Thursday, February 28, 2013

बोले चला निरा लबरी


झूठ बोलना सबसे आसान काम है, बोल दिया सो बोल दिया। चुनाव में नेता जी ने जनता जनार्दन महोदय से कहा-हम आपके पसीने के साथ अपना खून बहाएंगे। झूठे  नारे पर सवार होकर सीधे सत्ता के साकेत में उतर गए। अब पांच साल तक जनता का खून चुसवाएं या जनार्दन जी की खाल खंैचवाए कौन रोकने वाला। फिर आएंगे, झूठ का डबल धमाका करेंगे। जरूरत पड़ी तो जाति-पांति के स्वाभिमान का तड़का लगाएंगे। फिर चुनावी ताड़का का वरण कर ले जाएंगे। झूठ बोलना भी एक कला है। घोषणापत्रों में सफेद झूठ को काली स्याही से छपवाकर बंटवा दिया जाता है लोग पकड़ नहीं पाते। पकड़ने वालों पर झूठ की ऐसी करारी मूठ मारते हैं कि रिटायर होने तक वह चकरघिन्नी खाता रहता है, इस दफ्तर से उस दफ्तर, इस शहर से उस शहर। 
रिमही बोली के स्मरणीय पुरोधा कवि शंभू काकू ने झूठ पर अदभुत कविता लिखी थी-  बोले चला निरा लबरी। लबरिन से सब काम सधाय। लबरिन नेता देय बनाय। लबरिन अब कल्याण करी, बोले चला निरा लबरी। हर हर गंगे गोदावरी। मेरे एक साथी ने बताया कि झूठ का एक अलग तर्कशास्त्र होता है। एक झूठ बोलिए जब लगे कि पोल खुलने वाली है तो पुराने झूठ को बचाने के लिए तड़ से नया झूठ बोल दीजिए । इसी तरह पुराने झूठ की रक्षा करने के लिए नया झूठ बोलते जाइए । देखेंगे कि झूठ का ऐसा जबरदस्त संजाल तैयार हो जाएगा कि उसमें उलझा बड़े से बड़ा सत्यवादी विद्वान, झूठ को ही सच के नजरिये से देखने लगेगा। एडोल्फ हिटलर ने क्या किया था? अपने मंत्रीपरिषद में गोएबेल्स नाम से झुट्ठे को प्रचारमंत्री बनाकर रखा था। पूरे आत्मविश्वास के साथ एक झूठ को सौ बार दोहराइए वह सच लगने लगेगा। गोएबेल्स अब हमारे नेताओं के आराध्य देव हैं। हर पार्टी में गोएबेल्स का एक पद आरक्षित होता है। कई सूबों के मुखिया खुद ही गोएबेल्स को अपने व्यवहार व स्वभाव में उतार लेते हैं। जैसे गांवों में अभी भी बरम बाबा - किसी सुपात्र पण्डे के सिरे आकर बोलने लगते हैं उसी तरह। अपने सूबे में तो यही है। बच्चियों के रेप में यह देश भर में नम्बर वन। पर लाडली लक्ष्मी की जय। हर शुभ काम कुमारी कन्या का पांव पूज कर। इन कन्याओं को  चुन चुनकर जिस तरह से पेट में ही मार दिया जाता है या दुर्भाग्यवश पैदा होते ही गला दबा दिया जाता है उसके चलते यह तय मानिए कि निकट भविष्य में कन्याओं के पांव ही पूजने के लिए नहीं मिल पाएंगे। पर बोलने में क्या जाता है? लाडली को लक्ष्मी कह दो, अपने घर का क्या जाता है, महालक्ष्मी कह दो, दुर्गा या सरस्वती बना दो। इश्तहारों में इन सबको पूजते हुए दिखो। सभाओं मंचों से यही बोलो। वक्तव्यों में यही, यही दुहराते जाओ। गोएबेल्स की तरह तरह सौ सौ बार दुहराओ, जनता भूल जाएगी कि अपना सूबा बच्चियों के दुष्कर्म में अव्वल नम्बर है। हाल ही में एक खबर पढ़ी। जो एक्स्ट्रा कमाएगा वो जेल जाएगा। सोचा- इस पर अमल होगा। सुबह देखा तो मंत्री जी बंगले में। अफसर बहादुर मर्सडीज में, वैसे ही मजे में थे। कोई जेल नहीं गया। किसी के घर एक्स्ट्रा कमाई नहीं निकली। आप जपते रहिए जो एक्स्ट्रा कमाएगा, जेल जाएगा। दफ्तर जाइए... चढ़ावा चढ़ाइए फाइल तभी आगे खिसकेगी। बाबू टेबिल के नीचे नोट गिनता जाएगा, और सूबे के मुखिया का नारा दोहराता जाएगा, कि जो एक्स्ट्रा कमाएगा वो जेल जाएगा। अपने शंभू काकू ठीक ही कह गए... बोल चला निरा लबरी। लबरिन अब कल्याणकारी। हर -हर गंगे गोदावरी।

Wednesday, February 27, 2013

इंद्रधनुष अच्छे हैं,काले बादलों को भी देखिये

 चिदम्बरम साहब ने यह आलेख 14 मार्च 2004 को फाइनेंशियल एक्सप्रेस में लिखा था, तब केंद्र में एनडीए की सरकार थी और वे संसद के सदस्य नहीं थे। लेख में देश के गरीबों का दर्द व उनके संघर्ष को चिदम्बर साहब ने शिद्दत से महसूस किया है। 28 फरवरी को बतौर वित्तमंत्री आम बजट पेश करेंगे। इस लेख के बरक्स समङिाएक थनी और करनी के बीच का यथार्थ।

