Saturday, April 6, 2013

मर्यादा की कसौटी पर धर्म


 चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र 
 हम नहीं जानते कि धर्म नामक ढाई मात्रिक शब्द का पहला प्रयोग किसने किया लेकिन इतना जानते हैं इसका प्रयोग सम्प्रदायों के लिए किसी भी काव्य, पुराण-इतिहास में नहीं किया गया। सच तो यह है कि हम, मनुष्य के उस धर्म की बात करते हैं, जो उसने किया वह हिन्दू, इस्लाम, ईसाई धर्म जैसे रोग गस्त बीमारी से मुक्त प्रत्येक मनुष्य का सहज धर्म है। मनुष्य द्वारा किया गया कर्म ही धर्म की संज्ञा पाता गया। किसी के लिए धर्म, स्वधर्म बना तो अन्यों के लिए अधर्म भी। धर्म की सर्वमान्य परिभाषा कभी नहीं बनी, किसी भी युग में। इसी कारण आपद्धर्म और परमधर्म भी चर्चा और संवाद के विषय बने। धर्म, संवाद का विषय था विवाद का नहीं परंतु इस शब्द की दुर्गति इसके जन्मते ही शुरु हो गई। धर्म की स्थापना का गुणानुवाद करते गाते राम-कृष्ण भी आए और जो कुछ भी लोक में करणीय-अकरणीय किया उसे धर्म कहा। राम के जन्म की धार्मिकता को अनेक चुनौतियों में, वानरराज बालि का कथन अधिक प्रासंगिक है- व्याघ की तरह मारना, छिपकर, दो युद्धरत भाईयों में, बिना दूसरे को सुने परखे एक का हो जाना कौन सा धर्म था? धर्म की कसौटी यदि न्याय है तो हमारे आदर्श चरित्रों ने अपने अधर्मो को भी धर्म कहकर उसे न्यायोचित ठहराया। कृष्ण कहते हैं - जहां मैं हूं, वहीं धर्म है और जहां धर्म है वहीं विजय है।
पिता-पुत्र, भाई-चाचा इत्यादि नाते रिश्तों को धर्म से मत जोड़ो सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज।किस धर्म की स्थापना में कृष्ण लगे हैं, शायद न्यायोचित अधिकार मांगने से न मिले तो लड़कर ही, युद्ध-धर्म से प्राप्त किया जा सकता है। और युद्ध और प्रेम में सब सही है का मुहावरा भी धर्माधारित है। धर्म की बातें सबसे अधिक महाभारत में हैं। व्यास, भीष्म, विदुर, धृतराष्ट्र यदि धर्म का पालन करते दिखते हैं तो भीम, कर्ण, कुन्ती, द्रौपदी भी समान भाव से धर्म का पालन करते हुए प्रश्न भी खड़े करते हैं।
व्यास, पांडवों के पक्षधर कवि हैं, उन्होंने कौरवों को दरकिनार किया, जबकि दोनों उनकी संतान हैं। व्यास, युधिष्ठिर को धर्मराज सत्यवादी कहते हैं परंतु धर्म राज के झूठ और व्यसन ने, पूर्वज भरत के भारत में महाभारत करा दिया। बिना स्वार्थ के निष्काम कर्म करने वाले भीष्म और कर्ण स्वधर्म का पालन करते हैं, इन्हें राज्य नहीं चाहिए था। इनका धर्म, राज्य संरक्षण और मित्र धर्म का निर्वाह था।
महाभारत की कथा में जहां भी मोड़ आया है, वहां युधिष्ठिर खड़े हैं। महाभारत के वे नायक हैं, क्योंकि फल की प्राप्ति उन्हें होती है, पांडवों में ज्येष्ठ हैं। युद्ध में अस्थिर, धीर, मृदु, लज्जाशील वदान्य हैं। कर्ण उन्हें ‘वेदपाठरत ब्राrाण’ कहकर निरादृत करता है परंतु चालाक भी कम नहीं हैं। अजरुन के लक्ष्यवेध और विवाह के बाद युधिष्ठिर का यह कहना कि आज अद्वितीय भिक्षा लाए हैं, किस सत्य को उद्घाटित करता है। विश्व के किसी भी काव्य- पुराण-इतिहास की सबसे अभागी स्त्री, द्रौपदी है जिसको अनिच्छा से पांच पुरुषों में बंटने के लिए दिन या महीने निश्चित किये गए।
