Saturday, November 3, 2012

भूमण्डलीकरण का द्वन्द : गरीबी बनाम अमीरी


गरीबी बनाम अमीरीएवं 'ग्रामीण बनाम शहरीकी बहस बड़ी पुरानी है। सभ्यता के आरम्भ में यह गैप उतना नहीं रहा होगाजितना समकालीन समाज में। कार्ल माक्र्स ने भी वर्ग-संघर्ष की अपनी परिभाषा प्रभु और सर्वहारा वर्ग या शोषक और शोषित के आधार पर ही दी। भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारत हजारों वर्ष से गाँवाें का देश रहा है। ग्राम्य व्यवस्था व राज्य व्यवस्था का यहाँ अद्भुत तादातम्य देखने को मिलता है। भारतीय ग्राम्य व्यवस्था पर कभी राजनीति हावी नहीं रही,इसलिए वह स्वायत्त रूप से चलती रही है। वक्त के साथ अनेक थपेड़ों ने भारतीय संस्कृति पर हमला किया पर ग्राम्य व्यवस्था ने हजारों वर्षों से इस संस्कृति की रक्षा की। तभी तो पाश ने अपनी कविता में लिखा कि भारत नाम दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम पर नहीं बल्कि उन भूमिपुत्रों के नाम पर पड़ा हैजो आज भी सूरज की परछाइयों से समय मापते हैं। शहरों का विकास भी ग्राम्य व्यवस्था के फलने-फूलने पर ही हुआ पर आजादी पश्चात गाँव व शहर के बीच का अन्तराल बढ़ता गया। गाँवों की कीमत पर शहर फलने-फूलने लगे और नतीजन गाँव गरीबों का जमावड़ा हो गया और शहर अमीरों का। इसी के साथ 'इण्डियाबनाम 'भारतका मुहावरा चल निकला।

हमारा देश प्राकृतिक सम्पदाओं से भरपूर है और हमारे युवा मानव संसाधन के क्षेत्र में अमेरिका-ब्रिटेन जैसे विकसित देशों तक अपनी सफलता की पताका फहरा रहे हैं
,फिर भी आम आदमी उपेक्षित है। गाँवों के कल्याण के लिए तमाम योजनाएं बनाई गईपर राजनैतिक-प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव में वे अपने अंजाम तक नहीं पहुँच सकीं। 1962 में लोकसभा में गाजीपुर के सांसद विश्वनाथ सिंह गहमरी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में व्याप्त गरीबी की दास्तान सुनाते हुए कहा कि वहाँ गरीब गोबर से अनाज का दाना निकाल कर खाने को मजबूर हैंतो नेहरू की ऑंखें भी छलक आयी थीं। शायद इसी विडम्बना पर कविवर धूमिल ने लिखा था- ''भाषा में भदेस हूँकायर इतना कि उत्तर प्रदेश हूँ।'' प्रधानमंत्री रहते हुए राजीव गाँधी ने भी स्वीकारा था कि केन्द्र से भेजे गए एक रूपए में से मात्र 15 पैसा ही अंतिम व्यक्ति तक पहुँचता है। स्पष्ट है कि सारा धन भ्रष्टाचार के नाले में जा रहा है। आजादी पश्चात सरकारों की प्राथमिकता में शहरों का ही विकास रहा। गाँवों की कीमत पर शहरों को हर तरह की सुख-सुविधाओं से भरपूर करना एक तरह का आन्तरिक उपनिवेशवाद ही कहा जायेगाजिसने तमाम समस्याओं को जन्म दिया। भूमण्डलीकरण के बहाने तमाम बहुराष्ट्रीय कम्पनियांँ गाँवों तक पहुँच रही हैं और परम्परागत कृषि व्यवस्था पर चोट कर रही हैं। जो किसान अपनी आजीविका के लिए कृषि कार्य करता थाउसे परम्परागत खेती छोड़कर बागवानी और अन्य नकदी फसलों की खेती करने के लिए लालच दिया जा रहा है। दूसरों के लिए ठेके पर खेती की इस प्रवृत्ति को बढ़ाने के कारण गेहूँ की पैदावार लक्ष्य से पीछे खिसकने लगी और नतीजन विदेशों से गेहँ का आयात हो रहा है। किसानों को अपनी मनपसन्द फसल उगाने की बजाय रिटेल स्टोरों में बेचने के लिए उत्पाद पैदा करने को कहा जा रहा है। ठेके पर लहलहाती फसल चौपट हो जाती है तो किसानों की पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं होता। विशेष आर्थिक क्षेत्र के नाम पर कम दामों में किसानों की जमीन लेकर एक तरह से उन्हें पलायन के लिए मजबूर किया जा रहा है। स्पष्ट है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए किसान नागरिक नहीं उपभोक्ता है।
