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Wednesday, February 1, 2012

मकानों में तब्दील होते घर


  चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र  
शहरों में घर नहीं, मकान होते हैं, और गांवों में मकान नहीं घर होते हैं वैसे शहरों और गांवों में जुगलबंदी चल रही है गांवों में भी मकान बन गए हैं परंतु शहरों में घरों की संख्या अल्प है। घर की संस्कृति होती है, मकान की कोई संस्कृति नहीं है। शहर के मकान में रहने वाले आदमी से लोग पूछते हैं कि आपके मकान में कितने लोग रहते हैं? क्या कोई कमरा खाली है? गांव वाले से पूछते हैं आपके घर में कौन कौन है? मकान को प्रकारान्तर में ‘धर्मशाला’ की व्यावसायिक परम्परा का नाम दिया जा सकता है। जिसमें ‘धर्म’ केवल शब्द मात्र है और ‘शाला’ गोशाला -पाठशाला के बरक्स है। जिसमें आते-जाते लोग रुकते हैं और चले जाते हैं।  कोई मोह ममता उस मकान से नहीं पालते, यह अलग बात है कुत्ता भी जहां बैठता है पूंछ से स्थान बैठने लायक बना लेता है। घर में परिवार होता है, सुखो-दुखों का साझा होता है, सबको सबकी चिन्ता होती है। अकेला कोई नहीं रोता, अकेले कोई सुख भी नहीं भोगता। मकान में पत्थर हैं, कंक्रीट हैं, जो पानी के छींटों को सोख लेता है। गांव के घर मिट्टी के होते हैं, मिट्टी पानी का  संस्पर्श पाकर गीली बने रहने का सुख पालती है, इत्मीनान से सुखाती है, संवेदना का स्पर्श उसे तर रखता है। मकानों में अक्सर और अधिसंख्य लोग अकेले रहते हैं। परिवार का दायरा गांव की तुलना में सिमटकर पति-पत्नी तक ही रह जाता है। अपने स्वार्थों की पूर्ति तक ही संबंध होते हैं। मकानों के कई तल्ले होते हैं, घरों के तल्ले नहीं होते। मकान में कमरे और घर में कोठरी और ओसारी होती है।
         मकान में ‘मुंडेर’ नहीं होती, घरों में मुंड़हर होता है। बहुत कम मकानों में आंगन होता है। घरों में अनिवार्यता के साथ आंगन रहता है। आंगन में लीपना,बुहारना, मांड़ना, उसका श्रृंगार करना है। पवित्रता और शुद्धता भाव सहजात रूप से आंगन में उतर आता है। ‘मुंड़हरे’ पर कौआ जब सुबह सुबह बोलकर उड़ जाता है, घर मेहमान आने की खुशी में मगन होता है। कौआ सर्वभक्षी है, उसे शुभ नहीं माना जाता परंतु आगमन की सूचना पर लोग उसके चोंच को सोने से मढ़ाने की कल्पना का आशीष देता है। प्रिय, सहचर और मितकंठ भी नहीं है। फिर भी लोक और कविता में उसका नकार नहीं है। जायसी की नागमती कौअ‍े और सिंहलादीप में बसे प्रियतम रतन सेन के पास संदेश भेजती है कहती है कि कहना हम जन्म से काले नहीं थे, तुम्हारी विरह में जल मरी हैं, उसके धुंए से हम काले हुए हैं। घर में मनुष के साथ पशु होते हैं, पक्षी होते हैं, कुत्ते होते हैं, बिल्ली होती हैं,पिंजरे और घोसले होते हैं, सबका हिस्सा होता है, खाने पीने में बराबर के भागीदार।  घर घरनी से होता है। मकान किससे होता है, पता नहीं। संगीत में घराने होते हैं, घरानों की अपनी बंदिश लय और संस्कृति होती है, घर, घरौंदे और कुश की याद दिलाते हैं। घर-गृहस्थी का युग्म होता है, मकान का कोई युग्म नहीं, नितांत अकेला। घर बसाए जाते हंै, मकान नहीं। मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूं कि देश के पचहत्तर प्रतिशत लोग गांव में रहते हैं।  घरों में रहते हैं, आजादी के चौंसठ साल बाद भी अभी करोड़ों लोग ऐसे हैं, जो घर विहीन हैं, जिनके सिर पर छत नहीं है, सिर पर पॉलिथिन की पन्नियां हैं, सड़क के किनारे आशियाना है। घुमन्तु जातियां हैं, जिनका कोई ठिकाना नहीं वे भी मादरे हिन्द की संतान हैं।
      ‘है अपना हिन्दुस्तान कहां? वह बसा हमारे गांवों में’ कवि की यह उक्ति शर्म के साथ देश की सरकार भी स्वीकार ली है। कितना बड़ा विरोधाभास है कि कवि प्रधान भारत में कृषकों की आत्महत्या का ग्राफ विश्व में सर्वाधिक है। 2004 में देश में नौ खरब पति थे। मनमोहनी सरकार के चार वर्ष में छप्पन और अब यह स्ांख्या सौ के आसपास होगी। ये खरबपति घोषित हैं, अघोषित खरबपतियों की संख्या हजारों और लाखों में हैं। एक-एक घोटालों से छनकर आ रही रपटें क्या कहती हैं। नेताओं और अधिकारियों की एक दूसरे से गठजोड़ और सरपरस्ती क्या-क्या गुल खिला रही है, सारा देश देख रहा है, सन् 2000 में सकल घरेलू उत्पाद में खरबपतियों की हिस्सेदारी दो फीसदी थी, अब 22 फीसदी है। पैंसठ फीसदी आबादी खेती पर निर्भर है। जिसका सकल घरेलू उत्पाद घटकर सत्रह फीसदी रह गया है। देश के सबसे बड़े अमीर और गरीब के बीच नब्बे लाख गुना का अन्तर है। यह अनुपात उस कृषि प्रधान देश का है, जिसके चौरासी करोड़ लोग बीस रुपये रोज पर गुजारा करते हैं, फिर भी हम लोकतांत्रिक समाजवादी देश कहने में अघाते नहीं हैं।
    ये शहरी आंकड़े हैं, आंकड़े डराते हैं। आपकी औकात को आईना दिखाते हैं। गांव आंकड़े नहीं जानता। उसकी घट बढ़ प्रकृति पर निर्भर है। गांव की पगडंडी और मेड़ पर चलते हुए किसान गत और आगत फसलों की तुलना करता है। कोई टुच्चई की बातें नहीं बतियाता। गांव की मेंढ़ली में बैठी देवीदाई से मनौती करता है- मां अच्छी फसल देना,  बिटिया का बिआह करना है। तुमको रोट-लेवाला चढ़ाऊंगा। मां सबकी है, गरीब-अमीर किसी मंदिर में कैद नहीं है। रामनवमीं के मेले में चुनरी चढ़ाने का वायदा तोड़ता नहीं। कुछ पैसे कमाने शहरों में जाता है। ऋतुएं बुलाती हैं, फसलें पुकारती हैं, बचे खुचे माल-मवेशी,   पशु-पक्षी, पेड़-पौधे याद आते हैं इसलिए कि आंगन में नाड़ा खेड़ली गड़ी है। परदेश में कुुंडलिनी जागरण की स्मृति खींच लाती है। शहरों के अस्पताल में पैदा होने वाले नाभिनाल की क्या गति होती है, सब जानते हैं, इसीलिए विदेश गए शहरी युवकों को  नाभिनाल नहीं खींचती अपने देश की ओर, क्योंकि वह किसी नाले या गटर में बहा दी गई है। शहरी, ग्रामीण के अलावा भी एक नहीं आदिवासियों के अनेक ऐसे गांव हैं, जिन्हें ओपरा विन्फ्रे से बचाना होगा, जाने वे कौन सा आइना हमको दिखा दें। चन्द्रकान्त देवताले की कांटी गांव के लोग कविता ऐसा ही कुछ कहती है- अलबत्ता आ जाए दीदी महाश्वेता। बैठ जाए जीमने/ और तोड़ टुकड़ा घास की रोटी का/ पूंछ ले काए से खांऊ इसे/ और कह दे अकस्मात बुढ़िया कोई/ आंसू टपकाकर भूख मिलाकर/ खा ले माई/ तो क्या यह दुबारा/ धरती फट जाने जैसा नहीं होगा।
                                                         - लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।
                                                            सम्पर्क - 09407041430.

