Saturday, May 31, 2014

सफ़ेद बाघ (व्हाइट टाइगर/white tiger)

सफ़ेद बाघ (व्हाइट टाइगर/white tiger) एक ऐसा बाघ है जिसका प्रतिसारी पित्रैक (रिसेसिव पित्रैक) इसे हल्का रंग प्रदान करता है. एक अन्य आनुवंशिक अभिलक्षण बाघ की धारियों को बहुत हल्का रंग प्रदान करता है; इस प्रकार के सफ़ेद बाघ को बर्फ-सा सफ़ेद या "शुद्ध सफे़द" कहते हैं. सफ़ेद बाघ विवर्ण नहीं होते हैं और इनकी कोई अलग उप-प्रजाति नहीं है और इनका संयोग नारंगी रंग के बाघों के साथ हो सकता है, हालांकि (लगभग) इस संयोग के परिणामस्वरूप जन्म ग्रहण करने वाले शावकों में से आधे शावक प्रतिसारी सफ़ेद पित्रैक की वजह से विषमयुग्मजी हो सकते हैं और इनके रोएं नारंगी रंग के हो सकते हैं. इसमें एकमात्र अपवाद तभी संभव है जब खुद नारंगी रंग वाले माता/पिता पहले से ही एक विषमयुग्मजी बाघ हो, जिससे प्रत्येक शावक को या तो दोहरा प्रतिसारी सफ़ेद या विषमयुग्मजी नारंगी रंग के होने का 50 प्रतिशत अवसर मिलेगा. अगर दो विषमयुग्मजी बाघों या विषमयुग्मजों का संयोग होता है तो उनसे जन्मे शावकों में से 25 प्रतिशत शावक सफ़ेद, 50 प्रतिशत विषमयुग्मजी नारंगी (सफ़ेद पित्रैक वाहक) और 25 प्रतिशत सफ़ेद पित्रैक विहीन समयुग्मजी नारंगी रंग के होंगे. 1970 के दशक में शशि और रवि नामक नारंगी रंग के विषमयुग्मजी बाघों की एक जोड़ी ने अलीपुर चिड़ियाघर में 13 शावकों को जन्म दिया जिसमें से 3 सफ़ेद रंग के थे.[4] अगर दो सफ़ेद बाघों का संयोग कराया जाता है तो उनके सभी शावक समयुग्मजी और सफ़ेद रंग के होंगे. सफ़ेद पित्रैक वाला एक समयुग्मजी बाघ कई विभिन्न पित्रैकों की वजह से विषमयुग्मजी या समयुग्मजी भी हो सकता है. एक बाघ विषमयुग्मजी (विषमयुग्मज) है या समयुग्मजी (समयुग्मज), यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस पित्रैक पर चर्चा की जा रही है. अन्तःसंयोग समयुग्मता को बढ़ावा देता है जिसका इस्तेमाल सफ़ेद बाघ पैदा करने में किया जाता है.
सफ़ेद पित्रैक विहीन नारंगी रंग के बाघों की तुलना में सफ़ेद बाघ जन्म के और पूर्ण वयस्क हो जाने पर, दोनों ही समय आकार में बड़े होते हैं.[5] अपने असामान्य रंगत के बावज़ूद उन्हें जंगल में अपने इस बड़े आकार से फायदा हो सकता है. नारंगी रंग के विषमयुग्मजी बाघों का आकार भी नारंगी रंग के अन्य बाघों की तुलना में बड़ा हो सकता है. 1960 के दशक के दौरान नई दिल्लीचिड़ियाघर के निदेशक कैलाश सांखला ने कहा, "सफ़ेद पित्रैक के कार्यों में से एक कार्य इनकी आबादी में एक आकार पित्रैक रखना हो सकता है, बशर्ते अगर कभी इसकी जरूरत पड़े."[6]
गहरे रंग की धारियों वाले सफ़ेद बाघों को बंगाल टाइगर की उप-प्रजाति में बखूबी शामिल कर लिया गया है जो रॉयल बंगाल या इंडियन टाइगर (पैन्थेरा टाइग्रिस टाइग्रिस या पी. टी. बेंगालेंसिस ) के नाम से मशहूर है, ये गहरे रंग की धारियां कैद साइबेरियन टाइगर (पैन्थेरा टाइग्रिस अल्टैका ) में भी देखने को मिल सकती हैं, और हो सकता है इतिहास बन चुकी कई अन्य उपप्रजातियों में भी इनके पाए जाने की खबर हो. सफ़ेद रोमचर्म का बंगाल या इंडियनउपप्रजातियों से बहुत गहरा सम्बन्ध है. मौज़ूदा समय में दुनिया भर में सैंकड़ों सफ़ेद बाघ कैद किए गए हैं, इनमें से 100 भारत में हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है. इनकी आधुनिक आबादी में विशुद्ध बंगाल और संकर बंगाल-साइबेरियन दोनों ही शामिल हैं, लेकिन यह अस्पष्ट है कि सफ़ेद रंग का प्रतिसारी पित्रैक केवल बंगाल से आया है या इनके किसी साइबेरियाई पूर्वजों से.
सफ़ेद बाघ के अनोखे रंग ने इन्हें चिड़ियाघरों और आकर्षक जानवरों का प्रदर्शन करने वाले मनोरंजक कार्यक्रमों में लोकप्रिय बना दिया है. सिग्फ्राइड एण्ड रॉय (Siegfried & Roy) जादूगरअपने प्रदर्शन के लिए दो सफ़ेद बाघों को पालने और उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए प्रसिद्ध हैं, जो इन्हें "रॉयल व्हाइट टाइगर" (राजसी श्वेत बाघ) कहते हैं, शायद इस‍लिए कि ये सफ़ेद बाघ किसी तरह रीवा के महाराजा से जुड़े हुए हैं. असाधारण-बाघ के प्रदर्शन वाली एचबीओ वृत्तचित्र फिल्म,कैट डांसर्स के विषय व्यक्ति, रॉन हॉलीडे, जॉय हॉलीडे और चक लीज़ा की तिकड़ी ने इस फिल्म में एक सफ़ेद बाघ से साथ काम किया जिसने इस फिल्म के दौरान उनमें से दो को मार डाला.