भूमण्डलीकरण के इस दौर में 'कल्याणकारी राज्यकी अवधारणा गौण होती गई। गाँवों में बसने वाले किसानोंमजदूरोंशिल्पकारों को सरकार ने उनके भाग्य पर छोड़ दिया। बढ़ती मंँहगाई और बेरोजगारी के बीच जैसे-जैसे अमीरी-गरीबी का फासला बढ़ता गयावैसे-वैसे किसानों की आत्महत्याभुखमरी से मौत और सामाजिक विषमता जैसी प्रवृत्तियाँ बढ़ती गर्इं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के ऑंकड़ों पर गौर करें तो देश में वर्ष 2002 तक औसतन हर 30 मिनट में एक किसान ने आत्महत्या की। वर्ष 2005 में 17131, वर्ष 2006 में 17060 तो1997 से 2006 के बीच कुल 78737 किसानों ने आत्महत्या की। तस्वीर का सबसे दुखद पहलू तो यह है कि ज्यादातर आत्महत्या करने वाले किसान समृध्द प्रान्तों के हैं। अकेले महाराष्ट्र में वर्ष 1995 से अब तक 36428 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय की ही एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग दो करोड़ लोग जमीन से बेदखल किये जा चुके हैं और इनमें से मात्र 54 लाख लोगों को ही पुर्नस्थापित किया गया है। 'स्पेशल इकानामिक जोनकिस प्रकार 'स्पेशल एलिमिनेशन जोनमें तब्दील हो रहे हैंवह महाराष्ट्रआन्ध्र प्रदेशकर्नाटकमध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे 'सेजराज्यों में किसानों की आत्महत्या में 6.2 फीसदी की वृध्दि स्वयमेव दर्शाती है।

     सबसे बड़ा अन्तर्विरोध तो यह है कि सरकार आर्थिक समृध्दि के गीत गा रही है जबकि देश का एक बड़ा तबका इस समृध्दि से कोसों दूर है। सबको विकास की एक ही लाठी से हाँकने के कारण जो अमीर हैं वे अमीर हो रहे हैंऔर गरीब दिनाें-ब-दिन गरीब हो रहा है। आधुनिक परिवेश में आर्थिक विकास की बात करने पर भूमण्डलीकरणउदारीकरण और निजीकरण का चित्र दिमाग में आता है। संसद से लेकर सड़कों तक जी0डी0पीव शेयर-सेंसेक्स के बहाने आर्थिक विकास की धूम मची है और मीडिया भी इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है। जिस देश के संविधान में लोक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना की गई होवहाँ सामाजिक विकास की बात गौण हो गई है। सरकार यह भूल रही है कि पूँजीवादसमाजवाद या अन्य कोई वाद मात्र साधन हैसाध्य नहीं। साध्य तो समग्र समाज के विकास में निहित हैन कि एक सीमित भाग के विकास में। यहाँ तक कि नोबेल पुरस्कार विजेता प्रख्यात अर्थशास्त्री डॉअमर्त्य सेन ने भी भारतीय परिप्रेक्ष्य में इंगित किया है कि - शिक्षास्वास्थ्यआवास जैसी आधारभूत सामाजिक आवष्यकताओं के अभाव में उदारीकरण का कोई अर्थ नहीं है। आर्थिक विकास में जहाँ पूजीपतियों,उद्योगपतियोंबहुराष्ट्रीय कम्पनियों अर्थात राष्ट्र के मुट्ठी भर लोगों को लाभ होता है,वहीं भारत का बहुसंख्यक वर्ग इससे वंचित रह जाता है या नगण्य लाभ ही उठा पाता है। इस प्रकार ट्रिंकल डाउन का सिध्दान्त फेल हो