Saturday, November 5, 2011

वैचारिक मतभेदों के बावजूद मित्रता कायम रही

कांग्रेस की राजनीति में अर्जुन सिंह और श्रीनिवास तिवारी को परस्पर विपरीत ध्रुव के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है। लेकिन ऐसा था नहीं, प्राय: ऐसे मौके आते थे जब ये दोनों नेता अंतरंगता के साथ मिलते थे। खासतौर पर विन्ध्य की कांग्रेसी राजनीति में वही होता था जो ये दोनों मिलकर तय करते थे। शायद ही ऐसा कोई आमचुनाव रहा हो जब ये नेता एक दूसरे के निर्वाचन क्षेत्र में प्रचार करने न गए हों। हां.. जब भी किसी मुद्दे पर मतभेद होता, उसे खुलेआम व्यक्त करने में इन दोनों महारथियों ने कोई परहेज नहीं बरता। कुंवर अर्जुन के बिना यह उनका पहला जन्मदिन है। इस मौके पर खट्टी-मीठी यादों के साथ स्टार समाचार ने बातचीत की उनके समकालीन नेता श्रीनिवास तिवारी से।
- अर्जुन सिंह से आपकी पहली मुलाकात कब और कैसे हुई?
- विद्यार्थी जीवन में हमारी मुलाकात हुई।  हम कक्षा 9वीं में पढ़ रहे थे, उसी साल रणबहादुर सिंह व अर्जुन सिंह दोनों भाई रीवा आए थे पढने के लिए। अर्जुन सिंह उस समय 8वीं कक्षा में थे।
- छात्र राजनीति में आप उन्हें किस रूप में देखते थे?
 -हम दोनों दरबार कालेज में छात्र राजनीति में सक्रिय हुए। वे एक साल मुझसे पीछे के दर्जे में थे। कालेज के छात्रसंघ के चुनावों में हम सभी बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। अपने-अपने साथियों व समर्थकों को चुनाव में उतारते थे। मैं महासचिव चुना गया था। बाद में वे भी छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए थे।
-कांग्रेस की राजनीति में आप दोनों कब और कैसे एक साथ आये?
- समाजवादियों के चंदौली सम्मेलन में यह तय हुआ कि कांग्रेस में शामिल हुआ जाए, सो 1975 में मैं कांग्रेस पार्टी मेंआया। इसके पूर्व 1952 एवं 1972 में दो बार सोशलिस्ट पार्टी से विधायक बना था। मैं जब कांग्रेस में आया तब अर्जुन सिंह प्रदेश के कृषिमंत्री बाद में शिक्षामंत्री भी बने।
 -1977 में अर्जुन सिंह किन राजनीतिक परिस्थितियों में नेता प्रतिपक्ष बने?  
- कहानी यह थी कि समाजवादी गुट के कांग्रेसी तेजलाल टेंभरे को नेता प्रतिपक्ष बनाना चाहते थे। लोग उम्मीद कर रहे थे कि मैं भी टेभरे का ही समर्थन करूंगा पर मैंने अपने साथियों को अर्जुन सिंह का साथ देने के लिए तैयार किया। बात विन्ध्यक्षेत्र के गौरव के साथ के साथ जुड़ी थी। हमने अर्जुन सिंह का समर्थन किया और वे नेता प्रतिपक्ष बने।
- 1980 में अर्जुन सिंंह के कैबिनेट में आप मंत्री बने पर ज्यादा दिन निभ नहीं पाई ऐसा क्यों?
- हम दोनों के काम करने के तरीकों  एवं विचार में मतभेद मेरे मंत्रितत्व काल में हुए। उनकी सोच दूसरी थी, और हमारी सोच उनसे भिन्न थी। काम करने के तरीके से वैचारिक मतभिन्नता       आई। मुझे लगा कि इन परिस्थितियों में मेरे लिए काम करना मुश्किल होगा और मैंने पद त्याग दिया।
-कहा जाता है कि सभी नियमों को शिथिल करते हुए काम करने का फार्मूला अर्जुन सिंह को आपने दिया था?
-नहीं, ऐसी कोई बात नहीं थी। मुख्यमंत्री के पास लोकहित के अकूत अधिकार होते हैं। उसका  उन्होंने पूरा-पूरा उपयोग किया। सीएम के तौरपर उन्होंने खुद अपनी अलग शैली विकसित की।
-1985 में आपकी टिकट भी काट दी गई थी, किसे जिम्मेदार मानते हैं?
- वैसे तो 1985 में 80 निवृत्तमान विधायकों की टिकट कटी थी, लेकिन मेरी टिकट मूलरूप से अर्जुन सिंह के कारण काटी गई थी। शायद उनको भय था कि कहीं मैं सीएम न बन जाऊं। इसी आशंका के चलते उन्होंने मेरी टिकट कटवा दी। आज भी यह कहने में मुझे कोई हर्ज नहीं है।
-जब आप स्पीकर थे तब अर्जुन सिंह ने एक बार कहा था कि मुझे रीवा जाने से डर लगता है। ऐसा क्यों कहा?
-मुझे नहीं मालुम कि उन्होंने ऐसा क्यों और किस संदर्भ में कहा था।
- आप दोनों को एक दूसरे का धुर-विरेधी कहा जाता रहा है?
-हमारे मधुर संबंध थे। जब भी भेंट होती थी, मित्रवत होती रही है। हम एक दूसरे के काम भी खूब किये हैं। यह महज दुष्प्रचार है कि हम एक दूसरे के धुर विरोधी थे। अर्जुन सिंह के निधन से मुझे व्यक्तिगत बहुत दुख पहुंचा है। विन्ध्य से जुड़े हर पेचीदा मसलों पर हम दोनों साथ बैठकर विमर्श करते थे, जनहित और पार्टीहित के सवाल पर हम एक थे और मिलकर काम करते थे।
                                          (अर्जुन सिंह से रिश्तों को लेकर श्रीनिवास तिवारी से खास बातचीत 5 नवंबर2011)

