Friday, February 21, 2014

15वीं लोकसभा: गिरी संसद की गरिमा?

15वीं लोकसभा का आख़िरी सत्र बेहद हंगामेदार साबित हुआ.
लोकसभा के सीधे प्रसारण को रोककर तेलंगाना विधेयक को पारित किया गया. इस फ़ैसले को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी अपने विदाई भाषण में काफी मुश्किल भरा बताया. बतौर प्रधानमंत्री वे सदन में आख़िरी बार नज़र आए. उन्होंने संसद के सभी सदस्यों का शुक्रिया भी अदा किया.
लेकिन संसद के इस कार्यकाल की आलोचना भी ख़ूब हुई है. आलोचकों के मुताबिक भारतीय संसदीय इतिहास में बीते पांच साल सबसे बुरे रहे. हालांकि दूसरी ओर इस लोकसभा के कार्यकाल के दौरान सरकार ने कई अहम विधेयकों को पारित किया.
हालांकि हमें ऐसे देखना चाहिए कि इस दौरान क्या काम हुए और क्या काम नहीं हो पाए. यह हकीकत है कि बीते पांच सालों के दौरान संसद जितना काम कर सकती थी, उतना नहीं किया गया, लेकिन बहुत सारे काम हुए भी हैं.

काम कम, हंगामा ज़्यादा

2009 में जब 15वीं लोकसभा आई थी. सरकार ने आते ही शिक्षा का अधिकार क़ानून पास करा दिया था.
फिर बात आई महिलाओं के आरक्षण बिल की जिसे 2010 में राज्यसभा में पास करा लिया गया. 2010 के शीतकालीन सत्र से संसद के कामकाज में कुछ कमी आनी शुरू हो गई. व्यवधान ज़्यादा होने लगे, राजनीति ज़्यादा शुरू हो गई जिससे काम कम होने लगे.
इस वजह से 2010 का शीतकालीन सत्र पूरी तरह से बर्बाद हो गया. दोबारा काम की प्रक्रिया बढ़ी 2013 में जब खाद्य सुरक्षा विधेयक, भूमि अधिग्रहण बिल, और दिसंबर आते-आते लोकपाल विधेयक भी पास हो गया.
हालांकि इन विधेयकों को पास कराने के दौरान उन पर कभी राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई. जब महिला आरक्षण बिल पास हो रहा था तो समाजवादी पार्टी के 7-8 सांसदों को सस्पेंड करना पड़ा, तब जाकर बिल पास हो पाया था.

लोकतंत्र पर सवाल

उसी तरह तेलंगाना बिल पास कराने के लिए लोकसभा और राज्यसभा से सांसदों को सस्पेंड करना पड़ा. सदन में चर्चा कम और हंगामा ज़्यादा हुआ. विपक्ष बार-बार विधेयक पास कराने पर ज़ोर देता रहा है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि बिना चर्चा के विधेयक पास कराए जाए.
यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है. राष्ट्रपति जी ने भी इस महीने की शुरुआत में कहा है कि संसद बहस-मुबाहिसों के लिए है ना कि हंगामा खड़ा करने के लिए.
बावजूद इसके बीते पांच साल के दौरान चर्चा कम हुई है और विरोधाभास ज़्यादा रहे.
कई लोग मानते हैं कि टीवी पर सीधे प्रसारण के चलते हंगामा ज़्यादा होने लगे हैं. लेकिन लगता नहीं है कि ऐसी कोई बात है.
हंगामे के पीछे दो या तीन कारण हो सकते हैं. पहला कि कोई सदस्य कोई विषय उठाना चाहते हैं और उन्हें मौका नहीं मिल रहा है. इसलिए सदन की कार्यवाही में रूकावट डाल कर अपनी बात कहना चाहते हैं.
दूसरी वजह यह हो सकती है कि राजनीतिक कारणों से पहले से तय कर लिया गया हो कि रुकावट डालनी है. इसको रोकने का एक तरीका यह है कि सदन की कार्यवाही से पहले सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों बैठकर यह फैसला लें कि किस विषय पर चर्चा करनी है और किस पर नहीं.

संसद की गरिमा

इसमें कैमरे की कोई भूमिका नहीं है. आप कैमरा रखें या ना रखें अगर आपस में राजनीतिक समझ नहीं बनी है तो रुकावट आएगी ही.
एक अहम बात यह भी देखने को मिली है कि संसद सदस्यों की गरिमा कम हुई है. इसके लिए संसद सदस्य ही जिम्मेवार हैं.
अगर पिछले सालों में लोगों के अंदर संसद के प्रति यह इमेज

Thursday, January 23, 2014

भारत, विश्व में विकास का पहिया आगे बढ़ेगा: आईएमएफ़

 गुरुवार, 23 जनवरी, 2014 को 13:52 IST तक के समाचार

अर्थव्यवस्था
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में उम्मीद जताई है कि विश्व की अर्थव्यवस्था की विकास दर 2014 में 3.7 प्रतिशत और 2015 में 3.9 प्रतिशत रहेगी. वर्ष 2013 में विश्व की आर्थिक विकास दर तीन प्रतिशत रही.
भारत के लिए आईएमएफ़़ का अनुमान है कि विकास दर 2014 में 5.4 प्रतिशत और 2015 में 6.4 प्रतिशत रहेगी. चीन के लिए 2014 का आंकड़ा 7.5 प्रतिशत और 2015 का आंकड़ा 7.3 प्रतिशत है.

किस देश के लिए क्या अनुमान:

  • अमरीका - 2.8 प्रतिशत (2014) ; 3.0 प्रतिशत (2015)
  • जर्मनी - 1.6 प्रतिशत (2014) ; 1.4 प्रतिशत (2015)
  • ब्रिटेन - 2.4 प्रतिशत (2014) ; 2.2 प्रतिशत (2015)
  • चीन - 7.5 प्रतिशत (2014) ; 7.3 प्रतिशत (2015)
  • भारत - 5.4 प्रतिशत (2014) ; 6.4 प्रतिशत (2015)
भारत के बारे में रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि बढ़ते निर्यात और अच्छे मॉनसून के दम पर आर्थिक विकास दर बढ़ रही है और निवेश को प्रोत्साहन देने वाली मज़बूत मूलभूत नीतियों के चलते ये और बढ़ेगी.