जंगल में सफ़ेद बाघ

द बुक ऑफ इंडियन एनिमल्स (1948) में एस. एच. प्रेटर ने लिखा कि "मध्य भारत के कुछ शुष्क जंगलों में सफ़ेद या आंशिक सफ़ेद बाघ असामान्य नहीं हैं.[8] यह मिथक है कि सफ़ेद बाघ जंगल में नहीं पलते-बढ़ते. भारत ने रीवा के निकट विशेष रूप से आरक्षित एक जंगल में इस वशीभूत-नस्ल के सफ़ेद बाघों को फिर से पैदा करने की योजना बनायी.[9] जंगल में सफ़ेद बाघों को पैदा किया गया और कई पीढि़यों तक उनका संयोग कराया गया. ए. ए. डनबर ब्रांडर ने वाइल्ड एनिमल्स इन सेंट्रल इंडिया (1923) में लिखा कि "सफ़ेद बाघ कभी-कभार होते हैं. रीवा राज्य और मांडला एवं विलासपुर जिलों के संगम sthal पर अमरकंटक के पड़ोस में इन जानवरों का नियमित रूप से संयोग कराया जाता है. आखिरी बार 1919 में जब मैं मांडला में था, उस समय वहां एक सफ़ेद बाघिन और दो-तिहाई विकसित सफ़ेद शावक जीवित थे. 1915 में एक नर बाघ को रीवा राज्य ने पकड़ लिया और उसे कैद कर लिया. बॉम्बे नेचरल हिस्ट्री सोसाइटी के जर्नल के खंड XXVII के अंक 47 में भारतीय पुलिस के श्रीमान स्कॉट ने इस जानवर का उत्कृष्ट विवरण दिया है."[10]

द जर्नल ऑफ द बॉम्बे नेचरल हिस्ट्री सोसाइटी के "मिसलेनियस नोट्‍स: नं. 1-ए व्हाइट टाइगर इन कैप्टिविटी (तस्वीर के साथ)" के पूर्व चर्चित लेख कहता है कि "रीवा की कैद में जो सफ़ेद बाघ था उसे दिसंबर 1915 में इस सुहागपुर के निकट राज्य के जंगल से पकड़ा गया था. उस समय वह लगभग दो साल का था. दक्षिणी रीवा में इस बाघ से जुड़े और भी दो सफ़ेद बाघ थे, लेकिन ऐसा माना जाता था कि इस पशु की मां सफ़ेद नहीं थी ... लगभग 10 या 12 साल पहले दक्षिणी रीवा के सोहार्गपुर तहसील में एक सरदार ने एक सफ़ेद बाघ को मार डाला था. शाहडोल और अन्नूपुर, B.N.Ry. के अत्यंत निकट अन्य दो बाघ दिखाई पड़े, लेकिन स्वर्गवासी महाराज का आदेश था कि उनकी हत्या न की जाए. अन्नूपुर (भीलम डुंगारी जंगल) के एक बाघ के बारे में कहा जाता था कि वह कैद किए गए बाघ का भाई था. ये सफ़ेद बाघ सेंट्रल प्रोविंस के पड़ोसी ब्रितानिया जिलों में घुमा करते हैं और वे मैकल पर्वत श्रृंखलाओं के आसपास रहते हैं." इसके पर्याप्त सबूत हैं कि जंगलों में वयस्क सफ़ेद बाघों का अस्तित्व था.[11][12] 1900 के दशक में पोलोक तैयार की गई रिपोर्टों में मेघालय की जिंतेंह पहाड़ियों और बर्मा में सफ़ेद बाघों के देखे जाने की खबर थी. 1892 और 1922 के बीच, पूना, ऊपरी असम, उड़ीसा, बलिसपुर और कूचबिहार में सफ़ेद बाघों को गोली मारी गई. 1920 और 1930 के दशक में विभिन्न अंचलों में सफ़ेद बाघों को गोली मारी गई. इसी समयावधि में बिहार में पंद्रह बाघों को गोली मारी गई. कलकत्ता संग्रहालय और बिहार के टिसरी स्थित मीका शिविर में ट्रॉफियों की प्रदर्शनी लगी हुई हैं. रॉलैंड वार्ड के रिकॉर्ड्स ऑफ़ बिग गेम में सफ़ेद बाघों के और भी प्रमाण दर्ज हैं.
विक्टर एच. काहलने ने 1943 में उत्तरी चीन में सफ़ेद बाघों के बारे में बताया: "... उत्तर चीन में बड़ी तादाद में निश्चित रूप से हलके भूरे रंग के धारियों वाले रंगविहीन बाघ पैदा हुए हैं. मेलानिस्टीक (काले) बाघ बहुत ही दुर्लभ हैं."[13] हालांकि, सफ़ेद बाघ रंगहीन नहीं होते. ये बाघ अमुर बाघ की उपप्रजाति (पैंथेरा टाइग्रिस अल्टाइका) के सफ़ेद बाघ थे, जिन्हें साइबेरियाई बाघ के नाम से भी जाना जाता है. उत्तरी चीन और कोरिया में सफ़ेद बाघों के होने की खबर मिली थी.[14][15] दोनों देशों में सफ़ेद बाघों का सांस्कृतिक महत्व है. वे सुमात्रा और जावा की लोककथाओं का भी हिस्सा हैं.
जिम कॉर्बेट ने जंगल में एक सफ़ेद बाघिन पर एक फिल्म बनाया, जिसके नारंगी रंग के दो शावक थे. इस फिल्म के फुटेज को 1984 की नैशनल ज्योग्राफिक फिल्म मैन ईटर्स ऑफ़ इंडिया में इस्तेमाल किया गया था, जो जिम कॉर्बेट द्वारा 1957 में इसी नाम से लिखी गई किताब पर आधारित थी. यह जंगलों में सफ़ेद बाघों के अस्तित्व और उनके संयोग का एक और सबूत है. मध्य प्रदेश के रीवा राज्य की पूर्व रियासत में बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के वेबसाइट में सफ़ेद बाघों की तस्वीरें दिखाई गयीं हैं और कहा गया है "बांधवगढ़ के जंगल अतीत में सफ़ेद बाघों के जंगल थे." आज, बांधवगढ़ में 46 से 52 नारंगी रंग के बाघ निवास कर रहे हैं, जो भारत में किसी भी राष्ट्रीय उद्यान में बाघों की आबादी में सबसे बड़ी संख्या है.[16]