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पी. चिदम्बरम
चिड़िया की आंख से तसवीर का एक पहलू नजर आता है।
हवाई जहाज से हर शहर खूबसूरत दिखता है। रोशनी के समंदर में सभी गड्ढे और टीले खो जाते हैं। राष्ट्र के विकास की बातें जोश पैदा करती हैं। एक केंचुए की नजर से देखने पर तसवीर का एक अलग ही पहलू नजर आता है। धारावी मुम्बई है और मुम्बई धारावी। झोपड़पट्टी, गटर और गलियों में भटकते बच्चे, किसी की भी संवेदनशीलता पर भारी पड़ेंगे। क्या सचमुच देश का विकास हुआ है? हम ताज्जुब करते हैं।
दोनों ही पहलू तस्वीर के सही रूप को स्पष्ट नहीं करते हैं।
तस्वीर अपने वास्तविक रूप में तभी नजर आएगी, जब हम उसे व्यक्तिगत, घरेलू व सामुदायिक स्तर पर देखेंगे। राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त अर्थशास्त्र शोध परिषद समय-समय पर बाजार सव्रेक्षण करता रहता है। जिसे ‘मिश’ (मार्केट इन्फार्मेशन आफ हाउसहोल्ड) कहा जाता है। ‘मिश’ हर परिवारी के मुखिया से पूर्व वित्तीय वर्ष के दौरान परिवार के आय के आकलन के लिए कहता है। हाल के सव्रेक्षण के परिणामों से इस बात पर रोशनी पड़ी है भारत 1991 के बाद किस रास्ते चला है।
1989-90 में भारत में 142 मिलियन परिवार थे। इन परिवारों में से 58.8 प्रतिशत की वार्षिक आय 2001-02 की कीमतों के हिसाब से 45,000 से भी कम थी। (इस तरह इन परिवारों की वास्तविक आय 1989-90 में इससे भी कम होगी, लेकिन 2001-02 में क्रय क्षमता 45,000 के बराबर होगी) कुल परिवारों में से 14.2 प्रतिशत की आय 90,000 रुपये या उससे अधिक है। बाकी परिवार जिस स्तर के अंतर्गत आते हैं, उन्हें निम्न मध्यम वर्ग कहा जाता है। इनकी वार्षिक आय 45,000 से 90,000 के बीच में है। फिर दस वर्ष के आर्थिक सुधारों के बाद इसमें क्या बदलाव आया है? 2001-02 में परिवारों की संख्या बढ़कर 188 मिलियन हो गई। यह बढ़ोत्तरी लगभग एक तिहाई है। परिवारों की संख्या में हुई अच्छी खासी बढ़ोतरी के बावजूद, एक बड़ी संख्या में से केवल 34.6 प्रतिशत की वार्षिक आय 45,000 के ऊपर थी।
और दूसरी तरफ जिनकी वार्षिक आय 90,000 से ऊपर थी, उनका प्रतिशत 14 से बढ़कर 28 हो गया। स्वाभाविक है कि निम्न मध्यम वर्ग भी 27 से बढ़कर 37.4 प्रतिशत हो गया।
चिड़िया इस बारे में क्या कहेगी कि क्या भारतीय लोग ज्यादा उन्नति कर रहे हैं? परिवार की आय का स्तर निम्न से निम्न मध्यम वर्ग में पहुंच गया और निम्न मध्यम वर्ग से मध्यम वर्ग पहुंच गया।
लेकिन ये तब जब सभी परिवार में सदस्यों की संख्या औसतन पांच हो, निम्न वर्ग में भी और मासिक आय कम से कम 3500 रुपये हो। मकान मिल पाएगा और बच्चों को उचित शिक्षा।
सफलता की कहानी मध्यम वर्ग के पास है- कुल परिवार की संख्या में से 20 प्रतिशत इसी श्रेणी में आते हैं यानी 52 मिलियन परिवार-260 मिलियन लोग। इन परिवारों की मासिक आय 7500 रुपये या ज्यादा है। गत वर्षो में भारतीय मध्यम वर्ग उभरकर सामने आया है और यही सच है।
उभरते मध्यम वर्ग की सफलता की कहानी पर तो कई पृष्ठ अलग से लिखे जा सकते हैं। वे उपभोग ज्यादा करते हैं, इच्छा भी ज्यादा की करते हैं। बहुत साल पहले मैंने एक सीधी सी बात रखी थी कि क्या चीजें अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। मैंने कहा था,‘इच्छाएं उपभोग को प्रभावित करती हैं, उपभोग उत्पादन को और उत्पादन निवेश को प्रभावित करता है।’ और मेरा विश्वास है कि वह बात यहां बिल्कुल सटीक बैठती है।
260 मिलियन लोगों का मजबूत मध्यम वर्ग, देश को ऊंचाइयों तक ले जा सकता है। यह वर्ग शिक्षित है, बहुत कुछ करना चाहता है, हर तरह का जोखिम उठाने को तैयार है। अगर इस वर्ग के विचार प्रज्वलित हो उठें। इंजीनियर, मैनेजर, बैंकर, चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट और विश्व बाजार में दिग्गज कंपनियों का नेतृत्व कर रहे कर्मचारी इस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।
अब केंचुए की आंख से तस्वीर को देखें। जमीनी स्तर पर 65 मिलियन परिवार है, जिनकी मासिक आय 3,750 रुपये या उससे कम है। क्योंकि 3,750 रुपये की औसत मासिक आय है, इसलिए ऐसे कई परिवार भी हैं जिनकी मासिक आय इससे भी कम है। 65 मिलियन परिवार यानी 325 मिलियन लोग। इतनी आबादी तो किसी एक महाद्वीप की है। इसलिए हमारे पास असंतोषियों का एक पूरा महाद्वीप है, जो दो छोरों को मिलाने के लिए संघर्ष करता रहता है। दो भागों में विभाजित है, शहरी और ग्रामीण। 7.5 मिलियन परिवार शहरी हैं (37.5 मिलियन लोग)। इनमें से जो सबसे गरीब हैं वो अपने लिए दो जून का खाना नहीं जुटा पाते, वे कच्चे डेरों में रहते हैं। उनके बच्चे स्कूल नहीं जाते, अगर जाते भी तो शुरुआती कुछ साल के लिए। उनके पास शारीरिक श्रम के अलावा कोई दूसरी योग्यता नहीं है। अब परिस्थितियां उन्हें अपने चंगुल में पूरी तरह दबोच लेती है। तो सैकड़ों की संख्या में आत्महत्या के लिए विवश हो जाते हैं, जैसा आंध्र प्रदेश में हुआ। भारत चमक रहा है, 260 मिलियन लोगों के लिए। भारत अवसाद में है 325 मिलियन लोगों के लिए।
आर्थिक सुधार के पहले उस वर्ष की कहानी खट्टी-मीठी दोनों हैं। 260 मिलियन लोगों के जीवन में आई चमक के उत्सव के लिए 325 मिलियन लोगों के संघर्ष पर कंबल डालना एक क्रूर मजाक है। अगले आठ वर्षो में यानी 2009-10 तक भारत की कहानी इसी पटकथा पर चलेगी। मध्यम वर्ग बढ़कर 107 मिलियन परिवारों का हो जाएगा। (535 मिलियन लोग)। निम्न आय वर्ग अपने 35 मिलियन परिवार की सीमा पर टिका रहेगा।
(175 मिलियन लोग)। ज्यादा और तेज गति के आर्थिक सुधार मध्यम वर्ग के लिए संभावनाओं के और दरवाजे खोलेगा। ये गरीब हैं, जिन्हें सहायता की जरूरत है। बिना सहायता के वे अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित नहीं होंगे। बिना सहायता के वे कोई नई योग्यता हासिल नहीं कर सकते।
गरीबों के अलावा, यहां कई और उपेक्षित वर्ग हैं जैसे जनजाति, विकलांग, बीमार और वृद्ध। इनकी संख्या लाखों में है। इनके मामले में राज्य अक्सर कठोर और हृदयहीन दिखता है। और ज्यादातर मामलें में वह अपनी प्रत्यक्ष ज्ञान के हिसाब से सही भी रहता है। इस समस्या के समाधान और उपेक्षित वर्ग की जरूरतों को पूरा करने के लिए व्यवस्था के लिए रूप को डिजाइन करना पड़ेगा। जब हम आसमान में चमकीली रेखा को देखें, तो आसपास के काले बादलों को अनदेखा न करें। भारत खुशी से चमक भी रहा है, और अवसाद ग्रस्त भी है। आने वाले चुनाव ही दिखा पाएंगे कि कौन सी राजनैतिक पार्टी (या पार्टियों का समूह) भारत की सही तस्वीर सामने रखने के काबिल है।