'ब्रिटेन, अमरीका में स्थिति सुधरेगी'

आईएमएफ़़ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, ''वैश्विक अर्थव्यवस्था में वर्ष 2013 के मुकाबले वर्ष 2014 में बढ़ोत्तरी होने की उम्मीद है.''
ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था के बारे में अपने अनुमान को बेहतर करते हुए आईएमएफ़़ ने अंदाज़ा लगाया है कि विकास दर 2.4 प्रतिशत होगी जो यूरोप की किसी भी अर्थव्यवस्था अधिक होगी.
अमरीकी अर्थव्यवस्था के वर्ष 2014 में 2.8 प्रतिशत की दर से और 2015 में तीन प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान लगाया गया है.
दुनिया की सबसे बड़ी - अमरीकी अर्थव्यवस्था के लिए अक्तूबर में आईएमएफ़ ने वर्ष 2014 में 2.6 प्रतिशत की विकास दर का अनुमान लगाया था जो अब बढ़ा दिया गया है.
अर्थव्यवस्था
रिपोर्ट में उम्मीद लगाई गई है कि यूरो मुद्रा वाले देशों की अर्थव्यवस्था में कुल मिलाकर एक प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिलेगी.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यूरोज़ोन मंदी से उबर रहा है.
आईएमएफ़ का ये भी कहना है कि वित्तीय संकट की मार झेल रहे ग्रीस, स्पेन, साइप्रस, इटली और पुर्तगाल जैसे देशों की अर्थव्यवस्था में सुधार अपेक्षाकृत मंद गति से होगा.
चीन की अर्थव्यवस्था के बारे में आईएमएफ़ ने अपने पहले के अनुमान को बेहतर करते हुए कहा है कि चीन की अर्थव्यवस्था इस साल 7.5 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी.
लेकिन रिपोर्ट में यह चेतावनी भी दी गई है कि ''वैश्विक अर्थव्यवस्था में मज़बूती का यह मतलब नहीं है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था ख़तरे से बाहर निकल आई है.''

Thursday, January 2, 2014

वक्त की चौखट पर लोकशाही की दस्तक

खुशी की बात यह कि आम आदमी की अपनी ताकत का अहसास उसी तरह होना शुरू हुआ है जैसा कि जामवंत के याद दिलाने पर हनुमानजी को हुआ था। ईश्वर से प्रार्थना है कि नए वर्ष में हर व्यक्ति की आत्मा में बैठे हनुमानजी जाग्रत हो, और भ्रष्टाचार, अनाचार, विषमता, कुशासन की लंका का दहन करने के लिए समर्थवान बनें, देश में सुराज और रामराज्य नेताओं के नहीं आम आदमी के पराक्रम से ही संभव होगा।