Thursday, November 3, 2011

मोर पिया परदेशी चले हो आबा ना


प्र कृ ति की सबसे अनमोल देन वर्षा है। मनुष्य भर नहीं पृथ्वी पर अवस्थित चर-अचर, स्थावर-जंगम सभी का जीवन वर्षा आधारित है। बादल रूठ गए, सारी प्रकृति उदास हो गई। पानी आ गया, जीवन हरिया गया। पानी चला गया फिर मनुष्य के पास बचा ही क्या!  वर्षा का स्वागत मनुष्य मात्र नदी पेड़-वृक्ष, नदी-नाले भी करते हंै, पशु पक्षियों का उत्साह और उल्लास देखते ही बनता है। शायद इसीलिए सबसे अधिक कविताएं और गीत वर्षा पर ही लिखे गए हैं, पंत और निराला ने एक दो नहीं अनेक पावस-गीत, बादल राग में गाए हैं। तुलसी के राम ने भी वर्षा का एकान्त अन्तरतम से महसूस किया। सूर के कृष्ण तो वर्षा के साथ ही धरती पर आए और आते ही यमुना मे पैर (पाद) प्रक्षालन किया। उमड़ती-उफनाती यमुना को पार करते वासुदेव के सिर पर रखी टोकरी से पैर बाहर निकाल कर यमुना में आगे खेलने कूदने का संकेत दे दिया।  भयानक और भयावह वर्षा से केवल वासुदेव को नहीं समूचे ब्रज को डूबने से बचाया। किसी प्रचलित परम्परा के विरूद्ध कृष्ण का पहला प्रतिरोध था ‘गोवर्धन पूजा’। जो कालान्तर में ‘हरियरी की पुजाई’ के रूप में ब्रज से बघेलखण्ड में आई।
    रीतिकाल के कवियों में वर्षा के इस रूप को उद्दीपन रूप में अधिक चित्रित किया है। निश्चित रूप से लोक जीवन में भी प्रोषित पतिकाओं के लिए ऋतु उद्वेलित और उत्तेजित करती है। धूम-धुआरे-कारे बादल आकाश में उठ रहे हंैं, ‘जारत आवत जगत को पावस प्रथम प्रमोद’ ऐसे में नन्हीं-नन्हीं बूंदों को गिरना, बिजली का लपकना, बादलों का गम्भीर दमदमाता गर्जन विरहिणी को अशांत करता है। एक डरावनी सिहरन से भी आप्यायित करता है। सावन-भादौं की झुकी यह अंधियारी रात उसे परदेशी पति की याद दिलाती है। बघेली लोक गीत में कजली और हिन्दुली के असंख्य ऐसे गीत हैं जो जायसी के बारहमासी को चुनौती देते हैं-  ‘लगे हैं अषाढ़,सावन चढ़ि आएं ललकारि, भादौं निशि अंधियार, कुवांर खबरी न पायेंउं, अरे सांवरिया।’ नायिका कह उठती है- ‘मोर, पपीहा बोल रहे हैं, बादल झिमिर-झिमिर बरस रहे हैं।’
सामन-भदउना कई झुकी हई अंधिअरिया, चले हो आबा ना। मोर पिया हो परदेशी चले आबा ना, अपने कोठरिया से तोहार रानी गोहराबइ चले हो आबा न।
बघेली जन-जीवन में सावन-भादौं का महीना लड़कियों के नैहर में होने का महीना है। तीजा का त्यौहार  वे प्राय: मायके में ही बिताती थीं। कजली खेलने-गाने से लेकर पुतरी बहाने की परम्परा नैहर की है। बहू के रूप में ये सब खेल ससुराल में संभव नहीं, क्योंकि ससुराल की एक मर्यादा है, वहां बहू खिलंदड़ी नहीं हो सकती। नैहर में सखियों के साथ खेल करती है। सावन-भादौं आ गया। मायके में जिसकी मां नहीं है, उसको बुलाने के लिए कौन कहे, बाप का कलेजा थोड़ा मजबूत होता है- कैसे, कौन बुलवाए, ससुराल में बिटिया व्यग्र है, दुखी है कहती है- ‘समन-भदउना कइ झुकी अंधिअरिया ये मोर मन लाग नइहरबउ हो ना
माया जो होती न सुधि मोरि लेतीं पै बाबू क कहिन करेजबउ हो ना’
इसी प्रकार भाभी जो होतीं, चाची जो होती, आजी जो होती, सभी रिश्तों से अपेक्षा करती वह नैहर के लिए उत्कंठित है। दूसरी तरफ मां की भी स्थिति बिटिया से कमतर नहीं है। विवशताएं हैं, उनका समाधान नहीं है। सूर की यशोदा तो नन्द से यहां तक कह देती है कि ‘लो ! अपना ब्रज संभालो मैं अपने लाल के पास जाना चाहती हूं!’ बघेली जीवन में मां, बेटी के ससुराल नहीं जा सकती, वह तड़पती है, बिटिया को मां को दुलार भरी बोली कभी नहीं भूलती। पूरब दिशा से उठी है बदरिया, बरसे लागी ना, बदरा नान्ही-नान्हीं बुुदिया बरसै लागें ना, अपने महलिया से माया निहोरै रोवत होंइहीं ना, मोरी बेटी परदेशिन, रोबत होइहीं ना, होतू जो मोर बेटी हाथे पर मुंदरिया, रही हो अउतिउ ना, बेटी हमरे अंगुरिया, रही हो अउतिउ ना, काहे क पठइउ माया देश पर देशबा, नहीं हो बिसरउ ना, माया तोहरिन बोलिया, नहीं हो बिसरइ ना।
गीतों में जीवन के प्रत्येक रंग होते हैं। हर सम्बन्धों के गीतों की अलग ध्वनि है। समाज के प्रत्येक रिश्तों की अलग-अलग अपेक्षाएं होती हैं। सास-बहू के रिश्ते तुलसी के मानस की तरह बहुत कम दिखते हैं दीप बलि नहीं टारन कहेऊ, वाली कौशिल्याएं लोक में बहुत कम हैं। बहू को कठिन से कठिन काम देना बघेली जनजीवन में भी है। गंगा-जमुना नदी का कगार गिर गया है, कोई घाट नहीं है, फिर भी सास का आदेश है कि घड़ा भर के पानी लाने का! घड़ा भी चू रहा है, कैसे पानी आएगा, इससे सास का मतलब नहीं, उसे पानी चाहिए। बहू का संकट और दुख तथा ग्लानि इस गीत में किस प्रकार व्यक्त होती है-