Tuesday, February 26, 2013

इस रेल बजट में "कैटल क्लास" के लिए क्या!

आप जब यह लेख पढ़ रहे होंगे तब तक लोकसभा में रेल बजट प्रस्तुत हो रहा होगा। हम सब यह जानने की कोशिश कर रहे होंगे कि अपने इलाके को कितनी रेल सुविधाएं मिलीं, कौन नई ट्रेन चलेगी। कहां नई पटरियां बिछेंगी, या फिर किराए का क्या होगा। पिछले कई वर्षो से रेल बजट का प्रस्तुतिकरण महज राजनीतिक उपक्रम रह गया है। आम आदमी के हितों को फोकस करने की बजाय क्षेत्रवाद या गठबंधन के जिस दल के मंत्री के जिम्मे रेल मंत्रालय है उसकी दलीय प्रतिबद्धता प्रमुख रहती है। पिछले साल दिनेश त्रिवेदी ने इस चलन से हटकर बजट पेश करने की कोशिश की तो वे ममता बनर्जी के कोप के शिकार हो गए। दुनिया में यह पहली ऐसी घटना थी जब किसी मंत्री को राजनीतिक कारणों से इस तरह बेइज्जत होकर त्यागपत्र देना पड़ा हो। त्रिवेदी की सोच प्रगतिशील व यथार्थ के धरातल पर टिकी थी। ममता बनर्जी की सोच लालू यादव की सोच का विस्तार मात्र था। लोक लुभावन सड़क छाप घोषणाओं में आम आदमी के हित के लिए ये नेता स्टेशन पर कुल्हड-सत्तू लिट्टी-चोखा और 10 रुपए के जनता भोजन से ज्यादा नहीं। आम आदमी मवेशियों की तरह डिब्बे में सफर करें और स्टेशन के नलों का गंदा पानी पीकर बीमार होकर मरे इस दिशा में किसी रेल बजट में गंभीर पहल व ठोस विचार नहीं दिखा।

रेल की व्यवस्था और सोच में आम आदमी कहां है. रेलगाड़ियां ही अपने-आपमें जीवंत दृष्टान्त हैं। सामान्य श्रेणी, जिसमें आम गरीब मुसाफिर सफर करता है, लम्बी से लम्बी रेलगाड़ियों में महज दो डिब्बे लगते हैं। एक इन्जन के बाद और दूसरा गार्ड के डिब्बे से पहले। इनके बीच में वातानुकलित श्रेणियों के डिब्बे और सेकन्ड क्लास स्लीपर। ये मान सकते हैं कि रेलगाड़ी के आगे-पीछे लगने वाले ये सामान्य श्रेणी के डिब्बे, विशिष्ट श्रेणी के डिब्बों में सफर करने वालों के लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं। यानी कि रेलगाड़ी चाहे आगे से भिड़े या पीछे से कई टक्कर मारें (ईश्वर करे कभी ऐसा न हो) पहला आघात जनरल क्लास यानी कि आम आदमी को ही लगेगा।

दूसरे, सामान्य श्रेणी के डिब्बे अपराधों के मामले में भी शॉक आबजर्वर का काम करते हैं। मसलन जहरीला बिस्किट देकर यात्रियों को लूटने वाले, किसी न किसी बहाने यात्रियों से जबरिया वसूली करने वाले जीआरपी, आरपीएफ और रेल्वे के चेकिंग स्टाफ के लिए सबसे मुफीद जगह यही है। बजबजाते और गन्धाते सामान्य श्रेणी के डिब्बों के यात्री शशि थरुर के शब्दों में सचमुच कैटल क्लास के हैं। कहने को आम मुसाफिरों के लिए हर लाइन पर सस्ते किराए वाली पैसेन्जर गाड़ियां हैं। पर कभी इन गाड़ियों में कोई मंत्री, विधायक या सांसद या कि रेल्वे का आला अफसर यात्रा करके देखे तो पता चलेगा कि भारतीय रेल्वे अभी भी किस युग में है। पांच घंटे का सफर कभी-कभी पन्द्रह से बीस घंटे में तय होता है। सभी गाड़ियों को पास देने के लिए इन्हें ही कुर्बानी देनी पड़ती है। क्या गरीब भारतवासी को यह हक नहीं कि वह भी गन्तव्य तक वक्त पर पहुंचे। इन गाड़ियों के डिब्बे साफ-सफाई और सुरक्षा रेल्वे की सबसे निचली प्राथमिकता में होता है।

मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी बनने की बुनियाद में रेल्वे ही है। वह ऐतिहासिक घटना दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर से 80 किलोमीटर दूर पीटरमेरिटजबर्ग रेल्वे स्टेशन की है? वह ऐतिहासिक तारीख थी 7 जून 1893। प्रथम श्रेणी में यात्रा कर रहे मोहनदास करमचन्द गांधी को रेल्वे के अंग्रेज अधिकारियों ने सामान समेत कोच से फेंक दिया था। करमचन्द की आत्मा में बैठा महात्मा इसी घटना के बाद जागृत हुआ। गांधीजी ने जाति-रंग- नस्ल व वर्ग के खिलाफ लड़ाई यहीं शुरु की। दक्षिण अफ्रीका में अहिंसक क्रांति की ये चिंगारी नेल्सन मंडेला तक जारी रही। दक्षिण अफ्रीका आज आजाद मुल्क है पर उसकी आजादी के पीछे रेल्वे के वर्ग चरित्र की यह घटना है। गांधीजी जब हिन्दुस्तान लौटे तब यहां रेल लाइनें बिछ चुकी थी और रेलगाड़ियां चलने लगी थी। यहां की रेल्वे का चरित्र दक्षिण अफ्रीका जैसा ही था, क्योंकि अंग्रेज बहादुरों के लिए स्पेशल कोच और सैलून लगा करते थे।

गांधीजी ने देश-दर्शन के लिए रेलयात्रा ही चुनी। वे जीवनभर तृतीय श्रेणी की यात्रा करते रहे गांधी डिवीजन का जो देसज शब्द चल निकला उसके पीछे गांधी जी की तृतीय श्रेणी की रेल यात्रा ही है। गांधीजी ने रेलयात्रियों के जरिए ही देश के आम आदमी के बारे में अपनी समझ विकसित की, और उनका स्वप्न था कि देश जब आजाद हो तो वह वर्गविहीन, श्रेणी विहीन रहे। देश में सिर्फ एक ही श्रेणी एक ही वर्ग रहे वह आम भारतीय का। आजादी के बाद रेल्वे ने सिर्फ एक संशोधन किया, अपने डिब्बों में "गांधी क्लास" यानी की तृतीय श्रेणी नाम को विलोपित कर दिया।

गांधी जी देश में वर्ग व श्रेणी विहीन समाज का सपना देखा था, वह कई क्षेत्रों में चूर-चूर तो हुआ ही, रेल्वे में वर्ग और श्रेणी विभाजन वास्तव में कई-कई खांचों में बंटे अपने समाज की फौरी तस्वीर प्रस्तुत करता है। सामान्य रेलगाड़ी में पांच श्रेणियां, तीन ऐसी की दो सामान्य की। रेल्वे का आला अफसर, सरकार के शीर्ष अधिकारी और महामहिमों के लिए स्पेशल सैलून। फिर राजधानी-शताब्दी और दूरन्तों श्रेणी की रेलगाड़ियां। पर्यटकों के लिए पैलेस-ऑन-व्हील जैसी स्पेशल गाड़ी। और जहां तक जनप्रतिनिधियों तथा धर्माचार्यो व मठाधीशों को शामिल करते हुए समाजसेवियों की बात करें तो ऐसे लोगों की संख्या सैकड़ों नहीं अपितु हजारों में है जिन्होंने पिछले दस साल से रेल में यात्रा ही नहीं की। इनके लिए सरकार के या कारपोरेट घरानों की चार्टर सेवाएं व हैलीकाप्टर हाजिर।

इस बाजारू व्यवस्था में गांधीजी के सपने को हकीकत में बदलने की बात करना महज जुबानी-जमा-खर्च होगा, लेकिन जिस आदमी की बात यूपीए सरकार की अगुआ कांग्रेस करती है उस आम आदमी के लिए रेल यात्रा सम्मानजनक बनायी जा सकती है। और ज्यादा क्या चाहिए, डिब्बे में बैठने के लिए एक सुविधाजनक सीट, स्वच्छ व साफ वातावरण। ज्यादा संख्या में फास्ट पैसेन्जर, साफ-सुथरे यात्री प्रतीक्षालय, शुद्धपेय जल, और सबसे बड़ी बात सुरक्षित यात्रा की गारंटी। जनता शासनकाल के रेलमंत्री मधुदण्डवते स्तुत्य है, उन्होंने ही सामान्य श्रेणी में लकड़ी के फट्टे की जगह गद्दीदार सीटों के लिए पहल की थी व बाकायदें बजट में प्रावधान भी किया था। आप जब तक इस लेख को पूरा कर रहे होंगे, देश का रेल बजट आपके सामने होगा। रेल सुविधाओं की क्षेत्रीय प्राथमिकता, चुनाव की दृष्टि से लोकलुभावन व लालूछाप मसालेदार योजनाओं के बीच रेलमंत्री के बजट में आम आदमी की कितनी चिन्ता है और उसकी हैसियत क्या है. सब कुछ बजट को देखने-सुनने के साथ ही साफ होता जाएगा।

लेखक दैनिक स्टार समाचार के सम्पादक एवं वरिष्ठ साहित्यकार हैं.
jairamshuklarewa@gmail.com

Monday, February 25, 2013

संतों! देखहुं जग बौराना!


चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र
बिना किसी निमंत्रण पत्र के आस्था के महाकुम्भ, पुण्यों से भरा, प्रयाग में पिछले एक माह से छलक रहा है। वे बड़भागी हैं जिन्हें अमृत की वह बूंद जो कभी घड़े से छलकी थी पवित्र कर गई होगी, परंतु मुहूर्त के उन क्षणों का लाभ सिर्फ अखाड़े के साधु संतों को ही मिला होगा, क्योंकि आम जनता के लिए रास्ते रुके हुए थे। कहते हैं गंगा, जमुना, सरस्वती के संगम पर महाकुम्भ एक धार्मिक महोत्सव ही नहीं है, आस्थाओं संस्कृतियों विश्वासों का महापर्व भी है। यदि गंगा स्नान से पुण्य नामक पदार्थ मिलता है, ऐसा विश्वास है तो निश्चित रूप से यह अंधविश्वास से अधिक कुछ नहीं है। हमारी वैज्ञानिक सोच को क्यों तब काठ मार जाता है जब हम आस्था के नाम पर ठगे जाते हैं।

अंधविश्वासों और रुढ़ियों के विरुद्ध हम क्यों सवाल नहीं उठाते? हमारा समाज का राजनैतिक वर्ग जो विकास की बात करते हैं, शायद इसलिए चुप रहते हैं, कि यह धर्म का क्षेत्र है। इसकी आंच से हम झुलस जाएंगे। हमसे तो बेहतर नानक, कबीर और रैदास थे जो कठौती में गंगा रखते थे। वैसे भी गंगा ब्रहम्मा के कमण्डल में बहुत वर्षो तक अवस्थित रही। लाखों लोग स्वर्ग की पंक्ति के लिए महीने भर से कल्पवास कर रहे हैं। घर के प्रपंचों में ईश्वर चिंतन हो नहीं पाता। गंगा किनारे प्रपंच कम हो जाते हैं, कौन जाने? संसार का सबसे बड़ा मेला प्रयाग में उमड़ता है। मेला मिलने से होता है, यहां भीड़ में कौन किससे मिलता है, हां बिछड़ने वालों की उद्घोषणा लगातार होती रहती है। इस आस्था में ज्ञान की मौजूदगी का अभाव है। यदि इस आस्था को धर्म कहते हैं तो मुझे विवेकानन्द की वह उद्घोषणा याद आती है कि मैं धर्म और आध्यात्म की भूमि भारत हूं, मैं महान हूं, परंतु मैं दरिद्र, वंचित, शोषित भारत हूं-यह मेरा सच है और इस सच के आगे मैं धर्म और आध्यात्म को तिलांजलि देता हूं। मेरा धर्म दरिद्र दुखी भारत है।

हमारे जीवन की सबसे बड़ी विसंगति ढोंग है जिसे हम पीढ़ी दर पीढ़ी ढोते हुए गौरवान्वित होते रहे हैं। ढोंग को हमने साध कर महिमामंडित किया है। धर्म के नाम पर निर्थक अवैज्ञानिक रूढ़ियां और तात्विक विवेचन रहित आचार परम्पराएं चल पड़ती हैं। सच तो यह है कि धर्म के मूल तत्व को रूढ़ियों ने कमजोर किया है। महाभारत कहता है कि जो धर्म किसी अन्य धर्म के विरुद्ध जान पड़ता है, वह धर्म ही नहीं है। जो धर्म अविरोधी होता है, वस्तुत: वही धर्म है। "धर्म तो बांधते धर्म न ए धर्म: कुधर्म तत्/अविरोधी तु यो धर्म: सधर्मो मुनिसत्तम।" धर्म को बाह्यचारों और आडम्बरों से ढ़ककर हमने उसका स्वरूप ही बदल दिया। इस पाप और पुण्य की परिस्थिति जन्य परिभाषाएं रचते हुए हम पाप धोते रहे, पुण्य कमाते रहे। इस व्यवसायिक कारोबार में आत्मा मरती रही, जिसकी अनदेखी करते रहे।

जिन्होंने धर्म को गंभीरता से ग्रहण नहीं किया, उसकी अनिवार्यता में उनका विश्वास नहीं। जिन्होंने उसमें विश्वास किया उसका व्यक्तित्व भी विभाजित रहा। विश्व जीवन का एक भाग वह है जो ईश्वरमय है, जिसमें सभी जीव एक है, जिसके अणु-अणु में ईश्वर का वास है। किंतु जो व्यवसाय और जीविका का संसार है, उसे वे ईश्वर से विछिन्न मानकर चलते हैं तथा यह समझते हैं कि इस व्यवसायी विश्व में अशांति और संघर्ष, विरोध और दुराव तथा छल और प्रपंच सभी क्षम्य है। सर्वपल्ली राधाकृष्णन कहते हैं ऐसे लोग वस्तुत: पलायनवादी कहे जाएंगे। वे व्यवसाय की दुनिया में जब थक जाते हैं, तभी केवल विश्राम पाने के लिए धर्म की दुनिया में आते हैं। धर्म उनके लिए मात्र कवच है। वे रूप बदलकर आए कालनेमि से भिन्न नहीं है।

विवेकानन्द की पीड़ा को समझने का देश ने प्रयत्न ही नहीं किया। कंठी माला, आरती, घंटे, स्नान-ध्यान में मग्न लोग यह देख ही नहीं रहे हैं कि देश विकास के नाम पर किस चारित्रिक पतन की ओर जा रहा है। आस्था और अंधविश्वास के कारण देश कितनी बार पराजित हुआ, यह बताने गजनवी और गोरी नहीं आएगा, रूप बदलकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियां आ रही हैं। हमारी भाषा बदल गई है, विकास की भाषा मातृभाषाएं नहीं रह गई।

