Monday, February 23, 2015

aaropo ki siyasat...vishwas ka sankat


कॉरपोरेट मीडिया की दलाली पर पहली किताब


यह किताब राजकमल प्रकाशन से अभी अभी छप कर आयी है।♦ दिलीप मंडल
शुक्र है कि 2010 में नीरा राडिया कांड हुआ। इससे पहले 2009 में बड़े पैमाने पर पेड न्यूज घोटाला हो चुका था। इन दो घटनाओं से मीडिया में कोई नयी बात नहीं हुई। हुआ सिर्फ इतना कि जो छिपा था, वह दिखने लगा। अब भारत में मीडिया उपभोक्ताओं का एक हिस्सा अब पहले से ज्यादा समझदार है और अपनी राय बनाने और चैनलों और अखबारों को समझने के लिए बेहतर स्थिति में है। इसके लिए हमें खास तौर पर नीरा राडिया का शुक्रगुजार होना चाहिए। यह बताने के लिए कि देश कैसे चलता है और मीडिया कैसे काम करता है।
मीडिया के संदर्भ में नीरा राडिया कांड अपवाद नहीं है। पब्लिक रिलेशन और लॉबिंग के क्षेत्र में तेजी से उभरने वाली नीरा राडिया के टेलीफोन कॉल इनकम टैक्स विभाग ने रिकॉर्ड कराये थे। नीरा राडिया के महत्व का अनुमान लगाने के लिए शायद यह जानकारी काफी होगी कि वे देश के दो सबसे बड़े औद्योगिक घराने – टाटा समूह और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड यानी रतन टाटा और मुकेश अंबानी के लिए एक साथ काम करती थीं। नीरा राडिया जिन कंपनियों का पब्लिक रिलेशन संभालती हैं, वह काफी लंबी है। यह बातचीत दूसरे कॉरपोरेट दलालों, उद्योगपतियों, नेताओं के साथ ही पत्रकारों से की गयी थी। इस बातचीत के सार्वजनिक होने के बाद मीडिया की छवि को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। खासकर इन टेपों में पत्रकार जिस तरह से आते हैं और लॉबिंग तथा दलाली में लिप्त होते हैं, उसके बारे में जानना सनसनीखेज से कहीं ज्यादा तकलीफदेह साबित हो सकता है। खासकर उन लोगों के लिए, जिनके मन में समाचार मीडिया को लेकर अब भी कुछ रुमानियत बाकी है, जो अब भी मानते हैं कि तमाम गड़बड़ियों के बावजूद समाचार मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। इन टेप से यह बात भी निर्णायक रूप से साबित होती है कि चैनलों और अखबारों में जो छपता-दिखता है, उसका फैसला हमेशा मीडिया संस्थानों में नहीं होता।
इस कांड की सबसे पॉपुलर व्याख्या यह है कि मीडिया में कुछ मछलियां पूरे तालाब को गंदा कर रही हैं। मीडिया वैसे तो शानदार काम कर रहा है लेकिन कुछ लोग यहां गड़बड़ हैं जिनकी साजिश भरी हरकतों की वजह से मीडिया बदनाम हो रहा है। इस कांड को लेकर मीडिया की प्रतिक्रिया चुप्पी बरतने से लेकर कॉस्मेटिक किस्म के उपाय करने के दायरे में रही। इस कांड में लिप्त पाये गये पत्रकार आम तौर पर अपने पदों पर बने रहे, लेकिन कुछ पत्रकारों को नौकरी गंवानी पड़ी तो किसी का कॉलम बंद हुआ तो किसी को कुछ हफ्तों के लिए ऑफ एयर यानी पर्दे से दूर रखा गया। इसे व्यक्तिगत कमजोरी या गड़बड़ी या भ्रष्टाचार के तौर पर देखा गया। लेकिन राडिया कांड मीडिया के कुछ लोगों के बेईमान या भ्रष्ट हो जाने का मामला नहीं है। भारतीय समाचार मीडिया स्वामित्व की संरचना और कारोबारी ढांचे की वजह से कॉरपोरेट इंडिया का हिस्सा है। कॉरोपोरेट इंडिया के हिस्से के तौर पर यह काम करता है और इसी भूमिका के तहत मीडिया और मीडियाकर्मी दलाली भी करते हैं। मीडिया के काम और दलाल के रूप में इसकी भूमिका में कोई अंतर्विरोध नहीं है। कॉरपोरेट पत्रकार का कॉरपोरेट दलाल बन जाना अस्वाभाविक नहीं है।
वैसे भी इस बहस को राष्ट्रीय एजेंडे पर लाने की कोशिश हुई है कि लॉबिंग को कानूनी तौर पर मान्यता दे दी जाए। इसे भ्रष्टाचार के समाधान के तौर पर पेश किया जा रहा है। टेलीविजन पर इसे लेकर कार्यक्रम और बहसें हो रही हैं, लेख लिखे जा रहे हैँ। सीएनएन आईबीएन चैनल में इस बारे में आयोजित राजदीप सरदेसाई के एक कार्यक्रम में तो फर्जीवाड़ा करके यह बताने की कोशिश की गयी कि देश के लोग लॉबिंग को कानूनी रूप दिये जाने के समर्थक हैं। इसके लिए फर्जी ट्विटर एकाउंस से 5 मैसेज भेजे गये और सभी मैसेज लॉबिंग के पक्ष में थे। जब एक ब्लॉगर ने यह चोरी पकड़ ली और इंटरनेट पर इसे लेकर शोर मचने लगा, तो राजदीप सरदेसाई ने सॉरी कहकर मामले को निबटाने की कोशिश की और कहा कि कोशिश की जाएगी कि आगे ऐसी गलती न हो। यह मामला भूल-चूक का नहीं था, क्योंकि सभी फर्जी ट्विटर मैसेज लॉबिंग के समर्थन में भेजे गये थे।