देखें गंगा जमुना जी क  ओदरा कगरबा पई सास पठवंइ गंगा पनिअउ हो ना, सासु मोर दिहिन फुटहा घइलना, भीजइ हो लागें ना, मोर सतरंग चुनरिया भिजइ हो लागे ना,अस रिसि लागइ, पटकि देई घइला, कूदि हो परी ना, येंहीं अगमी दहरिया, कूदि हो परी ना।
कण्व जैसा वीतरागी ऋषि भी शकुन्तला की विदा में फफक पड़ा, शकुन्तला पालित पोषित पक्षियों-पशुओं की तो बात ही क्या, पेड़ पौधे भी हहरा उठे! ससुराल जाती बिटिया गांव से बाहर निकलते, बाबू के बगीचे, तालाब, पेड़ों से भी लिपटकर रोना चाहती है। लोक में कहते भी हैं कि ‘मायके का कुकुर भी भाई जैसा लगता है। कबीर भी   इस वजह से नइहर के छूट जाने से आत्मा को विचलित होते देखते हैं’, ‘बाबुल मोर नइहर छूटत जाय’ बघेली लोक गीत मे भी बेटी को अनुरोध देखें,उसका मायके का प्यार देखें -
एक वन गई, दूसर वन गई तिसरे वने ना, परा बाबू का बगीचा, तिसरे वने ना, थोरई क डोलिया तूं धई दे कंहरिया, देखि हो लेई ना, अपने बाबू क बगिचबा, देखी हो लेई ना, एक वन गई, दूसर वन गई, तिसरे वने ना, परा बाबू क  सगरवा तिसरे वने ना, थोर क डोलिया तूं धई दे कंहरिया, देखि हो लेई ना, अपने बाबू क सगरवा देखी हो लेई ना।
बघेली लोक-जीवन में प्रकृति के सभी जीवों से आत्मीय संबंध आदिम काल से रहे हैं। बहुला चौथ, भादौं कृष्ण पक्ष चतुर्था का प्रमुख व्रत है। गांव भर की प्रिय गाय बहुला (सुरमी) वन में चरने गई। उसे बाघ ने घेर लिया। बहुला ने कहा - ‘मेरा बछड़ा है भैया ! मुझे जाने दो, वह भूखा होगा, उसे दूध पिलाकर आऊंगी तब मुझे खा लेना’ भइया कहने के कारण बाघ ने उसे छोड़ दिया। इस शर्त के साथ कि तुम्हें आना होगा। गाय उदास आती है,  बछड़ा जान जाता है, वह हारा हुआ दूध नहीं पीता। मां के साथ वन जाता है। सारा गांव गाय को रोकता है। गाय नहीं मानती। बछड़ा आगे-आगे चलता है, बाघ को देखते ही ‘मामा प्रणाम’ कहता है और अपने को मां के पहले खाने के लिए बाघ से विनती करता है बाघ इस अनोखे रिश्ते के बंधन में बंधकर दोनों को छोड़ देता है। गांव, गाय और बछड़े को आता देखकर बहुत खुश होता है, दिन और देर रात तक प्रतीक्षा करता गांव उस रात चना और जौ की रोटी खाकर व्रत करता है। बहुरा चौथ भाई (बाघ) और पुत्र (बछड़ा) के चिरंजीवी होने का त्यौहार है। वन्य प्राणियों की रक्षा के लिए यह व्रत एक अनूठा उदाहरण बघेली लोकगीतोें मे मिलता है-
एक बभनमां के सुरहिन गइया पई चेरे उ नदन वन जाइउ हो ना, एक वन गई हइ, दूसरे वन गर्इं हइ, तिसरे वने ना, उहै बिंझ के पहारी, तिसरे वने ना, जब उगइयां मंथवा ओनामा, पइ सिंघ गराजै लागे हो ना,‘आजु के दिना तूं छोड़ा मोर सिंघ, पर घरे बांधे बछड़ू हमारौ हो ना’ ‘गइया जाति चतुर मोंहि लागै, हगि हो डोरे ना’,‘मोर मिला रे अहर बा, ठगि हो डोरे ना’,‘बछड़ू केर किरिया करब मोर भइया, ये लोंटि हम अदबै पहरिउ हो ना’,‘आनो दिना माया हुंकुरति आमा, आजु काहे अनमन ठाढ़िह हो ना’,‘आबा बछोलन तू थने म लगि जा पै सिंध से होरउं बातिउ हो ना’, ‘हारा दुधवा न पिअब मोरि माया, ये हमहूं चलब तोहरे सथबौ हो ना’, ‘एक वन गई दूसर वन गई तिसरे वने ना, पहुंचे सिंध के पहरी तिसरे वने ना’,‘पहले हो मामा तूं हमका भखि ले थे फेरि पीछे माया हमारिउ हो ना’,‘छिटिकि चरा बछड़ू कदली के वन मा, पै इ वन आई तोहारउ हो ना’
वर्षा ऋतु में गाये जाने वाले ये लोकगीत बघेली संस्कृति के सामाजिक जीवन के परिचायक मात्र नहीं है वरन अपनी निरंतरता में भी शास्वत है। सावन-भादौ में झूलों पर गाती लड़कियों, स्त्रियों एवं पुरूषों के गीत, हृदय में करूणा, प्रेम एवं स्रेह को जीवन्त रखते हैं। खेतों में निरौहों करती, ललनाएं, ओनए बादलों को देखकर जब कजली और हिन्दुली की तान देती हंै, बादल झर आते हंैं। गांव से लगे अपने जंगल में पेड़ों पर चढ़ कर नीचे बादलों को चरते हमने देखें हैं। पंत जी ने ‘उड़ गया अचानक लो भूधर’ देखा था। हमारे लोकमानस में उन्हीं कल्पनाओं को गीतों में ढालकर अमर कर दिया। विकास के इस अन्धे दौर में यह जरूर हुआ है कि गांवों  में भी झूले कम हो गए हैं, गीत गाने वाली परम्परा खत्म होती जा रही है, फिर भी ये लोकगीत हमारे जीवन की श्वास-प्रश्वास में है, रहेंगें, समय इन्हें क्षुब्ध करता है, लुप्त नहीं कर सकता, क्योंकि ये कालातीत है।

