधुनिक मकानों में आपसी प्रेम, आपसी सहकार, स्नेह, आदर के लिए कोई जगह ही नहीं बची है। एक छत के नीचे कई लोग रहते हैं किन्तु सभी में विचित्र प्रकार का अबोला है। किचन तो एक ही होता है, किन्तु लंच और डिनर एक साथ बैठकर खाना अंतिम बार कब खाया था किसी को याद नहीं है। मकानों में होटल की तरह लोग बाहर से आते हैं और अपने कमरें में चले जाते हैं, यदि घर में बुजुर्ग हैं तो उनके पास बैठने और उनसे बात करना किसी को नहीं सूझता।
पैसा होने पर कोठिया बंगले, फ्लैट आदि बनाए जा सकते हैं किन्तु घर बनाने के लिए धन नहीं मन की जरूरत है। माना कि आज उपभोगतावाद की कुत्ता दौड़ ने आदमी को यांत्रिक मानव बना दिया है, किन्तु कुछ पल ऐसे तो निकाले ही जा सकते हैं जिसमें आदमी शान्ति से अपनों के बीच अपनों के लिए जी सके। मकान को घर में बदलने के लिए कुछ भी खर्च नहीं करना होता है। मन से अंहकारी ऐंठन और स्वार्थ की भावना से पिन्ड छुड़ाने की जरूरत है। अजनबीपन की आदत ने आज हर आदमी को तनाव, भय, अविश्वास, अधैर्य, लालच की पठौनी दे कर कुंठित कर रखा है। हमारे पुरखे मकान नहीं घर बनाते थे। उनकी धारणा थी कि घर में पांच तत्व का होना जरूरी है। वह आरोग्यवर्धक हो, समृद्धिवर्धक हो, सस्ता हो, पर्यावरण से तालमेल वाला और सामाजिक हो तथा शांति प्रदाता हो। आजकल के मकान भूखे हैं। समृद्धिवर्धक नहीं है, उनकी भूख मिटाने के लिए अतिरिक्त सामान की आवश्यकता बराबर पड़ती रहती है। वे सामाजिक भी नहीं होते। अनजान तो क्या जान-पहचान के व्यक्ति का भी मकान स्वागत करता प्रतीत नहीं होता, झिझक सी बनी रहती है। पर्यावरण से भी तालमेल नगण्य प्राय: है।
मकान जिन्दगी गुजारने की शरणस्थली होते हैं। इस बात से मकान पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि कुछ लोग मकानों में सारी उम्र अशान्त, तनाव, कुंठा, अलगाव, क्रोध, धमंड, अहंकार और भय को बदंरिया के मरे बच्चे की तरह अपनी छाती में चिपकाए हुए गुजार देते हैं। हर मनुष्य के मन में बस एक ही ललक होती है कि किसी तरह उसका भी एक घर हो जाए। वैसे हर आदमी की इच्छा होती है कि उसका मकान, घर की तरह हो। लेकिन घर बनाने के लिए जो बुनियादी चीज परम जरूरी है उस पर कभी कोई ध्यान ही नहीं देता है। लोग सारी जिन्दगी भौतिक और विलासता की महंगी से महंगी चीजें मकान में एकत्र करते रहते हैं सुख सुविधा का ढेर लगा देते हैं, किन्तु घर नहीं बना पाते। घर को लेकर हर कोई सपनें देखता है। सन्यासी, साधु, बाबा, महात्मा भी घर बनाने और उसे सजाने में जुटे हैं। यह अलग बात है कि अपने इन मकानों को आश्रम, मठ, अखाड़ा और मंदिर का नाम देकर गृहस्थ से खुद को अलग दिखा कर दिखावा कर रहे हैं। अब वह समय नहीं रहा जब सन्यासी-बाबा खुले आसमान या पेड़ के नीचे रहते थे और महाराजा जनक दशरथ से लेकर सिकन्दर-अशोक जैसे प्रबल प्रतापी सम्राट मिलने के लिए हाथ बांधे वहां खड़े होते थे। जंगलों में पहाड़ों की गुफा में रहने के भी दिन बीत गए। वह नगर और महानगर आबाद करता है। भीमकाय और गगनचुम्बी पक्के, मजबूत मकान बना कर रहने लगा है। कंक्रीट की उगाई मीनारों में माचिस की डिब्बी जैसे फ्लैट नाम की आधुनिक गुफाओं में धरती और आकाश के बीच टंगा हुआ "स्वीट होम" का कीर्तन कर रहा है।