यह राजदीप सरदेसाई की नीयत या बेईमानी का सवाल नहीं है। यह कोई गलती या चूक भी नहीं है। कॉरपोरेट मीडिया यही करता है क्योंकि वह यही कर सकता है। कॉरपोरेट सेक्टर अगर चाहता है कि लॉबिंग को कानूनी रूप दे दिया जाए तो मीडिया का दायित्व बन जाता है कि वह इसके लिए माहौल बनाए। अगर मीडिया ऐसा न करे, तो उसे अपवाद कहेंगे। कॉरपोरेट मीडिया भारत के उद्योग जगत के साथ एकाकार है और दोनों के हित भी साझा हैं।
यह छवियों के विखंडन का दौर है। एक सिलसिला सा चल रहा है, इसलिए कोई मूर्ति गिरती है तो अब शोर कम होता है। इसके बावजूद, 2010 में भारतीय मीडिया की छवि जिस तरह खंडित हुई, उसने दुनिया और दुनिया के साथ सब कुछ खत्म होने की भविष्यवाणियां करने वालों को भी चौंकाया होगा। 2010 को भारतीय पत्रकारिता की छवि में आमूल बदलाव के वर्ष के रूप में याद किया जाएगा। देखते ही देखते ऐसा हुआ कि पत्रकारिता का काम और पत्रकार सम्मानित नहीं रहे। वह बहुत पुरानी बात तो नहीं है जब मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। लेकिन आज कोई यह बात नहीं कह रहा है। कोई यह बात कह भी रहा है तो उसे पोंगापंथी करार दिया जा सकता है। मीडिया की छवि जनमाध्यमों में भी बदली है। एक समय था, जब फिल्मों में पत्रकार एक आदर्शवादी, ईमानदार शख्स होता था, जो अक्सर सच की लड़ाई लड़ता हुआ विलेन के हाथों मारा जाता था। अब पत्रकार मसखरा (आमिर खान की पीपली लाइव) है, विघ्नसंतोषी (अमिताभ बच्चन की पा) है, दुष्ट (रण) है। वह अमानत में खयानत करने के लिए आता है।
मीडिया का स्वरूप पिछले दो दशक में काफी बदल गया है। मीडिया देखते ही देखते चौथे खंभे की जगह, एक और धंधा बन गया। मीडिया को एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के साथ जोड़ दिया गया और पता चला कि भारत में यह उद्योग 58,700 करोड़ रुपये का है। अखबार और चैनल चलाने वाली कंपनियों का सालाना कारोबार देखते ही देखते हजारों करोड़ रुपये का हो गया। मुनाफा कमाना और मुनाफा बढ़ाना मीडिया उद्योग का मुख्य लक्ष्य बन गया। मीडिया को साल में विज्ञापनों के तौर पर साल में जितनी रकम मिलने लगी, वह कई राज्यों के सालाना बजट से ज्यादा है।
पर यह सब 2010 में नहीं हुआ। कुछ मीडिया विश्लेषक काफी समय से यह कहते रहे हैं कि भारतीय मीडिया का कॉरपोरेटीकरण हो गया है और अब उसमें यह क्षमता नहीं है कि वह लोककल्याणकारी भूमिका निभाये। भारत में उदारीकरण के साथ मीडिया के कॉरपोरेट बनने की प्रक्रिया तेज हो गयी और अब यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। ट्रस्ट संचालित “द ट्रिब्यून” के अलावा देश का हर मीडिया समूह कॉरपोरेट नियंत्रण में है। पश्चिम के मीडिया के संदर्भ में चोमस्की, मैकचेस्नी, एडवर्ड एस हरमन, जेम्स करेन, मैक्वेल, पिल्गर और कई अन्य लोग यह बात कहते रहे हैं कि मीडिया अब कॉरपोरेट हो चुका है। अब भारत में भी मीडिया के साथ यह हो चुका है।
मीडिया का कारोबार बन जाना दर्शकों और पाठकों के लिए चौंकाने वाली बात हो सकती है, लेकिन जो लोग भी इस कारोबार के अंदर हैं या इस पर जिनकी नजर है, वे जानते हैं कि मीडिया की आंतरिक संरचना और उसका वास्तविक चेहरा कैसा है। लोकतंत्र में सकारात्मक भूमिका निभाने की अब मीडिया से उम्मीद भी नहीं है। चुनावों में मीडिया जनमत को प्रभावशाली शक्तियों और सत्ता के पक्ष में मोड़ने का काम करता है और इसके लिए वह पैसे भी वसूलता है। हाल के चुनावों में देखा गया कि अखबार और चैनल प्रचार सुनिश्चित करने के बदले में