......................................................................................................................
यह संयोग ही है कि नववर्ष यानी कि 2014 दिन-तिथि के हिसाब से वर्ष 1947 को दोहराने जा रहा है। वह आजादी का वर्ष था। तुर्को, मुगलों और अंग्रेजों की कोई पौने दो हजार वर्ष की गुलामी-दर-गुलामी से मुक्ति का वर्ष। 2014 में प्रवेश के पूर्व लोकशाही ने वक्त की चौखट पर दस्तक दी है। महाभारत से लेकर स्वतंत्रता संग्राम की साक्षी रही दिल्ली ने इस बार लोकसंग्राम की जीत देखा है। पिछले साल के ये दिन देश भर के लिए अवसाद व पीड़ादायक रहे। दिल्ली के वक्षस्थल पर एक बालिका का वीभत्स शीलहरण हुआ था। इसके बाद पूरा वर्ष दैवीय और मानवीय प्रकोप में डूबता उतरता रहा। शुभारंभ के संकेत ही आगत का हाल बता देते हैं। उत्तराखण्ड के केदार-बद्रीनाथ में जो प्रलय हुआ वह दिल दहलाने वाला रहा। यह हिमालय पर्वत श्रृंखला की शिखाओं से निकली एक चेतावनी थी। प्रकृति के साथ अन्याय करोगे तो वह प्रतिशोध लेगी। प्रकृति का प्रतिशोध भी समदर्शी होता है। वह चीन्ह-चीन्ह कर उपहार या दण्ड नहीं देती। सबको एक नजर से देखती है। पता नहीं इस घटना से सत्ता और व्यवस्था प्रतिष्ठानों ने क्या सबक लिया। पर संकेत और संदेश दोनों स्पष्ट हैं। भौतिक विलास और कथित औद्योगिकीकरण के विस्तार के नाम पर यदि हमने प्रकृति के उपादानों का शोषण किया तो सजा भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। प्रलय या संहार की तिथि व अवधि तय नहीं होती। यह हमारे सुकर्मो व दुष्कर्मो पर निर्भर होता है। उत्तराखण्ड जैसे आपदा प्रकृति न दोहराए इसके लिए हम व्यवस्था और सत्ता प्रतिष्ठानों को सचेत करें। नए वर्ष में नदी- जंगल-पर्वत, झरने, जीव-जन्तु इन सबके संरक्षण की दिशा में एक जन आन्दोलन खड़ा होना चाहिए।
वर्ष 2013 ने कई सामाजिक व्याधियों की सजर्री भी की है।
फोड़ा जब शरीर के अन्दर होता है तो लहकता है, उसे ठीक करने के लिए चीरा लगाकर मवाद का निकाला जाना जरूरी है।
आसाराम और नारायण सांई जैसी व्याधियां भी सामने आईं। महिला सशक्तीकरण और सूचना क्रांति ने रंग दिखाया। अत्याचार, दमन और दुष्कर्म को सामान्य तौर पर जज्ब करने वाली बहादुर महिलाएं सामने आईं, आसाराम और तरूण तेजपाल जैसे रसूखदारों के नकाब को नोचकर समाज के सामने उनकी असलियत को लाया।
अब शेष काम न्यायालय का है। न्याय तंत्र ने भी पूरे वर्ष संजीदगी का परिचय दिया। चाराघोटालें में लालू यादव और जगन्ननाथ मिश्र सहित कई अफसर हकीमों को सजा और उनकी जेल यात्रा ने सामान्यजन में न्यायतंत्र की प्राणप्रतिष्ठा की और इस मिथक को तोड़ा कि जेल और सजा सिर्फ गरीब लोगों के लिए हैं। पिछले वर्षो की भांति भ्रष्टाचार के नित नए खुलासे होते रहे। सीमा पर पाकिस्तान और चीन की हरकतों को कायरों की भांति नजरंदाज करना वर्ष भर सालता रहा लेकिन जाते-जाते अपनी राजनय देयवायानी प्रकरण में अमेरिका को अपने जिस तेवर से परिचित कराया उससे विश्वास जागा है कि अब सीमा पर भी इसी तरह दिलेरी का परिचय देते हुए अपने एक के बदले उनके चार मारेंगे भले ही यह काम उनके घर में घुस कर करना पड़े।
मीडिया साल भर अतिरेकी बना रहा। जरूरी मुद्दों से ज्यादा गैर जरुरी मुद्दे उसके टीआरपी का सनसेक्स बढ़ाते रहे। मीडिया ने साल भर नरेन्द्र मोदी की पालकी ढोई। कभी नकली लालकिला तो कभी गत्ते के सेट वाले संसद के मंच से मोदी दहाड़ते रहे। टीवी मीडिया कई गुना ज्यादा एम्प्लीफाई कर उनकी दहाड़ को चिग्घाड़ बनाकर दर्शकों को परोसता रहा। कारपोरेट मीडिया भी लोकशाही की ताकत के आगे नतमस्तक दिखा। दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल और आम आदमी पार्टी का झडू उसकी टीआरपी के लिए मजबूरी बन गया। किन्तु -परन्तु की तमाम आवांछनीय टिप्पणियों के बावजूद भी। चार राज्यों के चुनाव परिणाम ने 128 साल पुरानी कांग्रेस के अधोपतन का रास्ता तैयार किया। अर्थशाी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मौन और मजबूरी भी देखा तो उपाध्यक्ष राहुल गांधी की प्रेस क्लब में लोकायुक्त बिल को लेकर खिलदण्डई भी। बाहें चढ़ाकर उनका चीख-चिल्लाहट भरा भाषण युवाओं को लुभा नहीं सका और न ही सिर पर तगाड़ी लेकर मनरेगा की मजदूरी वाली तस्वीर ने गरीबों को जोड़ा। बंगाल की शेरनी ममता बनर्जी के भी ताजिए ठंडे रहे। मुलायम-नीतिश की तीसरे मोर्चे की परिकल्पनाएं हवाओं में तैरती-उतराती रहीं। उम्मीद के विपरीत मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा की हैट्रिक ने राजनीति की नई परिभाषा गढ़ी। नई परिभाषा इस मायने में कि आम आदमी आज भी विकास से ज्यादा सम्मान और अपनेपन के लिए लालायित है। प्रदेश सरकार पर भ्रष्टाचार के लगे तमाम आरोपों के बावजूद शिवराज की लाजर्र दैन लाइफ इमेज बनीं और वे गरीब तथा वंचित लोगों के दिल में ऐसे बैठे कि नया चुनावी इतिहास रच दिया। वे प्रदेश की जनता के सबसे बड़े कजर्दार हैं, उनके सिर पर जगाई गई उम्मीदों और अपेक्षाओं का गुरूतर बोझ है। अपनी विनम्रता व सहजता की बदौलत भविष्य की असीम संभावनाओं के कपाट खोले हैं। उनकी कथनी और करनी में भेद नहीं रहा तो यकीन मानिए वे निकट भविष्य में देश के यशस्वी व सफल नेताओं की श्रेणी में शामिल होने के सान्निकट हैं।
गुजरा हुआ साल युवाओं और महिलाओं की नवचेतना, संघर्ष और नए आगाज का साल रहा। यह साल आम आदमी के वजूद को पुर्नव्याख्यायित करने का भी रहा। डेढ़ साल पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के आन्दोलन को राजनीतिक दलों ने जिस तरह मजाक में बदलने की कोशिश की थी दिल्ली में आम आदमी ने उसका माकूल जवाब दे दिया। राजनीति अब परम्परागत दलों, घरानों और रसूखदारों की बपौती नहीं रही और न ही किसी के नाम इसका पट्टा है। आम आदमी को केन्द्रीय थीम पर रखकर अरविन्द केजरीवाल ने जिस तरह राजनीतिक नवाचार को यथार्थ के धरातल पर उतारा है वह हताश अवाम को नया रास्ता दिखाता है। डेढ़ साल की पुरानी पार्टी ने 128 साल के राजनीतिक संस्था को उसके वजूद की चुनौती दी है। दिल्ली की जीत और ‘आप’ तमाम राजनीतिक दलों के लिए सबक है। यह सबक वंश परम्परा और यथास्थितिवाद तोड़ने का है। नए साल में सभी राजनीतिक दल ‘आप’ को सामने रखकर या तो आत्म अवलोकन के लिए विवश होंगे या फिर अपने लिए अधोगति की राह चुनेंगे। आम आदमी और उसकी मुश्किलें केन्द्र में होंगी। कोई ढोंग नहीं चलेगा। देश के दो फीसदी लोगों के कारपोरेटी प्रायोजन से 98 फीसदी लोगों की बात करने वाले लोगों का भी ढ़ोंग सामने आएगा। क्योंकि हर सूबे में एक अरविन्द केजरीवाल के जन्म लेने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
हम उम्मीद करते हैं कि नया वर्ष आम आदमी की मुश्किलों को कम करने वाला होगा। मंहगाई पर लगाम लगेगी और भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़ी गई निर्णायक जंग मुकाम तक पहुंचेगी। मई 2014 में दिल्ली के सिहासन पर एनडीए का राज होता है, तीसरा मोर्चा आता है या फिर यूपीए करिश्मा करती है यह अभी इतिहास के गर्भ में है। लेकिन खुशी की बात यह कि आम आदमी की अपनी ताकत का अहसास उसी तरह होना शुरू हुआ है जैसा कि जामवंत के याद दिलाने पर हनुमान जी को हुआ था। ईश्वर से प्रार्थना है कि नए वर्ष में हर व्यक्ति की आत्मा में बैठे हनुमानजी जाग्रत हो, और भ्रष्टाचार, अनाचार, विषमता, कुशासन की लंका का दहन करने के लिए समर्थवान बनें, देश में सुराज और रामराज्य नेताओं के नहीं आम आदमी के पराक्रम से ही संभव होगा। नए वर्ष की असीम शुभकामनाएं।