मिल गया वो जीन जो बाघों को सफ़ेद बनाता है

 सोमवार, 27 मई, 2013 को 10:40 IST तक के समाचार

सफ़ेद बाघ कैसे हासिल करता है अपना रंग? इस राज़ से पर्दा उठाया है चीनी वैज्ञानिकों ने. चीनी वैज्ञानिकों ने उस जीन का पता लगा लिया है जो बाघ में सफ़ेद रंग के लिए ज़िम्मेदार है.
वैज्ञानिकों के मुताबिक यह जीन न केवल बाघ बल्कि इंसानों के रंग में भी बदलाव के लिए ज़िम्मेदार है.
सफ़ेद बाघ नारंगी रंग वाले बाघ का ही विलक्षण प्रकार होते हैं. हालांकि आजकल सफ़ेद बाघ केवल कैद में ही पाए जाते हैं जहां इनका संकरण कराया जाता है ताकि इनकी चमड़ी का ख़ास रंग बना रहे.
पीकिंग विश्वविद्यालय के शुन-जी लू और उनके साथियों का ये क्लिक करेंशोध करन्ट बायोलॉजी में प्रकाशितहुआ है.
इस शोध में बताया गया है कि कैसे वैज्ञानिकों ने किमलॉंग सफ़ारी पार्क में कैद बाघ परिवार की जैव संरचना का अध्ययन किया. किमलॉंग सफ़ारी पार्क गुआंगजो प्रांत में है.

जीन में बदलाव

शोध एसएलसी45ए2 नाम के रंग जीन पर केन्द्रित था. यह जीन इंसान के अलावा घोड़े, मुर्गे और मछलियों में भी हल्के रंग के लिए ज़िम्मेदार है. लेकिन जब सफ़ेद बाघ के एसएलसी45ए2 का अध्ययन किया गया तो वो थोड़ा परिवर्तित दिखा.
हालांकि इसका असर बाघों के अंदर काले रंग के बनने पर नहीं होता है और सफ़ेद बाघ के शरीर में सामान्य बाघ की तरह ही काली पट्टियां बन जाती हैं.
बाघ
सफ़ेद बाघ नारंगी रंग वाले बाघ के ही विलक्षण प्रकार होते हैं.
चिड़ियाघर में पाए जाने वाले बहुत से सफ़ेद बाघों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझना पडता है. इनमें से कई को दृष्टिदोष जैसी समस्याएं हो जाती हैं.
हालांकि लू और उनके सहयोगी इन कमियों के लिए इंसान को ज़िम्मेदार ठहराते हैं जो सफ़ेद बाघों को पाने का लिए उन्हें उनके नज़दीकी परिवार में ही बच्चे पैदा करने का लिए मजबूर करते हैं. सफ़ेद रंग को बाघ के अंदर आ रही सामान्य कमजोरियों का हिस्सा नहीं माना जा सकता.
इस तथ्य को स्थापित करने का मतलब है कि संरक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत ये मानना कि वो जंगल में रह सकते हैं.
शोधकर्ताओं का कहना है"आखिरी बार स्वतंत्र रूप से बिचरने वाले सफ़ेद बाघ को 1958 में भारत में मारा गया था. इससे पहले तक भारत में बाघ को खुले में देखने की परंपरा थी."
शोधकर्ताओं के मुताबिक "सफ़ेद क्लिक करेंबाघों की समाप्ति की वजह वही है जो दूसरे बाघों की है जैसै अनियंत्रित शिकार, शिकार की अनुपलब्धता और आवास का विखंडन. हालांकि तथ्य ये भी है कि कई सफ़ेद बाघ युवावस्था में ही मारे गए या पकड़े गए. इससे ये साबित होता है कि वो जंगल में जीवित रह सकते हैं.”