रेट कार्ड लेकर उम्मीदवारों और पार्टियों के बीच पहुंच गये और उसने खुलकर सौदे किये। मीडिया कवरेज के बदले कंपनियों से भी पैसे लेता है और नेताओं से भी। जब वह पैसे नहीं लेता है तो विज्ञापन लेता है। टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे अखबार विज्ञापन के बदले पैसे नहीं लेते, बल्कि कंपनियों की हिस्सेदारी ले लेते हैं। इसे प्राइवेट ट्रिटी का नाम दिया गया है। मीडिया कई बार सस्ती जमीन और उपकरणों के आयात में ड्यूटी की छूट भी लेता है। सस्ती जमीन का मीडिया अक्सर कोई और ही इस्तेमाल करता है। प्रेस खोलने के लिए मिली जमीन पर बनी इमारतों में किराये पर दफ्तर चलते आप देश के ज्यादातर शहरों में देख सकते हैं।
मीडिया हर तरह की कारोबारी आजादी चाहता है और किसी तरह का सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं निभाता, लेकिन 2008-09 की मंदी के समय वह खुद को लोकतंत्र की आवाज बताकर सरकार से राहत पैकेज लेता है। मंदी के नाम पर मीडिया को बढ़ी हुई दर पर सरकारी विज्ञापन मिले और अखबारी कागज के आयात में ड्यूटी में छूट भी मिली। लेकिन यह नयी बात नहीं है। यह सब 2010 से पहले से चल रहा था।
2010 में एक नयी बात हुई। एक पर्दा था, जो उठ गया। इस साल भारतीय मीडिया का एक नया रूप लोगों ने देखा। वैष्णवी कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस की मालकिन नीरा राडिया दिल्ली की अकेली कॉरपोरेट दलाल या लॉबिइस्ट नहीं हैं। ऐसे कॉरपोरेट दलाल देश और देश की राजधानी में कई हैं। 2009 इनकम टैक्स विभाग ने नीरा राडिया के फोन टैप किये थे, जो लीक होकर बाहर आ गये। नीरा राडिया इन टेप में मंत्रियों, नेताओं, अफसरों और अपने कर्मचारियों के साथ ही मीडियाकर्मियों से भी बात करती सुनाई देती हैं। इन टेप को दरअसल देश में राजनीतिशास्त्र, जनसंचार, अर्थशास्त्र, मैनेजमेंट, कानून आदि के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इन विषयों को सैकड़ों किताबे पढ़कर जितना समझा सकता है, उससे ज्यादा ज्ञान राडिया के टेपों में है।
क्या उम्मीद की कोई किरण है?
ऐसे समय में जब मीडिया पर भरोसा करना आसान नहीं रहा (अमेरिकी मीडिया के बारे में एक ताजा सर्वे यह बताता है कि वहां 63 फीसदी पाठक और दर्शक यह मानते हैं कि मीडिया भरोसे के काबिल नहीं है…) तब लोग क्या करें? यह मुश्किल समय है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इस दौर में नागरिक पत्रकारिता का एक नया चलन भी जोर पकड़ रहा है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि मीडिया-कॉरपोरेट और नेताओं के रिश्तों के बारे में अखबारों, पत्रिकाओं और चैनलों पर खबर आने से पहले ही राडिया कांड राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ चुका था। मास मीडिया को लेकर बहुचर्चित और प्रशंसित ‘एजेंडा सेटिंग थ्योरी’ यह कहती है कि मीडिया किसी मुद्दे पर सोचने के तरीके पर हो सकता है कि निर्णायक असर न डाल पाए लेकिन किन मुद्दों पर सोचना है, यह मीडिया काफी हद तक तय कर देता है। तो राडिया-मीडिया कांड में ऐसा कैसे हुआ कि मीडिया में कोई बात आये, उससे पहले ही वह बात लोकविमर्श में आ गयी। नीरा राडिया के बारे में मुख्यधारा के मीडिया में पहला लिखा हुआ शब्द ओपन मैगजीन ने छापा। टीवी पर इस बारे में पहला कार्यक्रम इसके बाद सीएनबीसी टीवी18 चैनल पर हुआ, जिसे करण थापर ने एंकर किया। इसके बाद द हिंदू ने इस बारे में पहले संपादकीय पन्ने पर और बाद में समाचारों के पन्ने पर सामग्री छापी। आउटलुक ने इस बारे में कई ऐसे तथ्य सामने लाये, जिनका ओपन ने भी खुलासा नहीं किया था। मेल टुडे और इंडियन एक्सप्रेस ने भी इस बारे में छापा। हिंदी मीडिया की बात करें, तो दैनिक भास्कर के दिल्ली संस्करण में दो पेज की सामग्री छापी गयी। एनडीटीवी ने बरखा दत्त को सफाई का मौका देने के लिए 47 मिनट का एक कार्यक्रम किया (एक घंटे का कार्यक्रम 13 मिनट पहले ही अचानक समेट दिया गया)। इससे पहले तक, जब मुख्यधारा के मीडिया में कोई भी राडिया-बरखा-वीर-चावला कांड को नहीं छाप/दिखा रहा था तो लोगों को इसकी खबर कैसे हो गयी और यह मुद्दा चर्चा में कैसे आ गया?