Saturday, December 28, 2013

तेल देखो तेल की धार देखो

चरणदास चोर के नए अवतार सचमुच के चरणदास साहु निकले। पिछले जनम में चोर इस जनम में साहु। साहु ने वो मूर्खताएं नहीं की जो चोर ने पिछले जनम में की थी। ‘चोर’ गुरू द्वारा दी गई प्रतिज्ञाओं की रस्सी में बंधा था, और चाहकर भी न सोने की थाली में खा सका, न रानी के साथ सो सका, न आधा राज भोग सका और न ही हाथी की सवारी कर सका। ईमानदार मूर्ख था इसलिए बेमौत मारा गया। ईमादारी भर ही अपने आप में काफी नहीं होती। चतुराई के मुलम्मे में वह धारदार बन जाती है। चरणदास साहु ने गुरू की प्रतिज्ञाओं की रस्सी को तड़ से तोड़ दी। ये गुरू लोग होते ही ऐसे हैं जब खुद कुछ करने का माद्दा नहीं बचता तो चेलों का भी रास्ता बंद करने की कोशिश करते हैं। चरणदास साहु की आत्मा में बैठा पुराने जनम का चोर पुरानी बातों को याद-कर-कर के तड़प रहा था। काश मैं भी उस खूसट गुरू की बाते न मानता। रानी को भोगता, सोने की थाली में खाता, राज करता और हाथी पर चढ़ता। चरणदास की आत्मा के अन्दर बैठे नए जनम के साहु और पुराने जनम के चोर में खटपट होने लगी। चोर ने कहा- सुन बे साहु तूने गुरू को दगा दिया है। पॉलटिक्स में जाने और पार्टी बनाने से मना करने के बाद भी तू नहीं माना। सीधे नरक में जाएगा नरक में। साहु ने जवाब दिया- तू निरा चोर का चोर ही रहा। जमाने की नजाकत को समझ और मेरे में विलीन हो जा। चोर होते हुए भी जो तेरी ईमानदारी की ठसक है न चरणदास को तंग किए जा रही है। अब देख कुर्सी तक पहुंचने के लिए लोग कितनी मशक्कत करते हैं। धनबल, जनबल,  बाहुबल, दारू, मुर्गा, कम्बलों के बीच से कुर्सी तक का रास्ता निकलता है। तेरी ईमानदारी की हनक ने चरणदास को कुर्सी तक तो पहुंचा दिया, अब आगे तो मुझे कुछ भोगने दे। चरणदास ने लालबत्ती लेने से मना कर दिया। गारद भगा दी। फट्टे पे सोएगा, आटो से चलेगा। न खाएगा, न खाने देगा। चरणदास के भीतर इन दिनों चोर और साहु के बीच का अन्तरद्वंद्व चल रहा है। ये कैसा विरोधाभास है कि जो चोर है वह चरणदास को ईमानदारी से नहीं डिगने दे रहा, और जो साहु है वह भौतिकवादी है सब कुछ वह भोगना चाहता है, जो चोर पुराने जन्म में नहीं भोग पाया और प्रतिज्ञाबद्ध होकर बेमौत मारा गया।

‘आधुनिक भारत का भविष्य पुराण’ के रचयिता आचार्य रामलोटन शास्त्री, भैय्याजी को चरणदास के नए अवतार के भीतर चल रहे द्वंदात्मक भौतिकवाद का अनुशीलन व मीमांशात्मक विश्लेषण करते हुए उसका मर्म समझा रहे थे। भैय्याजी को कथा की यह क्लासकी वैसे ही पल्ले नहीं पड़ रही थी जैसे कि शास्त्रीय संगीत में रागों का आरोह-अवरोह व तानपुरे की तान सामान्य श्रोताओं की समझ में नहीं आती। शास्त्री के शास्त्रज्ञान से कनफ्यूज भैय्याजी बोले- आचार्य जी अब सीधे-सीधे मुद्दे पर आइए और भविष्य बताइए कि नए जमाने का ये चरणदास राज भोग पाएगा कि नहीं? रामलोटन शास्त्री ने अपने दर्शन शास्त्र की व्याख्याओं को रहल की पोथी में दबाते हुए कहा- भैय्याजी दरअसल बात ये है- कि एक बार एक किन्नर को बच्चा पैदा हुआ। किन्नर को बच्चा! आश्चर्य!! खबर देश-दुनिया की सुर्खियों में छा गई। शहर का कोई भी आदमी यकीन नहीं कर पा रहा था पर यह सत्य था, सौ प्रतिशत। किन्नरों में उल्लास छा गया। सब नाचने गाने लगे, जश्न  मनाने लगे। फिर सवाल खड़ा हुआ कि यह बच्चा जाना किस नाम से जाएगा। इसकी वल्दियत क्या लिखी जाए। किन्नरों ने पंचायत बुलाई। अन्तत: तय हुआ की इस बच्चे पर सबका समान हक है। यह सभी किन्नरों के साझे पराक्रम का प्रतिफल है। अब दूसरा सवाल खड़ा हुआ कि सबसे पहले इसके प्यार दुलार का हक किसे? सर्व सहमति से यह भी तय हो गया कि वरिष्ठता के क्रम में एक-के बाद एक सभी इसे अपना प्यार दुलार दें। उमड़े हुए वात्सल्य से विह्वल किन्नरों ने उस नवजात शिशु को अपने-अपने बाहों में भर कर चूमना-चाटना प्यार करना शुरू कर दिया। इस क्रम में किसी को होश ही नहीं रहा कि शिशु को जन्मघुट्टी भी दें, दूध भी पिलाएं। प्यार के ज्वार में सिर्फ शिशु का चेहरा दिखता उसकी भूख की चिल्लाहट नहीं, उसके पालन पोषण की जरूरत नहीं। सब उसे एक-एक करके प्यार करते गए। और जब आखिरी किन्नर की बारी आई तो उसके हाथ नवजात शिशु का पार्थिव शरीर था। किन्नरों के समवेत प्यार के ज्वार में नवजात शिशु का दम उखड़ गया। शिशु की उम्र बरहों संस्कार तक भी नहीं खिंच पाई। भैय्याजी को इस कहानी में छिपा हुआ गूढ़ अर्थ समझ में आ गया। शास्त्रीजी का चरणरज माथे पर लगाते हुए भैय्याजी फिर पुराने टॉपिक पर आ गए बोले- शास्त्रीजी उस चरणदसवा का क्या होगा  जो स्वर्ग से सीधे भारत भूमि में अवतरित हुआ और सुधार में लग गया। शास्त्रीजी ने  उवाचा - अभी कुछ नहीं हुआ, फिलहाल तेल देखो तेल की धार देखो। एक के बाद एक आए और चले गए। इस देश को सीधे भगवान चलाते हैं, वही आगे भी चलाते रहेंगे, चरणदास जैसे लोग आते और जाते रहेंगे। प्रभु ऐसी ही लीला रचाते रहेंगे जैसे कि किन्नरों के साथ रचाई। राजनीति अपनी लय-गति पर चलेगी, और उसे न आज कोई समझ पाया न भविष्य में ही समझ पाएगा क्योंकि वह ‘तड़ित की तरह चंचल व भुजंग की भांति कुटिल है।’