Wednesday, January 18, 2012

वो पगडंडी ‘अदम’ के गांव जाती है

शहरों में रहते हुए क्या आपने अपने ऊपर फैले विस्तृत-मुक्त नीले आकाश को कभी देखा है। तारों भरी आकाश गंगा जिसे हम ‘हथडगर’(हाथियों का रास्ता) के रूप में जानते हैं, सामानान्तर दूरी बनाए पूर्व की तरफ से चढ़ते हुए सितारों को जिन्हें देखकर गांव के लोग समय का अनुमान लगाते हैं और जिन्हें हिन्नी मिर्गी (हिरणी मृगी) के रूप में पहचानते हैं, शुकवा (शुक्र) विहफइया(वृहस्पति) सात तारे (सप्तर्षि) मंगल, जो आकाश में रहकर हम पर नियंत्रण रखते हैं और हमारे शुभ कार्यों में साक्षी होते हैं, पंचक के दिशाशूल और उसमें मृत्यु पर बाधा मुक्त होने की प्रक्रियाओं इत्यादि से यदि आप परिचित नहीं हैं तो भले ही वैश्वक ज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान के बारे में पूर्ण जानकार हों, भारत के ग्रामीण आकाशीय ज्ञान से अल्पज्ञ हैं।
     शहर की ऊंची और भव्य इमारतें आकाश देखने में बाधा उत्पन्न करती हैं। नदी नाले, शहर के पास बहने का अभिशाप भोग रहे हैं। गो कि संसार भर की सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है, लेकिन जितनी प्रदूषित हमारी सप्त और इतर नदियां हुई हें उतनी ह्वांगहो, नील ओर डेन्यूब नहीं हुई। इतना धुंध युक्त आकाश हमारे ऊपर चिमनियों ने तान दिया है कि ताजमहल के शारदीय पूनम (मूनलाइट) के सौंदर्य का आनंद रघुवीर सिंह के ‘ताज’ को पढ़कर ही लिया जा सकता है, मकबरे के सामने बैठ या लेटकर नहीं। कवियों ने एकांत को कभी दुख नहीं माना, चिंतन और दर्शन उन्हीं क्षणों की देन है- ‘कोई जब साथ न दे, खुद से प्रीति जोड़ ले। बिछौना धरती को करके अरे आकाश ओढ़ ले।’ नदियां किसी से मोह बढ़ाने के लिए रुकती नहीं निरंतर चलती हुई कल-कल का अविराम दर्शन देती हैं, जिसे हमारे मनीषियों ने समझकर उन्हें मां कहकर पूजा, आदि शंकराचार्य जैसे अद्वैतवादी ने भी ‘गंगा’ और ‘नर्मदाष्टक’ लिखे।
 प्रकृति के खुलेपन का अहसास शहरों के किसी कोने में पार्क में किया जा सकता है, लेकिन शाम को बिजली के नियान बल्बों से छनकर चांद देखने का आनंद नहीं लिया जा सकता। शहरों में रहने-पढ़ने वालों के सामान्य ज्ञान में तिथियां नहीं होतीं, अमावस और पूनम नहीं होते, यहां तक कि ऋतुएं भी गर्मी, वर्षा और सर्दी में तब्दील हो गई हैं। शरद, शिशिर, हेमंत और वसंत कविताआें में बसे हैं। शहरों से गांव की समस्याओं का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। ‘भारत भाग्य विधाता’ दो दिन गांव में रुककर कहने लगे हैं कि गांव में रुको, देखो और गांव को बदल दो।’ गांव से यदि ग्राम्यत्व छिन गया तो फिर क्या बचेगा? गांव के बदलने का आशय कुछ समझ में नहीं आता। गांव में अभी भी शहरों की अपेक्षा करुणा, प्रेम, अहिंसा और संवेदना है। उसे बदलकर शहर न बनाएं, बना सकें तो ‘रालेगण सिद्धि’ जैसा गांव बनाएं। गांव से लगे जंगल बचाएं, नदी, तालाब, पोखर बचाएं। पक्षी के घोंसले बचाएं, पशु बचाएं ,गांव से खत्म होते कुटीर उद्योग बचाएं। चुनावों की चाशनी में जाति, वर्ग और वर्ण का जहर न परोसे। गुणवत्ता और योग्यता का कुछ प्रतिशत तय करें। बुनियादी जरूरतें पूरी करते हुए गांव को गांव रहने दें। खेतों को शल्य-श्यामला रहने दें, कंक्रीट की फैक्टरी खड़ी करके धन्ना सेठों से ग्रामीणों का पुश्तैनी जमीनी मोह न छीनें।
   पिछले दिनों गांव गया था। एक रात एकाएक बादल जाने कहां से आए, शायद सुदूर पड्डुचेरी के तूफान का प्रभाव था। दूर-दूर तक बारिश हुई। किसानों के चेहरे खिल उठे। गांवों में लोकोक्ति है, ‘पानी बरसैं आधा पूस/आधा गेहूं आधा भूस’/ अरहर-सरसों के फूलों ने बसंत आगमन की सूचना दे दी। सबेरे नहर के किनारे-किनारे दूर तक घूम आया। जाड़े की गुनगुनी धूप का आनंद लेने बाहर बैठ गया। आम के पेड़ से उतरकर गिलहरियों का जोड़ा धूप का आनंद लेता हुआ खलिहान में विखरे कोने-अंतरे धान के छिलके उतारकर पास से गुजरता हुआ दो पैरों पर खड़ा होकर हमें निहारता अपनी सफलता पर गुनगुना रहा था। राम के सेतुबंध के इस सहयोगी पर रश्क किए बिना नहीं रहा जाता। गौरैया, गलरी, पोड़की, परेवा अपने जोड़ों के साथ धूप का आनंद लेते दाने भी तलाश रहे थे। जाड़े की धूप का नशा जीवन के अनेक जीवन्त नशों से कमतर नहीं होता। धूप सेंकते हुए पक्षियों की हरकत, पशुओं की जुगाली देखने का सुख शहर में कहां। शहर में भौतिक सुख हो सकते हैं, लेकिन उन्मुक्त प्रकृति, आकाश, एक गांव से लगे दूसरे गांव तक की चहल-पहल और स्निग्ध मुक्त हवा का आनंद भाव तो सिर्फ गांव में है, उन्हें बचाना होगा। गांव का दूध-दातून शहर चला गया, वह अब गांवों में कम मिलता है। लेकिन हवा-पानी बचा है, करुणा, अहिंसा कुछ शेष है- ‘साधु रेंगा भुइया-भुइंया, चिहुंटी बचाइकै।’ किसी के दुख-सुख में शामिल होने का भाव रस्मी तौर पर नहीं, दायित्व के रूप में अभी भी बचा है। बड़े-छोटे का लिहाज है, रिश्तों की गरमी है, काका-काकी, बाबा-दाई, दिद्दा-बूटू, फूफा-फु फू , मामा-मामी, मौसा-मौसिया के रिश्ते पूरी शिद्दत से अपनी धज बनाए हुए हैं। आंख में शरम और हया अभी शेष है।
  संवेदनाशीलता मनुष का सहज गुण है, आज उस सहजात गुण से ही हम दूर होते जा रहे हैं। प्रेम और करुणा का भाव मूर्खता माना जा रहा है। समाज की एक नैतिक चेतना थी, किसी के साथ अन्याय करते-होते देख, लोग बोल उठते थे। किसी   का गिरा हुआ बटुआ उस तक पहुंच जाता था। अपरिचित के यहां भी रात भर रुका जा सकता था। अब परिचितों के यहां भी रुकने में डर लगता है। विश्वास का इतना संकट कहां से पैदा हो गया। पैसे के आगे सब रिश्ते कैसे छोटे पड़ गए? संतोष की गठरी कहां खो गई जिसके आगे सभी धन धूल के समान थे। सार्त्र नोबेल ठुकरा देते हैं, कृष्ण बलदेव वैद ज्ञानपीठ को पीठ दिखा देते हैं और राम विलास शर्मा पुरस्कार की राशि को देखे बिना साक्षरता के नाम पर दान कर देते हैं।
    विश्व में जितने भी महान व्यक्ति हुए, उनका हृदयाकाश वृहद, उन्मुक्त एवं सीमाहीन था उनकी चाहत में शहर नहीं थे, नदी के किनारे, पहाड़ की कंदराएं ही उनके आश्रय स्थल थे। उनसे शिक्षा लेने सिकन्दर भी जाता था, अकबर भी। आजादी के इतने दिनों बाद तमाम दुरभिसंधियों के बीच भी देश के गांवों का आकाश मुक्त है, सिर पर उसकी छत है, पवन मुक्त है, क्या आपने उन्हें देखा है? कुछ ऐसा ही अदम गोंडवी भी कहते हैं-
           फटे कपड़ों में तन ढांके, गुजरता हो जिधर कोई
                    समझ लेना वो पगडंडी, ‘अदम’ के गांव जाती है।
¨ चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र - लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।
                                                           सम्पर्क - 09407041430.