यह संभव हुआ इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की सक्रियता की वजह से। जब कॉरपोरेट मीडिया राडिया कांड के बारे में कुछ भी नहीं बता रहा था तो लोग इंटरनेट पर पत्रकारिता कर रहे थे और इस कांड से जुडी सूचनाएं एक दूसरे तक पहुंचा रहे थे। फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग, यूट्यूब आदि मंचों पर यह पत्रकारिता हुई। यह पत्रकारिता उन लोगों ने की जिन्होंने शायद कभी भी पत्रकारिता की पढ़ाई नहीं की थी, लेकिन जो किसी मसले को महत्वपूर्ण मान रहे थे और उससे जुड़ी सूचनाएं और लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। यह नागरिक पत्रकारिता है। इसमें कोई गेटकीपर नहीं होता।
नागरिक पत्रकारिता ने दरअसल पत्रकारिता की विधा को लोकतांत्रिक बनाया है। इसमें पढ़ने या देखना वाला यानी संचार सामग्री का उपभोक्ता, सक्रिय भूमिका निभाने लगता है। पत्रकारिता के तिलिस्म को तोड़ने में इसकी बड़ी भूमिका है। ट्विटर और दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए आज अपनी बात पहुंचाना पहले की तुलना में काफी आसान हो गया है। जो बात मुख्यधारा में नहीं कही जा सकती, वह इन माध्यमों के जरिए कही जा सकती है। परंपरागत पत्रकारिता के भारी तामझाम और खर्च से अलग यह नयी पत्रकारिता है।
पश्चिमी देशों में नयी मीडिया की ताकत टेक्नोलॉजी के विस्तार की वजह से बहुत अधिक है। अभी भारत में इंटरनेट शुरुआती दौर में है। इंटरनेट तक पहुंच के मामले में भारत दुनिया के सबसे दरिद्र देशों की लिस्ट में है। लेकिन भारत में भी इसकी ताकत बढ़ रही है। गूगल के अनुमान के मुताबिक, भारत में इस समय इंटरनेट के 10 करोड़ से ज्यादा उपभोक्ता है। चीन के 30 करोड़ और अमेरिका के 20.7 करोड़ की तुलना में यह संख्या छोटी जरूर है, लेकिन भारत इस समय इंटरनेट के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है।
इसके आधार पर अंदाजा लगाया जा सकता है कि नागरिक पत्रकारिता का असर यहां भी बढ़ेगा। मुख्यधारा के मीडिया की सीमाएं हैं और वहां जगह न मिलने वाले समाचारों को इन वैकल्पिक माध्यमों में जगह मिलेगी। मुख्यधारा के मीडिया से अलग रह गये समुदायों के लिए भी यह वैकल्पिक मंच बनेगा। ऐसा होने लगा है। यह सही है कि ऐसा पहले शहरी क्षेत्रों में होगा और कम आय वर्ग वाले शुरुआती दौर में इस पूरी प्रक्रिया से बाहर रहेंगे। इसके बावजूद संचार माध्यमों में लोकतंत्र मजबूत होगा। प्रेस और चैनल की तुलना में यह कम खर्चीला माध्यम है।
इस तरह के वैकल्पिक माध्यमों को लेकर कुछ चिंताएं भी हैं। इस माध्यम की बढ़ती ताकत के साथ ही इंटरनेट पर कॉरपोरेट क्षेत्र का दखल भी बढ़ रहा है। ज्यादा संसाधनों के जरिए वे छोटे मंचों और नागरिक पत्रकारिता करने वालों की आवाज को दबाने की कोशिश करेंगे। प्रतिरोध को वे अपने दायरे में समेटने की कोशिश भी करेंगे। विकिलीक्स के मामले में दुनिया ने देखा कि लोकतांत्रिक कही जाने वाली सरकारों ने किस तरह सूचनाओं और सूचनाएं देने वालों का दमन करना चाहा। भारत में सरकार का चरित्र पश्चिम की सरकारों से ज्यादा अनुदार है और इंटरनेट पर पहरा बिठाने की कोशिश यहां भी होगी। सूचना और जनसंचार माध्यमों का लोकतांत्रिक होना समाज और देश के लोकतांत्रिक होने से जुड़ी प्रक्रिया है। इन उम्मीदों, चिंताओं और आशंकाओं को बीच ही मीडिया के संदर्भ में राडिया कांड को देखा और पढ़ा जाना चाहिए।
dilip mandal(दिलीप मंडल। सीनियर टीवी जर्नलिस्‍ट। सक्रिय फेसबुक एक्टिविस्‍ट। कई टीवी चैनलों में जिम्‍मेदार पदों पर रहे। इन दिनों अध्‍यापन कार्य से जुड़े हैं। उनसे dilipcmandal@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