युधिष्ठिर द्यूतासक्त हैं, सभापर्व और विराट पर में हम जुएं का प्रभाव देखते हैं। धन-सम्पत्ति सब जुएं में हार जाने पर युधिष्ठिर ने चारो भाईयों सहित द्रौपदी को दांव पर लगा दिया। अपने को हार जाने पर युधिष्ठिर दूसरे को दांव पर कैसे लगा सकते हैं? यह द्रौपदी का सम्पूर्ण सभा से प्रश्न था। आश्चर्य तो यह है कि भीष्म भी द्रौपदी का साथ नहीं देते। कहते हैं- सब सत्व खोकर भी दास का अपनी पत्‍नी पर स्वामित्व बना रहता है। भरी सभा में द्रौपदी के पक्ष में धृतराष्ट्र पुत्र विकीर्ण कहता है- द्यूत एक राजोचित व्यसन है, व्यसनग्रस्त राजा जो कुछ करता है वह नगण्य है। दास होने के बाद युधिष्ठिर का द्रौपदी को दांव पर लगाना अवैध है। युधिष्ठिर से किंचित सहमत होते हुए कहता है कि यह जुआं अपनी प्रेरणा से नहीं शकुनि की उत्तेजना से खेला था। द्रौपदी पांच भाईयों की पत्‍नी थी किंतु युधिष्ठिर ने अनुजों की अनुमति लिए बिना ही उसे दांव पर रख दिया था अतएव यह द्यूत अग्राह्य है। विकर्ण द्वारा कही गई धर्मसम्मत बात पर धर्मराज की सफाई कोई मायने नहीं रखती। क्या इस बात की पुनव्र्याख्या आज आवश्यक नहीं है कि इतने झूठ, छल, प्रपंच रचने-करने वाले को धर्मराज कहकर कब तक लकीर पीटते रहेंगे।
व्यास, महाभारत युद्ध को धर्मक्षेत्र कहते हैं। मामा शल्य को कौरव पक्ष में गए जानकर धर्मराज कहते हैं- मामा! आप मुङो वचन दीजिए कि कर्ण-अजरुन के युद्ध के समय आप कर्ण के सारथी होते हुए भी उसके मनोबल को हतोत्साहित करेंगे। मेरे लिए यह कुकर्म आपको करना ही होगा। युधिष्ठिर के इस निंदनीय प्रस्ताव को वंदनीय और धर्माचारित तो नहीं ही कहा जाएगा। दूसरी तरफ कृष्ण ऐसे सारथी हैं। जो हर समय अजरुन को उत्साहित भर नहीं करते, सभी को मरा हुआ दिखाकर अजरुन को आश्वस्त भी करते हैं। द्रोण ऐसे महायोद्धा हैं जिनका रथ धरती से कुछ ऊपर उठकर चलता है, उनको मारने के लिए कृष्ण, युधिष्ठिर से द्रोण के मर्म पर सांघातिक चोट करने वाला इतिहास का सबसे बड़ा मिथ्या (झूठ) नरो व कुंजरो उच्चरित करा के रथ को जमीन पर गिराने का धर्म निर्वाह कराते हैं। हाथी और घोड़े कितने ही युद्ध में मरे होंगे। हाथी का नाम ˜अश्वत्थामा पहले कभी चर्चा में नहीं था।
हाथी के मरने का सत्य द्रोण की मृत्यु का कारण बना। जानते हुए भी धर्मराज का अर्धसत्य कृष्ण के शंखध्वनि में खो गया और पुत्र की मृत्यु मान द्रोण ने देह त्याग दिया।
महाभारत का युद्ध चरम पर है। कर्ण-अजरुन आमने सामने हैं।
पाण्डवों को पकड़ कर छोड़ देना कर्ण का कौतुक है। दोनों अदभुत धनुर्धर, दोनों की काट दोनों के पास है। कर्ण के तरकस में एक ऐसा सर्पबाण है, जो बार-बार कर्ण को प्रत्यंचा पर चढ़ाने के लिए प्रेरित करता है। अजरुन का परम शत्रु अश्वसेन फुफकार रहा है। जन्म से ही पार्थ का शत्रु है। क्षण में अजरुन को खत्म कर सकता है, परंतु कर्ण, मनुष्यों की इस लड़ाई में सर्प की सहायता नहीं लेता- कहता है- तेरी सहायता से जय तो मैं अनायास पा जाऊंगा। आने वाली मानवता को, लेकिन क्या मुख दिखलाऊंगा।कर्ण का धर्म, उसकी सम्पूर्ण जीवनशैली सभी पाण्डवों पर भारी पड़ती है। रथ के पहिए को निकालने के लिए युद्ध-धर्म की बात करता है, कृष्ण, अजरुन को कर्ण का सिर (निहत्थे) धड़ से अलग करने की धर्मसम्मत सलाह देते हैं, क्योंकि जहां वे हैं वहीं धर्म है। जरासंध और दुर्योधन की मृत्यु के पीछे कौन सा धर्म है। कृष्ण के कथन पर पूरा पांडव समाज संचालित है। युधिष्ठिर जब स्वधर्म की बात करते हैं कि स्वधर्म में निष्ठा ही तपस्या है, स्वधर्म में स्थिरता ही स्थैर्य है तब प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि उनका स्वधर्म उन्हें क्या धर्मराज की संज्ञा देता है और उनका परिपालन क्या वे करते हैं? स्वर्गारोहण में हिमालय के पाद देश की स्वर्णरेणु छूते ही द्रौपदी के पांव फिसल गए, वह गिर पड़ी। पांचों पतियों ने मुड़कर भी नहीं देखा वरन धर्मराज युधिष्ठिर ने भीम से कहा-˜मुड़कर न देखो! आगे आ जाओ!-
 लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।
सम्पर्क सूत्र - 09407041430. 

भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या!


 सचिन कुमार जैन
भूख क्यों पैदा होती है? इस सवाल का जवाब दीजिए! जवाब- क्योंकि शरीर और अपना काम करने के लिए उर्जा की जरूरत पूरी करने के लिए भोजन की जरूरत होती है और उसी जरूरत की अभिव्यक्ति है भूख। अगला सवाल यह की पेट की भूख किससे दूर होती है! स्वाभाविक है कि खाने से, रोटी से! यह सामग्री कहां से मिलती है? कारखाने से या प्रकृति से, बाजार से जंगल से, जमीन से, पानी से! जब भरपेट खाना नहीं मिलता है तब भूख वंचितों की जीवन की सहयात्री हो जाती है।

अब भूख का जन्म सरकार की नीतियों की कोख से होता है। उस सरकार की कोख से, जो यह मानती है कि खाद्यान्न और खाना उद्योगों और चिमनी वाले कारखानों में उपजता है। वह सरकारें जो यह मानती हैं कि जमीन बांझ हो जाए तो कोई समस्या नहीं है, नदी सूख जाए तो कोई संकट नहीं है, जंगल उजड़ जाए तो भी अस्तित्व संभव है। वह प्राकृतिक सम्पदा को निजी संपत्ति का दर्जा देने को तत्पर है क्योंकि उसे रोटी की पूंजी से ज्यादा मुद्रा की पूंजी से मुहब्बत है। वह अपने इस पागलपन में यह भूल जा रही है कि भोजन के बिना जीवन संभव नहीं है और भोजन खदानों से नहीं निकलता है, वह तो खेत में लहलहाता है और जंगल में बिखेरा जाता है। बस सोच का यही विरोधभास हमारे सामने भुखमरी से संकट के रूप में सामने है। हम बड़ी बात छोड़ दें और केवल आदिवासियों की बात करें तो बात थोड़ी और स्पष्ट होती है। शिक्षित लोग बता रहे हैं कि आदिवासियों के बच्चे ज्यादा कुपोषित हो रहे हैं। सरकार की तमाम योजनाओं में आदिवासियों को वंचित, पिछड़ा या आदिम समूह कहा जाता है। उन्हें छोड़कर बाकी समाज "विकसित" हो गया है। पर लोग वास्तव में सच जानना नहीं चाहते हैं।

मध्यप्रदेश के डिंडोरी, मंडला, बालाघाट, सीधी और सिवनी जिले के बैगा और गोंड आदिवासी जंगल से 25 तरह के मशरूम, 5 तरह की शहद, 28 तरह के कंद, 45 तरह की भाजियां लाते थे। यह उनकी खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य को सुरक्षित रखता था। इस संपदा को लौटाने के लिए सरकार को जंगल की कटाई रोकनी पड़ेगी, पर क्या सरकार इसके लिए तैयार है? आदिवासियों को जंगल से ही आंवला, औषधीय पौधे, इमली, चिरौंजी, हर्रा-बहेड़ा, तेंदू, महुआ मिल सकता है, जो उनकी आजीविका को एक ठोस आधार प्रदान करेगा।

महाकौशल के इलाकों में 30 साल पहले 56 तरह के अनाज मिलते थे। आज लोग केवल 24 के बारे में जानते हैं, 28 तरह के कंदमूल में से 13 के बारे में जानकारी है, 45 तरह के फल- फूल में से 21 की और 54 तरह की सब्जी-भाजी में से 27 की जानकारी उपलब्ध है। जिन्हें आज सरकार पिछड़ी बताती है, वे 262 तरह की सामग्री का अपने खाने में उपयोग करती थीं। तो पिछड़ा और गरीब कौन है? बालाघाट के सिंगौरी गांव में विस्थापित जीवन जी रही बरको बाई ने कहा "देख भईया, भोपाल से आया है। हमने सब सुन लिया। अब तुम हमार बात सुनीस। हमका जंगल से भगा देईस तो हमार तो रोटी चला गया। सरकार बस दाना देकर मुर्गी लड़ाई, अब नहीं। हमें कहता है तुमने जमीन पर कब्जा किया है। अब छोड़ो। सैंकडों साल से रह रहे थे। अब कहते हैं हम अवैध हो गए। कोई ये न बताई कि कहां जाई। अब जंगल न जा सके, जानवर न पाल सके, देवता न पूज सके, कंदा भाजी मिलता था पेट भरती का, अब वह उनके कब्जे में है।" विकास की मौजूदा अवधारणा ने आदिवासियों के गुजारे की मूल व्यवस्था को तोड़कर रख दिया है। इसी कारण आज यही समुदाय सबसे ज्यादा भूख और सामाजिक असुरक्षा का शिकार हुआ। मध्यप्रदेश में सिंचित खेती का रकबा कुल क्षेत्र का लगभग 37 प्रतिशत है, लेकिन 10 फीसदी से कम आदिवासी इलाकों में ही सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। उनकी जमीनें ऊबड़खाबड़, पठारी और असमतल है। रागी, कोदो, कुटकी, सांवा, दलहन आदि पौष्टिक अनाजों को, जिन्हें आज मोटा अनाज कहा जाता है, असल में बारीक अनाज होता है। इनका उत्पादन कम होता गया, पर आज भी प्रदेश को पौष्टिक अनाज का 90 फीसदी हिस्सा इन्हीं आदिवासी इलाकों से मिलता है।