रामलीला मैदानः जिन्ना, जेपी, इंदिरा से केजरीवाल तक

 शनिवार, 28 दिसंबर, 2013 को 15:49 IST तक के समाचार
अरविंद केजरीवाल
नई दिल्ली का रामलीला मैदान आज़ादी की लड़ाई, पाकिस्तान पर जीत, इमरजेंसी, राममंदिर आंदोलन और जनलोकपाल जैसे अनगिनत ऐतिहासिक हलचलों का गवाह रहा है. लेकिन आमतौर पर आंदोलन के मूड में दिखने वाला रामलीला मैदान शनिवार को जीत की खुशी में झूम रहा था.
शनिवार को इसी रामलीला मैदान में मात्र बारह महीने पुरानी आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने और दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. और वे दिल्ली के सातवें मुख्यमंत्री बन गए.
यही वजह थी कि अन्ना के जनलोकपाल आन्दोलन के विपरीत इस बार पुलिस का रुख भी दोस्ताना था और मंच से अरविंद केजरीवाल के भाषण में भी सत्ता की नरमी महसूस की जा सकती थी.
जनलोकपाल आंदोलन करीब ढाई साल के अपने सफर में आंदोलन से राजनीतिक दर और फिर दिल्ली की सत्ताधारी पार्टी बन गया.
बदलाव के एक अन्य पहलू को इस बात से समझा जा सकता है कि रामलीला मैदान में छाई रहने वाली टोपी पर लिखा स्नोगन 'मैं भी अन्ना' से बदलकर 'मैं हूं आम आदमी' हो गया.
रामलीला मैदान में बड़ी तादात में जुटे समर्थक अरविंद के भाषण में क्रांति और ऐतिहासिक बदलाव की झलक देख रहे थे.
लेकिन दिल्ली का रामलीला मैदान तो जिन्ना, जयप्रकाश से लेकर बाबा रामदेव तक, अनगिनत आन्दोलनों और क्रांतियों के ऐलान और उनकी अंतिम परिणिति का गवाह रहा है.

सैनिक शिविर से हुई शुरुआत

कहा जाता है कि इस मैदान को अंग्रेज़ों ने वर्ष1883 में ब्रिटिश सैनिकों के शिविर के लिए तैयार करवाया था.
समय के साथ-साथ पुरानी दिल्ली के कई संगठनों ने इस मैदान में रामलीलाओं का आयोजन करना शुरू कर दिया, फलस्वरूप इसकी पहचान रामलीला मैदान के रूप में हो गई.
दिल्ली के दिल में इससे बड़ी खुली जगह और कोई नहीं थी इसलिए रैली जैसे बड़े आयोजनों और आम जनता से सीधे संवाद के लिए ये मैदान राजनेताओं का पसंदीदा मैदान बन गया.
गुलाम भारत और आज़ाद भारत के इतिहास में ऐसे मौकों की कोई कमी नहीं है जब रामलीला मैदान ने अपना नाम दर्ज न कराया हो.
इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान से युद्ध की जीत का जश्न इसी मैदान पर मनाया था
ये रामलीला मैदान देश के इतिहास के बदलने का गवाह रहा है.

आज़ादी की लड़ाई का गवाह

आज़ादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल और दूसरे नेताओं के लिए विरोध जताने का ये सबसे पसंदीदा मैदान बन गया था.
इसी मैदान पर मोहम्मद अली जिन्ना से जवाहर लाल नेहरू तक और बाबा राम देव से लेकर अन्ना हज़ार तक सारे लोग इसी मैदान से क्रांति की शुरुआत करते रहे हैं.
कहा तो ये भी जाता है कि यही वो मैदान है जहां वर्ष 1945 में हुई एक रैली में भीड़ ने जिन्ना को मौलाना की उपाधि दे दी थी.
लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना ने मौलाना की इस उपाधि पर भीड़ से नाराज़गी जताई और कहा कि वो राजनीतिक नेता है न कि धार्मिक मौलाना.
इस मैदान का इस्तेमाल सरकारी रैलियों और सत्ता के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने जैसी दोनों ही परिस्थितियों में किया गया.
दिसंबर 1952 में रामलीला मैदान में जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को लेकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सत्याग्रह किया था. इससे सरकार हिल गई थी. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने साल 1956 और 57 में मैदान में विशाल जनसभाएं की.
जयप्रकाश नारायण ने इसी मैदान से कांग्रेस सरकार के ख़िलाफ़ हुंकार भरी थी

ब्रिटेन की महारानी का संबोधन

28 जनवरी, 1961 को ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ ने रामलीला मैदान में ही एक बड़ी जनसभा को संबोधित किया था.
26 जनवरी, 1963 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की उपस्थिति में लता मंगेशकर ने एक कार्यक्रम पेश किया.
वर्ष 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इसी मैदान पर एक विशाल जनसभा में 'जय जवान, जय किसान' का नारा एक बार फिर दोहराया था.
साल 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्ला देश के निर्माण और पाकिस्तान से युद्ध जीतने का जश्न मनाने के लिए इसी मैदान में एक बड़ी रैली की थी और जहां उन्हें जनता का भारी समर्थन मिला था.
25 जून 1975 को इसी मैदान पर लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने विपक्षी नेताओं के साथ ये ऐलान कर दिया था कि इंदिरा गांधी की तानाशाही सरकार को उखाड़ फेंका जाए.