Thursday, April 17, 2014

जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं ? --हरिशंकर परसाई

जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं ?  

किसी के निर्देश पर चलना नहीं स्वीकार मुझको
नहीं है पद चिह्न का आधार भी दरकार मुझको
ले निराला मार्ग उस पर सींच जल कांटे उगाता
और उनको रौंदता हर कदम मैं आगे बढ़ाता

शूल से है प्यार मुझको, फूल पर कैसे चलूं मैं?

बांध बाती में हृदय की आग चुप जलता रहे जो
और तम से हारकर चुपचाप सिर धुनता रहे जो
जगत को उस दीप का सीमित निबल जीवन सुहाता
यह धधकता रूप मेरा विश्व में भय ही जगाता

प्रलय की ज्वाला लिए हूं, दीप बन कैसे जलूं मैं?

जग दिखाता है मुझे रे राह मंदिर और मठ की
एक प्रतिमा में जहां विश्वास की हर सांस अटकी
चाहता हूँ भावना की भेंट मैं कर दूं अभी तो
सोच लूँ पाषान में भी प्राण जागेंगे कभी तो

पर स्वयं भगवान हूँ, इस सत्य को कैसे छलूं मैं?



क्या किया आज तक क्या पाया?
.......................................

मैं सोच रहा, सिर पर अपार
दिन, मास, वर्ष का धरे भार
पल, प्रतिपल का अंबार लगा
आखिर पाया तो क्या पाया?

जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा
जब थाप पड़ी, पग डोल उठा
औरों के स्वर में स्वर भर कर
अब तक गाया तो क्या गाया?

सब लुटा विश्व को रंक हुआ
रीता तब मेरा अंक हुआ
दाता से फिर याचक बनकर
कण-कण पाया तो क्या पाया?

जिस ओर उठी अंगुली जग की
उस ओर मुड़ी गति भी पग की
जग के अंचल से बंधा हुआ
खिंचता आया तो क्या आया?

जो वर्तमान ने उगल दिया
उसको भविष्य ने निगल लिया
है ज्ञान, सत्य ही श्रेष्ठ किंतु
जूठन खाया तो क्या खाया?

Saturday, April 12, 2014

'प्राइवेट कंपनियां बन गए हैं राजनीतिक दल

'

 शनिवार, 12 अप्रैल, 2014 को 09:42 IST तक के समाचार
सोनिया, प्रियंका, राहुल गांधी
"कांग्रेस माँ और बेटे की पार्टी है. समाजवादी पार्टी बाप, बेटे और बहू की, राष्ट्रीय जनता दल पति-पत्नी की और झारखण्ड मुक्ति मोर्चा बाप-बेटे की पार्टियां हैं."
ये थे भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उमीदवार नरेंद्र मोदी के शब्द, जो उन्होंने झारखण्ड के पलामू शहर में आम जनता को हाल में सम्बोधित करते समय कहे थे.
नरेंद्र मोदी का इशारा साफ़ तौर पर वंशवाद की राजनीति की तरफ़ था, जिसे वह आगे कोडरमा शहर में अपने एक भाषण में लोकतंत्र के लिए ग़लत मानते हुए कहते हैं, "वंशवाद की राजनीति का लोकतंत्र में कोई महत्त्व नहीं."
नरेंद्र मोदी के दोनों बयानों को नकारा नहीं जा सकता. वह चुनावी अभियान के शुरू में केवल गांधी परिवार को ही वंशवाद की सियासत के लिए आड़े हाथों लेते थे लेकिन अब 'लोकतंत्र के लिए हानिकारक' इस सियासत के लिए दूसरे राजनीतिक परिवारों को भी निशाना बना रहे हैं.
लेकिन एक तरफ़ मोदी वंशवाद की राजनीति को ख़त्म करने की बात करते हैं तो दूसरी तरफ़ ख़ुद उनकी पार्टी में यह परंपरा फल फूल रही है.

प्राइवेट लिमिटेड पार्टियां

उदाहरण के तौर पर भाजपा के नेता यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं और अपने पिता की सीट पर. मुंबई में प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन लोकसभा चुनाव के मैदान में पहली बार कूदी हैं. साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश भी लोकसभा के चुनावी अखाड़े में उतरे हैं.
लिस्ट और भी लंबी है. भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार के धूमल के बेटे भी चुनावी अखाड़े में उतरे हैं. यह फ़ेहरिस्त और भी लम्बी है.