जब सिंचाई की बात होती है तो यह क्यों नहीं देखा जाता कि कम पानी वाले स्थानों पर पौष्टिक अनाज की परंपरा और व्यवहार वाली अर्थव्यवस्था रही है। सिर्फ गेहूं और चावल की ही बात क्यों? जबकि हम जानते हैं कि चावल में 6.8 ग्राम् प्रोटीन और 0.7 मिलीग्राम आयरन होता है, परन्तु बाजरा में 10.6 ग्राम प्रोटीन और 16.9 मिलीग्राम आयरन होता है गेहूं में 11 मिलीग्राम केल्शियम है, लेकिन रागी या नाचनी में 344 मिलीग्राम कैल्शियम होता है। अपने गांव की थाली में से रागी गायब है पर बड़ी कंपनी रागी से नूडल्स बना कर बाजार में यह कह कर बेंच रही है कि इससे बच्चों का विकास होगा और वे स्वस्थ नागरिक बन जायेंगे। ब्रिटानिया कंपनी ने रागी से बना बिस्किट बाजार में बेचना शुरू किया। वे प्रचार करते हैं कि मधुमेह के मामले में रागी बिस्किट बहुत उपयोगी उत्पाद है। जब् एक बड़ी कंपनी बाजार में आकर विज्ञापन दिखाकर ऊंची कीमत पर वस्तु बेचती है तो समाज को उस पर ज्यादा विश्वास होता है और जब समाज के ज्ञान और व्यवहार की बात होती है तो प्रकृति से रागी, कोदो, कुटकी, महुआ लेने वाले आदिवासी समाज को पिछड़े समुदाय का दर्जा दिया जाता है।

अखबारों में अक्सर सामने आता है कि आदिवासी घास की रोटी खा रहे हैं। असल में यह सावा नाम की घास है। उसमें गेहूं से ज्यादा प्रोटीन और आयरन होता है। ये जलवायु परिवर्तन से जमकर मुकाबला कर सकते हैं। यदि हम स्थानीय पौष्टिक अनाजों के उत्पादन और उपयोग को प्रोत्साहित करने के साथ यह सुनिश्चित करें कि ये आदिवासियों की थाली तक पहुंचे तो काहे का कुपोषण!! बैतूल में गुरुवा गांव के किसान भैयालाल कहते हैं कि सरकारी योजना की कोई बात मत करो। अधिकारी हमें गेहूं और धान के बीज देकर समझते हैं कि ये उगाओ, अच्छे भाव मिलेंगे। जब खेत में पानी नहीं है तो पानी पीने वाली इन फसलों को उगाकर हम जिंदा कैसे रहें? डिंडोरी के लमतु बैगा के मुताबिक, अधिकारी जानते ही नहीं हैं कि बैगा किस तरह की खेती करते हैं। वे आये और धान का बीज बांट गए। कोदो- कुटकी के बीज तो उनके पास होय नी, हमारी फसल के बारे में न वो पूछे, ना वो कुछ जाने। बिना कोदो कुटकी खाए और, मक्के का पेज पिए बिना हमार जात का पेट ही न भरे। अब आप ही सोचिये पिछड़ा अज्ञानी और नादान कौन है?

लेखक विकास सम्वाद केंद्र से जुड़े जाने-माने समाज विज्ञानी हैं।

प्रसारण के डिजिटलीकरण की जिद


सौमित्र रॉय
पहले एंटीना, फिर केबल और अब छतरी। कल का बुद्धू बक्सा आज बाजार की दौड़ में समझदार हो गया है। दिसंबर 2011 में संसद ने कानून पारित कर इसे तकनीकी रूप से ताकतवर भी बना दिया है। केबल टीवी नेटवर्क (नियमन) कानून 1995 की धारा 9 में संशोधन से डिजिटल टीवी प्रसारण अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। इसको सरकार की बचकानी जिद कहें या बाजार का बढ़ता दबाव, यह मान लिया गया है कि जिसके पास सामर्थ्य होगी वह बिना गुण-दोषों को परखे इसे मान लेगा और बाकी आखिर में मानने पर मजबूर हो ही जाएंगे। यह पूछे बिना कि आखिर सरकार को अचानक टेलीविजन प्रसारण का डिजिटलीकरण करने की क्यों सूझी? केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय इसे एक ऐसी पारदर्शी व्यवस्थाओं की शुरुआत बता रही है, जो टीवी उपभोक्ताओं की वास्तिविक संख्या यानी 20 करोड़ परिवारों की जानकारी देगा। इससे फर्जी उपभोक्तावाद के रूप में केबल ऑपरेटरों की काली कमाई बंद होगी। सर्विस टैक्स और मनोरंजन कर की ज्यादा वसूली होगी।

लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि डिजिटलीकरण की अनिवार्यता से एक स्पष्ट विभाजन की स्थिति बनेगी। यानी जो डिजिटल टीवी देख पाने में समर्थ हैं और वे जो इसकी हैसियत नहीं रखते। केंद्र सरकार डिजिटलीकरण की प्रक्रिया के पीछे जिस पारदर्शिता का दावा कर रही है, उसकी हवा देश के चार महानगरों में पिछले साल ही निकल चुकी है। इसके बावजूद दूसरे चरण में भोपाल, इंदौर और जबलपुर समेत देश के 38 बड़े शहरों में इसे 31 मार्च तक अनिवार्य रूप से लागू किया जा रहा है। यह प्रक्रिया तकरीबन आधार कार्ड जैसी है, जिसका कोई वैज्ञानिक व प्रमाणिक आधार नहीं है। टीवी प्रसारणकर्ताओं और मास्टर ऑपरेटर्स के लिए तो यह फायदे का सौदा है, क्योंकि बैठे-बिठाए उन्हें 70 प्रतिशत तक ज्यादा कमाई होगी। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में उपभोक्ता बंधुआ हो जाएगा। इसका दर्द उसे अभी से महसूस हो रहा है। सौ फीसदी डिजिटलीकरण के दावे से सजे दिल्ली और मुंबई में स्थानीय केबल ऑपरेटरों ने उपभोक्ताओं की पूरी जानकारी भरे बगैर उन्हें घटिया सेट टॉप बॉक्स (एसटीबी) थमा दिए। इसके लिए दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के द्वारा तय 800 रुपए से ज्यादा लिए गए।

इस दलील पर कि 800 रुपए में तो घटिया एसटीबी आएगा। लेकिन 1500 रुपए देने के बाद भी प्रसारण की गुणवत्ता पहले से भी घटिया है। ट्राई ने बीआईएस मानक के एसटीबी मुहैया कराने की हिदायत दी है, लेकिन पहले चरण और अब दूसरे चरण के शहरों में भी इस तरह के डिब्बों की संख्या 30 प्रतिशत से भी कम है। इसका खामियाजा उपभोक्ताओं को भुगतना होगा, क्योंकि उन्हें इस पूरी प्रक्रिया की कोई तकनीकी जानकारी नहीं है। इसे सेवाओं का तकनीकी विभाजन भी कहा जा सकता है, क्योंकि 20 करोड़ परिवारों में से उपभोक्ताओं का 80 फीसदी केबल प्रसारण पर निर्भर हैं। इन्हें पहली पीढ़ी की गुणवत्ता वाले प्रसारण से काम चलाना होगा, जबकि बाकी के 20 फीसदी घरों में छतरी से सीधे पहुंच रहा डायरेक्ट टू होम (डीटीएच) तीसरी और चौथी पीढ़ी का है।

डिजिटलीकरण की अनिवार्यता के कारणों को समझते समय हमें यह देखना होगा कि आखिर पूरी प्रक्रिया की कमान किसके हाथ होगी? आप अपने हाथ में टीवी का रिमोट होने पर चाहे जितना इतराएं, पर असल में इसका नियंत्रण केंद्र सरकार के हाथ में होगा। वह जब चाहे, केबल प्रसारण पर रोक लगा सकती है।

टीवी पर दिखाए जा रहे विज्ञापनों को भी केंद्र सरकार नियंत्रित करेगी। चूंकि डिजिटलीकृत प्रसारण एनक्रिप्टेड यानी नकल न किए जा सकने योग्य होंगे, तो इस स्थिति में स्थानीय चैनलों और शहर के विज्ञापनों पर भी रोक लग जाएगी। उपभोक्ता तब झक मारकर वही देखने पर मजबूर होगा, जो उसे प्रसारणकर्ता और मल्टी सिस्टम ऑपरेटर दिखा रहा है। डिजिटलीकरण के दूसरे चरण में पहले चरण के मुकाबले पांच गुना ज्यादा खर्च आ रहा है, क्योंकि लगभग आधा भारत इसके दायरे में आ जाएगा। केंद्र ने केबल टीवी प्रसारण में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाकर 74 फीसदी कर दी है। यह पैसा न तो शहरी निम्न मध्य वर्गीय उपभोक्ताओं की सुविधा बढ़ाने के लिए लगाया जा रहा है और न ही गांव के आखिरी व्यक्ति के लिए। कंपनियों ने तैयारी कर ली है। उनके लिए 122 करोड़ उपभोक्ताओं का खुला बाजार है। वे खास उपभोक्ता वर्ग के लिए चैनल तैयार कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर हाई डेफिनिशन में होंगे। इन्हें देखने के लिए पूरा टीवी और सेट टॉप बॉक्स बदलना होगा। कुछ चैनलों के गुच्छे नए सिरे से तैयार हो रहे हैं, क्योंकि लोगों में उनकी मांग है। नतीजा यह होगा कि उपभोक्ताओं को जहां डिजिटल केबल प्रसारण के लिए प्रति माह 170 से 200 रुपए का वादा किया जा रहा है, उनसे आने वाले समय में 300 रुपए वसूले जाएंगे।