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

ओजस्वी कवि रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध पंक्तियां, "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है" यहाँ गूँजा और उसके बाद विराट रैली से डरी सहमी इंदिरा गांधी सरकार ने 25 -26 जून 1975 की दर्मयानी रात को आपातकाल का ऐलान कर दिया था.
फरवरी 1977 में विपक्षी पार्टियों ने एक बार फिर इसी मैदान को अपनी आवाज़ जनता तक पहुंचाने के लिए चुना.
जनता पार्टी के बैनर तले बाबू जगजीवन राम के नेतृत्व में कांग्रेस छोड़कर आए मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह और चंद्रशेखर के साथ भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन रूप जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी इसी मैदान के मंच पर एक साथ नज़र आए.
1980 और 90 के दशक के दौरान विरोध प्रदर्शनों की जगह बोट क्लब बन गई थी लेकिन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के कार्यकाल के दौरान बोट क्लब पर प्रदर्शन पर रोक की वजह से इसी मैदान को भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर आंदोलन के शंखनाद के लिए चुना.
यहां पर कांग्रेस, भाजपा सहित अन्य दलों, संगठनों व धार्मिक संगठनों के कई ऐतिहासिक कार्यक्रम होते रहे हैं.
ये वो ही रामलीला मैदान है जहां बाबा रामदेव ने काले धन और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना अनशन किया था लेकिन 5 जून 2011 उनके अनशन पर दिल्ली पुलिस ने लाठियां बरसा कर उन्हें वहां से हरिद्वार भेज दिया था.
भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, कोई नहीं जानता लेकिन हम इतना तो कह ही सकते हैं कि देश की सरकारें बदलती रही हैं लेकिन रामलीला मैदान वहीं का वहीं है.

Thursday, December 19, 2013

चरणदास चोर का धर्मसंकट

यह चरणदास चोर के पुनर्जन्म और आगे की कथा है। इसे ‘आधुनिक भारत का भविष्य पुराण’ के रचयिता आचार्य रामलोटन शास्त्री ने हाल ही में भैय्या जी को सुनाई है। पहले संक्षेप में चरणदास चोर की असली कथा सुने, जिस पर फिल्में बनीं और देश-दुनिया भर में नाटक खेले गए। यह छत्तीसगढ़ी लोककथा है, जिसे पहली बार हबीब तनवीर साहब मंच तक लाए। चरणदास चोर ऐसे चोर की कहानी है, जो मजाक ही मजाक में अपने गुरुजी को सच बोलने का वचन दे देता है और इसके साथ ही चार प्रतिज्ञाएं भी करता है। प्रतिज्ञाएं थीं कि कभी सोने की थाली में खाएगा नहीं, न ही कभी किसी रानी से शादी करेगा, कभी हाथी में बैठकर जुलूस में भी नहीं निकलेगा, न ही कभी किसी देश का राजा बनेगा। एक चोर की इन प्रतिज्ञाओं का आशय कोई भी समझ सकता है कि जो नामुमकीन है, प्रतिज्ञाएं उससे जुड़ी हैं।  एक दिन गजब हो गया। वह राजमहल के खजाने में चोरी करने गया। रानी ने उसे देख लिया। चोर ने सब कुछ सच-सच बता दिया। रानी इतनी प्रभावित हुई कि उसे अपना दिल दे बैठी। उसने सोने की थाली में भोजन परोसा, चरणदास ने मना कर दिया। फिर उसकी साफगोई और सम्मान के लिए हाथी पर बैठाकर जुलूस निकालने का प्रस्ताव दिया-चोर ने इसे भी ठुकरा दिया। रानी ने कहा, आधा राज्य उसके नाम लिख दिया जाएगा। प्रतिज्ञाबद्ध चोर ने इसे स्वीकार नहीं किया और अंतत: जब उसने रानी के विवाह का प्रस्ताव भी अस्वीकार कर दिया तो कुपित रानी ने उसे मौत की सजा सुना दी। चोर ने अपने गुरु का वचन निभाते हुए मौत को गले लगा लिया। 
चरणदास चोर के पुनर्जन्म और आगे की कहानी अब शुरू होती है। आचार्य रामलोटन शास्त्री ने जजमान भैय्या जी को कथा का मर्म समझाते हुए कहा- चरणदास चोर की आत्मा को लेकर स्वर्ग एवं नरक के दूतों में झगड़ा हुआ। नारद जी के हस्तक्षेप के बाद चरणदास चोर की आत्मा को ससम्मान उसी तरह स्वर्ग ले जाया गया, जैसा कि अजामिल कसाई और गणिका पतुरिया को ले जाया गया था। चोर की ईमानदारी और गुरु के प्रति वचनबद्धता स्वर्गलोक में चर्चा का विषय बनी रही। मृत्युलोक में चोरी कर परिवार पालने वाले को वहां देवी-देवताओं को ईमानदारी और दृढ़संकल्प की शिक्षा देने के लिए नियुक्त किया गया। इंद्र और चंद्रमा जैसे छली प्रपंची उसके शिष्यों में थे। चरणदास को हरिश्चंद्र और महात्मा गांधी वाले अतिथि गृह में जगह दी गई। यहां कभी-कभी सुभाषचंद्र बोस और जयप्रकाश नारायण भी आया करते थे। चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह जब कभी भारत की दुर्दशा की खबरों से उद्विग्न होते तो वे भी महात्मा गांधी से फरियाद करने आ जाया करते थे। पिछले जन्म में चोरी जैसे वर्जित कर्म से लज्जित चरणदास के हृदय में इच्छा जागी- क्यों ना एक बार भारत जाकर मातृभूमि की सेवा की जाए। भ्रष्टाचार और अराजकता के खिलाफ कुछ किया जाए। इससे पूर्व जन्म के कुकृत्यों का प्रायश्चित भी हो जाएगा और देश की कुंठित तरुणाई को नई राह भी मिल जाएगी। चरणदास की इस इच्छा के प्रति स्वर्ग में निवास कर रहे सभी भारतीय महापुरुषों, क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने सहमति व्यक्त की। एक प्रतिनिधिमंडल भगवान से मिला और उन्हें चरणदास के पुनर्जन्म के लिए राजी किया...। इतनी कथा सुनाने के बाद शास्त्री जी चुप हो गए। जजमान भैय्या जी ने पूछा- आगे क्या हुआ। शास्त्री जी ने परंपरा के अनुसार दक्षिणा और नवग्रहों के दान का आग्रह किया। भैय्या जी के एवमस्तु कहने के बाद कथा आगे बढ़ी। 
तो चरणदास चोर भारत भूमि में एक आम आदमी के घर में आम आदमी के शिशु की भांति किलकारी भरते हुए पैदा हुए। उनका पालन-पोषण भी आम आदमी  की भांति हुआ। भगवान की अनुकंपा और स्वर्गीय भारतीय महापुरुषों के आशीर्वाद की वजह से चरणदास बचपन से ही मेधावी निकले। मां-बाप ने नए चलन के हिसाब से उनका नामकरण किया। वे नए नाम से जाने गए। मेधावी होने की वजह से उन्हें उच्च संस्थान में पढ़ने का मौका मिला। सरकारी वजीफे ने उनकी आर्थिक समस्या का हल कर दिया। पढ़ने के बाद वे उच्च नौकरी के लिए चुन लिए गए। वे नौकरी में रम ही रहे थे कि स्वर्ग से मैसेज मिला कि जिस काम से गए हो, वो अब करो। चरणदास नए अवतार में नौकरी पर चरण प्रहार करते हुए आम आदमी के बीच आ गए।  पूर्व जन्म की भांति एक गुरु का चयन किया। गुरु ने पहला संकल्प दिलवाया- जनता के लिए लड़ना, लेकिन न राजनीति करना और न राजनीति में जाना। गुरु ने शिष्य को आगे करके एक बड़ा प्रभावशाली आंदोलन चलाया। इस आंदोलन से चेला छा गया। चेला को लगा कि गुरु तो धेला भर का है, असली तो मैं हूं। गुरु द्वारा दिलाए गए संकल्प पर चरण प्रहार करते हुए चेले ने राजनीति भी करनी शुरू कर दी और पार्टी भी बना ली। चूंकि चेला था तो ईमानदार और हृदय में चरणदास जैसा दृढ़ संकल्प, इसलिए आम आदमी उसे अपना हीरो मानने लगे। चेले की नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लग गई। 
ये नजर किसी तांत्रिक की मूठ से कम घातक नहीं थी। चुनाव हुआ तो वह कुर्सी उसी तरह मुरझा गई, जैसे कि तांत्रिक मूठ से हराभरा पेड़ मुरझा जाता है। चेले की पार्टी ने चुनाव में आम आदमी को रियायतों का ऐसा सब्जबाग दिखाया कि सामने वाली पार्टी सूखे पत्ते की तरह उड़ गई। जो पत्ते राजपथ पर पड़े भी मिले, उस पर तबियत से झाडूÞ फेर दिया गया। फिलहाल कथा को यही विश्राम देंगे, क्योंकि इस चरणदास के आगे गहरा धर्मसंकट आ गया है- पहला, गुरु के संकल्प की भांति जनता के प्रति संकल्पों पर चरण प्रहार कर उनसे हाथ मिला ले, जिनसे लड़ने के लिए उसे स्वर्ग से यहां भेजा गया था या फिर जनता के साथ संकल्पों की माला भजते हुए खड़ा रहे। अब क्या किया जाए, यही तो धर्मसंकट है।     