परिवार की राजनीति

भारत में वंशवाद काफ़ी पुराना है. एक अंदाज़ के अनुसार स्वतंत्र भारत में अब तक वंशवाद की राजनीति करने वाले 57 परिवार हैं, जिनमें सब से पहला और सबसे पुराना नेहरू-गांधी खानदान है. कुछ ऐसे परिवारों की लिस्ट:

नेहरू-गांधी परिवार
  1. मोती लाल नेहरु : नेता और एक प्रसिद्ध वकील
  2. जवाहर लाल नेहरु : मोती लाल के बेटे और प्रधानमंत्री (1947-1964)
  3. इंदिरा गांधी : जवाहर लाल नेहरू की बेटी और प्रधानमंत्री (1966-1977 और 1980-1984)
  4. राजीव गांधी : इंदिरा के बेटे और प्रधानमंत्री (1984-1989)
  5. सोनिया गांधी : राजीव गांधी की पत्नी, अध्यक्ष कांग्रेस पार्टी और यूपीए
  6. राहुल गांधी : राजीव और सोनिया के बेटे, उपाध्यक्ष कांग्रेस पार्टी
  7. प्रियंका गांधी : राजीव और सोनिया की बेटी, कांग्रेस पार्टी नेता
  8. संजय गांधी : इंदिरा के बेटे और राजीव के छोटे भाई. उनका एक विमान दुर्घटना में देहांत न होता तो वह अपने भाई राजीव की जगह प्रधानमंत्री बन सकते थे.
  9. मेनका गांधी : संजय गांधी की पत्नी, भाजपा नेता और भूतपूर्व मंत्री
  10. वरुण गांधी : संजय एवं मेनका के बेटे और भाजपा नेता
इनके इलावा परिवार के अन्य सदस्य जो किसी न किसी सूरत में राजनीति से जुड़े रहे, वह थे इंदिरा गांधी की चचेरी बहन उमा नेहरू, उनके बेटे अरुण नेहरू.जवाहर लाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू, मोतीलाल नेहरू की बेटी विजय लक्ष्मी पंडित और उनकी बेटी नयनतारा सहगल.


अब्दुल्ला परिवार
  1. शेख अब्दुल्ला : भूतपूर्व मुख्यमंत्री जम्मू कश्मीर
  2. फारूक अब्दुल्ला : शेख अब्दुल्ला के बेटे और भूतपूर्व मुख्यमंत्री जम्मू कश्मीर, केन्द्रीय मंत्री
  3. उमर अब्दुल्ला : फारूक अब्दुल्ला के बेटे और मुख्यमंत्री जम्मू कश्मीर
इनके इलावा शेख अब्दुल्ला की पत्नी बेगम अकबर सांसद रह चुकी हैं और उनके बेटे मुस्तफा कमाल अब्दुल्ला कश्मीर विधानसभा के सदस्य थे.

ठाकरे परिवार
  1. बाल ठाकरे : शिव सेना के संस्थापक
  2. उद्धव ठाकरे : बाल ठाकरे के बेटे और शिव सेना के अध्यक्ष
  3. आदित्य ठाकरे : उद्धव ठाकरे के बेटे और युवा शिव सेना का अध्यक्ष
  4. राज ठाकरे : बाल ठाकरे के भतीजे और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के संस्थापक
  5. स्मिता ठाकरे : बाल ठाकरे की बहु
नन्दामुरी परिवार (एनटीआर)
  1. नन्दामुरी ताराक रामाराव (एनटीआर) : भूतपूर्व मुख्यमंत्री आंध्र प्रदेश और अभिनेता
  2. चंद्रबाबू नायडू : एनटीआर के दामाद और भूतपूर्व मुख्यमंत्री आंध्र प्रदेश
  3. लक्ष्मी पार्वती : पत्नी एनटीआर तेलुगु देसम एनटीआर गुट की भूतपूर्व अध्यक्ष
  4. एन. हरिकृष्ण : एनटीआर के बेटे और भूतपूर्व मंत्री
  5. एन. बालकृष्ण : एनटीआर के बेटे अभिनेता और राज नेता
  6. डी. पुरन्देस्वरी : एनटीआर की बेटी और भूतपूर्व मंत्री
  7. डी. वेंकटेश्वर राव : एनटीआर के दामाद और भूतपूर्व मंत्री
करुणानिधि परिवार
  1. एम करुणानिधि : भूतपूर्व मुख्यमंत्री तमिल नाडु और डीएमके पार्टी नेता
  2. एम के स्टालिन : करुणानिधि के बेटे और भूतपूर्व उप मुख्यमंत्री तमिलनाडु
  3. एम के अझागिरी : करुणानिधि के सब से बड़े बेटे और भूतपूर्व केन्द्रय मंत्री
  4. कनिमोझी : करुणानिधि की बेटी और राज्यसभा सदस्य
  5. मुरासोली मारन : करुणानिधि के भतीजे और भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री
  6. दयानिधि मारन : मुरासोली के बेटे और भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री
कांग्रेस के नेता शकील अहमद कहते हैं कि भाजपा दोहरी नीति रखती है. लेकिन भाजपा के नितिन गडकरी कहते हैं उनकी पार्टी में वंशवाद नहीं है, "कांग्रेस के गांधी परिवार की तरह अडवाणी परिवार, वाजपेयी परिवार भाजपा में नहीं है. भाजपा के नेताओं के बेटे-बेटियों को टिकट इसलिए दिए गए हैं क्यूंकि वह पार्टी में वर्षों से सक्रिय हैं."
सच तो यह है कि आज जिस राज्य या जिस पार्टी पर निगाह डालें वहां आपको ऐसे परिवार मिल जाएंगे.
उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे अखिलेश यादव को आगे बढ़ा दिया. कश्मीर में शेख अब्दुल्ला ने पहले फारूक अब्दुल्ला को अपनी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस का अध्यक्ष बनाया और वो मुख्यमंत्री बने. बाद में जब वह केंद्र सरकार में आए तो पार्टी और राज्य में सत्ता की बागडोर अपने बेटे उमर अब्दुल्ला के हवाले कर दी.
ओडिशा में बीजू पटनायक ने नवीन पटनायक को आगे बढ़ाया. महाराष्ट्र में शिव सेना की स्थापना करने वाले बाल ठाकरे ने मरने से पहले अपने बेटे उद्धव ठाकरे के हवाले पार्टी की जिम्मेदारियां सौंप दीं. अब उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे पार्टी के उभरते हुए युवा नेता हैं.
दक्षिण भारत पर निगाह डालें तो तमिलनाडु में डीएमके के करुणानिधि ने अपने बेटे और परिवार के कई सदस्यों को मुख्य स्थान दिए चाहे वह पार्टी हो या सरकार.
बिहार में लालू यादव ने अपनी बेटी मीसा भारती को पार्टी में शामिल करके इस बार उन्हें चुनाव के मैदान में भी उतार दिया है, जबकि वह पहले ही अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनवा चुके हैं.
वरिष्ठ महिला पत्रकार तवलीन सिंह अपने एक लेख में कहती हैं कि इन नेताओं ने अपनी पार्टियों को प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों में बदल दिया है. पार्टियों पर इन परिवारों का शिकंजा इतना कसा हुआ है कि दूसरों को आगे बढ़ने का अवसर ही नहीं मिलता.