जाता है। अत: सामाजिक विकास जो कि बहुसंख्यक वर्ग की आधारभूत आवष्यकताओं के पूरी होने पर निर्भर हैके अभाव में राष्ट्र का समग्र और चहुमुखी विकास सम्भव नहीं है। एक तरफ गरीब व्यक्ति अपनी गरीबी से परेशान है तो दूसरी तरफ देश में करोड़पतियों-अरबपतियों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। तमाम कम्पनियों पर करोड़ों रुपये से अधिक का आयकर बकाया है तो इन्हीं पूँजीपतियों पर बैंकों का भी करोडों रुपये शेष है। डॉअमर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्री ने स्पष्ट इंगित किया है कि समस्या उत्पादन की नहींबल्कि समान वितरण की है। आर्थिक विकास में पूँजी और संसाधनों का केन्द्रीकरण होता है जो कि कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के खिलाफ है। फिर भी तमाम सरकारें सामाजिक विकास के मार्ग में अवरोध पैदा करती रहती हैं। जिस देश की 70 प्रतिशत जनसंख्या नगरीय सुविधाओं से दूर हो,एक तिहाई जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे होलगभग 35 प्रतिशत जनसंख्या अशिक्षित होजहाँ गरीबी के चलते करोड़ों बच्चे खेलने-कूदने की उम्र में बालश्रम में झोंक दिये जाते होंजहाँ कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में हर साल हजारों किसान फसल चौपट होने पर आत्महत्या कर लेते होंजहाँ बेरोजगारी सुरसा की तरह मुँह बाये खड़ी हो-वहाँ शिक्षा को मँहगा किया जा रहा हैसार्वजनिक संस्थानों को  औने-पौने दामों में बेचकर निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा हैसरकारी नौकरियाँ खत्म की जा रही हैंसब्सिडी दिनों-ब-दिन घटायी जा रही हैनिश्चितत: यह राष्ट्र के विकास के लिए शुभ संकेत नहीं है।
सरकार द्वारा जारी नेशनल सैम्पल सर्वे आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट पर गौर करें तो शहरी बनाम ग्रामीण का द्वन्द खुलकर सामने आता है। इसके अनुसार अभी भी ग्रामीण आबादी का पाँचवा हिस्सा (लगभग 14 करोड़) मात्र 12 रूपये रोजाना में जीवन जीने को अभिशप्त है। 19 फीसदी ग्रामीणों के पास अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए सालाना 365 रूपये भी नहीं जुड़ते। गाँवों का पाचवाँ हिस्सा मिट्टी से बनी दीवारों और छतों के नीचे रहने को विवश हैं तो 31 फीसदी ग्रामीण बमुश्किल छत या दीवार में से किसी एक को पक्का करने का इन्तजाम कर पाये हैं। उत्पादकता के बावजूद गाँव वाले 251-400 रूपये में भोजन का काम चला रहे हैं जबकि शहरी क्षेत्रों में भोजन पर 451-500 रूपये मासिक खर्च किये जा रहे हैं। इससे बड़ी विसंगति और क्या हो सकती है कि ग्रामीणों की आय का आधा से ज्यादा हिस्सा अर्थात रूपये में 53 पैसे भोजन जुटाने पर खर्च हो रहा है जबकि शहरी बाबू लोग कमाई अधिक होने के बावजूद मात्र 40 पैसे खर्च कर रहे हैं। सरकार भले ही बड़े-बड़े दावे करे और ग्रामीणों के नाम पर सब्सिडी जारी करेपर असलियत कुछ और ही है। तमाम सब्सिडी के बावजूद रसोई गैस मात्र फीसदी ग्रामीणों के नसीब में हैतीन चौथाई ग्रामीण आबादी अभी भी गोबर व सूखी लकड़ी पर निर्भर हैं। 