Sunday, December 15, 2013

एक उम्मीदवार की चुनाव-व्यथा

मुद्दतों बाद महात्मा गांधी ने सोचा कि भारतवर्ष में जाकर क्यों न चुनाव लड़ कर देखा जाए कि अब क्या हाल है। पुनर्जन्म की झंझट में फंसे बिना वे अपने अनुयायी दादूदयाल दयापति की आत्मा में प्रवेश कर गए और टिकट की अर्जी दिलवा दी। दयापति आलाकमान के फॉर्मूले से निकले ऐसे उम्मीदवार हैं जिन्हें भीषण विचारमंथन के बाद टिकट दी गई थी। यह टिकट उन निंदकों के मुंह पर तमाचा थी, जो प्राय: कहा करते थे कि राजनीति बेईमानों की बपौती बन चुकी है और नागनाथ-सांपनाथ के अलावा कोई विकल्प नहीं। दयापति ईमानदारी में हरिश्चंद्र, समाजसेवा में बिनोवा भावे, विद्वता में विवेकानंद हैं, आत्मा में गांधी घुसे ही हैं। टिकट घोषित होने के बाद दयापति जी जैसे ही पार्टी कार्यालय पहुंचे उनकी आंखें फटी रह गर्इं। देखा कि पार्टी दो गुटों में बदल चुकी है। असंतुष्ट गुट की बैठक वहां चल रही थी। उनके कान में जैसे ही सुनाई दिया कि - आलाकमान अंधा हो गया है... दयापति जैसे सड़ियल उम्मीदवार को उतारकर खुदकुशी की है... हम  लोग उसे हरगिज नहीं जीतने देंगे। बेचारे दयापति ऐसे कटुवचन सुनते ही उल्टे पांव भागे और सीधे आलाकमान के दफ्तार पहुंचे। घुसते ही पार्टी प्रवक्ता से सामना हो गया। प्रवक्ता उन्हें देखते ही बोल पड़ा- दयापति जी आपने तो पार्टी को कहीं का नहीं छोड़ा। जब आप पर इतने एलीगेशन थे तो पहले हिंट क्यों नहीं किया? दयापति बोले - मतलब! फाइल के पुलिन्दे निकालता हुआ प्रवक्ता बोला - ये हैं आपके खिलाफ फ्रॉडगीरी के दस्तावेज, बड़े छुपे रुस्तम निकले! ये हलफनामा देख रहे हैं न - यह एक महिला का है जिसका कहना है कि आपके उससे अवैध संबंध रहे हैं, एक औलाद भी है। उसने डीएनए टेस्ट कराने की मांग की है। दरअसल दयापति जी के आलाकमान पहुंचने के पहले ही एलीगेशन पहुंच चुके थे।  