शुरुआत

ज़रा सोचिए सोनिया गांधी और राहुल के बिना कांग्रेस पार्टी का वजूद बाक़ी रहेगा? नटवर सिंह अब सियासत से रिटायर हो चुके हैं लेकिन वंशवाद की राजनीति की अलम्बरदार इंदिरा गांधी के क़रीब थे. वह कहते हैं, "माँ-बेटा ही कांग्रेस पार्टी है."
लेकिन नटवर सिंह कहते हैं गांधी परिवार की ही आलोचना करना ठीक नहीं, "केवल नेहरू गांधी परिवार को वंशवाद की सियासत के लिए ज़िम्मेदार मानना सही नहीं. यह कश्मीर से कन्याकुमारी तक सभी राज्यों और सभी पार्टियों में है."
उन परिवारों की संतानें क्या कहती हैं जो अपने राजनीतिक परिवार और पिता के बल पर सियासत में हैं.
मिलिंद देवड़ा दक्षिण मुंबई से सांसद हैं. क्या अगर उनके पूंजीपति पिता मुरली देवड़ा शक्तिशाली नहीं होते और मंत्री पद पर न होते तो उन्हें सियासत में प्रवेश मिलता? वह कहते हैं, "आप सियासत में जिस कारण से आएं. चुनाव में जीत और हार जनता के हाथ में होती है."
हर आम चुनाव के समय ये सवाल उठाए जाते हैं कि भारत से वंशवाद की राजनीति का अंत कब होगा? क्योंकि आम तौर से इसे लोकतंत्र के विपरीत माना जाता है.
इन्दर मल्होत्रा एक ऐसे वरिष्ठ पत्रकार हैं जिन्होंने न केवल वंशवाद की सियासत का झंडा गाड़ने वाली इंदिरा गांधी पर किताब लिखी है बल्कि दक्षिण एशिया में वंशवाद की राजनीति पर भी उनकी किताबें प्रकाशित हुई हैं. उनका जवाब साफ़ है, "वंशवाद की राजनीति भारत से ख़त्म नहीं होगी."
आम तौर पर लोग समझते हैं कि इसकी शुरुआत जवाहरलाल नेहरु ने अपनी बेटी इंदिरा गांधी को सियासत में उतार कर की थी. लेकिन इन्दर मल्होत्रा कहते हैं कि नेहरु ने इंदिरा को किसी बड़े ओहदे के लिए नहीं आगे बढाया. वह आज़ादी से पहले से अपने पिता के साथ काम करती थीं और बाद में उनका हाथ बंटाती थीं.
वह इंदिरा गांधी को वंशवाद की राजनीति की शुरुआत करने वाला मानते हैं, “इंदिरा ने संजय गांधी को आगे बढ़ा कर वंशवाद की राजनीति की बुनियाद रखी.”
लेकिन नेहरु-गांधी परिवार का दबदबा न केवल कांग्रेस पार्टी पर बल्कि देश की सियासत पर जवाहर लाल नेहरु के पिता मोती लाल नेहरु के समय से चला आ रहा है. यह आज भारत में राजनीतिक वंशवाद का सबसे पुराना उदाहरण है. कांग्रेस उसकी पुश्तैनी पार्टी की तरह है.
लेकिन परिवार का समर्थन करने वाले यह तर्क देते हैं कि जिस कमज़ोरी के लिए परिवार की आलोचना की जाती है, वही इस परिवार की शक्ति है. मणिशंकर अय्यर इंदिरा गांधी के बेटे और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के क़रीबी साथियों में से एक थे.
वह कहते हैं, “राजीव जी के मरने के बाद अगर सोनिया पार्टी का नेतृत्व न करतीं तो पार्टी बिखर सकती थी. भारत के इतिहास में इस परिवार का काफ़ी योगदान है. इसने दो प्रधानमंत्रियों का बलिदान दिया. कांग्रेस पार्टी आज देश की सबसे बड़ी पार्टी है जो इस परिवार के कारण ही संभव हो पाया है.”

वंशवाद की राजनीति में कमी?