आश्चर्य है कि धर्म ने सबसे अधिक विनाश भारत का किया और धर्म को अफीम की संज्ञा देने वाले मार्क्‍स यूरोप में पैदा हुआ। पोप के दरवाजे पर प्रश्न चिन्ह लगाने वाला मार्टिन लूथर यूरोप में जन्मा जिसने स्वर्ग की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए, भारत में भी कमोवेश यही स्थिति तब भी थी आज भी है। गनीमत है कि देश किसी धर्म का मुखापेक्षी नहीं है। धर्म न तो पुस्तकों में है न सिद्धान्तों में, धर्म आचरण और अनुभूति में निवास करता है। हिंसा सर्वथा त्याज्य नहीं है। एक बार किसी ने विवेकानन्द से पूछा- "कोई शक्तिशाली व्यक्ति यदि किसी दुर्बल का गला टीप रहा हो, तो हमें क्या करना चाहिए! स्वामीजी ने तड़ाक से उत्तर दिया-क्यों? बदले में उस शक्तिशाली की गर्दन टीप दो। क्षमा भी कमजोर होने पर अक्षम्य है, असत्य और अधर्म है, युद्ध उससे उत्तम धर्म है।" वास्तविक शिव की पूजा निर्धन और दरिद्र की पूजा है। केस्टा नामक भूखे संथाल को भोजन करा कर उन्होंने कहा था "तुम साक्षात नारायण हो। आज मुझे संतोष है कि भगवान ने मेरे समक्ष भोजन किया।" यह महाभाव क्या किसी संत साधु महात्मा में बचा है। साधुओं के इन अखाड़ों की पंगत में क्या किसी दरिद्र नारायण को प्रसाद मिलता है। धर्म सभा में विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित होते हुए भी विवेकानन्द ने कभी अपने को जगतगुरु नहीं माना, जबकि अपने देश में महामण्डलेश्वर और जगतगुरुओं के धतकरम सारा देश देखते हुए भी मौन है। पाप का कुम्भ भरा होते हुए भी फूट नहीं रहा है। पता नहीं यह कुम्भ किस धातु का बना है। यदि फूट गया तो आस्था समाप्त हो जाएगी। कुम्भ फूटेगा नहीं, वह आस्था के बल पर पुष्ट है।

जिस देश के छ: करोड़ हाथ पुण्य प्राप्त कर चुके हों, उस देश में दामिनियां सुरक्षा की गुहार लगाए? भ्रष्टाचार के लिए जनता सड़कों पर उतरे? वे पवित्र हाथ ही यदि व्यवस्था सुधार में उठ जाएं तो देश का अतीत गर्वित होकर वर्तमान को आशीषे! लेकिन उन हाथों में तो पाप धोया है, प्रायश्चित किया है। देश के सबसे बड़े संत गांधी विवेकानन्द या किसी ने भी स्नान और कल्पवास से मुक्ति और मोक्ष की बात नहीं कही। कुम्भ में एकत्रित साधु संतों के स्वास्थ्य को देखकर यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि कॉरपोरेट भारत के बाद देश की पूंजी कहां है? सोने के भगवान से लेकर सोने के सिंहासन तक इन्हीं के पास भरे पड़े हैं और सोने के भाव ने आम आदमी का सोना मुश्किल कर दिया है। वह सोता है तो सपने देखता है, जागता है तो छटपटाता है। प्रयाग के सेक्टरों, घाटों पर मुक्तिकामी लोगों की बिलबिलाती इच्छाओं को देख कबीर चिंतित है-"संतों! देखहु जग बौराना।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।

Wednesday, February 20, 2013

'बुंदेलखंड पैकेज में हो रहा है भ्रष्टाचार'


 गुरुवार, 8 दिसंबर, 2011 को 20:11 IST तक के समाचार
बुंदेलखंड के किसान
जन-सुनवाई के दौरान सैंकड़ों किसानों ने अपनी परेशानियों का बयान किया.
पिछले एक दशक से सूखे की मार झेल रहे बुंदेलखंड के त्रस्त किसानों के लिए बृहस्पतिवार को दिल्ली में एक सार्वजनिक सुनवाई का आयोजन किया गया.
सुनवाई के दौरान किसानों पर बढ़ता क़र्ज़, बढ़ते क़र्ज़ के दबाव में आकर हो रही आत्महत्याएं, गांवों में पानी की किल्लत, सूखा और किसानों के शहरों की ओर हो रहे पलायन जैसे मुद्दों को उजागर किया गया.
बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश के उत्तरी भाग के सात ज़िलों और पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के छह ज़िलों से मिलकर बना एक विशाल क्षेत्र हैं, जो भारत के सबसे कम विकसित भागों में से एक है.
"क़र्ज़ से दुखी होकर मेरे पति ने ज़हर पी लिया था. इसके बाद मेरे देवर और सास ने मिलकर मुझे घर से निकाल दिया. मेरी तीन बेटियां है. इनके भविष्य की चिंता मुझे खाए जा रही है. मैं और मेरे पिताजी जब अधिकारियों के पास मुआवज़ा मांगने जाते हैं, तो हमें लताड़ दिया जाता है."
विमला यादव, मृत किसान की विधवा
दशकों से सूखे की मार की वजह से बुंदेलखंड में इसी साल के शुरुआती पांच महीनों में 519 किसानों ने आत्महत्या की, जबकि 2010 में ये सालाना आंकड़ा 583 था.
साल 2009 में केंद्रीय सरकार ने बुंदेलखंड के लिए 7,226 करोड़ रुपए का एक विशेष आर्थिक पैकेज जारी किया था, लेकिन दिल्ली आए किसानों की शिकायत है कि सरकार की इस घोषणा के दो साल बाद भी उस पैकेज का लाभ उन तक तिनका भर भी नहीं पहुंचा है.
झांसी से आए श्रीराम नरेश ने बताया, “अधिकारी बहुत भ्रष्ट हो गए हैं, जिसका नतीजा हम किसानों को भुगतना पड़ रहा है. हमारे लिए बनाए हुए पैकेज का फ़ायदा हम तक ही नहीं पहुंच रहा है. अधिकारी सिर्फ़ पैसा खाने की सोचते हैं. कोई ये नहीं सोचता कि सूखे से निपटने के लिए हमारे लिए गांव में कुँए बनाए जाएं. दिल्ली से पैसा राज्य में आता है, लेकिन निचले स्तर तक पहुंचते पहुंचते वो पैसा न जाने कहां ग़ायब हो जाता है.”