42फीसदी ग्रामीण बिजली पर सब्सिडी के बावजूद अंधेरा दूर करने हेतु केरोसिन पर निर्भर हैं। शहरी बनाम ग्रामीण का सबसे ज्वलंत उदाहरण उनकी व्यय शक्ति है। शहरी भारत जहाँ हर माह 1171 रूपये खर्च कर रहा हैवहीं ग्रामीण भारत मात्र625 रूपये। यह स्थिति सन्तोषजनक नहीं कही जा सकती। ऐसे में आर्थिक विकास के साथ-साथ आर्थिक विषमता की चौड़ी होती खाई को भी पाटना जरूरी है क्योंकि करोड़ाें लोगों को फटेहाल रख कर राष्ट्र की समृध्दि का सपना नहीं देखा जा सकता। स्वतंत्रता की स्वर्णजयंती की पूर्व संध्या पर अपने उद्बोधन में तत्कालीन राष्ट्रपति के0आर0नारायणन के शब्द हमें समाज का चेहरा दिखाते हैं-''उदारीकरण से उपजी विषमता यूं ही बढ़ती रही और धन का अश्लील प्रदर्शन जारी रहा तो समाज में सिर्फ अशांति फैलेगी। उथल-पुथल की इस आंधी में सिर्फ गरीब की झोपड़ी ही नहीं उड़ेगीअमीरों की आलीशान कोठियाँ भी उजड़ जाएंगी।''
अमेरिका के चर्चित विचारक नोम चोमस्की ने भी हाल ही में अपने एक साक्षात्कार में भारत में बढ़ते द्वन्द पर खुलकर चर्चा की है। चोमस्की का स्पष्ट मानना है कि भारत में जिस प्रकार के विकास से आर्थिक दर में वृध्दि हुयी हैउसका भारत की अधिकांश जनसंख्या से कोई सीधा वास्ता नहीं दिखता। यही कारण है कि भारत सकल घरेलू उत्पाद के मामले में जहाँ पूरे विश्व में चतुर्थ स्थान पर हैवहीं मानव विकास के अन्तर्राष्ट्रीय मानदण्डों मसलनदीर्घायु और स्वस्थ जीवनशिक्षाजीवन स्तर इत्यादि के आधार पर विश्व में 126 वें नम्बर पर है। आम जनता की आर्थिक स्थिति पर गौर करें तो भारत संयुक्त राष्ट्र संघ के 54 सर्वाधिक गरीब देशों में गिना जाता है। संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट की मानें तो जैसे-जैसे भारत की विकास दर में वृध्दि हुयी हैवैसे-वैसे यहाँ मानव विकास का स्तर गिरा है। आज0-5 वर्ष की आयुवर्ग के भारतीय बच्चों में से लगभग 50 फीसदी कुपोषित हैं तथा प्रति 1000 हजार नवजात बच्चों में 60 फीसदी से ज्यादा पहले वर्ष में ही काल-कवलित हो जाते हैं। स्पष्ट है कि उपरी तौर पर भारत में विकास का जो रूप दिखायी दे रहा हैउसका सुख मुट्ठी भर लोग ही उठा रहे हैंजबकि समाज का निचला स्तर इस विकास से कोसों दूर है।

       अब समय आ गया है कि गरीबकिसानमजदूरदलितपिछड़े और आदिवासी वर्गों में व्यापक चेतना तथा जागरुकता पैदा की जाय जिससे वे अपनी आधारभूत आवष्यकताओं की पूर्ति हेतु सरकारों को बाध्य कर सकें। याद कीजिए 1789 में पेरिस में हुई पहली राज्य क्रान्तिजहाँ लोग राजा से रोटी मांँगने के लिए 18 कि0मीदूर वर्साय तक पहुँच गये थे। अमेरिका में अश्वेतों के लिए ऐतिहासिक मार्च कर मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने 1963 में सफलता अर्जित की तो भारत में गाँधी जी ने जनादेश यात्राओं के दम पर अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया। इस परम्परा को समय-समय पर आजमाया गया। हाल ही मेंअक्टूबर 2007 को ग्वालियर से चलकर 18 राज्यों के लगभग 27000भूमिहीन किसानों  ने जब दिल्ली में बैठे हुक्मरानों को अपनी आवाज सुनाने के लिए तीन हफ्ते तक 400 कि0मीलम्बा अहिंसक मार्च करते हुए 28 अक्टूबर को दिल्ली के रामलीला ग्राउण्ड पर प्रवेश कियातो ऐसा लगा जैसे ये अपने ही देश में बेगाने हैं। जमीनजल और जंगल पर अपने अधिकारों की माँग कर रहे इन वंचितों के पास अपने दमन की अद्भुत दास्तान है। वस्तुत: सामन्तवादी समाज और पूँजीवादी