आजकल सरकार कानून और नीतियां अलग-अलग बनाती है और दोनों में भिन्न बात कही जाती है। कानून हकदारी की बात करता है तो नीतियां भेदभावपूर्ण होती हैं। इस मामले में भी केंद्र सरकार ने केबल उपभोक्ताओं से प्रतिमाह लिए जाने वाले शुल्क के निर्धारण का हक एमएसओ और स्थानीय केबल ऑपरेटरों पर छोड़ दिया। सरकार इस बात की भी कोई गारंटी नहीं दे रही कि शहरी निम्न वर्गीय परिवारों और आगे चलकर गांव के गरीब परिवारों से रियायती दरों पर शुल्क वसूला जाएगा। पेट्रोल- डीजल की तरह सब कुछ बाजार भरोसे है। बाजार अपनी मनमानी करेगी और सरकार चुपचाप देखती रहेगी। इस प्रक्रिया में लाखों परिवार सूचनाओं और मनोरंजन के पिटारे का लुत्फ उठाने से वंचित हो जाएंगे। आखिर में हार मानते हुए उन्हें अपने घरेलू बजट का एक हिस्सा सरकार और केबल ऑपरेटरों की जिद के आगे न्योछावर करना होगा।

निश्चित रूप से यह हकदारी देने के बजाय टेलीविजन जैसे सूचना-संचार के अहम साधन से वंचितों को दूर करने वाला कदम है। हालांकि व्यापक मध्यमवर्गीय समाज को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसके सामने सवाल भेदभाव का नहीं, मनोरंजन की मजबूरी का है। तेजी से आधुनिक हो रहे सिनेमाहॉल और मल्टीप्लेक्स में मनोरंजन 300 रुपए से ज्यादा महंगा है। सही मायनों में यही वर्ग उपभोक्ता है। गरीब, वंचितों को कौन पूछता है।

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं व विकास संवाद संस्था से जुड़े 

त्योहारों में अब वो बात कहां!


चिन्तामणि मिश्र
बाजार ने हम सभी को उपभोक्ता बनाने के साथ हमारा बहुत कुछ हमसे छीन लिया है। इस बहुत कुछ में हंसना और मुस्कराना भी शामिल है। हम मुस्कराते भी है तो औपचारिकता के साथ आधा इंची मुस्कान होती है। हमारे चेहरे पर। ऐसी मुस्कान ओढ़ी हुई और कृत्रिम होती है। हमारे होली-दीवाली आदि त्यौहार बाजार से पैदा नहीं हुए हैं। होली में तो सभी बराबर हो जाते हैं, इसे मनाने के लिए अमीर होना अनिवार्य नहीं है। अखबारों के विज्ञापनों की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि ये बाजार के नहीं भारतीय जीवन और ऋतुओं से निकले त्यौहार हैं। इनका भारत के लोगों से जैविक सम्बन्ध है। हर त्यौहार मात्र आनन्द, उल्लास और मिठाई-पकवान का ही नाम नहीं है। इनके माध्यम से हम पारिवारिक और सामाजिकता के नाते-गोते मजबूत करते हैं। अगर इनमें कभी-कहीं गांठ लग जाती है तो इन त्यौहारों में उसे प्रेम-स्नेह से सुलझ लेते हैं। अब तो हम आपसदारी का ही श्राद्ध कर रहे हैं। हमारे स्वार्थ तथा हमारे अहम् ने रिश्तों को ही बांझ करना शुरू कर दिया है। त्यौहारों में मित्रों, परिचितों के साथ परिवार के लोगों से मिलने और उन्हें यथा उचित प्रणाम, नमस्कार, चरण स्पर्श करने, आशीष देने-लेने की परम्परा न जाने कितनी सदियों से हमारे यहां थी किन्तु अब हम एक ही छत के नीचे रह कर भी ऐसे मौकों में अबोलेपन और अपरिचय के साथ जी रहे हैं। अंहकार का प्रेत अपने सिर पर आज हर कोई रख कर अकेला जी रहा है। प्रसन्न हो रहा है।

पिछले दिनों अपनी बस्ती की होली देख कर घर लौटा और लगभग भोर होने तक जागता तथा सोचता रहा कि हमें क्या होता जा रहा है। हम ऐसा कैसा जीवन जीने लगे हैं कि हमारी जिन्दगी से अतीत के सरोकार, हमारे रीति-रिवाज, हमारी संस्कृति धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। अभी ज्यादा समय नहीं बीता है जब होलिका दहन की तैयारी हर परिवार में दस दिन पहिले से शुरू हो जाती थी। घर की साफ-सफाई और लिपाई-पुताई होती थी। होली पर पकवान बनाए जाते थे। इस अवसर पर गुझिया और मठरी जरूर बनती थी। घर में गोबर के रोज बल्ले बनाए जाते थे, इनमें आर-पार छेद होता था और इनको धूप में सुखाया जाता था। होली के दिन इन बल्लों की सुतली में पिरो कर माला बना ली जाती थी जिस जगह होली जलाई जाती थी वहां लोग अपने साथ एक बड़ा बांस ले जाते थे जिसके सिरे पर गेहूं और चने की बाल और बल्ले की माला बधीं होती थी। लोग बांस के साथ जलती होली की परिक्रमा करते और बांस को होली की लपटों का स्पर्श कराते। बल्ले की माला होली में डाल देते थे। घर लौटते तो होली की कुछ आग साथ लेकर आते। घर के आंगन में या छत पर गोबर के बल्लों की माला रखी जाती, इसके मध्य में बांस का टुकड़ा खड़ा करके इसकी पूजा होती फिर बाहर की होली से लाई गई आग से घर की होली जलाई जाती। घर के सभी लोग, महिलाओं सहित इस होली की परिक्रमा करते थे। अब घरों में होली जलाने का रिवाज शहरो में नहीं बचा है। होली के दिन लाल मिर्च राई तथा नमक मिला कर हर सदस्य की नजर उतारी जाती थी और इसे होली में डाल दिया जाता। अब हम सभ्य हो गए हैं, इन पर हमारी आस्था नहीं है। ऐसे परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जो अब होली के दर्शन तक करने नहीं जाते हैं। घरों में होली पर पकवान बनाना बन्द हो गया है। अब तो बाजार से ही खरीद कर लाने का रिवाज है।