लोक में शिव, राम और कृष्ण


लोक’ हमेशा से चर्चा में रहा है। वैदिक युग से लेकर आज तक। ऋषियों ने अधिकतर मंत्र लोक पर, लोक के लिए लिखी, लोकमंगल की कामना से। पुराणों में लोकमंगल को कल्पना का साकार अर्थ शिव ने दिया। सुर और असुरों ने समुद्र मंथन किया। मंथन से चौदह रत्न निकले। सही बंटवारे का प्रमाण न किसी पुराण में मिलता है न स्मृति में, न लोक में। श्रम की हिस्सेदारी देवताओं की तमाम चालाकियों के बावजूद बराबर होनी थी। सुर सम्राट देवराज ने मणि, रम्भा, गजराज(ऐरावत)कल्पद्रुम, कामधेनु, घोड़ा, धनुष, हथिया लिया, तो छोटे भाई विष्णु कौन कम थे, उन्होंने लक्ष्मी को अंगीकार कर लिया, शंख ले लिया। धनवन्तरि सुरों के वैद्यराज हो गए। वारूणी (शराब) असुरों को पिला दिया। और हालाहल, सभी भागने लगे उसे देखकर देवता चालाक थे। शिव भोलेनाथ थे, सीधे-सरल-विश्वासी। उनकी महिमा का गायन करने लगे कि ‘प्रभो! आप ही इस विष को पीकर संसार का  कल्याण कर सकते हैं अन्यथा यह विष सारे संसार में फैलकर सबको नष्ट कर देगा, रक्षा करें आशुतोष’। संसार के कल्याण के लिए यह पहला लोकमंगल कार्य था। सारे  शरीर में फैलकर विष, शिव को भी जला डालता, उन्होंने कंठ में ही रोक लिया। कंठ जलने लगा, सर्पों को गले लगाया, माथा जलने लगा, शशि जो मंथन से निकला था उसे माथे पर लगाकर विष को प्रभावहीन किया। अमृत के बंटवारे की कथा तो सारा लोक जानता है। श्रम के फल का यह विभाजन अपनी प्रासंगिकता के साथ कदाचित आज भी जीवन्त है।
   शिव अनार्यों, आर्यों दोनों में पूजित हुए और लोक में तो शिव से बड़ा कोई है ही नहीं, शायद इसलिए कि शिव के स्वार्थ की कोई कहानी भारतीय वांग्मय में नहीं है। वे परमार्थ के देवता थे। सबसे भोले-भाले, दैत्यों, असुरों की किसी भी प्रार्थना पर हरदम वरदान देने के लिए प्रस्तुत और वरदान देकर भागते हुए औघड़दानी शिवपुराणों में दिखते हैं। शिव का अर्थ ही कल्याण है। उनके विशेषण ही उनकी संज्ञा है, संभवत: इसीलिए भारतीय साहित्य में उनकी अव्याहतगति है। शिव जैसा पे्रमी विश्व के किसी साहित्य में नहीं है। सती की लाश कंधे पर लिए, उसे जीवित मानते हुए उससे बात करते हैं। गल-गल के अंग-प्रत्यंग गिर रहे हैं, वह बावला प्रेमी यह मान ही नहीं रहा है कि सती अब नहीं है। देवताओं के कुचक्रों का शिकार, शिव उनको ढूंढ़ता है, परन्तु वे सब छिपे हैं। उनमें शिव के सम्मुख आने का साहस नहीं है। शिव जैसा योगी भी कोई नहीं, अखण्ड और अचल समाधि को भंग करने के लिए देवताओं ने कन्दर्प की बलि दे दी। लोक मंगल के लिए हमेशा हर क्षण, उपस्थित। इसीलिए वे लोक के सर्वाधिकप्रिय महादेव, देवाधिदेव - ‘जरत सकल, सुरवृन्द, विषम् गरल जेहिं पान किए’। शिव पर कोई लोक निन्दा नहीं, कोई लोकापवाद नहीं है।
  लौकिक संस्कृत के आदिकाव्य ‘रामायण’ की रामकथा के अनेक स्वरूप हैं। सीता निष्कासन लोक में स्वीकार्य नहीं है। इस प्रसंग में लोक, सीता के पक्ष में खड़ा है। क्या राम लोकमंगल के लिए वन गए? वन में अस्थि समूह देख कर उन्होंने निश्चरहीन पृथ्वी करने की बात कही। किशोर राम, विश्वामित्र की रक्षा के लिए गए, निर्भय यज्ञ करने को कहा। ताड़का-सुबाहु को मारा। तब निश्चर उनकी दृष्टि में नहीं थे। राजतिलक की तैयारी, वनगमन, चित्रकूट तक उनके चिन्तन में लोक की कोई पीड़ा नहीं थी। सीताहरण के बाद वे लोक के सामने पूरी तरह आते हैं। केवट प्रसंग भी लोक से जुड़ा था। पेड़, पृथ्वी, लता पत्तों तक से सीता का पता पूछते हैं। हरिण-मृग भी  दक्षिण दिशा की ओर घूमकर सीता को ले जाने का संकेत देते हैं। वहीं उनका परिचय वानर, वृक्ष, पक्षी, साधु, सन्तों से होता है। सबको साथ लेकर निश्चरों का नाश करते हैं। वानर स्वार्थ से जुड़े, राक्षस विभीषण स्वार्थ से जुड़ा। राम का स्वार्थ तो था ही। नि:स्वार्थ भाव से राम का साथ देने वाले वृक्ष, पक्षी (जटायु-सम्पाती) और सेतु, निर्माण में लगी गिलहरी थी। नैयायिक कहते हैं कि यदि राम का राज्याभिषेक हो गया होता तो क्या रावण-वध होता। खैर, ये लेकिन-परन्तु की बातें हैं। राम का न तो बचपन लोक से जुड़ा था, न कैशोर्य। वे खेलते भी हैं तो चारों भाइयों के बीच ही। राक्षसों-निशाचरों को मारना उनके रास्ते में आड़े आने का काम था। सीता को लौटाने का सन्देश भेजना युद्ध का टालना था। यदि रावण सीता को वापस कर देता, तब उस प्रतिज्ञा का क्या होता जो भुज उठाकर उन्होंने की थी। सबके सामने सीता की अग्नि परीक्षा के बाद भी कुछ लोगों के कहने के कारण लोकापवाद से डरकर राम ने गर्भवती सीता को जिस तरह धोखे से निकाला उसे लोक ने कभी सही नहीं माना। लोक से राम हार गए। लोक में राम हार गए। अपराजित राम अपनी ही प्रजा(लोक) से पराजित हो जाते हैं।
   लोक की सीता बाल्मीक से कहती है- ‘तोहार कहा गुरु करबै!  परग दस चलबै हो। गुरुजी। राम निरमोंहियां क मुंहबा। बिताया नहि देखबै हो।  तुलसी के राम तो प्रकट हुए थे, लोक कहता है ‘खीर’ खाय पैदा सुत करती पति कर कछू न कामा। जहां शिव का स्वरूप लोक कल्याणकारी कहलाया वहीं राम मर्यादा पुरुषोत्तम, लोक मंगलकारी के रूप में स्थापित हुए।
 लोकरंजन की भूमिका में देवकी की कोख से कृष्ण पैदा हुए, गोकुल में पले। उनकी बाल-लीलाओं ने लोक मन मोहा। पहली बार लोक-साहित्य में वात्सल्य भाव को   रस की संज्ञा मिली। कृष्ण ने प्रभु का आभिजात्य और विशिष्टता छोड़, जीवन को, खेल की तरह लिया। सामान्यों की तरह जिए, उनका साथी भी खेल में दांव न देने पर हड़का कर कहने की हिम्मत रखता है कि या अधिकार जनावत याते अधिक तुम्हारे है कुछ गैया।  माखन-चोरी करता है, मुंह में माखन लगा है, दलील देता है कि उन सभी ग्वाल-बालों ने जबरन मेरे मुंह में लगा दिया है। रो-रो कर मां को अपने पक्ष में कर लेने की अद्भुत लीला लोक में प्रिय है। कृष्ण, लोक में सबसे करीब हैं। लोक के वे लीला पुरुषोत्तम है। सम्पूर्ण महाभारत उनके दायरे में हुआ, बिना अस्त्र चलाए, द्वारकाधीश कहलाए, एक दिन भी राजगद्दी पर नहीं बैैठे। कृष्ण का प्रत्येक कार्य मनुष्य की जीवन-चर्या से जुड़ा। ‘रामायण’ भारतीय दर्शन का स्वप्न और आदर्श लोक है तो महाभारत जीवन का यथार्थ, जो अतीत में था, वह आज भर नहीं, शाश्वत सत्य है। पुराणों में राम और कृष्ण को ईश्वर का अवतार माना गया है। दोनों के जीवन का उत्तरार्द्ध- अवसान त्रासद है। लोक से सबसे करीब राम और कृष्ण की कथा है। लोक में कृष्ण कथा (भागवत) का श्रवण मुक्ति देता है। जीवन के अन्तिम क्षणों में राम और कृष्ण नितांत अकेले थे। शायद जीवन का सत्य भी यही है। हंस अकेला जाई।
   लोक, राम और कृष्ण को विष्णु भगवान का अवतार मानता है। धरती पर उनके द्वारा किए गए कार्यों को श्रद्धा और भक्ति से सिरमाथे स्वीकारता है। समूचे भारतीय साहित्य में दोनों की स्थिति अपौरुषेय है। दोनों लोक में भगवान हैं, लेकिन जिनकी लीलाओं पर वे बेवाक टिप्पणी करते हैं। अकेले शिव ऐसे देवता हैं जो अनादि हैं, अनन्त हैं, जिनके जन्म-देहोत्सर्ग का कोई रिकार्ड न लोक में है, न शास्त्र में। वे देवादिदेव हैं, वे आशुतोष भी हैं, महाकाल भी। प्रलयकार भी हैं, भोलेनाथ भी। न उनका बचपन है न वृद्धावस्था। न आदि है न अन्त। लोक में कामरि है, बोल बम है, तीसरे वर्ष मलिमास है। वर्षा ऋतु के ये सावन-भादौं महीने इन तीनों देवों को प्रिय हैं। सावन तो शिव का महीना ही है। विष की जलन अभीशेष है। वर्षा में उनके भीगने से ताप कुछ कम होता है। वे अपनी इच्छा से कैलाश नहीं गए थे। बर्फ से ढके उस स्थान में शरीर की चित्त की जलन कुछ तो कम हुई होगी। सुरों के षड़यंत्र को वे भूल गए भुला दिया। राम को भी चतुर्मास बिताने का सुख कामदगिरि में बारह बार तो मिला ही। पंचवटी और ऋष्यमूक में मैं भी चौमासा बिताया।
   कृष्ण ने सावन में इन्द्र से मोर्चा लेकर इन्द्र पूजा रोककर गोवर्धन पूजा। कराई थी। इन्द्र का कोप कृष्ण के रहते निरर्थक हो गया। गोकुल में कृष्ण की तमाम लीलाओं के बीच लोक में झूला भी है- ‘झूला पड़ा कदम की डरिया झूलै कृष्ण मुरारी ना’ भादौं शुक्ल पक्ष तीज पार्वती के व्रत का चरम दिन था, जब वे अपर्णा कहलाई- अपर्ण-आशना। आज भी शिव जैसा पति पाने की कामना में लड़कियां और महिलाएं चौबीस घंटे का कठिन व्रत बिना पानी पिए, रात भर जागकर पूरा करती हैं। भादौं की वह भयानक बरसती कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधीरात, लोक में अवस्थित है। देश का यह शाश्वत शास्त्र भी है, लोक भी। शास्त्र के त्रिदेव भले ही ब्रह्मा, विष्णु महेश हों, लेकिन लोक ने शास्त्र से सिर्फ महेश को लिया।
                                   