धांधली

ग़ैर सरकारी संस्था एक्शन ऐड की स्थानीय प्रोग्राम मैनेजर गुरजीत कौर का कहना है कि 2009 से लेकर अब तक, सरकारी पैकेज की केवल 11 प्रतिशत राशि ही इस्तेमाल हो पाई है.
उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड में बिगड़ते हालात को देखते हुए पैकेज के कार्यान्वयन की गति को बढ़ाना बेहद ज़रूरी है.
उन्होंने कहा, “पैकेज तो सरकार ने दे दिया, लेकिन इसके कार्यान्वयन के रास्ते में जितनी अड़चनें आ रही हैं, उस पर सरकार का ध्यान नहीं जा रहा है. सबसे बड़ी मुसीबत है भ्रष्टाचार. दूसरी ओर इस पैकेज के लागू किए जाने की प्रक्रिया में कहीं भी आम लोगों की सहभागिता नहीं है. गांवों में जो प्रभुत्व वाले लोग हैं, उन्हीं को ही पैकेज के लाभ मिल रहे हैं. सूखे की स्थिति से निपटने के लिए ज़मीनी स्तर पर जिस तरह की दूरदर्शी योजना होनी चाहिए, उसका कहीं न कहीं अभाव है.”
बुंदेलखंड के लिए दिए गए सरकारी विशेष पैकेज में धांधली के आरोपों के बीच मुख्यमंत्री मायावती की ये शिकायत है कि केंद्र सरकार ने बुंदेलखंड को 80,000 करोड़ रुपए के पैकेज की स्वीकृति नहीं दी.

दोहरी मार 

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पति की आत्महत्या के सालों बाद भी विमला यादव को मुआवज़ा नहीं मिला है.
सार्वजनिक सुनवाई में किसानों का पक्ष रखने आए आपदा निवारक मंच के मुताबिक़ बुंदेलखंड की लगभग 86 प्रतिशत आबादी सीधे तौर पर कृषि पर निर्भर है.
ग़ैर-सरकारी संस्था एक्शन ऐड का कहना है कि बुंदेलखंड में 75 प्रतिशत परिवार क़र्ज़ में डूबे हुए हैं और हर परिवार पर औसतन 45,000 रुपए का क़र्ज़ बकाया है.
दमोह ज़िले से दिल्ली आई विमला यादव के पति ने क़र्ज़ के दबाव में आकर आत्महत्या कर ली थी.
पति के स्वर्ग सिधारने के तुरंत बाद ससुराल वालों ने उन्हें घर से निकाल दिया. विमला आज भी अपने पति की मौत के मुआवज़े का इंतज़ार कर रही है.
विमला अपनी आपबीती का बयान करते हुए कहती हैं, “क़र्ज़ से दुखी होकर मेरे पति ने ज़हर पी लिया था. इसके बाद मेरे देवर और सास ने मिलकर मुझे घर से निकाल दिया, जिसके बाद मुझे अपने माइके लौटना पड़ा. मेरी तीन बेटियां है. इनके भविष्य की चिंता मुझे खाए जा रही है. लेकिन अब मुझे मुआवज़े की भी आस नहीं है. मैं और मेरे पिताजी जब अधिकारियों के पास मुआवज़ा मांगने जाते हैं, तो हमें लताड़ दिया जाता है.”
"पैकेज तो सरकार ने दे दिया, लेकिन इसके कार्यान्वयन के रास्ते में जितनी अड़चनें आ रही हैं, उस पर सरकार का ध्यान नहीं जा रहा है. सबसे बड़ी मुसीबत है भ्रष्टाचार. गांवों में जो प्रभुत्व वाले लोग हैं, उन्हीं को ही पैकेज के लाभ मिल रहे हैं."
गुरजीत कौर, एक्शन ऐड
केवल बुंदेलखंड विशेष फ़ंड में ही नहीं बल्कि दूसरी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में भी धड़ल्ले से हो रही धांधली की मार किसान को झेलनी पड़ रही है.
जहां एक ओर विमला यादव अपने मुआवज़े की लड़ाई लड़ रही है, वहीं टीकमगढ़ से आए सीता राम पाल मनरेगा में हो रही धांधली को उजागर करने के मक़सद से दिल्ली आए.
मनरेगा की राशि के दरुपयोग को साबित करने वाले बहुत से दस्तावेज़ हाथों में लहराते हुए सीता राम कहते हैं, “मेरी पत्नी की साल 2003 में मौत हो गई थी. लेकिन मेरी जानकारी से परे उसके नाम का फ़र्ज़ी जॉब कार्ड बना कर सरपंच और सचिव ने उसके नाम का वेतन अपनी जेब में रख लिया.”
सीता राम जैसे कई किसानों की कुछ ऐसी ही कहानियां थीं.
कई किसानों का कहना है कि मनरेगा के अंतर्गत भी उन्हें नौकरी न मिल पाने की वजह से ज़्यादा से ज़्यादा किसान शहरों का रुख़ कर रहे हैं.

बंटवारे से फ़ायदा?

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सीता राम पाल का आरोप है कि उनके गांव में मनरेगा योजना के फ़ंड का दुरुपयोग किया जा रहा है.
उत्तर प्रदेश के चुनाव नज़दीक हैं और इस बीच चुनावी गहमा-गहमी बढ़ती नज़र आ रही है.
उत्तर प्रदेश के कई पिछडे हुए इलाकों में अब नेताओं के आने-जाने की ख़बरें आ रही हैं.
पिछले दिनों योजना आयोग के अध्यक्ष मोन्टेक सिंह आहलुवालिया भी बुंदेलखंड की स्थिति का जायज़ा लेने वहां पहुंचे थे.
जहां कांग्रेस के नेता यूपी के पिछड़े इलाकों का दौरा कर अपना चुनावी कार्ड खेल रहे हैं, वहीं मायावती ने राज्य के बंटवारे की बात कर चुनावी सरगर्मी बढ़ा दी है.
कुछ लोगों ने मायावती की इस घोषणा को केवल एक चुनावी हथकंडा बताया था लेकिन सभा में मौजूद कुछ किसानों का मानना था कि बुंदेलखंड के नए राज्य बन जाने से उनकी स्थिति में सुधार आने की उम्मीद है.