होली के दूसरे दिन फाग में घर और बाहर रंग, गुलाल, अबीर से हर कोई जमकर एक दूसरे को सराबोर कर देता था। कोई बुरा नही मानता था। आनन्द तथा उल्लास की जीवन्त अनुभूति होती थी। अब सब कुछ खतम होता जा रहा है। पिछले एक दशक से होली औपचारिकता बन कर रह गई है। यह ऐसा त्यौहार है जो किसी वर्जना किसी कुंठा तथा किसी भी प्रकार के भेदभाव को नहीं मानता। होली तो वर्जनाओं का त्यौहार है। हमारा समाज वर्जनाओं का समाज है। वर्ग, वर्ण, जाति, स्त्री-पुरुष और आचार-विचार के आधार पर इतनी सीमा रेखाएं खिंची हुई हैं जिन्हें लांघने की मनाही है सिर्फ होली के दिन ये वर्जनाएं टूटती हैं। रंगों के साथ मनुष्य का तनाव-कुंठाएं भी बह जाती हैं। छोटे लोग बड़ो पर हंसते हैं, उन्हें रंग देते हैं तथा अपनी सामाजिक जकड़न से बाहर आ जाते हैं। अगले दिन भले ही दुनिया फिर से वैसी हो जाती हो, लेकिन समानता का जो क्षण बनता है वह एक त्यौहार हो जाता है। हंसी-ठिठोली, हास्य-परिहास, कही- अनकहनी की सौगात लेकर होली आती है, किन्तु अब हमने अपने आपको तथा इसी के चलते अपने समाज को इतना प्रगतिशील और इतना आधुनिक-सभ्य बना लिया है कि होली और उससे जुड़े क्रिया-कलाप गंवारू लगते हैं। होली ही क्यों हमने अपनी संस्कृति से निकले हर त्यौहारों के साथ इसी तरह की तटस्थता अपना ली है।

किन्तु असलियत यह है कि उसकी प्रसन्नता नकली तथा दिखावटी है। रिश्ते सिमटने लगे हैं। अब लोगों के मध्य जीवन्त संवाद का समय खतम हो गया है। हमारे त्यौहारों पर बाजारवाद ने कब्जा कर लिया है। जीवन और मौत भी बाजार की वस्तु बना दिए गए हैं। अब तो बाजार ही त्यौहार तय करता है उसकी रूपरेखा निर्धारित करता है। पश्चिम से आयात किए गए त्यौहारों ने हमारे पारम्परिक त्यौहारों को समाज निकाला दे दिया है। सुख अब आनन्दमय नहीं रह गया और दुख भी कातर नहीं रहा। केवल अपना ही लाभ और अपना ही जीवन समृद्धिशाली बना कर जो दावे किए जा रहे हैं वे कोरे पाखंड हैं। अपनी माटी और अपनी संस्कृति की गर्भनाल से कट कर हर कोई पेड़ पर लटके बैताल की तरह बेजान और मरी हुई जिन्दगी जी रहा है। यह जीना नहीं है, जीने के नाम पर जिन्दगी ढोने का धतकरम किया जा रहा है। यह बड़ा विचित्र समय है।

जीवन स्नेह और प्रेम के लिए तरस रहा है। पैसा हर मर्ज की दवा बन गया है। तेज जीवन शैली और आधुनिक सभ्यता ने उल्लास के क्षण कम कर दिए हैं। गांव अभी अपने त्यौहारों को बचाए हुए हैं। जिनको विदेश-पलट हमारे अर्थशास्त्री निम्न वर्ग का टैग लगाते रहते हैं वे भी पुरखों की जातीय धरोहर को सहेजने का काम कर रहे हैं। किन्तु कब तक यह होता रहेगा क्योंकि बाजार की ताकते सब कुछ का व्यापारीकरण करने में पूरी ताकत से जुटी हैं।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एव चिंतक हैं।

Friday, April 5, 2013

kharnews aprail-13 issue

मुआवजे में हांसिल आया घुप्प अंधेरा

 एक के बाद एक स्थापित हो रहे थर्मल प्लांट व उनकी कालोनियां दूर से रोशनी से नहाए हुए पहाड़ों सी नजर आती है वहीं दूसरी ओर गांवों की दशा जुगनू की तरह है। जनगणना 2011 के सामाजिक सव्रेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि पूरे राज्य में सिंगरौली जिले के गांवों की दशा सबसे बदहाल है।  इस जिले के 78.6 प्रतिशत ग्रामीण प्रकाश के लिए केरोसीन पर निर्भर हैं। वर्ष 2001 में यहां 21.1 प्रतिशत ग्रामीण विद्युत उर्जा का उपयोग कर रहे थे इसमें 0.9 प्रतिशत की गिरावट आई है और अब 20.2 प्रतिशत लोग इसका उपयोग करते हैं।
Details

Wednesday, April 3, 2013

क्या गलत साबित हो गए कार्ल मार्क्स?