आज लोगों के अपने घरों में बेहद कीमती पत्थर, टाइल्स, विदेशी सेनेटरी सामग्री लाखों का फर्नीचर सपनों वाला शयनकक्ष और किचन हैं। टॉयलेट और बाथरूम देख कर हमारे जैसे चिरकुटों को तो लगने लगता है कि यहीं पसर कर सो जाए। ऐसे मकानों में जा कर मैं सोचने लगता हूं कि क्यों इतना रुपया खुद अपने लिए जेल का निर्माण कराने के लिए खर्च किया है? खिड़की, रौशनदान, बालकनी, बरामदें होते हैं, किन्तु सभी में लोहे की मोटी छड़ों का ऐसा जाल लगा होता है कि चिड़ियों का भी प्रवेश असम्भव है। पूरी दुनिया से कट कर हम अपनी ही बनाई गुफा में समा जाते हैं। पहले के ऋषि-मुनि पूरे जगत से कट कर ध्यान "समाधि" लगाते थे आज हम काल्पनिक भय के मारे बन्दी बन कर जी रहे हैं। इन घरों में से खुला आसमान भी नहीं दिखता है, क्योंकि एसी ने उसे भी छीन लिया है।
आधुनिकता की चूहा दौड़ में आंगन और बरामदें वाले घरों का समय हमने विदा कर दिया है। स्वाभाविक खुलापन उपलब्ध नहीं है। लोग मुहल्ला छोड़कर कालोनियों में रहने लगे हैं। मुहल्लेदारी हमारी सामाजिकता की पहली सीढ़ी थी। अब फ़्लैट ने सब काट दिया है। हर फ्लैट का द्वार हमेशा बन्द रहता है। किसी का किसी से कोई संवाद नहीं है। बाहर से काम करके आइए और अपने फ्लैट में समा जाइए। अगल-बगल और आमने-सामने रह कर भी लोग वर्षो अबोले रहे आते हैं। संवाद की स्थिति कभी नहीं बनती। सामाजिकता के लिए कोई जगह नहीं बचती। हालांकि नएपन या अजनबीपन को विर्सजित करने का पहला चरण है संवाद। आज के मकानों में भौतिक सुखसुविधा तो भरपूर है किन्तु सामाजिकता के लिए कोई जगह नहीं है। सरोकार से कट जाना ही नियति बन गई है। इन आधुनिक मकानों में आपसी प्रेम, आपसी सहकार, स्नेह, आदर के लिए कोई जगह ही नहीं बची है। एक छत के नीचे कई लोग रहते हैं किन्तु सभी में विचित्र प्रकार का अबोला है। किचन तो एक ही होता है, किन्तु लंच और डिनर एक साथ बैठकर खाना अंतिम बार कब खाया था किसी को याद नहीं है। मकानों में होटल की तरह लोग बाहर से आते हैं और अपने कमरें में चले जाते हैं, यदि घर में बुजुर्ग हैं तो उनके पास बैठने और उनसे बात करना किसी को नहीं सूझता।
पैसा होने पर कोठिया बंगले, फ्लैट आदि बनाए जा सकते हैं किन्तु घर बनाने के लिए धन नहीं मन की जरूरत है। माना कि आज उपभोगतावाद की कुत्ता दौड़ ने आदमी को यांत्रिक मानव बना दिया है, किन्तु कुछ पल ऐसे तो निकाले ही जा सकते हैं जिसमें आदमी शान्ति से अपनों के बीच अपनों के लिए जी सके। मकान को घर में बदलने के लिए कुछ भी खर्च नहीं करना होता है। मन से अंहकारी ऐंठन और स्वार्थ की भावना से पिन्ड छुड़ाने की जरूरत है। अजनबीपन की आदत ने आज हर आदमी को तनाव, भय, अविश्वास, अधैर्य, लालच की पठौनी दे कर कुंठित कर रखा है। हमारे पुरखे मकान नहीं घर बनाते थे। उनकी धारणा थी कि घर में पांच तत्व का होना जरूरी है। वह आरोग्यवर्धक हो, समृद्धिवर्धक हो, सस्ता हो, पर्यावरण से तालमेल वाला और सामाजिक हो तथा शांति प्रदाता हो। आजकल के मकान भूखे हैं। समृद्धिवर्धक नहीं है, उनकी भूख मिटाने के लिए अतिरिक्त सामान की आवश्यकता बराबर पड़ती रहती है। वे सामाजिक भी नहीं होते। अनजान तो क्या जान-पहचान के व्यक्ति का भी मकान स्वागत करता प्रतीत नहीं होता, झिझक सी बनी रहती है। पर्यावरण से भी तालमेल नगण्य प्राय: है।
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