सावन इसलिए मनभावन

सम्राट अकबर ने बीरबल से पूछा- बीरबल बारह में से चार निकल जाएं तो शेष कितने बचेंगे। बीरबल प्रत्युत्पन्नमति थे, उन्होंने उत्तर दिया- जहांपनाह! शून्य! सभी दरबारी हंस पडेÞ बीरबल की इस मूर्खता पर। बादशाह ने पूछा- कैसे! बीरबल ने कहा- जहांपनाह! वर्ष में बारह महीने होते हैं। बारह में से चार महीने बरसात के होते हैं, यदि ये चार महीने बिना बरसे चले जाएं, फिर तो शून्य ही शेष रहेगा। अकबर का आशय भी यही था क्योंकि शेष दरबारियों का उत्तर ‘आठ’ था। बीरबल के उत्तर से सम्राट खुश हुए। यों भी बीरबल, अकबर के प्रत्येक प्रश्नों के समाधानकर्ता थे। सैकड़ों वर्षों पहले पूछा गया यह प्रश्न और उत्तर आज भी उतनी ही अर्थवत्ता से उपस्थित है।
   यह चतुर्मास (चौमास) भारतीय जीवन-दर्शन का आधार है। अनेक वर्षांे बाद आषाढ़ के प्रथम दिवस पर आर्द्रा  के मेघों ने धरती को तृप्त कर दिया। ग्रीष्म की तपन में पेड़ सूख गए, कुओं ने जवाब दे दिया। धरती की छाती पर कोदौ दरता हैंडपम्प सांस लेने लगा। जाने किसकी आह में इतना दम था कि पूरुब दिशा से बादल उठे और इस तरह बरसे कि लोगों के चेहरे खिल उठे, अनायास ही कृतज्ञता में वाह कह उठे। वर्षा मनुष्य का मुक्तिपर्व है। अंग अंग पुलकित हो जाता है। पेड़- पौधे लहलहा उठते हैं, धरती हरी-धानी चूनर पहन इठलाने लगती है। गर्मी और धूल से धूसर पत्ते सद्यस्राता की तरह लहक कर एक दूसरे को चूमने लगते हैं। नदी का संगीत शुरू हो जाता है, ग्रीष्म में वह दुबली होकर सलिला का अर्थ खो बैठी थी, एकाएक दर्शन बघारने लगी। पशु-पक्षी, जीव-जन्तु सब निकल पडेÞ, वर्षा रानी का स्वागत करने। पक्षी गाने लगे। ग्रीष्म ने सबका गाना छीन लिया था। मेढ़कों ने राग सारंग(बादल) छेड़ा। वर्ष भर पता नहीं कहां छिपा रहा तुलसी बाबा का दादुर। वर्षा ने उसे उद्दीप्त कर दिया, वह ब्राह्मणों की तरह वेद पढ़ने लगा। वेद का आरोह और अवरोह से लगातार दस-बारह घण्टे पढ़ना किसी भी ब्राह्मण के वश का हो न हो, मेढ़कों के वश का है। वे निरन्तरता के साथ लय और स्वर से रात मेघों आह्वान करते रहते हैं। मनुष्यों की तरह वे बेसुरे नहीं हैं। उन्हें किसी उस्ताद की जरूरत नहीं है। चर-अचर हरिया गए।
  वर्षा के इन चार महीनों (आषाढ़, सावन, भादौं, क्वांर) पर ही वर्ष भर की खुशी निर्भर हैं। सारी प्रकृति का आनन्द वर्षा पर निर्भर है। वह गाने लगता है- लगे है असाढ़, सावन चढ़ि आएें ललकार भादौं निशि अधियार। बघेली लोक-जीवन में वर्षा सर्वोत्तम ऋतु है। सबसे अधिक त्यौहार व्रत, उत्सव इसी ऋतु में होते हैं। सावन आनन्द और उत्सव का महीना है। ‘सावन’ गीतों की एक परम्परा का नाम है। कजली, हिदुली लोकगीत, भिनसार से झूले में शाम तक, गांवों में आज भी सुने जा  सकते हंै। बघेली जन जीवन में सावन-भादौं का महीना बहन-बेटियों के मायके में होने का महीना है। राखी से तीजा तक उनके गाने, हंसने खेलने के दिन हैं। ससुराल में रह रही ग्रामीण वधू अपने मायके में पहुंचने के लिए कलप रही है, उसके मां नहीं हैं, पिता को बुलाने की फुरसत नहीं है, वह रोते हुए गा उठती है। जीवन के सुख-दु:ख को उत्सव की तरह गीत गाने की परम्परा भारतीय लोक जीवन में है। यहां स्त्रियां रोते हुए गाती रहती हैं। राजाओं के यहां तो मृत्यु पर रोने के लिए रुदाली होती है। रानी रो नहीं सकती, रोने के लिए तो सामान्य जन होना पडेÞगा। सामान्य ही तो लोक का यथार्थ सत्य है- पूरुब दिशउना से उठी रे बदरिया, बरसै हो लागी ना,उहै नान्ही नान्ही बुंदिया, बरसै हो लागी ना, माया जो होतीं, त सुधिया लइ लेतीं पइ बाबुल क कठिन करेजबउ हो ना। बाप का कलेजा कठिन होता ही है, माता की तुलना में। दूसरी तरफ ऐसे भी चित्र लोक जीवन में है कि मां, आजी बेटी के लिए रो रही हैं। गांव की लड़कियां गुड़िया, कजली खेल रही हैं, हमारी बेटी ससुराल में है उसे देखने की ललक आंसुओं में व्यक्त होने लगती है। बेटी मोर से कहती है-  ऐरिया के बेरिया मैं तोंहि बरजै मोरबा, के मत बोलै ना, मोरे बाबू के सगरबा पै मत बोलै ना। और उधर आजी (दादी) की स्थिति देखिए। तीसरी पीढ़ी का अतिरिक्त स्नेह कितना मार्मिक है- सगरा किनारे ठाढ़ि बेटी कइ आजी, रोबइ हो लागी ना। मुंह दइकै अंचरबा रोबइ हो लागी ना सबकै बेटी खेलैं गुड़िया-कजलिया हमार बेटी ना। कुहकै अपने ससुरबा हमार बेटी ना,  लोक-जीवन में रिश्तों का बहुत महत्व है। आज रिश्ते दरक रहे है।  पहले पशु-पक्षी-पेड़ वृक्षों से भी लिपटकर रोते थे। रिश्ते बन रहे हैं लोक में राम, लक्ष्मण, सीता भी सामान्य मनुष्य की तरह हैं, हां लोक की संवेदना जरूर उनके साथ है। उन पर मेघ नभ छाया अतिरिक्त रूप से नहीं है। वन में जाते हुए वे उन्हें मोहते हैं। आगे-आगे राम चलत हैं पीछे लक्ष्मिन भाई, ओनके बीच म सीता जानकी शोभ बरनि न जाई, तो है लेकिन भरी बरसात में उनके भीगने की चिन्ता है। कौन बिरिछ तर भीजत होइही राम लखन दुनउ भाई। सावन सुख का महीना है तो विरह का महीना भी।
   आषाढ़Þ के ओनए बादलों को देखकर कालिदास का शापित यक्ष मेघ को ही अपना दूत बनाकर अलकापुरी भेजता है, तो बाबा नागार्जुन कालिदास से ही पूछ बैठते हैं- कालिदास सच-सच बतलाना। इंदुमती के विरह शोक में, रोया यक्ष कि तुम रोये थे। तुलसी के राम भी ऋष्यमूक   पर्वत पर बादलों के गर्जन-तर्जन से अकेली सीता की स्मृति में सिहर उठे थे। बरसहिं बडेÞ बूंद, सीता कदम तरि भीजंइ की कल्पना, लोक को है। लोक गीतों में सीता और राधा के बहाने आम लड़की-बहू की तरह खेलने की बाते हैं।
   लोक सहजता का विश्वासी है, उसमें ग्लैमर और अभिजात्य का दिखावा नहीं है- सात सखियां मिलि सीता अकेली। खेलत होंइहीं ना। लट छोरे रे खेलत होंइहीं ना। मोरि पतली पतोहिया खेलत होंइहीं ना। अपने महलिया से ससुरा निहांरइ, भिजत होंइही ना। ससुर चिंतित हैं परन्तु खेल में बाधा नहीं डालता। लोकगीतों में सावन के झूलों का वर्णन अनेक तरह से है। कही ब्रज में कृष्ण और राधा को झूलते हुए देखने का आग्रह है, कहीं शिव के छद्म रूप को पहचान लेने की समझ है। सखियां चला चली दर्शन का ब्रज मा झूलि रहे गोपाल। को या झूलैं को या को या झुलावैं, को या खीचैं डोर। की जिज्ञासा है, वहीं महादेव शिव के रूप बदलने पर पकड़ जाने पर-कतनउ महादेउ तुं बदन छिपउबे चीन्हि हो जाबइ न। तोहर संभरी सुरतिया चीन्हि हो जाबइ ना। बेला और चमेली किस समय फूलती है, यह खिलने की सतत प्रक्रिया है परन्तु लोक ने इनके फूलने का समय अपने, प्रिय प्रणय-काल से जोड़कर गंध को सार्थक कर दिया- हरे रामा, बेला फूली आधीरात, चमेली भिनसारे रे हारी।  बिहारी ने अली-कली में ही बंध्यो लिख कर अविकसित यौवन के प्रति राजा को सचेत किया था। लोक कवि ने कच्ची कली कचनार, टोरत डर लागै रे हारी, कहकर सतर्कता बरतने का संकेत भी दे दिया। बघेली कजली और हिंदुली में लोक-जीवन का संघर्ष और सम्बन्धों का अप्रतिम निर्वाह है।
   सास-बहू और ननद भौजाई में प्रेम तो है, लेकिन लोक में इन सम्बन्धों पर अनेक प्रश्न चिन्ह है। सास और ननद को बहू और भौजी के आने पर, भाई और पुत्र के स्नेह के विभक्त होने के डरने, ईर्ष्या और  जलन भाव पैदा कर दिया। मायके से आए भाई के लिए क्या कुछ नहीं चाहती बहन। आंगन बटोरते बहू के हाथ से बढ़नी कहती है कि मायके से भैया बढ़नी का बोझा लेकर आएंगे। बहू चील्ह (चील) पक्षी से सन्देश भेजती है। संभवत: समूचे लोक और साहित्य बांग्मय में चील से सन्देश भेजने की बघेली बोली की विशिष्ट परिकल्पना है। चील से अधिक दूर दृष्टि वाला कोई पक्षी नहीं होता। भाई बोझा भर बढ़नी लाता है। सास फरिका में रखवा देती है, बहन बमुश्किल से आंगन में भाई का पैर पकड़कर भेंटती है (भेंटना बघेली से मिलना नहीं है- मिलते हुए रोना है) भाई को क्या खाना बनाए, पूछने पर सासु पुरानी रखी कोदई का भात और मूंग की दाल बनाने को कहती है। बहू एकदम प्रतिक्रिया व्यक्त करती है। सहने की सीमा पार हो जाने पर बहू का यह विद्रोह समीचीन और सार्थक है। बहू कहती है कि कोठे में रखे बढ़िया चावल और अरहर की दाल बनाऊंगी। लोकगीत में कथा है-
 ‘अंगना बहारत टूट गई बढ़निया, पइ सासु गरियाबइ बीरन भइअउ हो ना। जनि गरिआबा सासु हमरा बिरनमा, पइ लइ अइहीं बढ़नी क बोझवउ हो ना। सरग उड़न्ती तइ चिल्हिया रे बहिनी, माया से कहे रे संदेशवउ हो ना। धिया मोरि दूबरि, केशनि भइ लूमरि, पइ हियरउ म भरे हइ विरोगबउ हो ना। बहुत दिना म आंए हइ बीरन भइया, का रची जेउनरिवउ हो ना। बहुत दिना कइ धरी हइ कोदइया, अउ मुंगिया कइ दारिउ हो ना। माचिकब कोदइया, छितराइ जइहैं रे अंगना, खीचि लाउब चउरा अ दारिउ हो ना।
                                           