Thursday, January 12, 2012

कबिरा कुत्ता राम का मोतिया मेरा नाउं


 मनुष्य के आसपास रहने वाले प्राणियों में कुत्ता ही एक ऐसा जीव है, जो आदिकाल से उसके साथ रहा है। पुराकथाओं में भी उसकी भूमिका सबसे विश्वसनीय साथी की रही है। पाषाण युग में मनुष्य के शिकारी जीवन में शिकार की तलाश का वह अगिम दस्ता था। महाभारत काल में वह धर्मराज का साथ, किंबहुना धर्म का स्वरूप था। एकलव्य की एकान्त साधना का अन्वेषी कुत्ता था, जिसका भोंकना एकलव्य ने मुंह में बाण भरकर बंद कर दिया था और बाण के प्रहार के बावजूद कुत्ते के मुख से एक बूंद खून तक नहीं टपका था, हस्तलाघव का इतना संयत और अभ्यस्त प्रहार अर्जुन को भी नहीं आया। कुत्ता कसौटी बन गया। सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होते हुए भी एकलव्य को राजकुमार से पीछे ही रहना पड़ा। धर्मराज युधिष्ठिर के साथ उसने स्वर्गारोहण किया। एक तरह से कहें तो जन्म से लेकर मृत्यु तक का एकमात्र साथी। पता नहीं उस समय कुत्तों की उम्र कितनी होती थी। कुत्ता पालने की परम्परा मनुष्य की प्रारंभिक अवस्था से ही रही जो अद्यावधि कायम है। पहले कुत्ते मालिक के आगे टोह लेते हुए चलते थे, या अनुसरण करते थे। उनको अदभुत घ्राण शक्ति प्राप्त है। अब तो वे पुलिस और सेना के प्रमुख अंग हैं, उनके ओहदे भी पुलिसिया हैं। उनका रखरखाव देखभाल प्रशिक्षण चौंकाता है। पहले वे आदमी के अधीन होते थे, अब कई व्यक्ति और पद उनके अधीन होते हैं। स्वामिभक्ति की वे मिसाल हैं। आदमी जिन अपराधियों तक नहीं पहुंंच पाता, उसका पता कुत्ते आसानी से लगा लेते हैं। ‘कुत्ता’ गाली भी है। कभी कबीर को अवमूल्यित करने के लिए पंडितों ने कबीर (एक विशिष्ट गाली जो होली के दौरान भाभियों को दी जाती है) कह कर अपमानित किया था, उसी तरह बेबाकी में बाबा नागार्जुन का भी नाम लेकर अपनी भड़ास निकालने का प्रचलन है- ‘अब तो कुत्तों ने भी कुत्ते पाले हैं’ से लेकर ‘कुत्तों ने ही कुत्ते पाले हैं’ की व्यंजना बाबा के नाम है।
लोक कवियों ने भी भक्ति के प्रवाह में ‘जो हम होइत राम जी क कूकुर’ लिखा है, और उनका खाना खाते हुए, टुकुर-टुकुर देखने की अभिलाषा की है, लगभग रसखान की तरह, बिना उस ऊंचाई तक पहुंचे। कबीर ने भी ‘कबिरा कूता राम का मोतिया मेरा नाउं/गले राम के जे बड़ी जित खींचो तित जाउं/’कहां है। भक्ति के प्रकार भले ही नौ हों, लेकिन स्वामिभक्ति से बड़ी कोई भक्ति नहीं। आज के कुत्ते बड़भागी हैं, जिन सुन्दरियों के देह स्पर्श के लिए देवराज इन्द्र को अनेक रूप बदलना पड़ा था वे ही इन्द्र कुत्ते का रूप धारण कर कामिनियों के देह का स्पर्श सहज रूप से ही प्राप्त कर लेते हैं। जितना दुलार आज के कुत्तों को मिलता है, उसे देख सुनकर स्वर्ग में बैठा धर्मराज का कुत्ता भी ईर्ष्या करता होगा। अपने-अपने परवरदिगारों की स्तुति में भोंकना कुत्तों का परम धर्म है। अपनी-अपनी खोरि में सभी कुत्ते ताकतवर होते हैं। दूसरों की खोरि में घुसते ही अपनी दुम दबा और थूथन नीचे कर लेते हैं।
रामायण काल में भी एक कुत्ते के न्याय का प्रसंग है जो आज भी प्रासंगिक है। राम के राज्य में सभी को न्याय प्राप्त था। कहते हैं कि एक कुत्ता सड़क के किनारे लेटा आराम कर रहा था। जटाजूटधारी कमण्डल लिए एक साधु उधर से निकले। उन्होंने किनारे बैठे उस कुत्ते को एक डंडा मार दिया। कुत्ता चीखते-चिल्लाते राम की अदालत में पहुंचा और फरियाद की कि ‘प्रभो! बिना किसी अपराध के मुझे साधु ने मारा, मुझे न्याय चाहिए।’साधु को बुलाकर पूछा गया, साधु ने मारने का अपराध स्वीकारते हुए कुत्तों पर तीन आरोप लगाए। पहला- ये रास्ते के किनारे ही बैठते हैं, स्वाभाविक रूप से पास से गुजरने पर डर लगता है कि कहीं काट न लें। दूसरा- ये किसी पेड़ पौधे झाड़ी पर एक टांग उठाकर अक्सर पेशाब कर देते हैं। तीसरा- ये संतों, साधुओं को देखकर भूंकते हैं और पीछा करते हैं, इसलिए मैंने इसे मारा, इसमें मेरा क्या दोष? राम ने कुत्ते से साधु के आरोप की सफाई मांगी। कुत्ते ने कहा - ‘प्रभो! यह संसार है, सारे जीव-जन्तु संत-असंत सभी इस रास्तों से संचरण करते हैं। मैं किनारे लेटा एक नजर उठाकर सभी को देखता हूं, जो सज्जन लोग हैं, चुपचाप चले जाते हैं, लेकिन जो दुष्ट हैं, मुझे मारते हैं। न मैं डराता हूं, न भोंकता हूं, परंतु मुझे मार खानी पड़ती है। राम ने साधु से पूछा- ‘क्या’ यह सच है। साधु ने कहा - ‘हां! यह सच कह रहा है।’ कुत्ते ने दूसरे आरोप की सफाई दी - ‘प्रभो! मैं कुत्ता हूं, धरती मेरी मां है, मैं उसी कोख-आंचल को सीधे गंदा नहीं करता, किसी वस्तु का सहारा लेकर धीरे से टट्टी-पेशाब करता हूं। इन साधुओं की तरह जहां-तहां सीधे खड़े या बैठकर मैं मां को गंदा नहीं करता। साधु उत्तर से संतुष्ट हुए और राम भी। तीसरे आरोप पर कुत्ते ने कहा- ‘यह सच है कि मैं जटाजूट धारी, नग्न, विभिन्न बानाधारी सन्यासियों को देखकर भूंकता हूं, गांव के बाहर तक उन्हें खदेड़ता हूं। जब इन्होंने घर-परिवार छोड़ दिया, वैराग्य ले लिया फिर क्यों गृहस्थों के पास आते हैं, इसलिए गांव की सीमा तक खदेड़ता हूं कि आप तप करें, यहां लौटकर न आयें। प्रभो! अब आप ही फै सला करें, अपराधी कौन है, मैं या ये स्वनामधन्य संत महात्मा! राम और साधु ने भी कुत्ते की बात में न्याय देखा। साधु ने गलती स्वीकारी, बोले-‘प्रभो! मुझे दण्ड दें।’ राम ने कहा मुझे दण्ड देने का अधिकार   नहीं है, जिसे आपने दुख पहुंचाया है, वही कुत्ता आपको दण्ड देगा। कुत्ते ने कहा- ‘प्रभो! इन्हें किसी मठ-मंदिर का महंत बना दिया जाए।’ राम चौंके- ‘यह दण्ड है या पुरस्कार! महन्तों को तो हर तरह का सुख प्राप्त रहता है। कुत्ते ने कहा- ‘मंै भी पिछले जन्म में महंत था, इस जन्म में कुत्ता हुआ। ये सन्त भी महंत होकर जीवन का सुख भोगें और मरने के बाद मेरी ही योनि में जन्म लेकर रास्ते के किनारे बैठकर डंडे खाएं। इन्हें यही दण्ड दें।’ राम राज्य की यह न्याय व्यवस्था समस्त जीव-जन्तुओं को दण्ड देने और पाने का अदभुत दृष्टान्त है। मनुष्य के अनुषंगी साथियों में जितना कुत्तों पर लिखा गया, किसी अन्य पर नहीं। सतयुग, त्रेता, द्वापर हुए या नहीं जानता, पढ़ा अवश्य पुराणों के युगनिर्धारण में। कलयुग के इस चरण को ‘कुत्ता युग’ कहा जाए यह अधिक समीचीन होगा, क्योंकि लगभग सभी श्रेष्ठतम स्वामिभक्ति के दिखावे में लगे हैं। धरती की अन्य प्रजातियां भले ही दिन प्रतिदिन समाप्त होने की ओर अग्रसर हैं, कितनी तो लुप्त हो गई जिनका सफाया हम अक्सर करते रहते हैं। कुत्ते निरंतर संख्या और शक्ति बल में आगे बढ़ रहे हैं।
***चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र   - लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।
                                                            सम्पर्क- 094070 41430.

Wednesday, December 14, 2011

चोर-चौतरा नाचै, ...कब तक

  बचपन में एक कविता पढ़ी थी जो सर्दी के दिनों में बरबस याद आती है- ‘जाड़ा आया, जाड़ा आया/ नई कहानी किस्से लाया।’ किसकी लिखी हुई यह कविता है, स्मरण नहीं परन्तु इसके समांतर गांवों में अनेक लोक कविताएं आज भी जीवन्त हैं- ‘कातिक बाति कहातिक,अगहन हंड़िया अदहन/ पूस काना ठूस/ माघ तिलै तिल बाढ़ै/ त फागुन गोड़ी काढ़ै।’ सूरज की स्थिति का यह लोकरंग है कि कार्तिक का दिन महीना बात करते बीत जाता है, अगहन के दिन खाने की हंड़िया चढ़ाते और पूस के कान का मैल निकालते बीत जाते हैं। माघ के दिन तिल-तिल कर बढ़ते हैं और फागुन में सूरज लम्बे पग (गोड़ी गोड़-पैर) चलने लगता है। कवि सेनापति ने शिशिर का वर्णन तो अतिशयोक्ति पूर्ण ढंग से करते हुए ‘शशि को सरूप पावै सविताऊ’ से लेकर ‘चन्द के भरम होत मोद है कुमुदियों को, शशि शंक पंकजिनी फूलि न सकति है,’ लिखकर प्रकृति का व्यापार ही बदल दिया, व्यवहार भी। लोक सेनापतियों की अपेक्षा जमीन पर खड़ा है, ‘गप्पी’ और ‘लफ्फेबाज’ वह भी है लेकिन राजदरबारी नहीं, क्योंकि उसे किसी राजा से अशर्फी मिलने की न उम्मीद है, न  जानकारी में ही है। वह तो अपने में मस्त-लीन, सर्दी, ठंड की महत्ता स्वीकारते हुए कहता है- ‘लड़िकन क छुअत नहीं, सयान मोर भाई/ बूढ़न को छांड़ित नहीं, चाहे ओढ़ां कतनिउ रजाई।’ अकेले में रजाई-कम्बल ओढ़ने पर भी ठंडी नहीं जाती, गांव में कहनूति है कि ‘जाड़ि जाइ रूई’ कि ‘जाड़ि जाई दुई’। दो व्यक्तियों के साथ सोने से शरीर की गर्मी से भी ठंडी से छुटकारा पाया जा सकता है। ‘पूस की रात’ का हल्कू, जबरा कुत्ता को अपने आगोश में लेकर, उस भयानक ठंडी रात में चुनौती देता है।
 शीत-सर्दी, जाड़ा-ठंडी शब्दों के अपने अर्थ हैं। गांव और शहरों में इनका सामना करने के अपने तरीके हैं। गांव के लिए सबसे कठिन महीने पूस और माघ के होते हैं परंतु वे इसका रोना नहीं रोते, निर्भय होकर पूस-माघ की ठार को चुनौती देते हैं। ठंडी आने के पहले जड़ावर का इन्तजाम रुइही बंडी, परदनी, सूथन्ना, पायजामा सिलवा लेते हैं। लकड़ी की गांठ, करसी-कंडा-उपरी की व्यवस्था, बरसात के बाद से ही शुरु हो जाती है। प्रकृति की खुली चुनौती बिना हाय-हाय के वे स्वीकारते हैं। पाला पड़ता है, फसल चौपट हो जाती है, वे सरकार से मुआवजा नहीं मांगते। सरकार के कर्मचारी अपने लिए उनके नुकसान का ढिंढोरा पीटते हैं और सहायता राशि का अधिकतम लाभ अपना लेते हैं। असली पीड़ितों को सहायता नहीं मिलती, मिलती भी है तो ऊंट के मुंह में जीरा की तरह। भीषण से भीषण ठंडी को आग के हवाले कर देते हैं, उनका ‘कौड़ा’ नहीं बुझता, पूरे पूस-माघ सुलगता रहता है। उसी कौड़ा को घेरकर बच्चे-बड़े बुजुर्ग अनेक किस्से कहानियां कहते सुनते हैं। कहानी की पहली कार्यशाला ‘कउड़े’ ही थे। कहने से कहानी बनी। ऋचाएं भी कही गर्इं। सृजन, वाचिक परम्परा की ही देन है। गांव के जीवन में सर्दी की रातें बहुत बड़ी होती थीं। देर तक ‘कउड़े’ तापते रात बीतती थी, कपड़े पहनने-ओढ़ने के कम थे। आग ही एकमात्र सहारा थी और जागने के लिए कहानियां, जो कभी-कभी धारावाहिक हुआ करती थीं, जिसे कहने वाले की प्रतीक्षा बड़ी तन्मयता  से होती थी। उसका बहुत आदर था। हां तो कहां से कहानी कल खतम हुई थी और फिर अनंत सिलसिला... शर्त यह थी कि कहानी में हुंकारी भरना जरूरी था और दिन में कहानी नहीं कही जाती थी, यदि कोई कहेगा तो मामा रास्ता भूल जाएगा। अर्थात् कहानी दिन में कहने से काम-काज का नुकसान होगा। लोक, मामा का रिश्ता सबसे बड़ा मानता है, वह नहीं चाहेगा कि उसको देखने, हाल-समाचार लेने वाला मामा रास्ता भूल जाए। लोक में मामा, कंस और शकुनि नहीं- मां-मां है।
गरीबी धन भर से नहीं मन से भी होती है। कितने ही अमीर निहायत ललकते गरीब हैं। सर्दी की रातों को बिताने के लिए,गरीबी को मनोरंजन से जोड़ा गया था। उन्हीं दिनों, गांवों में रामलीलाएं हुआ करती थीं। आधी-आधी रात बहुत इत्मीनान से एक मोटी चादर ओढ़े हुए, बगीचे में होती रामलीला देखते हुए बीत जाती थी, परंतु इतनी एकाग्रता बड़े होने पर फिर किसी दृश्य या श्रव्य काव्य में नहीं आई।  रामायण की कथा पुस्तकों से नहीं अभिनय और सामाजिक जीवन से सीखने-जानने को मिली। क्रमबद्ध राम-कथा गांव के एक ठेठ निरक्षर को मालूम है, सैकड़ों चौपाइयां उसे याद हैं, उनका उचित और सार्थक प्रयोग अपनी बातचीत में वह करता है किंतु एम.ए. हिन्दी प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण अनेक छात्रों-अध्यापकों को शायद ही मालूम हो। रामलीलाएं भी अब अंतिम सांस ले रही है। एक सम्पूर्ण जीवन-दर्शन हाशिए पर चला गया। कहानियां हमें दिशा देती थीं, जीना सिखाती थीं। लोक नाट्य, नौटंकी, छाहुर, कोलदहंका का संगीत आज के कानफोड़ू रैम्प से लाख गुना बेहतर था। जो सहज रूप से किसी भी पारिवारिक समारोह का सहज आयोजन हुआ करता। जीवन का पाठ्यक्रम किसी पाठशाला में नहीं पढ़ाया जाता। निरंतर घटते घटनाक्रम से ही जीवन का आदर्श और उद्देश्य निश्चित होता रहा है, वही हमारी धरोहर है।
  महात्मा गांधी अमीर परिवार के थे, लेकिन उन्होंने देश के गांवों को देखा था। भारत गांवों का देश है। गांधी ने गांव से शहरों को देखा था, इसीलिए उन्होंने ग्राम-स्वराज्य की कल्पना की थी। शहरों की चकाचौंध से गांव नहीं दिखता,   शहरों में चले, कैम्ब्रिज और आॅक्सफोर्ड में पढ़े लोग जब गांवों के देश का संचालन करने लगेंगें तो फ्रांस के लुई सोलहवें की बात ही जनता से कहेंगे कि रोटी नहीं तो केक खाओ। क्योंकि वे नहीं जानते कि रोटी क्या है? ऐसा भी तो इसी देश के इतिहास में हुआ था कि यहां का राष्टÑनिर्माता चाणक्य नगर से दूर झोपड़ी में रहता था। 
    कितनी अवश्यकता है कि प्रधानमंत्री यह कहे कि उसके भेजे हुए एक रुपये जनता के पास पहुंचने तक मात्र पंद्रह पैसे रहते हैं। यह विवशता अभिनन्दनीय और ताली पीटू तो नहीं घृणास्पद और निन्दनीय भी है। यह कैसा सत्ता मोह है, जहां व्यवस्था ही लाचार हो वहां पीड़ित की क्या स्थिति होगी। गांधी, जयप्रकाश के पास ऐसी विवशता क्यों नहीं थी? इकतालीस वर्षों तक केन्द्रीय फाइलों में बंद सरकारी लोकपाल बिल की धूल इसलिए झाड़ी जा रही है कि एक गांव के आदमी ने जन लोक से हांक लगाई है। सरकार एक कदम आगे बढ़ती है, फिर दो कदम पीछे जाती है। मंशा साफ न हो तो बिल पास हो जाने के बाद भी कुछ नहीं बदलेगा। यह हमारी हताशा नहीं, यथार्थ है। यहां भ्रष्टाचार जब खत्म, हटाने समाप्त करने की कही जाती है तब इन तत्वों की बन आती है,क्योंकि लोक यह मानता है जानता है, रोज देखता है- ‘चोर-चौतरा नाचै, साहु क फांसी होय।’ झुके लेकिन खड़े हुए ग्रामीण को देखकर शायद इसीलिए दुष्यंत कुमार ने कहा था- ‘में सिनदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा।’ 
          * ** चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र - लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।  
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Friday, November 18, 2011