व्यवस्था के लोकतांत्रिक मूल्यों से टकराव का दुष्परिणाम छोटे किसानों,मजदूरोंअनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को ही प्राय: भुगतना पड़ा है। यह इस बात का भी परिचायक है कि प्रतिशत से ज्यादा की आर्थिक विकास दर और सेंसेक्स की उँचाइयों के साथ विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना देखने से पहले सामन्तवादी मूल्यों में जकड़े समाज की मुक्ति का मार्ग भी ढँढ़ना होगा। स्वयं रिजर्व बैंक के गर्वनर वाई0वी0रेड्डी ने चेतावनी दी है कि 9 प्रतिशत सालाना की विकास दर भारत के खेतिहर और गैर-खेतिहर परिवारों के बीच मौजूद विषमता को और बढ़ा देगी।
आज जरूरत है कि राष्ट्र की वास्तविक समस्याओं को उनके मूल परिप्रेक्ष्य में देखा जाय। ग्रामीण व शहरी वर्ग के अन्तर को कम किया जाय। ग्रामीणों की कीमत पर शहरी क्षेत्र का विकास और गरीबों की कीमत पर अमीरी का जश्न तमाम आर्थिक विकास के बावजूद राष्ट्र को रसाताल में ही ले जायेगा। कभी हिन्दू विकास दर कही जाने वाली प्रतिशत की भारतीय अर्थव्यवस्था आज प्रतिशत पर खड़ी है पर सरकार की गलत नीतियों के चलते  द्वन्द बढ़ता ही जा रहा है पर व्यवस्था के पहरूये ऑंख व कान बन्द कर सोये पड़े हैं। आम लोगों का उनकी जरूरतों की तरफ से ध्यान हटाने के लिए वे सदैव नाना प्रकार के स्वांग रचते रहते हैं। कभी मन्दिर-मस्जिदकभी राष्ट्रवादकभी साम्प्रदायिकताकभी कश्मीर तो कभी आतंकवाद की बात उठाकर लोगों को गुमराह किया जाता है जिससे मूल मुद्दे नेपथ्य में चले जाते हैं। जरूरत है कि सबके साथ समान व्यवहार किया जायेसबको समान अवसर प्रदान किया जाये और जो वर्ग सदियों से दमित-शोषित रहा है उसे संविधान में प्रदत्त विशेष अवसर और अधिकार देकर आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त किया जाये,तभी इस देश में अमीरी-गरीबी की खाई कम होगीइण्डिया बनाम भारत का द्वन्द खत्म होगासामाजिक न्याय व सामाजिक लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त होगा और भारत एक समृध्द राष्ट्र के रूप में विश्व के मानचित्र पर अपना अग्रणी स्थान बना सकेगा।
   

आंकड़ों पर इठलाती अमीरी

सपनों के सौदागर इस बात पर अभी से दिवाली मना सकते हैं कि भारत कुछ मुट्ठी भर रईसों के मामले में दूसरे नंबर पर पहुंच गया है। मायाजाल के महादेश अमेरिका की एक कंपनी के अनुसार अमीरी के एक मानक के मामले में चीन, ब्राजील, जर्मनी और यूरोप के तमाम देशों से हिन्दुस्तान बहुत आगे निकल गया है। क्या वाकई?
सबसे पहले सर्वे की रिपोर्ट को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं। रिपोर्ट का कहना है कि 27 प्रतिशत अमेरिकी परिवार अमीर हैं, जबकि भारत में 1.25 प्रतिशत लोग धनी हैं। चीन में यह आंकड़ा 0.75 पर आकर लटक गया है। सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में 1.25 प्रतिशत लोगों को रईस कहने का अर्थ यह नहीं है कि वे गिनती में कम हैं। ऐसा जनसंख्या की अधिकता की वजह से हुआ है। सर्वेक्षणकर्ताओं के मुताबिक, भारत में ऐसे 30 लाख लोग हैं, जिनकी हैसियत एक लाख अमेरिकी डॉलर निवेश करने की है। 121 करोड़ की विशाल आबादी में तीस लाख! ये तो खिचड़ी में नमक के बराबर भी न हुए। बाकी बचे 120 करोड़ से ज्यादा लोगों का क्या हाल है?