लोकमंगल की कामनाओं का सुफल ‘आम’


भारत से अधिक फलों और फूलों वाला देश शायद ही विश्व में कोई हो। यहां खुश और प्रसन्नचित्त रहने के लिए फलने और फूलने का आशीर्वाद, बिना कुछ किए सहज रूप से प्राप्त हो जाता है। भारतीय जन-जीवन का सर्वाधिक प्रिय फल, आम है। देश के अलग अलग क्षेत्रों में अनेक तरह के फल होते हैं लेकिन पूरे देश के कोने कोने में आम अकेला ऐसा फल है जो अपनी धज बनाए हुए है, पूरी शिद्दत और अस्मिता के साथ। गरीब की कोलिया से लेकर महाराजा के बगीचे तक इसकी उपस्थिति है। इसका स्मरण होते ही जीभ मुंह के भीतर चलने लगती है। आधे जून से अगस्त तक, इस फल का एकछत्र साम्राज्य रहता है। पेड़ के नीचे गिरे आम को उठाने के लिए पालकियां रुक गर्इं। हाथी पर सवार राजा के हाथी रुक गए, सामान्य की बात कौन कहे? प्राचीन काल में आम के बाग-बगीचे व्यक्ति की हैसियत का निर्धारण करते थे। आम ‘वन-फल’ नहीं ‘जन-फल’ है। कहते हैं कि पुन्नाम नरक से मुक्ति दिलाने वाला वृक्ष आम ही है। पुत्र, पिता का नाम आगे बढ़ाता है। आम भी अपने लगाने (रोपने) वाले के नाम से ही जाना जाता है। इस तरह वह मनुष्य का ‘वंश वृक्ष’ भी है। पेड़ों के नाम लगाने वाले के नाम से चलते हैं। गांवों में परम्परा है कि आम लगाने वाला उसके फल को तब तक नहीं खाता, जब तक उस वृक्ष का व्रतबंध बरुआ नहीं करता। वृक्ष को पुत्रवत मानने की परिकल्पना सिर्फ भारत में है। अम्ल या (आंबिल) के कारण भले उसका नाम आम रखा गया हो, मुझे तो ऐसा लगता है कि यह खास (स्पेशल) के यहां नहीं, हर आम (जनरल) के दुआर और पछीती की शोभा होने के कारण इसका नाम आम पड़ा। आम रसराज है, इसी कारण उसे रसाल कहते हैं।
आम, पृथ्वी पर कब आया, यह तो नहीं जानता, पर कहते हैं कि कामदेव के पंचबाणों में एक वाण आम्रमुकुल (मंजरी) भी था शिव की समाधि भंग करने के लिए काम ने पांच पुष्पों का सरसंधान किया उनमें अशोक, अरविन्द, नीलोत्पल, मल्लिका और आम थे। कमल, नील कमल, (जलज) थे, मल्लिका (लता) बेलि पुष्प थी। अशोक और आम, वृक्ष थे। अशोक के फूल सामान्य के पहुंच और ज्ञान के बाहर है। (आम्र-मंजरी ) नुकीली सुन्दर और सुगंधित होती है इसीलिए आम बौरा (बावला)जाता है। नील कमल तो नीला है ही, अरविन्द का रंग, रक्त था या श्वेत, इसका वर्णन नहीं मिलता, मैं जानता हूं कि वह लाल ही रहा होगा क्योंकि प्रेम का रंग लाल माना जाता है। कामदेवता ने पलाश वृक्ष की ओर लेकर बाण चलाए थे। शिव की समाधि भंग हुई। उन्होंने नेत्र खोले। काम तो क्षार हुआ ही निष्कलुष पलाश भी जल गया। धनुष खण्ड हुआ। वामन पुराण के अनुसार धनुष के टुकडेÞ धरती पर जहां गिरे वहां चम्पा, मौलिश्री, कमल, चमेली और बेला के पुष्प कालान्तर में उगे हैं जो आज तक मनसिज को उद्दीप्त करने के सहायक उपाद बने हुए हैं।
 आम लोक-फल है। बसंत पंचमी के दिन आम्र मंजरी देख लोग पुलकित होते हैं, उसे बौरि कहते हैं। उसके अग्रभाग को तोड़कर चबाते हैं, गदेली (हथेली) पर रगड़ते हैं। सूंघते हैं आम की फसल का स्वागत खाद्यान्न की तरह करते हैं। बौरि में छोटी-छोटी टिकोरी (अमिया) लगती है। फागुन और चैत के आंधी पानी से लड़कर जो टिकोरी बचती हैं, पूर्ण विकसित आम बनने के पहले से उनका उपयोग होने लगता है। जब तक आम में बीज (गुठली) पड़ता तब तक उसे छीलकर ‘अमहरी’ बना लेते हैं, आम का अचार गरीब की तरकारी है। बीज निकाल-सुखा कर और फिर कूटकर आम्रचूर्ण (अमचुर) बनाकर वर्षों चटनी और कढ़ी बना कर भोजन का स्वाद लिया जाता है। पहले आमों के बगीचे थे। सैकड़ों, हजारों पेड़ों  के साथ लखराम (लाखों आम) के वृक्ष होते थे। कहीं ‘बाबू का बगीचा’ ‘बड़का बगीचा’ और कहीं ‘महरानी (देवी) का बगीचा’ प्राय: हर दो तीन गांवों के बीच में आम के बगीचे जातीय और पारिवारिक पहचान के रूप थे। प्रत्येक गांव में कुछ जमीन  बगीचे के लिए छोड़ दी जाती थी जहां सभी घरों के लोग आम के बीज बोते थे, रखवाली करते थे और इस तरह बगीचे तैयार होते थे। पहले किसी के खेत या मेड़ में कोई आम लगा देता था और उसकी पीढ़ियां उसको खाती थी। अब जिसके खेत में आम है, वह उसका है। कितने ही आम लगाने वालों के परिवार के लोग, बिना आम के हो गए। आम का मौसम उनके लिए अकाल का मौसम हो गया। भाइयों में आम के लिए लाठियां चलने लगी। पे्रम और मिठास का यह फल झगडेÞ का कारण बन गया। लोगों ने कलमी आम लगाना प्रारंभ कर दिया। ये झाड़ बन गए पेड़ नहीं बन सके। पेड़ बनने में समय और साधना की समवेत भूमिका होती है। पेड़ के आम पेड़ में ही पकते हैं। कलमी आम तोड़कर पकाए जाते हैं, पहले भूसा, पैरा, घडेÞ में भरते थे अब केमिकल्स से पकने के कारण न तो वह स्वाद रहता है, न स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त। पके आम को पेड़ पर चढ़कर हल्का दम लगाकर हिलाते थे। सिर्फ पका आम ही गिरता था। कलमी आम पकाने के लिए अभिशप्त है। देशी आम की अमहरी, छूना अमचुर से लेकर अमावट (आम्रवते) तक काम आते हैं। इसे चुस्सू (चूसने वाला) भी कहते हैं। ‘शाह’ औ ‘मरई’ को गिराने के लिए कंकड़-पत्थर और छोटी लाठी से साठ-सत्तर हाथ ऊपर वाले आम को तुक कर झोर लिया जाता था। गांवों में ऐसे निशानेबाजों का अब इतिहास शेष है। पुराने पेड़ वर्षा की कमी से या दीमकों के   अभिशाप  से सूखते जा रहे हैं, उन्हें अपने लगाने वालों को न संतुष्ट कर पाने के मलाल ने उनकी जिजीविषा छीन ली। अब बीजू आम लगाने का समय खतम हो गया। ऊंचे उठे कि उखडेÞ। कलमी का जमाना है, उनकी  जडंÞे गहरे नहीं गर्इं। वे झखरा हैं मुसरा नहीं। चूसने वाले आमों में कब्जियत नहीं  होती जबकि काटकर खाने वाले कलमी आम का गूदा गरिष्ट होता है, देर से पचता है, कर्बाइड सीधे हाजमा को प्रभावित करता है। आम्र बौर के गंध से जब शिव की समाधि भंग हो गई तो पके आम को देखकर मनुष्य की स्थिति का अन्दाज सहज ही लगाया  जाता है। गांवो में मुफ्त में मिलने वाला आम शहर में आकर बिकने लगा।
   गांवों में आज भी आम खाने का न्यौता होता है। परात में दस-पांच किस्म के पच्चीस-तीस आम धोकर चूसने के लिए दिये जाते हैं। लोग छक कर सराह कर खाते हैं। खिलाने वाला छांटकर एक-एक आम जिस प्रेम से खिलाता है, उतने प्रेम से तो शबरी ने भी शायद ही राम को खिलाया हो, आम खाने और खिलाने की परम्परा सदियों से रही है। पका आम देख किसका जी नहीं ललचाएगा। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी लम्बे समय तक शान्ति निकेतन में गुरुदेव के साथ रहे, उन्होंने लिखा है कि एक बार गुरुदेव चीन गए उन्हें आम खाने को नहीं मिला। उन्होंने अपने एक साथी से विनोद में कहा देखिए मैं जितने दिन तक जिऊं उसका हिसाब कर लेने के बाद उसमें एक साल कम कर दीजिएगा, क्योंकि जिस साल में आम खाने को नहीं मिला उसको मैं व्यर्थ समझता हूं, फल व्यक्ति की उम्र बढ़ाते हैं और स्वस्थ रखते हैं। जिस वर्ष मेरे आम नहीं फलते लगता है संसार रस-हीन है, दूसरों के आम से पेट नहीं भरता। आमों को डाल में लटकते हुए देखने का सुख आसमान में लटकते तारों के सुख के समान है। कहते हैं गालिब साहब को आम बहुत पसन्द थे, कमजोरी की हद तक। यह बात शहंशाह को मालूम थी। एक बार शहंशाह ने गालिब को अपने आम के बगीचे की सैर कराई। आम पके थे। पेड़ फलों से लदे थे। पूरा बाग महक रहा था। गालिब हर पेड़ के सामने खडेÞ होकर आम को देखने लगते शहंशाह ने पूछा गालिब क्या बडेÞ गौर से देख रहे हैं, गालिब ने तुरन्त उत्तर दिया जहां पनाह सुना था कि दाने-दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है। हुजूर अपना नाम ढूंढ़ रहा हूं। शंहशाह हंस पडेÞ और ढेÞर सारे आम गालिब के घर भेजवा दिए।
धतूरे की गंध शिव को पंसद है। आम मंजरी शिव पर चढ़ती है। आम स्वर्ग का वृक्ष नहीं है वह धरती की कोख से उपजा अमृत वृक्ष है। अमृत में आम की ध्वनि है। वे बहुत अभागे हैं, जिनके ऊपर आम की छाया नहीं है। देवताओं की पूजा में कलश के ऊपर आम की  टेरी (पत्तों की एक छोटी डार) हवन की समिधा में सूखी आम की लकड़ी आम के पत्ते से घी का होम, कहीं वन्दनवार कभी तोरणद्वार, समग्र रूप में कहें तो जन्म से लेकर मृत्यु (सतलकड़िया में आम की लकड़ी) तक किसी न किसी रूप में आम उपस्थित है। भीमसेनी एकादशी का पूर्ण फलाहार आम ही तो है। वृक्षारोपण सरकारी योजना हो सकती है लेकिन आम का रोपना सल्तनत को युगों तक अपनी मीठी यादों का फल खिलाना है। लोक जीवन से लुप्त होते जा रहे आम का निरन्तर घटना प्रकृति और प्राणी के लिए अशुभ संकेत है, जिसके लिए मनुष्य को सचेत होना होगा। आम का कम होना जीवन से मिठास का कम होना है।
                                   