लोकोक्तियों में सांस्कृतिक चेतना



ज्ञान और कर्म का समाहार ही सम्पूर्ण मानव-संस्कृति है। संस्कृति पर लोक का दांय है। ग्राम-संस्कृति ही लोक संस्कृति है। जिस साहित्य और कला में लोक तत्वों की जितनी ही प्रमुखता होगी वह उतना ही शाश्वत होगा, किंबहुना कालजयी भी होगा। भक्तिकालीन कविताएं इसीलिए श्रेष्ठ हुर्इं कि उनमें लोकतत्व की प्रधानता थी। लोक कविताओं में जीने की खुशी है तो उसका दर्द भी, निर्मल हंसी है तो कठोर व्यंग भी। संस्कृति जीवन चेतना की वाहिका है। संस्कृति जीवन का सुन्दर, सुकोमल, और सौरभमय पक्ष भी है, समाज के विकास का इतिहास भी। लोक जीवन के चारों ओर बिखरे उपकरण, उसके रीति रिवाज, क्रियाकलाप, धार्मिक-आध्यात्मिक आद्यान, भाषा, गीत, मौखिक आख्यान, प्रचलित लोकोक्तियां और मुहावरे उसके विकास की कहानी कहते हैं। बघेली में लोकोक्तियों के लिए ‘उखान’ राष्टÑ का प्रचलन है। यह ‘उखान’ उपाख्यान का लोक सम्मत रूप है। गम्भीरता से देखा जाए तो लोकोक्तियां अपने गर्भ में एक आख्यान पाले रहती हैं। अर्थात लोकोक्तियां लघुकथाएं हैं, ग्राह्य नीति वाक्य है, एक सूक्ति है, परंतु उनमें सूक्ति जैसी दुर्बोधता ओर नीरसता नहीं होती। वे कालेत्तर होती हैं। उनमें जीवन की सरलता होती है और यह सरलता चिन्तन को जन्म देती है।  ये समझ के साथ विकास पाती हैं। अपनढ़ भी इसका भरपूर सार्थक प्रयोग करते हैं। यही उखान (उक्खान) के कालातीतत्व का रहस्य है, उनका प्रसार सुदूर अतीत से लेकर आसन्न वर्तमान तक है।
‘अधजल गगरी छलकत जाए’ ओछे व्यक्ति का प्रतीक न केवल भारतीय लोक जीवन में है बल्कि ‘इम्प्टी पाट मेक्स मच न्वायज’ के रूप में आंग्ल-जीवन में भी प्राप्त है। ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ समान स्वभाव वालों की जमात को उजागर करता है, आंग्ल-जीवन में ‘बर्ड्स आर सेम फीदर फ्लाक टूगेदर’ बन जाता है। ग्राम्य-अंचल में प्रचलित ‘जेकर जइसन बाप महतारी, तेकर तइसन लड़िका’, ‘लाइक फादर लाइक सन’ से कहां कम है। लोकोक्तियां अमर सांस्कृतिक चेतना तत्व है, गहरी अनुभूतियां हैं, सर्वजनीन, विश्वसनीय हैं। इनके सामने भूगोल की सीमाएं अस्तित्वहीन हैं। इनकी जड़ें मानव स्वभाव की अतल गहराइयों में होती है। बघेली मानस कहता है ‘इनकी धोती आकाश में सूखती है।’ हमारी सांस्कृतिक दांय इन लोकोक्तियों में सुरक्षित है। प्रत्येक काल और समाज में स्वार्थियों  की कमी नहीं रही है। ये किसिम-किसिम के होते हैं। पेट के स्वार्थी या पेटू भी ऐसे ही प्राणी हैं। बघेली में इन्हें ‘हउहा’ कहा जाता है। ‘हउहा’ का चरित्र बहुत ही घृणास्पद और मनोरंजक होता है। ये खा-खाकर मरेंगे, परंतु मर-मर कर भी खाएंगे, और खाने के लिए ललचते रहेंगे। इनके स्वभाव को ‘अपन पेट हाहू, मैं न देइहौं काहू’ लोकोक्ति बखूबी व्यक्त करती हैं। हरेक समाज और जाति कुछ दृढ़व्रती, संयमी और निर्भीक व्यक्तियों के त्याग और संयम के बल पर आज भी गौरवान्वित है, ‘जब कांडी म मूंड़ दीन त मूसर से कउन डेरि’ उक्खान ऐसे ही जुझारू चरित्र को उजागर करता है। लोक जीवन में छाया-धूप के रंगारंग आवर्त-विवर्त की तरह सुख-दु:ख का चक्र चलता रहता है। दु:ख और विवाद की गहराई में आशा की किरण ही धैर्य बंधाती है। इस आशा और जीवन के प्रति अदम्य विश्वास की झलक एवं जिजीविषा की ललक ‘बारह महीना बाद घूरेउ केर दिन फिरथ’ उखान में मिलती है।
   काहिलों और निकम्मों का अभाव कभी नहीं रहा। ऐसे लोग प्राप्त अवसरों का भी उपयोग करना नहीं जानते। ‘बारह बरस दिल्ली रहे, भाड़ ही झोंका किए’ ऐसे ही चरित्रों की ओर संकेत है। इस लोकोक्ति में दिल्ली की प्रतिष्ठा, ख्याति एवं कर्म के क्षेत्र में खुली स्थिति की भी ध्वनि है। उसकी दयनीयता का कहना ही क्या? उसकी कहानी ‘आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास’ लोकोक्ति की गहरी निराशा में व्यंजित होती है। कपास की खेती और उसका ओटा जाना भी ज्ञातव्य है, इतना ही नहीं यह भी ध्वनित होता है कि ‘हरि भजन’ ही जीवन का महत उद्देश्य रहा है।  कृषक संस्कृति का विज्ञापन तो अनेक लोकोक्तियां करती हैं ‘का वर्षा जब कृषि सुखानी’ या ‘अब पछिताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत’ उद्धृत पहली लोकोक्ति उपयुक्त समय पर वांछित क्रिया के सम्पन्न न होने से प्राप्त निराशा, बेबसी एवं दयनीयता का खुलासा करती है। खेती वर्षा पर आश्रित है। मेघ की अदया मार सीधे किसान के पेट पर पड़ती है। वही पीड़ा इस लोकोक्ति का मुखर स्वर है। काल किसी के लिए ठहरता नहीं। समय उसी का हुआ है, जिसने उसे आगे से पकड़ा है, अन्यथा वह द्वार पर दस्तक देकर चला गया है। और ‘हाथ मीजिबो हाथ रहयो’ वाली स्थिति ही मिली है। काल के आगे व्यक्ति का बौनापन भी उद्धृत उपर्युक्त लोकोक्ति का प्रतिपाद्य है।
  लोकोक्ति का नाम रूप कहावत भी है। पढ़े लिखे लोग अपने लेखन को लोक से जोड़ने के लिए इनका प्रयोग करते हैं, लेकिन गांव के लोग तो बात बात में सहज प्रवाह में इनका उपयोग करते हैं। कहावतें/लोकोक्तियां ग्रामीण जनता का दर्शनशास्त्र है। इनमें कही हुई बातें राई-रत्ती सच्ची तथा मानवीय होती है। इसका संचरण बोली-भाषा में किंचित हेरफर के साथ पूरे संसार में एक जैसा है। ‘बनावट’ व्यक्ति के ओछेपन की पहचान है। ओछापन लोक-जीवन में व्याप्त एक महत्वपूर्ण चरित्र है। बड़प्पन भी इसके रहते सुरक्षित है। ‘अरहर की टट्टी गुजराती ताला’ कहावत में ध्वनित अर्थ पर   विचार करें- ताले कभी गुजरात के प्रसिद्ध रहे होंगे और किवाड़ की जगह अरहर की सूखी टटिया। कितनी सार्थक व्यंग्योक्ति है। विसंगति कब और कहां नहीं रही। यह विसंगति विचार, क्रिया और व्यवहार सभी क्षेत्रों में, समाज और जातियों में न्यूनाधिक मात्रा में पाई ही जाती है। न्यायिक संदर्भों में एक विसंगति ‘चोर चौतरा नाची, साहु क फांसी होय’ तो कालजयी है। इस लोकोक्ति पर तो काल का दाग आज भी नहीं लगा। ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का मंजर तो शाश्वत सत्य है। काल की गति धूल को आसमान में चढ़ा देती है, नहीं तो बिल्ली के आगे  भला चूहों की क्या बिसात। जो चूहे ‘बिल्ली के गले में घन्टी कौन बांधे’ प्रश्न पर परेशान थे, वे ही समय आने पर ‘बूढ़ी भई बिलैया मुसबे टेमा कान’ शक्तिशाली या दम्भी को यह गांठ बांध लेने की सीख भी मिल रही है कि ‘पुरुष बली नहिं होत है, समय होत बलवान।’
  लोकोक्तियों में मुखर लोक सांस्कृतिक तत्व हमारी संस्कृति का इतिहास है। हमारे चेतना की कहानी है। इसके आरोहावरोह तंत्री या तमूरे की पदार्थिक सीमा का अतिक्रमण कर अखंड भूमण्डल और अकूत गगनमण्डल को यावद्वयव आच्छादित किये हुए हैं, लोक होनहार बिरबा हैं, संस्कृति लोक पर फूल ओर फल रही है, यही आश्वस्ति-भाव है।
                                              - लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।
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Saturday, November 5, 2011

..कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मनुष्य की तरह शब्दों के भी उत्कर्ष और अपकर्ष होते हैं। धर्म, सत्य, सदाचार जैसे शब्द अपने साथ अनेक मिथकों एवं इतिहास कथाओं के साथ अर्थ को व्यापक बनाते थे, और वे ही मानक बन जाते थे। यद्यपि तब भी इनकी अर्थवत्ता पर प्रश्नचिन्ह थे? परंतु आज तो वे सर्वथा निरर्थक हो चुके हैं। विजयदशमी की वार्षिकी कितने दिनों से चल रही है? इसकी सार्थकता और ऐतिहासिकता पर प्रश्न खड़ा करना अविवेकी और नास्तिकता की श्रेणी में आता है। अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य, अनाचार पर सदाचार और बुराई पर अच्छाई की विजय का कर्मकाण्ड हर वर्ष होता है। बुराई के प्रतीक रावण, मेघनाद, कुम्भकर्ण के पुतले देश के बड़े नेताओं की उपस्थिति में जलाये जाते हैं। शायद ही किसी नेता ने इन प्रतीकों के संदर्भों को ईमानदारी और तटस्थ भाव से पढ़ा और महसूस किया हो। वाल्मीकि ने अपने आदिकाव्य में रावण और मेघनाद को महात्मा शब्द से भी सम्बोधित किया है। सूर्पणखा का नाक-कान काटना और बालि को छिपकर मारना, सीता की अग्नि परीक्षा-निष्कासन, शम्बूक-वध किस धर्म एवं सदाचार के मानक हैं।  रावण और उसका परिवार हर वर्ष मरता है अर्थात् हर वर्ष जन्मता भी है, परंतु राम हर वर्ष उसको मारने की प्रतीक्षा करते हैं। हर वर्ष जन्मने वाला परिवार निश्चित रूप से रावण का नहीं है, तो वह रामाश्रयी है। उत्तर भारत में जिसे जलाया जाता है वह एक नाटक परम्परा है जिसे जीवन से जोड़कर वर्षों से दिखाया जा रहा है। धर्म, सत्य, सदाचार, अच्छाई शब्द ताकतवर लोगों का वाग्विलास है। दबाव बनाने वाले अंतर्कथाओं से सम्पन्न इन शब्दों का अपकर्ष निरंतर हो रहा है। कभी कहा जाता है जहां धर्म है वहीं विजय है, कभी यह भी कहा गया जहां मैं हूं वहीं धर्म है। उत्तर भारत की जनता के मानस से रावण-दहन कब निकलेगा कौन जाने? जबकि उनके अन्दर का रावण अद्यावधि जीवित है।
 भारतीय पुरा काव्य और साहित्य में भी लेखकीय ईमानदारी नहीं दिखती। व्यास जैसे रचनाकार भी यत्र-तत्र पाण्डवों के पक्ष में खड़े दिखते हैं। सच तो यह है कि हमने पुराने इतिहास को भी अपौरुषेय मान कर उन्हें पूजनीय बना दिया। उसके निहितार्थ को जीवन में उतारने से गुरेज किया। कृष्ण-सुदामा की मित्रता को मित्रता का मानक मान लिया। मित्रता तो तब धन्य होती जब कृष्ण अपने मित्र का समाचार लेने उनके आश्रम गए होते, हमने उन्हें (कृष्ण) भगवान मानकर भक्त (सुदामा) की परीक्षा लेने तक केन्द्रित कर दिया। मित्रता को हाशिए पर रखा? और कर्ण-दुर्योधन की मित्रता को उस स्तर तक रेखांकित नहीं किया गया। माना कि दुर्योधन का कर्ण की मित्रता में स्वार्थ था, लेकिन कर्ण नि:स्वार्थ निरुद्देश्य मित्रता पर बलिदान हो गया। वह सिर्फ इसलिए जीता रहा कि मित्र दुर्योधन पर बाण चले तो वह अपने सीने पर झेले, न उसे राज्य से मतलब था न जीत-हार से। अनैतिकता की भी नैतिकता होती है।  निहत्थे कर्ण पर अर्जुन का प्रहार भी क्या नैतिक था? धर्म था? कर्ण, भीष्म यह जानते हुए भी कि अनैतिकता के पक्ष में खड़े हैं, नैतिक दिखते हैं। जिसके साथ हैं, जिन वचनों को अनजाने ही स्वीकार कर लिया उसके लिए ताउम्र लड़ते रहे। यही स्थिति द्रोणाचार्य और कृपाचार्य की भी थी। व्यास को सुगंध की तरह अपने काव्य में प्रच्छन्न रहना था, नहीं रह सके। झूठ पर झूठ बोलते युधिष्ठिर अंत तक धर्मराज ही बने रहे। कृष्ण पर अडिग आस्था रखने वाले अर्जुन भी जब कभी संशय के शिकार हुए, उनकी सहायता की। कृष्ण के मूल्य तो निस्पृह और स्थित प्रज्ञता के हैं, लेकिन अर्जुन को पारिवारिक और संसारी ही बने रहने देना चाहते हैं।  वहीं वेद व्यास (द्वैपायन) कृष्ण के साथ प्रभास क्षेत्र तक जाते हैं। कृष्ण हर क्षेत्र में जीवन की पूर्णता की बात करते हैं।
आचार्य चाणक्य अपने उददेश्य की पूर्ति के लिए लोक में कौटिल्य कहलाए।  यह नाम नहीं था यह उनके स्वभाव का गुुण-धर्म है। चाणक्य ने अपने लिए क्या किया? सम्राट बनाने के बाद भी चन्द्रगुप्त के राज्य को निष्कंटक बनाने की बात ही आजीवन सोचते रहे। कृष्ण के जीवन को आदर्श मानते चाणक्य राष्टÑ चिंतन में ही लगे रहे। क्या वे चाहते तो सम्राट हो सकते थे? क्या कृष्ण द्वारकाधीश थे?  क्या राम के जीवन का उत्तरकाण्ड रोका जा सकता था। सीता का पाताल प्रवेश , राम की सरयू समाधि रोकी जा सकती थी? नहीं, यह नियति-कवि के लेखनी की स्याही थी, जो आज भी प्रवहमान है, इतिहास और वर्तमान में भी। चाणक्य शहर के बाहर एक झोपड़ी में रहते थे। तत्कालीन देश के निर्माता थे। चीनी यात्री फाह्यान को आश्चर्य हुआ। उसने चाणक्य से प्रश्न किया कि इतने बड़े देश का प्रधानमंत्री नगर के महल में न रहकर झोपड़ी में क्यों रह रहा है। चाणक्य ने कहा जिस देश का प्रधानमंत्री साधाण कुटिया में रहता है, वहां के निवासी भव्य महलों में निवास किया करते हैं। और जिस देश का प्रधानमंत्री ऊंचे महलों में रहता हो, वहां की आम जनता तो झोपड़ियों में ही रहेगी?  परम्पराएं जब रूढ़ हो जाती हैं, तब प्रथा बनकर कुरीति बन जाती हैं। परम्पराओं में संवर्धन, परिवर्तन और संशोधन होते रहना ही जीवित-जाति का प्रमाण है।
 अनेक अर्थों में बापू बहुत रूढ़ थे, वे बहुत हठी थे, सीमाहीन, परंतु वे भी कभी-कभी नरम हो जाते थे। शराब पीने के वे सख्त खिलाफ थे। पंडित मोतीलाल नेहरू इतिहास में ऐसे अकेले नेता थे जो बेटे के प्रभाव से   राजनीति में आए और ऐतिहासिक लाहौर के कांग्रेस अधिवेशन के गवाह बने थे। मोतीलाल नेहरू ने बापू से कहा  ‘बापू! मैं शराब छोड़ नहीं पा रहा हंू’ तो बापू बोले- ‘कोई बात नहीं, लेकिन मेरे आश्रम में मत आना।’ आज की स्थिति में कोई ऐसा चरित्र कहीं, किसी का दिखता है। बापू ने देखा कि डॉ. राममनोहर लोहिया सिगरेट पीते हैं। उन्होंने  लोहिया को पास बुलाया - बोले - ‘जरा हिसाब लगाना कि तुम दिन भर में जितने पैसों की सिगरेट पी जाते हो, क्या हिन्दुस्तान का आम आदमी उतने पैसे कमा पाता है।’ समूह और समाज की भी अपनी सोच होती है जो ज्यादा बुद्धिवादी नहीं होता लेकिन वह भी गलत और सही की विवेचना अपनी समझ के अनुसार करता है। इतने दिनों में देखता-परखता वह भी मानने लगा है कि ऐसे प्रतीकार्थों की परम्परा बंद होनी चाहिए। या फिर पुतले जलाने की प्रथा पर जनसंसद बैठनी चाहिए। दुष्यंत ने ठीक कहा था- ‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।’
                                                           

दश (दस) हरा या दसराहा?