कहने की जरूरत नहीं कि वे बेहाल हैं। इन पंक्तियों को लिखते वक्त विजयदशमी के रावण को जले हुए 48 घंटे भी नहीं हुए हैं। इंसान की लगाई हुई हर आग की तरह पुतले तो जल गए हैं, पर दशानन अपने विविध रूपों में सामने खड़ा अट्टहास कर रहा है। आज ही महंगाई के आंकड़े आए हैं और एक बार फिर से खाने-पीने की वस्तुओं के दामों ने दहाई के अंक के पास पहुंच गया है। जब खाद्य महंगाई को लगभग दस अंक हासिल हो रहे हों, तो मान लीजिए कि आम इंसानों का जीना दूभर हो रहा होगा। यकीनन इस देश के अधिसंख्य लोगों के मन में यह सवाल उथल-पुथल मचा रहा होगा कि इस दिवाली पर उनका दिवाला निकलने जा रहा है।
पश्चिमी राष्ट्रों के लोग पिछले पांच सौ वर्षो से शेष दुनिया को सिर्फ सपने और नसीहतें ही बांटते आए हैं। उनके बोए बबूल को काटते-काटते हमारी तमाम पीढ़ियां खाक में मिल गईं। यही वजह है कि जब कोई एजेंसी इस तरह के सब्जबाग दिखाने की कोशिश करती है, तो मन की गहराइयों में रचे-बसे बबूल और घने हो जाते हैं। अगर यह ठीक है कि रईसों और रईसी के एक पैमाने में हम दुनिया में दूसरे नंबर पर पहुंच गए हैं, तो तमाम मानक ऐसे भी हैं, जो ओढ़ी हुई इस अमीरी के रंग को बदरंग कर देते हैं। विश्व बैंक ने 2005 में एक विश्वव्यापी सर्वे किया था। उसके मुताबिक, दुनिया के एक-तिहाई गरीब भारत में रहते हैं। कुल जमा 41.6 प्रतिशत लोगों को अपनी जिंदगी गरीबी की जगमान्य रेखा से नीचे गुजारने पर मजबूर होना पड़ रहा है। क्या है गरीबी का मानक? तो सुन लीजिए। ये लोग उन्हें निर्धन मानते हैं, जो हर रोज अपनी जिंदगी 1.25 अमेरिकी डॉलर से कम में गुजारते हैं। आपको याद होगा। कुछ दिनों पहले भारतीय योजना आयोग ने एक आंकड़ा पेश किया था। जिसके तहत आम आदमी हर रोज 32 रुपये में गुजर-बसर कर सकता है। यह ठीक है कि भीषण विरोध के बाद नई दिल्ली के वातानुकूलित चैनगाहों में बैठकर लिखी गई यह रपट वापस ले ली गई, पर अगर उस पर यकीन करें, तो फिर 1.25 अमेरिकी डॉलर में तो गुजर-बसर से आगे भी काफी कुछ किया जा सकता है। समय आ गया है। जब हम हकीकत की काली गहराइयों में झांककर देखें और आंकड़ों के जुगनू चमकाना बंद करें।
अमीरी और गरीबी के इस महासंग्राम में कुछ और दिल दहलाने वाले आंकड़े हैं। भारत में प्रति व्यक्ति आय कुल 1,219 डॉलर सालाना है, जो कि संसार में 142वां स्थान रखती है। माना जाता है कि हिन्दुस्तान में 2011 से 2020 के बीच प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी की दर 13 प्रतिशत रहेगी। यानी एक हिन्दुस्तानी इस दशक के अंत में औसतन 4,200 अमेरिकी डॉलर कमा रहा होगा। एक अन्य रिपोर्ट कहती है कि 2015 तक भारत में गरीब काफी कम हो चुके होंगे। फिर पूछना चाहूंगा- क्या वाकई?