सर्वहारा का लोक वृक्ष है महुआ


शेफाली, अशोक, शिरिष, कुटज, देवदार, आम पर इतने सुन्दर ललित निबन्ध लिखने वाले आचार्य द्विवेदी से शिकायत है। आम को छोड़कर अन्य सभी पुष्पों पर उनकी मुग्धता पाठक को भी रससिक्त करती है। ‘आम’ बौरा जाता है तो हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती है। आचार्य जी के आम ‘आम्र’ हैं आम (व्यक्ति) नहीं। उनका जितना मन इन फूलों पर गया है,स्तुत्य है। पता नहीं क्यों इन फूलों के साथ वे मधुक, पुष्प को कैसे भूल गए, लगता है गुरुदेव के शान्ति निकेतन में मधुक वृक्ष नहीं था, या उस पुष्प की मादक गंध को बर्दास्त नहीं कर सकेंगे पंडित द्विवेदी। भला मादकता का पंडित से क्या सम्बन्ध? आचार्य, मधुक-पुष्प पर लिखते तो वह वृक्ष भी अभिजात वर्ग का हो जाता। संस्कृत भाषा का मधुक,तद्भव में मधूक और देहात में महुआ हो गया। ‘मधु’ में संचयन की एक विकसित परम्परा है। उसकी मिठास गुड़ और शक्कर से अधिक है। मधु दवा है, साधना है। जिस वृक्ष ने इतनी साधना की, उसका पुष्प अमृत हो गया, वह सचमुच वरेण्य है। प्रसाद ने ‘पुरस्कार’ की मधूलिका को मधुक वृक्ष के नीचे ही आश्रय देकर उसे बोधिवृक्ष बना दिया। मधुक की सघन छाया सूरज के प्रचंड ताप को चुनौती देती है।
  बसंत के आगमन के साथ मधुक वृक्ष भी पलाश की तरह निर्वस्त्र अवधूत की तरह पत्रहीन हो जाता है। शाखाओं की फुनगियों पर कूंचे बनती हैं। कुछ दिन बाद उन कूंचों में फूल विकसित होते हैं। कूंचों से झांकते वे फूल आसमन में लटकते तारों के समान दिखते हैं। मधुमक्खी के छत्ते से झांकते ये फूल खिलने के साथ आधी-रात से सुबह देर तक झरते रहते हैं। कूंची में वे मोती की तरह दिखते परन्तु  धरती पर आते ही कुछ गुलाबी हो जाते हैं। हाथ में उठाते ही अपनी गंध आपके भीतर तक भर देने की क्षमता रखते हैं। हाथ महक उठता है। आनंद की अनुभूति चेहरे पर स्पष्ट दिखती है।
 मधुक अर्थात महुआ, आम आदमी का पुष्प और फल दोनों हैं। आम आदमी के सानिध्य के कारण देवभाषा में इसे स्थान नहीं मिला। इसीलिए इसे अन्त्यजों के हवाले कर दिया गया। न तो इसे स्वर्ग में जगह मिली और न अप्सराओं की वेणीं में, और न देवताओं के कुंज में। यह जंगली हो गया, और जंगल के प्राणियों का भरपूर पोषण किया। आज के अभिजात शहरी इसे आदिवासियों का अन्न कहते हैं। सच तो यह है कि गांव में बसने वालों उन लोगों के जिनके यहां महुआ के पेड़ है, बैसाख और जेठ के महीने में इसके फूल नाश्ता और भोजन हैं।
       मेरे गांव के पूरब और उत्तर बहुत बड़ी ‘मउहारि’(महुआरि) थी। जहां महुआ के पेड़ थे, वहां खेती नहीं होती थी, क्योंकि वे पेड़ इतने सघन थे कि उन्हें महुआ-वन कहा जा सकता है। हम उसे मौहारि कहते थे। प्रत्येक किसान के पास बीस-पच्चीस महुआ के पेड़ थे। गेहूं की कटाई करने के बाद किसान, महुआ बिनाई से लेकर उसे सुखाकर, पीट-साफ कर कुठिला में रखने के बाद ही गेहूं की मिजाई (गहाई) करता था। महुआ के हिसाब की नाप उन दिनों पैला, कुरई, खांड़ी में हुआ करती थी। अधिक पैदावार व्यक्ति की हैसियत निर्धारित करती थी। पेड़ों के नाम हुआ करते थे, मिठौंहा, चिनिहमा, मिसिरीबा, उसके फल की गुणवत्ता बताते थे। पेड़ के नीचे गिरे पत्तों को जलाकर जमीन साफ कर लेते। ताजा गिरे फूलों को चुन चुनकर डलिया में भरते फिर बडेÞ  टोपरा में डालकर सिर पर कपडेÞ की गोढ़री रखकर टोपरी (झौआ) भर महुआ घर लाते। आंगन लीपा रहता, उसमें बिछा देते, पांच, छ: दिन में सूख जाने पर उसे मोंगरी से पीटकर उसके भीतर के जीरा को निकालते और सहेज कर रख देते। गांव के लोग एक दूसरे की खबर लेने पर आम और महुआ को फसल के आने या न आने को समय और अकाल से जोड़ते थे। चौथे और पांचवे दशक में महुआ ग्रामीण जन-जीवन का आधार होता था। प्रत्येक घर में शाम को महुआ के सूखे-फूल को धो-साफ कर चूल्हों में कंडा-उपरी की मंद आंच में पकाने के लिए रख देते थे। रातभर वह पकता,पक कर छुहारे की तरह हो जाता। ठंडा हो जाने पर उसे दही, दूध के साथ खाने का आनन्द अनिर्वचनीय होता। कुछ लोग आधा पकने पर कच्चे आम को छीलकर उसी में पकने के लिए डाल देते। वह खटमिट्ठा स्वाद याद आते ही आज भी मुंह में पानी आ जाता है। लेकिन न वे पकाने वाली दादियां रहीं न, माताएं अब तो सिर्फ उस मिठास की यादें भर शेष हैं। इसे डोभरी कहते, इसे खाकर पटौंहा में कथरी बिछाकर जेठ के घाम को चुनौती दी जाती थी। लगातार दो महीने सुबह डोभरी खाने पर देह की कान्ति बदल जाती थी। दोपहर को इतनी बढ़िया नींद गांव छोड़ने के बाद कभी नहीं आई। डोभरी का अहसास आज भी जमुहाई ला देता है।
     पेड़ों के नीचे पडेÞ ये मोती के दाने टप-टप चूते हैं सुबह देर तक, इन्हें भी सूरज के चढ़ने का इन्तजार रहता है। जो फूल कूंची में अधखिले रह जाते है, रात उन्हें सेती है, दूसरे दिन उनकी बारी होती है। पूरे पेड़ को निहारिये एक भी पत्ता नहीं, सिर्फ टंगे हुए, गिरते हुए फूल। दोपहर और शाम को विश्राम की मुद्रा में हर आने-जाने वाले पर निगाह रखते हैं। कुछ इतने सुकुमार होते हैं कि कूंची में ही सूख जाते हैं, वे सूखकर ही गिरते हैं, उनकी मिठास मधु का पूर्ण आभाष देती है। जब वृक्ष के सारे फूल धरती को अर्पित हो जाते हैं तब ग्रीष्म के सूरज को चुनौती   देती लाल-लाल कोपलों से महुआ, अपना तन और सिर ढकता है। कुछ ही दिनों में पूरा वृक्ष लहक उठता है। नवीन पत्तों की छाया गर्मी की लुआर को धता बताती है। फूल तो झर गये लेकिन वृक्ष का दान अभी शेष है। वे कूंचियां जिनसे फूल झरे थे, महीने डेढ़ महीने बाद गुच्छों में फल बन गए। परिपक्व होने पर किसान इनको तोड़-पीटकर इनके बीज को निकाल-फोड़कर बीजी को सुखाकर इसका तेल बनाते है। रबेदार और स्निग्ध, इस तेल को गांव डोरी के तेल के नाम से जानता है। ऐंड़ी की विबाई, चमडेÞ की पनही को कोमल करने देह में लगाने से लेकर खाने के काम आता है। गांव की लाठी कभी इसी तेल को पीकर मजबूत और सुन्दर साथी बनती थी, जिसे सदा संग रखने की नसीहत कवि देते थे।
   महुआ गर्मी के दिनों का नाश्ता तो है ही कभी-कभी पूरा भोजन भी होता है। बरसात के तिथि,त्यौहारों में इसकी बनी मौहरी (पूड़ी) सप्ताह तक कोमल और सुस्वाद बनी रहती है। मात्र आम के आचार के साथ इसे लेकर पूर्ण भोजन की तृप्ति प्राप्त होती है। इस महुए के फूल के आटे का कतरा सिंघाडेÞ के फूल को फीका करता है। सूखे महुए के फूल को खपड़ी (गगरी) में भूनकर, हल्का गीला होने पर बाहर निकाल भुने तिल को मिलाकर, दोनों को कूटकर बडेÞ लड्डू जैसे लाटा बनाकर रख लेने से वर्षान्त के दिनों में पानी के जून में, नाश्ते के रूप में लेने से जोतइया की सारी थकान एक लाटा और दो लोटा पानी, दूर कर देता है। लाटा को काड़ी में छिलका रहित झूने चने के साथ कांड़कर चूरन बना कर सुबह एक छटांक चूरन और एक गिलास मट्ठा पीकर ताउम्र पेट की बीमारियों को दफा किया जा सकता है।
     संसार के किसी भी वृक्ष के फूल के इतने व्यंजन नहीं बन सकते। व्रत त्यौहार में हलछठ के दिन माताएं महुआ की डोभरी खाती है। पूजा-पद्धति में भी महुआ, आम और छिलका के पत्ते ही काम आते हैं। छिलका अकारण अभिशप्त हो गया समाधिस्थ शिव को कामदेव ने पलाश के ओट से ही पंचशर (पुष्पवाण) मारा था। शिव क्रोधाग्नि से काम तो क्षार हुआ ही, बेचारा पलाश भी जल गया। मुझे लगता है। काम के पुष्पवाणों में यदि अकेला मधुक पुष्प होता तो वह किसी की भी समाधि भंग करने का सबसे सुन्दर और असरकारक बाण होता। कामदेव को मधुक पुष्प की शक्ति का पता नहीं था। समाधि भंग की जो मादकता मधुक पुष्प में है वह काम के अन्य वाणों में नहीं। इतना बहुअर्थी वृक्ष कोई है? पता नहीं देवताओं को इस बेचारे मधुक से क्या चिढ़ थी। वृक्ष भले सख्त हो फूल और फल तो अत्यंत कोमल हैं। फिर जब आपने नारियल जैसे सख्त फल को स्वीकारा तो महुए ने कौन सा गुनाह किया था।