Monday, February 9, 2015

पटेल, टैगोर के बाद अब निराला पर नजर

पटेल, टैगोर के बाद अब निराला पर नजर


सूर्यकांत त्रिपाठी निराला। सौजन्यः विकिपीडिया।
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला। सौजन्यः विकिपीडिया।
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लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल और कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर के बाद अब आरएसएस और बीजेपी ने महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' पर अपनी नजर डाली है। मध्य प्रदेश बीजेपी के मुखपत्र 'चरैवेति' में निराला को 'हिंदू राष्ट्रवादी चेतना के प्रखर कवि' के बतौर जगह दी गई है।
'चरैवेति' के संपादक जयराम शुक्ल से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि महाकवि निराला छायावादी दौर के सबसे ओजस्वी एवं तेजस्वी कवि थे जिन्होंने अपनी रचनाओं में हिंदू राष्ट्रवादी चेतना का निडरता और प्रखरता के साथ उद्घोष किया।

यह पूछने पर कि निराला को तो राष्ट्रवादी चेतना का कवि कहा जाता रहा है तो वह हिंदू राष्ट्रवादी चेतना के कवि कैसे हो सकते हैं, उन्होंने कहा कि औरंगजेब के सेवादार राजा जयसिंह को महाराज शिवाजी की ओर से लिखी गई चिट्ठी को जिस तरह निराला ने गीत रूप में 'महाराज शिवाजी का पत्र' लिखा और 'राम की शक्ति पूजा' जैसी उनकी रचना उन्हें हिंदू राष्ट्रवादी चेतना के प्रखर कवि के बतौर स्थापित करती है।

उन्होंने कहा, 'महाराज शिवाजी का पत्र' आज भी पाठकों को झंकृत करती है। इस लंबे पत्र गीत में निराला ने राजा जयसिंह को महाराज शिवाजी की ओर से लिखे गए पत्र के मर्म को प्रस्तुत किया है। जयसिंह जब दक्षिण के सैन्य अभियान पर निकला तो शिवाजी ने हिंदू राष्ट्रवादी चेतना को आधार बनाते हुए उसे पत्र लिखा था। निराला का यह पत्र गीत आज भी कई मायनों में प्रासंगिक है।'
शुक्ल ने कहा कि 'चरैवेति' ने 'पुनर्पाठ' के नाम से एक स्थाई स्तंभ शुरू किया है जिसमें निराला के समकालीन कवियों सहित ऐसे कवियों और साहित्यकारों को प्रकाशित करना शुरू किया है जिन्होंने वैदिक संस्कृति और राष्ट्रवाद को अपने रचनाकर्म का विषय बनाया है। इनमें जयशंकर प्रसाद, रामधारी सिंह दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त जैसे महान साहित्यकार शामिल हैं।

शुक्ल ने कहा कि यह सोचना गलत है कि केवल बीजेपी ही निराला को हिंदू राष्ट्रवादी चेतना के कवि के बतौर देखती है, उनकी रचानाएं पढ़िए फिर तय कीजिए कि उन्होंने हिंदू राष्ट्रवादी चेतना की हुंकार भरी थी कि नहीं। निराला अपनी 'जागो फिर एक बार' नामक कविता में लिखते हैं, 'योग्यजन जीता है, ये पश्चिम की उक्ति नहीं... गीता है... गीता है, स्मरण करो बार-बार।'
गौरतलब है कि गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने वाले तत्कालीन कांग्रेस सरकार के गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की नरेंद्र मोदी की ओर से सरदार सरोवर के बीच एक विशालकाय प्रतिमा लगाने और उनके आचार-विचारों की प्रशंसा करने पर कांग्रेस ने उनकी आलोचना की थी।

वहीं आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने संघ के एकत्रीकरण कार्यक्रम में कहा था कि कविवर रविन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी किताब 'स्वदेशी समाज' में अंग्रेजों की आलोचना करते हुए लिखा था कि आपस में लड़कर हिंदू-मुस्लिम खत्म नहीं होंगे बल्कि इस संघर्ष से वे साथ रहने का रास्ता ढूंढ लेंगे और वह रास्ता 'हिंदू राष्ट्र' होगा।