शक्ति परम्परा में दुर्गा पूजा के ये नौ दिन ‘शारदीय नवरात्र’ के रूप में माने जाते हैं। आदिकाव्य रामायण, जो रामकथा का अधिकारिक रुप है (जिसे लेकर भारत की सभी भाषाओं में रामकाव्य लिखे गए) में रावण के मरने की तिथि का कहीं उल्लेख नहीं है, लेकिन दशहरा (दस सिर के खत्म होने की तिथि) निश्चित है। शाक्त परम्परा पूर्वोत्तर भारत की देन है। आर्य परम्परा में शक्ति के यज्ञ हवन-पूजन की चर्चा नहीं है। जबकि बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में मात्र शक्ति की ही न सिर्फ पूजा होती है वरन् यह राज्य सरकारों का भी उत्सव होता है। दुर्गा नवमी के ये दिन आराधना-हवन और साधना (तंत्र) मंत्र के हैं। काली (बंगाल) कामाख्या (आसाम) दन्तेश्वरी (बस्तर) चामुण्डा (मैसूर) और देश के अन्य हिस्सों में भी मां दुर्गा की पूजा के ये दिन, रज-सत-तम तीनों भाव से पूरी श्रद्धा और दृढ़ता के साथ मनाये जाते हैं। दशहरा के दिन रावण के मरने का उल्लेख, हिन्दी क्षेत्र में सबसे अधिक लोकप्रिय रामचरित मानस में भी नहीं है। जो कथा, काव्य और पुराणों में नहीं है, उसे लोक ने सूमची ताकत से देश भर में व्यापक बना दिया है। हां लोक में दशहरा नहीं ‘दसराहा’ है। इस तिथि के बाद दसों रास्ते खुल जाते हैं। जो शुभ कार्य चतुर्मास में वर्षा के कारण बन्द थे, उनकी शुरुआत हो जाती है। तुलसी के राम ने भी चतुर्मास ऋदय मूक पर्वत पर बिताया था तत्पश्चात वानरों, भालुओं द्वारा सीता की खोज का श्री गणेश हुआ था। नदी-नालों का पानी कम होने लगता है। आकाश निरभ्र हो जाता है। खुशनुमा (न गर्मी, न सर्दी) मौसम, प्राचीन काल में राजे-महाराजे इस दिन शस्त्रपूजा किया करते थे और युद्ध करने के के लिए (सीमा-विस्तार)  निकला करते थे। निष्कर्षत: दशहरा की प्रामाणिकता की अपेक्षा ‘दसराहा’ लोक जीवन में अधिक साम्य रखता है किसी अधिक सजे-धजे व्यक्ति को देखकर यह लोकोक्ति यहां के जनजीवन में आम है- ‘दसराहा’ के हाथी कस सजे हैं। राजा हाथी पर सवार होते थे, हाथी को खूब सजाया जाता था। जनता को दर्शन देने के लिए राजे निकलते थे। शक्ति की आराधना परम्परा काव्य और पुराणों में वर्णित राक्षसों में भी हैं।
    लंकाकाण्ड में जब मेघनाद को जाम्ववान पैर पकड़कर फेंकते हैं, तो वे देवी के मंदिर में जाकर हवन-पूजन करने लगता है। विभीषण कहते हैं यदि मेघनाद अनुष्ठान पूरा कर लेगा तो अजेय हो जाएगा अत: उसके यज्ञ का विध्वंश आवश्यक है। राम के आदेश से सभी वानर-भालू जाकर यज्ञ में बाधा डालते हैं। मेघनाद यज्ञ पूरा नहीं कर पाता। गोस्वामी तुलसी भी यज्ञ और देवी की सार्थकता स्वीकार करते हैं। रावण शिव का उपासक था। राम ने रावण के आराध्य शिव की समुद्र तट पर स्थापना की और ‘शिव समान प्रिय मोहि न दूजा’ भी कहा, यह कथन एक वैष्णव की शिव महिमा की स्वीकारोक्ति थी। राम कथा में शिव की स्थापना के साथ शिव-शक्ति अनायास जुड़ जाती है। बिना शक्ति के शिव अग्राह्य हैं। प्रकारान्तर में शक्ति की आराधना राम से सम्पन्न कराके शाक्तों  ने शक्ति को भी रामकथा से जोड़ दिया। ‘निराला’ की ‘रामशक्ति पूजा’ हिन्दी साहित्य में दशहरा के प्रमाणीकरण का एकमात्र आधार है। अश्विन कृष्ण की अमावस का वह दिन था। राम-रावण के युद्ध का दिन। राम ने अपने सारे दिव्यास्त्रों के प्रयोग उस दिन किया अन्य दिनों वे दिव्यास्त्र कार्य पूर्ण कर वापस राम के पास आ जाते थे। उस दिन एक भी बाण वापस नहीं लौटे। राम हताश-निराश थके, शाम को युद्ध से लौटे। ‘रवि हुआ अस्त ज्योति के पत्र पर लिखा अमर। रह गया राम-रावण का अपराजेय समर।’ उन्होंने ध्यानाव्यस्थित होकर देखा-देखा है महाशक्ति रावण को लिए अंक ’ लांक्षन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक । उन्होंने देखा ‘अन्याय जिधर-उधर शक्ति’।  राम का स्थिर मन संशय ग्रस्त हो उठा। आज के भयानक युद्ध की वह भीमा मूर्ति। रावण का अट्टहास। सभा ने राम को ऐसा उद्धिग्न कभी नहीं देखा था। वे उठे, उनकी आंख से दो मुक्तादल छलक पड़े। मंत्रियों ने शक्ति की आराधना का महात्म्य बताया। एक सौ आठ कमल के फूलों का एक-एक पुरश्चरण के बाद हवन।  यह तिथि आश्विन की प्रतिपदा थी। नवरात्र तो वासंती थी। यह असमय आई हुई अकाल ‘नवरात्र’।  पूजा आस्था-विश्वास का नाम है। संशय ग्रस्त राम का मन विश्वास में परिवर्तित हो गया। ‘बोले, आवेग-रहित’ स्तर से विश्वास-स्थित। मात: दस भुजा! विश्व ज्योति:! मैं हूं आश्रित! राम द्वारा स्थापित यह दूसरी अर्चना है। सभी दिशायें इस दशभुजा देवी के हाथ हैं। पर्वत के नीचे यह समुद्र जो गरज रहा है, वह सिंह है। राम देखते हैं कि ‘अम्बर में हुए दिगम्बर अर्चित शशिशेखर’। राम करमाला एक बार मंत्र-जप करने के बाद एक कमल चढ़ाते हैं। छठें दिन मन आज्ञा चक्र पर पहुंच कर ठीक से बैठ गया । राम के जप से अम्बर भी थर-थर कांपने लगा। आठवां दिवस मन ध्यान-मुक्त चढ़ता ऊपर कर गया अतिक्रम ब्रह्मा-हरि-शंकर का स्तर! महाष्टमी के अंतिम प्रहर दुर्गा साकार हुई वे हंंस उठा ले गर्इं पूजा का प्रिय इन्दीवर! पूजा के चरम पर जब राम ने हाथ से पीछे रखा नीलकमल उठाना चाहा तो फूल नदारद थे। ‘आसन छोड़ना असिद्धि भर उठाना चाहा तो फूल नदारद! राम एकाएक अस्थिर हो उठे।’ ‘आसन छोड़ना असिद्धि भर नयनद्वय।’ राम की बुद्धि ने एक युक्ति सोची-मां मुझे राजीव नयन कहती थी अभी तो दो शेष है। बाण खींचकर फलक को ज्योंहिं आंख से लगाया। दुर्गा ने राम का हाथ पकड़कर साधु कहा-   होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन! कह महाशक्ति राम के बदन में लीन।
‘निराला’ की शक्ति पूजा यहीं विराम लेती है। लोकमन इतना विश्वासी है वह मानता है कि दूसरे दिन अर्थात् दशमी के दिन रावण शक्तिहीन हो गया और विजय की यह तिथि दशमी ही रही होगी। सभी दिशाओं को रावण ने घेर रखा था। चर-अचर सारी शक्तियां उसी के नियंत्रण में थी। रावण-वध के साथ ही सभी दिशाएं मुक्त हो गर्इं। अत: लोक का दसराहा काव्य और पुराणोंतिहास का दशहरा हो गया। भारतीय मनीषा प्रकृति के प्रत्येक रूपों में आनंदानुभूति की है। दशहरा के बाद वर्षाकालीन खरीफ फसल काटकर घर में लाने का समय है। नवान्न के आने के शुरुआती दिन आनंद के हैं। जातीय विभाजन के त्यौहारों में दसराहा क्षत्रियों का त्यौहार है। आयुध-पूजन की शास्त्रीय परम्परा विजयादशमी से जुड़ी है। पान-खाना और नीलकंठ पक्षी देखना दसराहा के दिन शुभ माना जाता है। योग-साधना और तंत्र-मंत्र की सिद्धि के लिए दुर्गानवमी एवं दशहरा का विशिष्ट महत्व है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के बारे में प्रसिद्ध है कि काली मां उनको सिद्ध थी। वे उनसे बात करते थे। वामपंथी भारतीय नेता भी दुर्गा मां की पूजा से असहमत नहीं हो सके। दशहरा दुर्गा पूजन के फलागम है तो दसराहा लोक जीवन में वर्षा के चतुर्मास के बंधन का मुक्ति पर्व ।