होश करो,दिल्ली के देवो,होश करो


सन् 1954 में राष्टÑकवि दिनकर ने दिल्ली नामक एक कविता लिखी थी जिसमें उन्होंने दिल्ली को भारत का रेशमी नगर कहा था और पूरी शिद्दत से उसे देश के शोषण का केन्द्र प्रमाणित किया था। आजादी के सिर्फ सात वर्ष बाद कवि ने देशवासियों को सतर्क रहने और दिल्ली के देवताओं को चेतावनी दे दी थी। तब से अब तक दिल्ली ने और देश ने बहुत कुछ देख लिया। कुछ ही दिन बाद मुक्तिबोध ने भी महसूस किया था और प्रश्नाकुल कविता ने आत्मान्वेषण किया-
जीवन क्या जिया!/ लिया, बहुत बहुत ज्यादा/ दिया बहुत बहुत कम/ अरे! मर गया देश! / जीवित रह गए तुम!
आज अनेक प्रश्न हैं, जिनका उत्तर ही नहीं है। प्रश्न पहले भी थे, लेकिन उनके उत्तर थे। आंखों में शर्म और हया थी। अब शर्म से आंखे झुकती नहीं। पूरी बेशर्मी से गलती स्वीकारी जाती है। ‘गलती हो रही है’, यह बताने पर भी दबंगई से गलती की जाती है। एक छोटे से ड्रायवर द्वारा की गई गलती के कारण हुई दुर्घटना से आहत मंत्री त्यागपत्र दे देता था और अब गलती-दर-गलती हो रही है। माफी मांगी जा रही है, स्यापा किया जा रहा है लेकिन कुर्सी नहीं छोड़ी जा रही है। त्याग और बलिदान इतिहास की बातें हो चुकी हैं।  पूरी दुनिया को साफ करने के लिए इसी भारत ने एक मेहतर दिया था (मुक्तिबोध  की एक पंक्ति है ‘पूरी दुनिया को साफ करने के लिए एक मेहतर चाहिए’) अब उसी के देश में उसका नाम भर लेकर तर्पण करते हैं। अपने पोस्टर और बैनरों पर उसकी तस्वीर छापते हैं। जिसने जीवन के मध्यान्ह से शाम तक एक धोती पहनी, उसकी मुस्कुराती तस्वीर हजार रूपये की करेंसी पर दिखती है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भारत विश्व का भ्रष्टतम देश है। क्या कोई एक भी व्यक्ति ऐसा दिखता है, जिस पर यकीन किया जाय। कोई रोल मॉडल नहीं है। देश बहुत धार्मिक भी है यह, लेकिन किस धार्मिक ठेकेदार की ईमानदार छवि पर भरोसा करेंगे आप! स्वतंत्रता का जितना दुरुपयोग हमारे देश में हुआ उतना शायद कहीं नहीं। ‘स्व-तंत्र’ हो गया। और अपने तंत्र में सब कुछ अपना। संसार के सबसे धनी व्यक्ति भारत में रहते हैं, सबसे गरीब व्यक्ति कहां रहते हैं? जहां गरीबी रेखा में वर्ष-दर-वर्ष लोग बढ़ रहे हों वहां राजा भी हैं, नीरा भी हैं। कहते हैं देश का कालाधन यदि सफेद हो जाय तो देश अमेरिका के बाद सबसे सम्पन्न देश बन जाय। प्रजातंत्र से बेहतर कोई शासन प्रणाली नहीं है लेकिन जिस देश की प्रजा अपने प्रतिनिधि को बिकते हुए देख रही है। जिसकी संसद में एक चौथाई दागी बैठे हों, जिस मंत्री की फाइल खोलें, घपले ही घपले दिखते हैं, जिनके विजन में सिर्फ वे और उनके रिश्तेदार आते हों उनका देश कैसा होगा। अब तो कोई जय प्रकाश भी नहीं है, जिन्दा कौमें पांच साल तक इन्तजार नहीं करतीं। हम तो मिस्र से भी गए गुजरे हैं। आजादी की रजत जयन्ती पर ‘धूमिल’ ने एक कविता लिखी थी- आजादी के पच्चीस साल बाद / मैं आपसे एक सवाल पूंछता हूं, कि जानवर बनने के लिए कितने सब्र की जरूरत है? अब सब्र का बांध टूटता नजर आ रहा है। आजादी पर धूमिल ने ही प्रश्न उठाए हैं- क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है। जिसे एक पहिया ढ़ोता है,या इसका कुछ और भी अर्थ होता है।
थामस- प्रसंग पर हमारे देश के महाधिवक्ता कहते हैं कि निर्विवाद रूप से बेदाग होना नियुक्ति का कोई पैमाना नहीं है।  कपिल सिब्बल तो 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में सीबीसी की रिपोर्ट को ही झूठी करार दे चुके हैं।
अपराधी को आमतौर पर काले कपड़ों में ढका देखा जाता है लेकिन अब छवि बदल गई है, एकदम सफेद कपड़ों में झक्क। मुस्कुराता हुआ चेहरा। सफेदपोश अपराधी पूरे देश में हैं, वे अभिजात वर्ग के हैं। समाज वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि ये समाज के सबसे बडेÞ शत्रु होते हैं, क्योंकि इनसे सामान्य जनता की, नैतिक प्रवृत्ति के हास में सहायता मिलती है। जब किसी समाज में अपराधों में वृद्धि होती है तो उसके वास्तविक नेता सफेदपोश ही होते हैं। ये अपराधी सुशिक्षित, सम्पन्न और समाज के समादृत व्यक्ति होते हैं। इनके मुख्य कार्य कर चोरी, तस्करी, जमाखोरी घूंसखोरी, धोखाधड़ी आदि होते हैं। समाज का कोई क्षेत्र नहीं है जहां इन प्रतिभाशाली अपराधियों का प्रभाव न देखा जाता हो। हर दल में दलदल है। कोई कुआं ऐसा नहीं दिखता जिसमें भॉंग न पड़ी हो। तो क्या निराश हुआ जाए? नहीं निराश में भी आशा के संकेत हैं। इस सबा अरब की आबादी वाले देश में ढेÞर सारे ऐसे लोग हैं जो सत्ता से दूर हैं , नेक और ईमानदार हैं। देश सिर्फ आय से नहीं चल रहा है। प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर मुख्यमंत्रियों के कार्यालयों तक सेवानिवृत्त अधिकारियों के प्रतिनियुक्ति पर काम चल रहा है। आखिर क्यों? शिक्षित बेराजगारों की फौज खड़ी है और सेवानिवृत्त अधिकारियों को काम पर लगाया जा रहा है, विभिन्न आयोगों, संगठनों पर बैठाया जा रहा है। क्योंकि ये घुटे-पिटे-पिट्ठू अधिकारी वे सारे चोर- गलियारे जानते हैं जिनसे बचा या बना जा सकता है।
देश की जनता का मनोबल टूट रहा है। किसी भी घोटाले का परिणाम उसने नहीं देखा। गत तीन वर्षों का मीडिया- नायक कसाब इच्छित भोजन कर रहा है। अफजल गुरू के पक्ष में सरकार खड़ी है। रीवा के एक नाबालिक लड़की के बलात्कार के अपराधी की मृत्युदण्ड को आजीवन करावास में बदल   देने की क्षमा याचना के लिए महामहिम के पास समय है लेकिन कसाब और अफजल के लिए हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। प्रधानमंत्री माफी मांगते रहेंगे। आप धन्य होते रहेंगे, कितना ईमानदार प्रधानमंत्री है। प्रधानमंत्रीजी आपसे ईमानदार इस देश में करोड़ों लोग हैं। आपके मंत्री तब भ्रष्ट माने जाते हंै,जब न्यायालय हटाने का आदेश देता है। न्यायालय कहता है- यह क्या हो रहा है प्रधानमंत्री जी, और आप कश्मीर की वादियों में या विदेश में चले जाते हैं। देश देख रहा है, आपका कुर्सी प्रेम! कहते हैं कि आप बहुत बडेÞ अर्थशास्त्री हैं।  मैंने दिनकर की दिल्ली से बात शुरू की थी, दिल्ली कविता आज भी मौजूं है अब भी मौका है, समझ लो, घोटालों का परिणाम जनता जानना चाहती है। जिस तरह सत्ता के लिए सीटों का समझौता कर लेते हो उसी तरह राजा और करुणानिधि से समझौता न कर लेना- जनता देख रही है दिल्ली को-
तो होश करो, दिल्ली के देवो, होश करो,
सब दिन तो यह मोहिनी न चलने वाली है।
होती जाती हैं गर्म दिशाओं की सींसें,
मिट्टी फिर कोई आग उगलने वाली है।