Friday, January 23, 2015

.. इजराइली मॉडल के बरक्स

चीन और पाकिस्तान की जुगलबंदी के साथ भारत को जिस सामरिक तरीके से घेरने की

व्यूह रचना की जा रही है, उसका जवाब अब जीरो टालरेन्स का इजराइल मॉडल ही है। संघ
प्रमुख मोहन भागवत जी ने संघ की सागर शिविर के बाद अपने सार्वजनिक संबोधन में भारत
को इस तरह की रणनीति अख्तियार करने के लिए संकेतों में अपनी बाते रखी हैं। श्री भागवत ने
विस्तार से वह दृष्टान्त रखा कि यहूदियों ने किस तरह इजराइल को एक मजबूत और संप्रभु राष्ट्र
के रूप में खड़ा किया कि आज दुनिया के किसी देश में इतनी हिम्मत नहीं कि वह  उसकी ओर
आँखे तरेर सके।
दरअसल पाकिस्तान जिस तरह शैतान की धुरी में बदल चुका है उसे इजराइल शैली में
ही जवाब देना होगा। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद मोर्चे पर जिस तरह जैसे
को तैसा की रणनीति अपनाई गई उसका असर पाकिस्तान में भी दिख रहा है और चीन में। मोदी
के पहले तक जो भाषा भारत बोला करता थ वही अब ये दोनों पड़ोसी बोल रहे है। सामरिक
नीति पर कामयाबी की दिशा में यह सराहनीय कदम है। लेकिन इससे और आगे बढऩे से पहले
हकीकत के फलक पर खड़े होकर एक बात गौर करना होगी। इजराइल जिन मुल्कों से घिरा है
उनके पास आणविक हथियार नहीं हैं तथा उसकी पीठ पर अमेरिका, इंग्लैण्ड और फ्रांस जैसे
नाटो देशों का हाथ है। यहां पाकिस्तान एटमी ताकत से लैश है, उसकी शैतानियत की गर्भनाल
इन्हीं एटमी हथियारों के नीचे गड़ी है। हाल ही में अमेरिकी थिंक टैंक इन्स्टीट्यूट साइन्स एन्ड
इन्टरनल सिक्यूरिटी ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि पाकिस्तान अपनी चौथी एटामिक
रियेक्टर इकाई खुशाब पर तेजी से काम कर रहा है, यहाँ परमाणु हथियारों में उपयोग किए
जाने वाले प्लूटोनियम को संवर्धित किया जाएगा। अमीरिकी खुफिया सेटेलाइट ने १५ जनवरी
को वहां की तस्वीरें भी जारी की है। पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र मुस्लिम देश है जिसके पास
यह एटमी ताकत है। सही मायने में पूछा जाए तो इस्लामिक आतंकवाद को भी यहीं से ऊर्जा
मिलती है। अब तक दुनिया में जितनी भी बड़ी आतंकी वारदातें हुयी हैं उसका प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष
तौर पर पाकिस्तान से सम्बन्ध रहा है। चाहे वह ९/११ की घटना हो यया मुंबई की। चार्ली एब्दो
की घटना के बाद सबसे कड़ी प्रतिक्रिया भी पाकिस्तान में ही हुई है। अमेरिका ने जिस हाफिज
सईद को वांछित अपराधी मानते हुए करोड़ों डालर का इनाम घोषित किया है वहीं हाफिज
चार्ली-एब्दो की घटना के बाद लाहौर बंद व मिलेनियम मार्च की ऐलान करता घूम रहा है।
पाकिस्तान को सेवा-चिकित्सा व शिक्षा के क्षेत्र में अमेरिका जितना भी अनुदान देता है उसका
हिस्सा हाफिज के जमात-उद-दावा के खाते में चला जाता हैं और उसी रकम से कश्मीर में जब-
तब दबिश देने वाले आतंकी तैय्यार होते हैं।
पाकिस्तान को लेकर अमेरिका की नीति अभी भी भारत के लिए एक अबूझ पहेली की
भांति है। आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि अमेरिका सबकुछ जानते हुए भी आँखे मंूदे हुए है,
और उसी की खैरात में दी गई रकम से अप्रत्यक्ष रूप से आतंकी संगठन पल रहे हैं। जबकि संयुक्त
राष्ट्र संघ की सहमति से अमेरिका ने इराक पर इस संदेह के आधार पर हमला किया था कि वहां
उसने जैविक व रासायनिक हथियार जुटा लिए हैं। अमेरिका को वो नरसंहार के हथियार मिले
या नहीं लेकिन इराक मिट्टी में मिल गया और सद्दाम हुसैन को चूहे की मौत मिली। यह निष्कर्ष
भी अमेरिकी का ही है कि पाकिस्तान की मिलिट्री और उसकी खुफिया एजेन्सी आईएसआई
आतंकवादी संगठनों से मिले हुए हैं और वे इनका इस्तेमाल पड़ोसी देशों के खिलाफ रणनीतिक
तौर पर करते हैं। पाकिस्तान की जम्हूरियत भी वहां की मिलिट्री की बूटों के नीचे दबी है। वहां
लोकतंत्र महज मुखौटा हैं। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान के एटमी हथियार सर्वदा असुरक्षित हैं और
जो मिलिट्री एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन को पाल सकती है वह किसी भी हद तक जा
सकती है। पेरिस की घटना के बाद इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ जिस तरह दुनिया के देश
जुटते जा रहे हैं और आज नहीं तो कल एक निर्णायक जंग छिडऩी ही है ऐसी स्थिति में यदि
पाकिस्तान के एटमी हथियारों का जखीरा आतंकवादियों के हाथ लग गया तो दुनिया का क्या
हश्र होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है। जेहाद के नाम पर आतंक का कारोबार करने
वाले आईएसएस, अलकायदा और तालीबान जैसे संगठनों के शुभचिन्तक पाकिस्तान की
मस्जिदों के बाहर मिलिट्री में भी हैं व वहां के राजनीतिक संगठनों में भी।
इन स्थितियों के चलते अब वक्त की मांग यह है कि पाकिस्तान के परमाणु प्रतिष्ठान को
संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी निगरानी में लेकर इस बात का परिक्षण करे कि पाकिस्तान का परमाणु
कार्यक्रम कितना शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और कितना उसके शैतानी मंसूबों के लिए। यदि
ऐसा होता है तो उसका सीधा असर इस्लामिक आतंकवाद को काबू करने में दिखेगा। परमाणु
शक्तिविहीन पाकिस्तान में कोई आतंकी शिविर भी नहीं चल पाएंगे क्योंकि ऐसी स्थिति में इन
शिविरों को निपटाने में भारत कोई ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। वैसे मोदी ने मोर्चें पर जीरो टॉलरेंस
की नीति का पालन करने के लिए जिस तरह से भारतीय पलटन को निर्देश दिए हैं और उसका
त्वरित अमल हुआ है वह- देश की सुरक्षा के लिए इजराइली मॉडल की ओर ही बढ़ा हुआ पहला
कदम ही समझिए।