... हो न हो, ये है मेरा देखा हुआ



भाषा का परिवेश लोक है। काव्य शास्त्रकार कविता में मूर्धन्य स्पर्श को अनुचित और गवांरू मानते हैं लेकिन पद्माकर की कविता ‘आगे नन्दरानी के तनक पय पीवे काज। तीन लोक ठाकुर सो ठुनकत ठाढ़ो है’, का क्या करेंगे, जो शास्त्र को लोक के सामने झुकाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसमें पहले चरण की मृदुल विन्यास की व्यंजना देखें और दूसरे चरण के ठकार की पुनरावृत्ति देखें। ‘ठकार’ की परुषता वात्सल्य के प्रवाह में बह गई। ठाकुर (कृष्ण) के ठुनकने से ऐश्वर्य बहुत छोटा पड़ गया। जिन्होंने लोक देखा है, दूध से भरा हुआ बर्तन देखा है, मां के सामने खड़ा उसका दुलारा तनक दूध मांग रहा है, मां अनदेखी कर रही है, बालक ठुनक रहा है, वे ही इस कविता का आनंद ले सकते हैं। जिस कविता मे जितना ही लोक तत्व होगा, लोक दृष्टि होगी वह उतनी ही शाश्वत होगी, किंबहुना कालजयी भी होगी। कबीर, तुलसी, सूर, मीरा, रसखान किस बिना पर प्रासंगिक बने हुए हैं, सिर्फ इसलिए कि इनकी रचनाओं में लोक समग्र रूप से उपस्थित है। एक अपढ़ भी कबीर, रहीम, तुलसी की उक्तियों का सार्थक प्रयोग अपनी बातों में करता है। आज की कविता में भावों का वह उन्मेष नहीं है, जो लोक की जीवन पद्धति थी, है। वे मात्र वर्ष या दशक की कविता बन कर रह गई है। क्योंकि उनसे उनका लोक छिन गया है, वे लोक को गवांरू-संस्कृति-परम्परा का क्षेत्र मानने लगे हैं। वह बड़ा और श्रेष्ठ कवि लेखक हो ही नहीं सकता जिसने लोक की उपेक्षा की। कालिदास ने कहा था कि सब पुराने अच्छे नहीं होते, सब नये खराब नहीं होते। विवेकी लोग जांचकर जो हितकर होता है उसे ग्रहण करते हैं। परंतु आज विवेक ही दुराग्रही और पूर्वाग्रही हो गया है, कदापि इसी वजह से हम अनेक जगहों पर अनादृत होते हैं।
   विश्व के तमाम देशों की अपनी लोक परंपरा है। परंपराएं विचार प्रवाह को बनाए रखती हैं, उसे कभी जड़ नहीं होने देती। प्रगति का विरोध नहीं, उसे अपनी कसौटी पर कसती है, तत्पश्चात उसे स्वीकार कर परंपरा में भी शोधन करती हैं। लोक में परंपरा पर ही समाज चलता है। सामाजिक, जातीय, घरेलू, परम्पराएं समाज को गतिशील रखती हैं। परम्पराएं अविरोधी भाव से चलती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इनके अलग स्वरूप होते हैं। भारत का शायद ही कोई ऐसा गांव हो जहां लोक परंपराएं न हों। हर क्षेत्र की अपनी परम्पराएं हैं। परम्पराएं जब टूटती हंै लोगों की आस्थाएं चरमरा जाती हैं, सुख-चैन छिन जाता है। सच है कि प्रगति सरिता का प्रवाह है परंतु सरिता पर घाट बनाना, उसकी स्तुति करना, उस पर बांध बनाना परंपरा का काम है। देशी आम में परदेशी आम की कलम लगे, परंतु इसका जरूर ध्यान रहे कि उसमें जो फल लगे, उसमें अपनी मिट्टी का स्वाद रहे। अपनी अस्मिता की मिठास रहे। परंपरा मधु की तरह है, प्रगति करके चीनी बने, परंतु बीमारी में मधु दवा होती है, चीनी नहीं। कितने फूलों के मिष्ट संचय से मक्खी मधु तैयार करती है। यह हमारी परंपरा है। लोक में परम्पराओं को पर्वों और त्यौहारों तक से जोड़ा गया है। शास्त्र में वर्णित देवताओं से भिन्न, गांवों में लोक देवता होते हैं। जिनकी पूजा-अर्चना के लिए शास्त्र की शरण में नहीं जाना पड़ता, क्योंकि इनकी पूजा का विधान उनमें वर्णित नहीं है। मुझे याद आता है कि गांव के गोइड़े में जादौराय (यादव राय) का चौरा हुआ करता था। एक मंदिर था, बगल में चौरे पर हर मंगलवार को एक पंडा बाबा बैठते थे। यह एक लोक विश्वास था कि जादोराय के चौरे पर जाने से सामान्य बीमारी ठीक हो जाती है। वे गांव के लोक देवता थे। अन्ना हजारे के ‘यादव बाबा’  के बारे में जानकर मुझे अपने जादौराय बाबा याद आ गए। गांव का कोई भी व्यक्ति जादोराम की जाति नहीं पूछता। हरेक घरों में ‘बाबा साहेब’ अंधेरी कोठरी के एक कोने में गड्ढे में रहते हैं। ये पशुओंं की रक्षा करने वाले देवता हैं। इनकी पुजाई जिस दिन होती है। उस दिन छोटे बच्चों तक का कलेवा बंद रहता है। कहते हैं जब ये नाराज होते हैं तो पशुओ में बीमारी फैलती है। अब तो पशु भी खत्म होते जा रही हैं फिर भी गांव में बाबा साहब की पूजा बदस्तूर जारी है।
 बघेलखण्ड के गांवों का नववर्ष होलिकोत्सव के बाद चैत्र महीने में होता है। होलिका दहन में एक लम्बी लकड़ी बीच में गाड़ते थे, जिसे सम्वत कहते थे। सम्वत किस दिशा में गिरा, यह शुभाशुभ में शामिल होता था।  नए वर्ष के प्रथम माह में ही किसी दिन दोपहर में गांव के कोने पर स्थित नीम या किसी पेड़ के नीचे देवी के पास सारे गांव के प्रत्येक घर से एक व्यक्ति एक लोटा जल लिए पूरे समूह के साथ गांव का चक्कर लगाता था। जिसमें सबसे आगे एक दलित, जिसके हाथ में सद्य: जात सुअर का बच्चा (घेंटा) रहता था, दौड़ता हुआ चलता था। देवी के पास लौटकर उस बच्चे की बलि देकर गांव के सुखी होने की कामना करता था, इसे ‘निकाई देवी’ की परिक्रमा कहते थे। प्रत्येक घर की दीवारों में गोबर की गोंठ होती थी। गांव में सुख शांति रहे इसके लिए ‘हरियरी की पुजाई’ से लेकर ‘शीतला माता’ तक की पूजा की परंपरा थी। चेचक का निकलना ‘महरानी’ का निकलना मानते थे। ‘तेलिया मसान’ भी पूजित थे। जातीय सौमनस्य के ये उदाहरण आज कहां बिला गए। जो परंपराएं समाज के सभी जातियों को जोड़ती थींं उनका एकदम से   लुप्त हो जाना चिन्तनीय है। गांवों में एक लोकमंत्र हुआ करता था जिसमें ओझा या पण्डा सभी लेकदेवताओं की दुहाई देकर उनसे कल्याण करने की कामना करता था। ओझाई करने वाले ओझा कहलाते थे, अब ब्राह्मणों की एक उपजाति भी ओझा कहलाती है। लोक का दुख सिर्फ उनके द्वारा स्थापित देवता सुनते थे। वे अन्यों के आगे अपना दुखड़ा नहीं रोते।
  हमने परम्पराओं को पिछड़ापन माना। पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी लोगों ने गांव केवल छोड़ा भर ही नहीं, उससे संबंध भी तोड़ लिया। अपनी विद्वता और सफलता के आगे गांव की खोज खबर नहीं ली। हमारे दिल दिमाग से वह गायब हो गया। हम भूल गए उस आंगन को, उस जमीन को, जिसमें हमारी नाभि-नाल गड़ी थी। जब गांव जाता हूं, अपने बचपन के उन साथियों से मिलता हूं जिनके साथ जिन्दगी के सबसे ईमानदार-निश्छल दिन बिताये थे। जो मेरे अच्छे और धतकरमों के गवाह हैं, और वे उसी तरह भेंटते हैं, तब लगता है कि ये ओढ़ी हुई विद्वता, अभिजात्य एवं बेमानी है। आधुनिकता के दंभ ने लोक परंपराओं की हत्या कर दी और इसके लिए सिर्फ हम गुनाहगार हैं। अपने उखड़े और उजड़े हुए घर परिवार, खेत-तालाब, पेड़ देखकर गीत की वह पंक्ति अक्सर कुरेदती है -सोचता हूं अपने घर को देखकर,हो न हो, ये है मेरा देखा हुआ ।  