इन्दर मल्होत्रा भी वंशवाद की सियासत के पूरी तरह से ख़िलाफ़ नहीं हैं. वह कहते हैं कि हर मैदान में- चाहे वह फ़िल्मी दुनिया हो या डॉक्टर, किसान और पत्रकार का पेशा हो– भारतीय समाज में वंशवाद का सिलसिला पुराना है. इसे बुरा नहीं माना जाता और इसीलिए हर मैदान में एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी उसी मैदान में आ जाती है.
इन्दर मल्होत्रा कहते हैं कि भारत के बाहर भी इसकी परंपरा है. बांग्लादेश में शेख हसीना और पाकिस्तान में भुट्टो परिवार इसकी मिसालें हैं.
अखिलेश, मुलायम सिंह यादव
यहाँ तक कि उनके अनुसार अमरीका जैसा लोकतंत्र भी इससे वंचित नहीं. बुश सीनियर के बाद बिल क्लिंटन राष्ट्रपति बने और उनके बाद बुश सीनियर के बेटे बुश जूनियर. अगर बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन बराक ओबामा को प्राइमरीज में हरा देतीं तो हो सकता था वह उनकी जगह राष्ट्रपति होतीं.
लेकिन जो वंशवाद की राजनीति के ख़िलाफ़ हैं और एक ही परिवार के शिकंजे में पार्टी को नहीं देखने के हक़ में हैं, वो कहते हैं कि इसका सब से बड़ा नुक़सान यह होता है कि पार्टी के अन्दर दूसरे योग्य लोगों को अवसर नहीं मिलते. कांग्रेस में एक से एक क़ाबिल नेता हुए हैं लेकिन पार्टी के बड़े ओहदों के लिए या प्रधानमंत्री पद के लिए उनका प्रोत्सान नहीं किया गया.
सोनिया गांधी ने 2004 चुनाव में जीत के बाद मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया. लेकिन उनके आलोचक कहते हैं कि मनमोहन सिंह के कंधे पर रख कर सोनिया गांधी बंदूक चलना चाहती हैं.
इन्दर मल्होत्रा ने अपनी पुस्तक पिछले चुनाव से पहले लिखी थी. तो क्या इस चुनाव में वंशवाद की राजनीति में कमी आई है? वह एक लम्बी सांस लेकर कहते है, "यह रिवाज और बढ़ा है. यह जारी रहेगा.”

Tuesday, April 1, 2014

नेतृत्व में बदलाव चाहते हैं भारतीय: प्यू रिसर्च


भारतीय
अमरीका के एक शोध संस्थान के एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ अधिकांश भारतीय देश की मौजूदा स्थिति से संतुष्ट नहीं हैं और चुनाव के बाद नेतृत्व में बदलाव चाहते हैं.
प्यू रिसर्च सेंटर के इस सर्वे के अनुसार लड़खड़ाती अर्थव्यव्था के बावजूद लोग अपनी निजी वित्तीय स्थिति से खुश हैं और देश के साथ ही अगली पीढ़ी की आर्थिक स्थिति के बारे में आशावान हैं.
प्यू रिसर्च सेंटर ने सात दिसंबर 2013 से 12 जनवरी 2014 के बीच कराए इस सर्वेक्षण में 2,464 लोगों को शामिल किया था और उनसे आमने-सामने साक्षात्कार लिए गए थे.
सर्वे के मुताबिक़ 70 प्रतिशत भारतीय देश के मौजूदा हालात से संतुष्ट नहीं है जबकि 29 प्रतिशत लोगों ने इस पर संतुष्टि जताई.
असंतुष्टि और संतोष का यह फ़र्क उन लोगों में भी था, जो चाहते थे कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में अगली सरकार बने और उन लोगों में भी था जो चाहते थे कि कांग्रेस के नेतृत्व वाला सत्तारूढ़ वर्तमान यूपीए गठबंधन ही अगली सरकार बनाए.
सर्वे कहता है कि तीन में से एक आदमी (63% में से 19%) चाहता है कि कांग्रेस नहीं भारतीय जनता पार्टी अगली सरकार का नेतृत्व करे.

आतंकवाद बड़ी समस्या

हालांकि आर्थिक मंदी के बाद भी आधे से अधिक भारतीय (57%) देश के आर्थिक प्रदर्शन को 'ठीक-ठाक' बताते हैं और दो तिहाई नागरिक (64%) उम्मीद करते हैं कि देश के बच्चे युवा होकर आज की पीढ़ी से बेहतर रहेंगे.
भ्रष्टाचार
83 प्रतिशत भारतीय यह मानते हैं कि भ्रष्टाचार एक एक बड़ी समस्या है.
सर्वे में चीन को लेकर भारतीयों का मत विभाजित नज़र आया. 35% उसे पसंद करते हैं जबकि 41% नापसंद. और चीन के मुकाबले अमरीका के प्रति भारतीय 21% ज़्यादा सकारात्मक हैं.
करीब चार में एक भारतीय (47% में से 12%) भारतीयों का कहना है कि चीन के बजाय अमरीका दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्था है. हालांकि एक तिहाई भारतीय मानते हैं कि चीन अमरीका को हटाकर दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति बन गया है, या बन जाएगा.
करीब 10 में से नौ भारतीय आतंकवाद को देश के लिए बहुत बड़ी समस्या मानते हैं. दो तिहाई मानते हैं कि इस्लानमिक चरमपंथी समूह भारत के लिए मुख्य खतरा हैं और करीब दस में से छह लोगों को डर था कि ऐसे समूहों पर पाकिस्तान नियंत्रण कर सकता है.
कुल मिलाकर सिर्फ़ 19% भारतीयों ने पाकिस्तान के प्रति सकारात्मक नज़रिया दिखाया और भार के लिए सबसे बड़े ख़तरे के रूप में पाकिस्तान, चीन, लश्कर-ए-तैयबा और नक्सलियों में से 47 % ने पाकिस्तान को चुना.
इसके बावजूद अधिकतर (64%) भारतीयों ने कहा कि वह पाकिस्तान से बेहतर संबंध चाहते हैं और आधे से ज़्यादा ने कहा कि दोनों देशों के बीच ज़्यादा बातचीत, ज़्यादा व्यापार का वह समर्थन करते हैं.