(लेखक - वैचारिक मासिक 'चरैवेति के संपादक है)

पाकिस्तान में है वैश्विक आतंक की गर्भनाल

संयुक्त राष्ट्र की सहमति से अमेरिका ने इराक पर महज इसलिए हमला किया था क्योंकि

उसे संदेह था कि सद्दाम हुसैन नरसंहार के लिए जैविक और रासायनिक हथियार जुटा चुके हैं।
विनाश के ये हथियार मिले या नहीं मिले पर बगदाद धूल में मिल गया और सद्दाम हुसैन को चूहे
की मौत मिली। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान परमाणु हथियारों का जखीरा जमाकर रहा है और
उसकी मिलिट्री तथा खुफिया एजेन्सी आतंकियों को पाल-पोस रही हैं फिर भी न तो संयुक्त राष्ट्र
संघ को कोई फिकर हो रही है और नहीं अमेरिका उसके परमाणु जखीरे को अपने कब्जे में लेने
की कोई पहल कर रहा है। भारत की सुरक्षा की चिन्ता करने वालों के लिए यह यक्ष प्रश्न की
अमेरिका के थिंक टैंक इन्स्टीट्यूट फार साइंस एन्ड इन्टरनल सिक्योरिटी ने अपनी ताजा
रिपोर्ट में कहा है कि पाकिस्तान में परमाणु बम बनाने लायक प्लूटोनियम तैयार करने वाले चौथे
परमाणु रियेक्टर खुशाब में काम शुरू हो गया है। इन्स्टीट्यूट ने १५ जनवरी को सेटेलाइट से
मिली तस्वीरों को भी आधार माना है जिसमें चौथी इकाई पर जोरों से काम चल रहा है।
पाकिस्तान एक मात्र इस्लामिक देश है जिसके पास परमाणु बम बनाने की तकनीक है और वह
एटमी हथियारों का जखीरा भी जमा करके रखा है। पता नहीं क्यों अभी तक ये दुनिया को ये
बात समझ में नहीं आ रही है कि इस्लामिक आतंकवाद की गर्भनाल भी इन्हीं परमाणु बमों के
जखीरे में गड़ी है। चाहे अमेरिका की ९/११ की घटना हो या अन्य कोई आतंकी वारदातें सभी के
कनेक्शन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से पाकिस्तान के साथ जुड़े हैं। ओसामा बिन लादेन की
एबटाबाद में सुरक्षित मिला था और वहीं भारत सब के लिए सबसे बड़े वांछित अपराधी दाउद
इब्राहिम और हाफिज सईद भी बेखटके घूम रहे हैं, उन्माद का कारोबार कर रहे हैं। पाकिस्तान में
लोकतंत्र के किरचे-किरचे वैसे भी बिखरे हुए है, वहां की मिलिट्री और खुफिया एजेन्सियों का
आतंकवादियों से गहरा संबंध है, कई बार यह बात साबित हो चुकी हैं। अब खतरा यह है कि
जिस दिन इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ दुनिया में निर्णायक युद्ध छिड़ेगा उस दिन परमाणु
हथियारों का यह जखीरा आतंकी समूहों के हाथ लगने से शायद ही कोई रोक पाए। ऐसे में अब
यह जरूरी हो गया है कि पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को मानव विरोधी घोषित करते हुए
संयुक्त राष्ट्र संघ उसके अणविक हथियारों के जखीरे को अपने नियंत्रण में ले। अमेरिका को भी
पाकिस्तान में वैसी ही कार्रवाई करना चाहिए जैसा कि उसने इराक में की थी क्योंकि पाकिस्तान
में जम्हूरियत वहां की मिलिट्री के हाथों की कठपुतली है।
आतंकवाद को लेकर अपने दोहरे मापदण्डों के चलते पाकिस्तान दुनिया के सबसे
अविश्वसनीय और खतरनाक देश के रूप में उभर रहा है। यहीं वजह है कि पेरिस की चार्ली-एब्दो
की घटना के बाद यदि सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं तो पाकिस्तान में ही हो रहे हैं। ये
अमेरिका का कैसा खेल व कैसी मजबूरी है कि जिस हाफिज सईद के लिए वह करोड़ों डालर
रुपए का ईनाम घोषित करता है वहीं हाफिज आतंकवाद के समर्थन में लाहौर बंद व मिलेनियम
मार्च का ऐलान करता है। पाकिस्तान के सेवा-शिक्षा-चिकित्सा क्षेत्र में जो वह अरबों डॉलर का
अनुदान देता है वह हाफिज के कथित समाजसेवी संगठन जमात-उददावा के माध्यम से उन
आतंकी शिविरों तक पहुँच जाता है जहां भारत के खिलाफ विध्वंश की कार्रवाई के लिए आतंकी
तैयार किए जाते हैं। भारत के लिए यह जरूरी है कि अमेरिका से यह कैफियत पूछें कि इतना सब
होते हुए और देखते हुए भी आखिर पाकिस्तान उसके लिए कैसी मजबूरी है।
एशिया के इस उपमहाद्वीप में भारत की स्थिति इजराइल सी बनती जा रही है। एक ओर
चीन तो दूसरी ओर पाकिस्तान। सीमा पर दोनों की नापाक हरकतें। श्री नरेन्द्र मोदी के
प्रधानमंत्री बनने के बाद यद्यपि भारत ने जैसे को तैसा जवाब देने की शुरूआत कर दी है और
उसका असर भी दिखने लगा है लेकिन हमें अपनी रक्षा के लिए जीरो टाँलरेंस का इजराइली
मॉडल अख्तियार करना होगा। इजराइल के लिए सहूलियत यह है कि उसके दुश्मन देशों के पास
परमाणु हथियार नहीं है लेकिन यहाँ तो पाकिस्तान की शैतानियत का ऊर्जा केन्द्र ही उसके
परमाणु प्रतिष्ठान हैं। यदि दुनिया के देशों को वास्तव में आतंकवाद के खिलाफ लडऩा हैं तो सबसे
पहले पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम पर नजर व नियंत्रण रखना होगा। यह काबू में आ जाए तो
आतंकवाद को मसलना चुटकी का खेल है क्योंकि उसकी गर्भनाल इसी इस्लामिक बम में गड़ी है।