तभी आलाकमान का बुलावा आया। आलाकमान दरअसल कुछ नहीं, ये जनता द्वारा रिजेक्टेड कुछ बुद्धिविलासियों का छोटा सा समूह होता है जो राजनीति का ज्ञान बघारता है और सुप्रीमों की कृपा से राज्यसभा की सांसदी को भोगता है। चूंकि दयापतिजी को टिकट देने का राजनीतिक नवाचार सुप्रीमों ने ही किया था इसलिये आलाकमान का दायित्व बनता है कि वे दयापति को पूरा सपोर्ट करें। गांधी टोपी लगाए एक बुजुर्ग आला मेम्बर ने कहा - दयापति जी आप घबराइये नहीं, राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप चलते ही रहते हैं। झूठ के पांव नहीं होते, क्षेत्र की जनता आपको चुनकर निंदकों को करारा जवाब दे देगी। प्रदेश व जिला वालों को अभी कहे देता हूं, किसी ने चू-चपड़ की तो उन्हें शंट कर दिया जाएगा। दयापति जी को सामने चुनाव दिख रहा था। उन्होंने वक्त जाया करना ठीक न समझा। उल्टे पांव क्षेत्र में लौट आए। पार्टी कार्यालय पहुंचे तो माहौल बदला सा था। सभी असंतुष्ट अचानक संतुष्ट हो चुके थे। पार्टी अध्यक्ष ने कहा - दयापति जी पूरा संगठन आपके साथ है - चुनाव लड़िये दिल खोलकर - फिर हें.. हें.. करता हुआ अन्य पदाधिकारियों को आंख मारी। एक पदाधिकारी उठा और दयापति के कानों में बुदबुदाने लगा - दयापति जी विचलित होकर लगभग चीख उठें - सुनिये हम वोटरों को दारू-दक्कड़ न बांटेंगे न बांटने देंगे। दरअसल पदाधिकारी एक गाड़ी और दारू के लिए बीस हजार रुपये मांग रहा था। दयापति अपने घर पहुंचे तो देखा नात-रिश्तेदार उनकी दलान में जमा थे। उनके एक बड़बोले भतीजे ने कहां - क्यों फूफाजी पार्टी ने अच्छा माल-टाल दिया होगा... इधर भी कुछ ढीलिये तब न निकलेंगे प्रचार में। इस बीच गांव का सरपंच आ गया। दयापति को एक कोने ले जाकर बोला, गांवों की दलित बस्ती मुझे सौंप दीजिये आप आगे की देखिये। फिर रुककर बोला, हमने हिसाब लगाया है, दारू, कम्बल व वोट के दिन भोजन भंडारे का कोई सवा तीन लाख रुपये का खर्चा है। दयापति सरपंच से निपटते कि उनके एक पुराने साथी आ गए। जो हाल ही में पटवारी से रिटायर हुए थे। टीटीएस (तीन तेरा सवा लख्खी) और डिएमटियों को एक कर दिया जाए तो चुनाव निकला समझिए। दयापति यह कह पाते कि मुझे जातीय आधार पर चुनाव नहीं लड़ना है, रिटायर्ड पटवारी बोल पड़ा - उधर ठाकुर, पटेल, दलित सब लामबंद हो रहे हैं। चलिये ज्यादा देर नहीं - पांच गाड़ियों व उनके डीजल के खर्चे का प्रबंध करिये सब मैनेज हो जाएगा। दयापति को दिन में ही हरिश्चंद्र, बिनोवा, विवेकानंद सपने में आने लगे। अदृश्य आवाज गूंजी इन सबको छोड़कर अकेले ही आगे बढ़ो, यानि एकला चलो। दयापति ने सभी से माफी मांगी व अकेले ही वोट मांगने निकल पड़े। वे उस गांव में गए जिस गांव में स्कूल व सड़क बनवाने के लिये संघर्ष किया था। प्रवेश करते ही दो युवक मिले। दयापति उनसे वोट की अपील करते कि वे गाड़ी के पिछवाड़े कुछ तलाश करने लगें। भई कुछ है, दारू-सारू है कि वैसे ही भिखमंगे की तरह निकल पड़े वोट मांगने। तरुणाई की इस ढिठाई पर दयापति को बड़ा कष्ट हुआ। वे बोले बेटा तुम लोग भारत के भविष्य हो - नया इतिहास गढ़ो हमारे साथ मिलकर। दोनों युवक बोल पड़े - आपने हमें बुद्धू समझ रखा है क्या? तमाम चंदा लेकर माल अकेले ही पेल जाना चाहते हो। तुमसे तो अच्छा वो परदेसीलाल है जो ढोंग तो नहीं करता। दयापति खेत की मेड़ पर भारत के भविष्य के बारे में सोच ही रहे थे कि भैय्याजी आ धमके।  दयापति जी, कुछ पैकेज वैकेज है! दयापति ने कहा, हमारी सरकार बन जाने दो इस क्षेत्र के विकास का स्पेशल पैकेज दिलवाएंगे। भैय्या जी ने कहा, पब्लिसिटी का पैकेज, जीतना है तो प्रेस को मैनेज करना पड़ेगा। ये पैकेज उल्टी खबरों को सीधा करके आप की पब्लिसिटी को सही लाइन पर ले जाएगा। दयापति के सामने लोकतंत्र का चौथा खंभा हिलते हुए दिखने लगा। कहीं सिर पर ही न गिर पड़े, वे वहां से आगे बढ़ लिये। तभी एक तेज बदबू का झोका उनकी नाक में घुसा। आंखें फेरी तो उनकी पार्टी के पदाधिकारी, विरोधी प्रत्याशी के साथ जाम लड़ाते हुए चहक रहे थे, डीएनए टेस्ट का दावा करने वाली वो महिला मटक रही थी। यह वाकया मतदान के एक दिन पहले का था। उन्होंने आसमान की ओर देखा, तो हरिश्चंद्र, बिनोवा, विवेकानंद की आंखों से आंसू झर रहे थे। आंसुओं की बारिश से दयापति भीग गए। ऐसे लगा कि उनका एक बार फिर कायान्तरण हो रहा है... वे तेजी के साथ राजघाट की ओर उड़ चलें।