Friday, February 15, 2013

फिर भी छुट्टा घूम रहें हैं रेप के आरोपी नेता


 शुक्रवार, 15 फ़रवरी, 2013 को 19:34 IST तक के समाचार
दिल्ली बलात्कार
दिल्ली बलात्कार की घटना के बाद पूरे देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर आवाज़े उठने लगीं थीं.
मनोज कुमार पारस उत्तर प्रदेश सरकार में स्टैंप ड्यूटी के मंत्री हैं. नगीना विधानसभा क्षेत्र से चुने गए विधायक मनोज कुमार पारस पर एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार के आरोप हैं.
पिछले साल (2012) दिसंबर में दिल्ली में एक बस में एक पैरामेडिकल छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार और फिर उनकी मौत के बाद भारत सरकार ने कहा था कि वे महिलाओं के ख़िलाफ़ हुए यौन अपराध के मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए तुरंत इंसाफ़ दिलाने की कोशिश करेगी.
दिल्ली बलात्कार मामले के पांच अभियुक्त गिरफ़्तार हो चुके हैं और फ़ास्ट ट्रैक अदालतों में उस केस की सुनवाई भी हो रही है.
लेकिन ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार के इन दावों का उत्तर प्रदेश पर कोई ख़ास असर नही है.
मंत्री मनोज कुमार पारस पर छह साल पहले बलात्कार के आरोप लगे थे लेकिन आज तक उनके ख़िलाफ़ न तो अदालत ने कोई कार्रवाई की है और न ही इस मामले को ख़ारिज किया है.
लेकिन पारस का मामला अकेला नहीं है जिसमें किसी राजनेता या मंत्री पर इस तरह के आरोप लगे हैं.
कई राजनेताओं पर बलात्कार या महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन शोषण के आरोप हैं.

एक तिहाई नेताओं पर आपराधिक मामले

जस्टिस वर्मा कमेटी
वर्मा कमेटी ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे.
राजनेताओं पर नज़र रखने वाली दिल्ली स्थित ग़ैर-सरकारी संस्था एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (एडीआर) के अनुसार भारत में 4835 निर्वाचित नेताओं में से लगभग एक तिहाई ने अपने नामांकन पर्चे में अपने ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज होने की बात स्वीकार की है.
उनमें उत्तर प्रदेश तो शायद सबसे आगे है क्योंकि यहां के मौजूदा 58 मंत्रियों में से 29 पर कोई न कोई आपराधिक मामला दर्ज है.
उत्तर प्रदेश में ही मनोज कुमार पारस के साथी, परिवहन मंत्री महबूब अली पर अपने राजनीतिक विरोधी की हत्या के प्रयास का मामला दर्ज है.
लेकिन महबूब अली अपने ऊपर लगे आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, ''हो सकता है कि अदालत या पुलिस थाने में मेरे ख़िलाफ़ कोई शिकायत दर्ज हो लेकिन अगर जाँच होती है, तो आरोप ग़लत साबित होंगे.''
"अक्सर राजनेता अपने पद का इस्तेमाल करके मामले को वर्षो नहीं बल्कि दशकों तक टालने में सफल हो जाते हैं."
एडीआर के राष्ट्रीय संयोजक अनिल बैरवाल
मनोज कुमार पारस भी अपने ऊपर लगे बलात्कार के आरोप को ख़ारिज करते हुए कहते हैं कि ये उनके राजनीतिक विरोधियों की साज़िश है.
भारतीय समाज में हालाकि एक महिला के लिए बलात्कार का मामला दर्ज करवाना बहुत ही असाधारण बात है क्योंकि उलटे पीड़ित लड़की या महिला को ही पारिवारिक और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है.
लेकिन भारतीय क़ानून के अनुसार आरोप चाहे कितने भी गंभीर हों जब तक वे साबित नहीं हो जाते राजनेता अपनी कुर्सी पर बने रह सकते हैं.
"हो सकता है कि अदालत या पुलिस थाने में मेरे ख़िलाफ़ कोई शिकायत दर्ज हो लेकिन मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है."
महबूब अली, परिवहन मंत्री, उत्तर प्रदेश
एडीआर के राष्ट्रीय संयोजक अनिल बैरवाल कहते हैं कि अक्सर राजनेता अपने पद का इस्तेमाल करके मामले को वर्षो नहीं बल्कि दशकों तक टालने में सफल हो जाते हैं.
एडीआर के मुताबिक़ आपराधिक मामलों के अभियुक्त नेताओं की संख्या हर साल बढ़ती जा रही है.
एडीआर के अनुसार 1448 सांसदों और विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं जिनमें 641 पर तो हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर अपराध के आरोप हैं.

लोकतंत्र को ख़तरा

"राजनीतिक पार्टियां केवल इस बात में विश्वास रखती हैं कि चुनाव जीतना ही असल मुद्दा है. चुनाव कैसे जीते जाएं इससे कोई लेना देना नहीं."
प्रोफ़ेसर जगदीप चोकर, एडीआर के संस्थापक सदस्य
कांग्रेस पार्टी के मौजूदा 206 सांसदों में से 44 पर आपराधिक मामले दर्ज हैं जबकि पूरे देश में सभी पार्टियों को मिलाकर छह विधायकों पर बलात्कार के मामले दर्ज हैं.
दिल्ली बलात्कार के बाद बनी जस्टिस वर्मा कमेटी के सदस्य गोपाल सुब्रमण्यम कहते हैं कि 'भारतीय लोकतंत्र ख़तरे में है.'
वर्मा कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में सिफ़ारिश की थी कि गंभीर आरोप झेल रहे सभी राजनेताओं को अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. लेकिन उनकी सिफ़ारिश को सरकार ने मानने से इनकार कर दिया है.
एडीआर के संस्थापक सदस्यों में से एक प्रोफ़ेसर जगदीप चोकर कहते हैं, ''राजनीतिक पार्टियां केवल इस बात में विश्वास रखती हैं कि चुनाव जीतना ही असल मुद्दा है. चुनाव कैसे जीते जाएं इससे कोई लेना देना नहीं.''