Thursday, January 22, 2015

'जब रेप होता है तो धर्म कहाँ जाता है?'

 मंगलवार, 12 अगस्त, 2014 को 12:54 IST तक के समाचार
म्यूज़ियम का एक दृश्य
"पाँच पांडवों के लिए पाँच तरह से बिस्तर सजाना पड़ता है लेकिन किसी ने मेरे इस दर्द को समझा ही नहीं क्योंकि महाभारत मेरे नज़रिए से नहीं लिखा गया था!"
बीईंग एसोसिएशन के नाटक 'म्यूज़ियम ऑफ़ स्पीशीज़ इन डेंजर' की मुख्य किरदार प्रधान्या शाहत्री मंच से ऐसे कई पैने संवाद बोलती हैं.
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सहयोग से मंचित इस नाटक में सीता और द्रौपदी जैसे चरित्रों के माध्यम से महिलाओं की हालत की ओर ध्यान खींचने की कोशिश की है लेखिका और निर्देशक रसिका अगाशे ने.
रसिका कहती हैं, "सीता को देवी होने के बाद भी अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी और इसे सही भी माना जाता है लेकिन मेरा मानना है कि 'अग्नि परीक्षा' जैसी चीज़ें ही रेप को बढ़ावा देती हैं."

ये विरोध का तरीका है

म्यूज़ियम का एक दृश्य
नाटक में शूर्पणखा पूछती है, "मेरी गलती बस इतनी थी कि मैंने राम से अपने प्यार का इज़हार कर दिया था? इसके लिए मुझे कुरूप बना देना इंसाफ़ है?"
शूर्पणखा सवाल उठाती है, "अगर शादीशुदा आदमी से प्यार करना ग़लत है तो राम के पिता की तीन पत्नियां क्यों थीं?"
रसिका कहती हैं, "16 दिसंबर को दिल्ली गैंगरेप के बाद इंडिया गेट पर मोमबती जलाने और मोर्चा निकालने से बेहतर यही लगा कि लोगों तक अपनी बात को पहुंचाई जाए और इसके लिए इससे अच्छा माध्यम मुझे कोई नहीं लगा."

कट्टरपंथियों का डर नहीं

म्यूज़ियम का एक दृश्य
नाटक में सीता का किरदार निभाने वाली प्रधान्या शाहत्री हैं, "सच से डरना कैसा? ये हमारा विरोध करने का तरीका है और हम जानते हैं, हम ग़लत नहीं हैं."
जब आस्था का मामला आता है तो घर परिवार से भी विरोध होता है. द्रौपदी की भूमिका निभाने वाली किरण ने बताया कैसे घर वाले उनसे नाराज़ हो गए थे.
रसिका का कहना था, "ये पहली बार नहीं है कि किसी ने द्रौपदी और सीता के दर्द को लिखने की कोशिश की है और उस वक़्त धर्म कहाँ जाता है जब किसी लड़की का रेप हो जाता है."

हिंदू सभ्यता पर हमला?

म्यूज़ियम का एक दृश्य
"कुंती ने हमारा सेक्स टाइमटेबल बनाया ताकि किसी भाई को कम या ज़्यादा दिन न मिलें." द्रौपदी जब मंच से ये संवाद बोलती हैं तो तालियां गूंज उठती हैं.
नाटक की सीता पूछती हैं, "लोग पूछेंगे कि सीता का असली प्रेमी कौन था? वो रावण जिसने उसकी हां का इंतज़ार किया या वो राम जिसने उस पर अविश्वास किया?"
सिर्फ़ हिंदू मान्यताओं पर ही छींटाकशी क्यों, इसके जवाब में वह कहती हैं, "हमने ये कहानियां बचपन से सुनी हैं. हमें ये याद हैं और इसलिए हम इसके हर पहलू पर गौर कर सकते हैं."