Friday, February 21, 2014

15वीं लोकसभा: गिरी संसद की गरिमा?

15वीं लोकसभा का आख़िरी सत्र बेहद हंगामेदार साबित हुआ.
लोकसभा के सीधे प्रसारण को रोककर तेलंगाना विधेयक को पारित किया गया. इस फ़ैसले को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अपने विदाई भाषण में काफी मुश्किल भरा बताया. बतौर प्रधानमंत्री वे सदन में आख़िरी बार नज़र आए. उन्होंने संसद के सभी सदस्यों का शुक्रिया भी अदा किया.
लेकिन संसद के इस कार्यकाल की आलोचना भी ख़ूब हुई है. आलोचकों के मुताबिक भारतीय संसदीय इतिहास में बीते पांच साल सबसे बुरे रहे. हालांकि दूसरी ओर इस लोकसभा के कार्यकाल के दौरान सरकार ने कई अहम विधेयकों को पारित किया.
हालांकि हमें ऐसे देखना चाहिए कि इस दौरान क्या काम हुए और क्या काम नहीं हो पाए. यह हकीकत है कि बीते पांच सालों के दौरान संसद जितना काम कर सकती थी, उतना नहीं किया गया, लेकिन बहुत सारे काम हुए भी हैं.

काम कम, हंगामा ज़्यादा

2009 में जब 15वीं लोकसभा आई थी. सरकार ने आते ही शिक्षा का अधिकार क़ानून पास करा दिया था.
फिर बात आई महिलाओं के आरक्षण बिल की जिसे 2010 में राज्यसभा में पास करा लिया गया. 2010 के शीतकालीन सत्र से संसद के कामकाज में कुछ कमी आनी शुरू हो गई. व्यवधान ज़्यादा होने लगे, राजनीति ज़्यादा शुरू हो गई जिससे काम कम होने लगे.
इस वजह से 2010 का शीतकालीन सत्र पूरी तरह से बर्बाद हो गया. दोबारा काम की प्रक्रिया बढ़ी 2013 में जब खाद्य सुरक्षा विधेयक, भूमि अधिग्रहण बिल, और दिसंबर आते-आते लोकपाल विधेयक भी पास हो गया.
हालांकि इन विधेयकों को पास कराने के दौरान उन पर कभी राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई. जब महिला आरक्षण बिल पास हो रहा था तो समाजवादी पार्टी के 7-8 सांसदों को सस्पेंड करना पड़ा, तब जाकर बिल पास हो पाया था.

लोकतंत्र पर सवाल

उसी तरह तेलंगाना बिल पास कराने के लिए लोकसभा और राज्यसभा से सांसदों को सस्पेंड करना पड़ा. सदन में चर्चा कम और हंगामा ज़्यादा हुआ. विपक्ष बार-बार विधेयक पास कराने पर ज़ोर देता रहा है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि बिना चर्चा के विधेयक पास कराए जाए.
यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है. राष्ट्रपति जी ने भी इस महीने की शुरुआत में कहा है कि संसद बहस-मुबाहिसों के लिए है ना कि हंगामा खड़ा करने के लिए.
बावजूद इसके बीते पांच साल के दौरान चर्चा कम हुई है और विरोधाभास ज़्यादा रहे.
कई लोग मानते हैं कि टीवी पर सीधे प्रसारण के चलते हंगामा ज़्यादा होने लगे हैं. लेकिन लगता नहीं है कि ऐसी कोई बात है.
हंगामे के पीछे दो या तीन कारण हो सकते हैं. पहला कि कोई सदस्य कोई विषय उठाना चाहते हैं और उन्हें मौका नहीं मिल रहा है. इसलिए सदन की कार्यवाही में रूकावट डाल कर अपनी बात कहना चाहते हैं.
दूसरी वजह यह हो सकती है कि राजनीतिक कारणों से पहले से तय कर लिया गया हो कि रुकावट डालनी है. इसको रोकने का एक तरीका यह है कि सदन की कार्यवाही से पहले सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों बैठकर यह फैसला लें कि किस विषय पर चर्चा करनी है और किस पर नहीं.

संसद की गरिमा

इसमें कैमरे की कोई भूमिका नहीं है. आप कैमरा रखें या ना रखें अगर आपस में राजनीतिक समझ नहीं बनी है तो रुकावट आएगी ही.
एक अहम बात यह भी देखने को मिली है कि संसद सदस्यों की गरिमा कम हुई है. इसके लिए संसद सदस्य ही जिम्मेवार हैं.
अगर पिछले सालों में लोगों के अंदर संसद के प्रति यह इमेज