 बुधवार, 3 अप्रैल, 2013 को 17:22 IST तक के समाचार
बीबीसी का सबसे बड़ा सर्वे
7 वर्गों में बंटा ब्रितानी समाज
कार्ल मार्क्स ने कहा था कि समाज में दो ही वर्ग होते हैं—पूंजीपति और सर्वहारा. लेकिन बीबीसी का एक सर्वे बताता है कि ये धारणा अब पुरानी हो चुकी है. इस नए सर्वे के मुताबिक ब्रिटेन का समाज आज 7 वर्गों में विभाजित हो चुका है.
समाज विभाजन को समझने के लिए किए गए इस सर्वे में 1 लाख 61 हजार लोगों ने हिस्सा लिया. इसे नाम दिया गया ग्रेट ब्रिटिश क्लास सर्वे.
इस सर्वे में कुछ नए मापदंड भी जोड़े गए. अब तक यही माना जाता था कि वर्ग विभाजन को समझने के लिए लोगों के व्यवसाय, पैसा और शिक्षा के बारे में जानना जरूरी है. लेकिन इस सर्वे में पहली बार सामाजिक और सांस्कृति गतिविधियों को भी शामिल किया गया है.
बीबीसी लैब यूके के इस सर्वे में कहा गया कि वर्ग को समझने के लिए आर्थिक, सामजिक और सांस्कृतिक आधार को भी समझना जरूरी है. सर्वे में आर्थिक पूंजी को आय, बचत और घर के रूप में मापा गया जबकि समाजिक पूंजी को समाजिक हैसियत और पहचान के आधार पर नापा गया.
वर्ग विभाजन कुछ इस तरह से है –
1) उच्च वर्ग-- ये वर्ग समाज का सबसे ऊपरी तबका है. तीनों मापदंडों में ये बाकी के 6 वर्गों से आगे है.
2) मध्य वर्ग—वर्ग विभाजन में दूसरे पायदान पर. ये वर्ग सांस्कृतिक पूंजी के मामले में सबसे आगे है. ये समाज का सबसे बड़ा तबका है.
3) तकनीकी मध्य वर्ग—ये समाज का तीसरा वर्ग है जो पैसेवाला तो है लेकिन समाजिक हैसियत और सांस्कृतिक पूंजी के मामले में पीछे है.
4) समृद्ध कामगार--– ये वर्ग समाजिक विभाजन में चौथे नंबर है. सांस्कृतिक सामाजिक रूप से सक्रिय लेकिन आर्थिक पैमाने पर ये मध्यम स्तर का है.
5) पारंपरिक कामगार वर्ग -– ये वर्ग हर पैमाने पर कमजोर है लेकिन पूरी तरह से साधनहीन नहीं है. इस वर्ग के पास घर भी हैं.
6) उभरते हुए सेवक कामगर—इस वर्ग में ज्यादातर शहरों के युवक शामिल हैं. इनके पास सांस्कृतिक और सामाजिक पूंजी पर्याप्त मात्रा में है लेकिन आर्थिक पैमाने पर ये तुलानात्मक रूप से कमजोर हैं.
7) सर्वहारा वर्ग--– ये समाज का सबसे निचला तबका है जो रह तरह से कमजोर है. आर्थिक, समाजिक और सांस्कृतिक हर पायदान पर ये वर्ग सबसे नीचे आता है.

21 वीं शताब्दी में वर्ग विभाजन

"ये सर्वे हमें ये समझने में मदद करता है कि आज के समय में वर्ग विभाजन आखिर है कैसा. ये वर्ग विभाजन की सबसे संजीदा तस्वीर उपलब्ध कराता है. ये हमें नीचे तक पहुंचने में मदद की है. "
फियोना देविना, प्रोफेसर, समाज शास्त्र, मैनचेस्टर युनिवर्सिटी
इस सर्वे को करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि उच्च वर्ग की पहचान तो पहले भी की गई है लेकिन ये पहली बार है जब समाज के वर्ग विभाजन को बड़े पैमाने पर समझने की कोशिश की गई है. समाजशास्त्रियों के मुताबिक वर्ग विभाजन को समझने की कोशिश में अब तक मध्य वर्ग और कामगर वर्ग पर ही जोर दिया जाता था लेकिन ये पहली बार है जब व्यापक पैमाने पर वर्ग विभाजन को समझने की कोशिश की गई है.
मैनचेस्टर युनिवर्सिटी में समाज शास्त्र के प्रोफेसर फियोना देविना का कहना है कि ये वर्ग विभाजन 21 वीं शताब्दी में वर्ग विभाजन को समझने में मदद करता है. वो कहती हैं, “ये सर्वे हमें ये समझने में मदद करता है कि आज के समय में वर्ग विभाजन आखिर है कैसा. ये वर्ग विभाजन की संपूर्ण तस्वीर उपलब्ध कराता है. ये हमें नीचे तक पहुंचने में मदद करता है.”