Thursday, November 3, 2011

लोक में शिव, राम और कृष्ण


लोक’ हमेशा से चर्चा में रहा है। वैदिक युग से लेकर आज तक। ऋषियों ने अधिकतर मंत्र लोक पर, लोक के लिए लिखी, लोकमंगल की कामना से। पुराणों में लोकमंगल को कल्पना का साकार अर्थ शिव ने दिया। सुर और असुरों ने समुद्र मंथन किया। मंथन से चौदह रत्न निकले। सही बंटवारे का प्रमाण न किसी पुराण में मिलता है न स्मृति में, न लोक में। श्रम की हिस्सेदारी देवताओं की तमाम चालाकियों के बावजूद बराबर होनी थी। सुर सम्राट देवराज ने मणि, रम्भा, गजराज(ऐरावत)कल्पद्रुम, कामधेनु, घोड़ा, धनुष, हथिया लिया, तो छोटे भाई विष्णु कौन कम थे, उन्होंने लक्ष्मी को अंगीकार कर लिया, शंख ले लिया। धनवन्तरि सुरों के वैद्यराज हो गए। वारूणी (शराब) असुरों को पिला दिया। और हालाहल, सभी भागने लगे उसे देखकर देवता चालाक थे। शिव भोलेनाथ थे, सीधे-सरल-विश्वासी। उनकी महिमा का गायन करने लगे कि ‘प्रभो! आप ही इस विष को पीकर संसार का  कल्याण कर सकते हैं अन्यथा यह विष सारे संसार में फैलकर सबको नष्ट कर देगा, रक्षा करें आशुतोष’। संसार के कल्याण के लिए यह पहला लोकमंगल कार्य था। सारे  शरीर में फैलकर विष, शिव को भी जला डालता, उन्होंने कंठ में ही रोक लिया। कंठ जलने लगा, सर्पों को गले लगाया, माथा जलने लगा, शशि जो मंथन से निकला था उसे माथे पर लगाकर विष को प्रभावहीन किया। अमृत के बंटवारे की कथा तो सारा लोक जानता है। श्रम के फल का यह विभाजन अपनी प्रासंगिकता के साथ कदाचित आज भी जीवन्त है।
   शिव अनार्यों, आर्यों दोनों में पूजित हुए और लोक में तो शिव से बड़ा कोई है ही नहीं, शायद इसलिए कि शिव के स्वार्थ की कोई कहानी भारतीय वांग्मय में नहीं है। वे परमार्थ के देवता थे। सबसे भोले-भाले, दैत्यों, असुरों की किसी भी प्रार्थना पर हरदम वरदान देने के लिए प्रस्तुत और वरदान देकर भागते हुए औघड़दानी शिवपुराणों में दिखते हैं। शिव का अर्थ ही कल्याण है। उनके विशेषण ही उनकी संज्ञा है, संभवत: इसीलिए भारतीय साहित्य में उनकी अव्याहतगति है। शिव जैसा पे्रमी विश्व के किसी साहित्य में नहीं है। सती की लाश कंधे पर लिए, उसे जीवित मानते हुए उससे बात करते हैं। गल-गल के अंग-प्रत्यंग गिर रहे हैं, वह बावला प्रेमी यह मान ही नहीं रहा है कि सती अब नहीं है। देवताओं के कुचक्रों का शिकार, शिव उनको ढूंढ़ता है, परन्तु वे सब छिपे हैं। उनमें शिव के सम्मुख आने का साहस नहीं है। शिव जैसा योगी भी कोई नहीं, अखण्ड और अचल समाधि को भंग करने के लिए देवताओं ने कन्दर्प की बलि दे दी। लोक मंगल के लिए हमेशा हर क्षण, उपस्थित। इसीलिए वे लोक के सर्वाधिकप्रिय महादेव, देवाधिदेव - ‘जरत सकल, सुरवृन्द, विषम् गरल जेहिं पान किए’। शिव पर कोई लोक निन्दा नहीं, कोई लोकापवाद नहीं है।
  लौकिक संस्कृत के आदिकाव्य ‘रामायण’ की रामकथा के अनेक स्वरूप हैं। सीता निष्कासन लोक में स्वीकार्य नहीं है। इस प्रसंग में लोक, सीता के पक्ष में खड़ा है। क्या राम लोकमंगल के लिए वन गए? वन में अस्थि समूह देख कर उन्होंने निश्चरहीन पृथ्वी करने की बात कही। किशोर राम, विश्वामित्र की रक्षा के लिए गए, निर्भय यज्ञ करने को कहा। ताड़का-सुबाहु को मारा। तब निश्चर उनकी दृष्टि में नहीं थे। राजतिलक की तैयारी, वनगमन, चित्रकूट तक उनके चिन्तन में लोक की कोई पीड़ा नहीं थी। सीताहरण के बाद वे लोक के सामने पूरी तरह आते हैं। केवट प्रसंग भी लोक से जुड़ा था। पेड़, पृथ्वी, लता पत्तों तक से सीता का पता पूछते हैं। हरिण-मृग भी  दक्षिण दिशा की ओर घूमकर सीता को ले जाने का संकेत देते हैं। वहीं उनका परिचय वानर, वृक्ष, पक्षी, साधु, सन्तों से होता है। सबको साथ लेकर निश्चरों का नाश करते हैं। वानर स्वार्थ से जुड़े, राक्षस विभीषण स्वार्थ से जुड़ा। राम का स्वार्थ तो था ही। नि:स्वार्थ भाव से राम का साथ देने वाले वृक्ष, पक्षी (जटायु-सम्पाती) और सेतु, निर्माण में लगी गिलहरी थी। नैयायिक कहते हैं कि यदि राम का राज्याभिषेक हो गया होता तो क्या रावण-वध होता। खैर, ये लेकिन-परन्तु की बातें हैं। राम का न तो बचपन लोक से जुड़ा था, न कैशोर्य। वे खेलते भी हैं तो चारों भाइयों के बीच ही। राक्षसों-निशाचरों को मारना उनके रास्ते में आड़े आने का काम था। सीता को लौटाने का सन्देश भेजना युद्ध का टालना था। यदि रावण सीता को वापस कर देता, तब उस प्रतिज्ञा का क्या होता जो भुज उठाकर उन्होंने की थी। सबके सामने सीता की अग्नि परीक्षा के बाद भी कुछ लोगों के कहने के कारण लोकापवाद से डरकर राम ने गर्भवती सीता को जिस तरह धोखे से निकाला उसे लोक ने कभी सही नहीं माना। लोक से राम हार गए। लोक में राम हार गए। अपराजित राम अपनी ही प्रजा(लोक) से पराजित हो जाते हैं।
   लोक की सीता बाल्मीक से कहती है- ‘तोहार कहा गुरु करबै!  परग दस चलबै हो। गुरुजी। राम निरमोंहियां क मुंहबा। बिताया नहि देखबै हो।  तुलसी के राम तो प्रकट हुए थे, लोक कहता है ‘खीर’ खाय पैदा सुत करती पति कर कछू न कामा। जहां शिव का स्वरूप लोक कल्याणकारी कहलाया वहीं राम मर्यादा पुरुषोत्तम, लोक मंगलकारी के रूप में स्थापित हुए।
 लोकरंजन की भूमिका में देवकी की कोख से कृष्ण पैदा हुए, गोकुल में पले। उनकी बाल-लीलाओं ने लोक मन मोहा। पहली बार लोक-साहित्य में वात्सल्य भाव को   रस की संज्ञा मिली। कृष्ण ने प्रभु का आभिजात्य और विशिष्टता छोड़, जीवन को, खेल की तरह लिया। सामान्यों की तरह जिए, उनका साथी भी खेल में दांव न देने पर हड़का कर कहने की हिम्मत रखता है कि या अधिकार जनावत याते अधिक तुम्हारे है कुछ गैया।  माखन-चोरी करता है, मुंह में माखन लगा है, दलील देता है कि उन सभी ग्वाल-बालों ने जबरन मेरे मुंह में लगा दिया है। रो-रो कर मां को अपने पक्ष में कर लेने की अद्भुत लीला लोक में प्रिय है। कृष्ण, लोक में सबसे करीब हैं। लोक के वे लीला पुरुषोत्तम है। सम्पूर्ण महाभारत उनके दायरे में हुआ, बिना अस्त्र चलाए, द्वारकाधीश कहलाए, एक दिन भी राजगद्दी पर नहीं बैैठे। कृष्ण का प्रत्येक कार्य मनुष्य की जीवन-चर्या से जुड़ा। ‘रामायण’ भारतीय दर्शन का स्वप्न और आदर्श लोक है तो महाभारत जीवन का यथार्थ, जो अतीत में था, वह आज भर नहीं, शाश्वत सत्य है। पुराणों में राम और कृष्ण को ईश्वर का अवतार माना गया है। दोनों के जीवन का उत्तरार्द्ध- अवसान त्रासद है। लोक से सबसे करीब राम और कृष्ण की कथा है। लोक में कृष्ण कथा (भागवत) का श्रवण मुक्ति देता है। जीवन के अन्तिम क्षणों में राम और कृष्ण नितांत अकेले थे। शायद जीवन का सत्य भी यही है। हंस अकेला जाई।
   लोक, राम और कृष्ण को विष्णु भगवान का अवतार मानता है। धरती पर उनके द्वारा किए गए कार्यों को श्रद्धा और भक्ति से सिरमाथे स्वीकारता है। समूचे भारतीय साहित्य में दोनों की स्थिति अपौरुषेय है। दोनों लोक में भगवान हैं, लेकिन जिनकी लीलाओं पर वे बेवाक टिप्पणी करते हैं। अकेले शिव ऐसे देवता हैं जो अनादि हैं, अनन्त हैं, जिनके जन्म-देहोत्सर्ग का कोई रिकार्ड न लोक में है, न शास्त्र में। वे देवादिदेव हैं, वे आशुतोष भी हैं, महाकाल भी। प्रलयकार भी हैं, भोलेनाथ भी। न उनका बचपन है न वृद्धावस्था। न आदि है न अन्त। लोक में कामरि है, बोल बम है, तीसरे वर्ष मलिमास है। वर्षा ऋतु के ये सावन-भादौं महीने इन तीनों देवों को प्रिय हैं। सावन तो शिव का महीना ही है। विष की जलन अभीशेष है। वर्षा में उनके भीगने से ताप कुछ कम होता है। वे अपनी इच्छा से कैलाश नहीं गए थे। बर्फ से ढके उस स्थान में शरीर की चित्त की जलन कुछ तो कम हुई होगी। सुरों के षड़यंत्र को वे भूल गए भुला दिया। राम को भी चतुर्मास बिताने का सुख कामदगिरि में बारह बार तो मिला ही। पंचवटी और ऋष्यमूक में मैं भी चौमासा बिताया।
   कृष्ण ने सावन में इन्द्र से मोर्चा लेकर इन्द्र पूजा रोककर गोवर्धन पूजा। कराई थी। इन्द्र का कोप कृष्ण के रहते निरर्थक हो गया। गोकुल में कृष्ण की तमाम लीलाओं के बीच लोक में झूला भी है- ‘झूला पड़ा कदम की डरिया झूलै कृष्ण मुरारी ना’ भादौं शुक्ल पक्ष तीज पार्वती के व्रत का चरम दिन था, जब वे अपर्णा कहलाई- अपर्ण-आशना। आज भी शिव जैसा पति पाने की कामना में लड़कियां और महिलाएं चौबीस घंटे का कठिन व्रत बिना पानी पिए, रात भर जागकर पूरा करती हैं। भादौं की वह भयानक बरसती कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधीरात, लोक में अवस्थित है। देश का यह शाश्वत शास्त्र भी है, लोक भी। शास्त्र के त्रिदेव भले ही ब्रह्मा, विष्णु महेश हों, लेकिन लोक ने शास्त्र से सिर्फ महेश को लिया।