भूलिए मत। 1990 के बाद से लगातार आंकड़ों के छल भरे तमाम खेल हम लोगों ने देखे हैं। कभी कहा जाता था कि 2000 से 2010 के बीच में दुनिया में अनोखी प्रगति होगी। इसी के आधार पर 2020, 2030 और 2050 के तमाम आंकड़े रच लिए गए। पर अफसोस के साथ याद आता है कि किसी ने भी 2008 की मंदी के बारे में सोचने की जहमत नहीं उठाई। अर्थशास्त्र के बाजीगर कुछ भी कहें, पर इसमें कोई दो राय नहीं है कि इंसानियत उनके खोखले सिद्धांतों से पूछकर अपना रास्ता तय नहीं करती। अमेरिका में बदहाली के विरोध में लोगों का बढ़ता कारवां उन्हें आईना दिखा रहा है।
समूचे यूरोप की लड़खड़ाहट इसका दूसरा उदाहरण है। अभी दो साल भी नहीं हुए, जब बराक ओबामा से लेकर तमाम महारथियों ने खुद अपने हाथ अपनी पीठ ठोंकी थी कि आर्थिक मंदी दूर हो चुकी है। पहले वे अपने यहां कर्ज भुगतान के संकट को नहीं पढ़ पाए थे। अब ग्रीस के संकट से खौफजदा उनके चेहरे देखकर लगता है कि अमीरी और गरीबी की शाश्वत लड़ाई बाजार की चोंचलेबाजी से दूर नहीं होगी। उसके लिए हमें जमीनी रास्ते तलाशने पड़ेंगे। फिलहाल विश्व के किसी सत्तानायक या दानवीर संस्थाओं के मुखिया में ऐसा करने का दमखम दिखाई नहीं देता। यूरोपियन सेंट्रल बैंक के मुखिया जीन क्लॉट ने जब गए गुरुवार को अपनी आखिरी प्रेस कांफ्रेंस की, तो उनके चेहरे पर हताशा की धुंध बिखरी हुई थी। उनकी आठ साल की मेहनत पर मौजूदा यूरोपीय संकट ने पानी फेर दिया है। वह हताश भाव से रुखसत हो रहे थे। दुनिया के तमाम सत्तानायकों का यही हश्र होने वाला है।
कभी पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने ‘ग्लोबल विलेज’ का शोशा उछाला था। अमेरिकी राष्ट्रपतियों को शायद इस बात के लिए प्रशिक्षित किया जाता है कि वे अपनी मर्जी से जब चाहे तब दुनिया को सपने बेच सकते हैं, लुभाने की कोई और कोशिश कर सकते हैं या मन आने पर धमका भी सकते हैं। क्लिंटन का ग्लोबल विलेज कितना बना, यह तो मालूम नहीं, पर यह सच है कि आर्थिक असमानताओं के बादल बरसते कहीं और हैं, पर भीगते हम सब हैं। 2008 में अमेरिका लड़खड़ाया, तो हिन्दुस्तान में हजारों लोगों की नौकरियां चली गईं। अब यूरोप डगमगा रहा है। हम सब दिल थामकर बैठे हैं। न जाने कब, किस पर बिजली गिर जाए। पर हम हिन्दुस्तानियों को बहुत हताश होने की जरूरत नहीं है। भारतीय बाजार की अंदरूनी खपत और 70 प्रतिशत लोगों का कृषि से जुड़ाव हमें कभी भी जमींदोज नहीं होने देगा। तीन साल पहले यह सच साबित हो चुका है।
यकीन मानिए। हमारे हरियाले खेतों और सदानीरा नदियों में अब भी 121 करोड़ लोगों की भूख और प्यास बुझाने की शक्ति है। बस एक बार संकल्प करने की जरूरत है। तो क्या सोच रहे हैं आप? सिर्फ दरवाजे पर दीया जलाकर छोड़ देंगे और हमेशा की तरह लक्ष्मी जी के वाहन का इंतजार करते रहेंगे या फिर अपने अंदर भी कोई जोत जलाने की कोशिश करेंगे? इस ‘ग्लोबल विलेज’ का सम्मानित सदस्य होने के नाते कुछ जिम्मेदारी आपकी भी है।

अमीर इंडिया के ग़रीब भारतीय


 मंगलवार, 16 अक्तूबर, 2012 को 15:53 IST तक के समाचार
रिपोर्ट के अनुसार भारत में अमीरों और ग़रीबों के बीच खाई बढ़ती जा रही है.
अगर आपको कोई कहे कि भारत में अमीरों की संख्या अगले पांच साल में 53 फीसदी बढ़कर 2 लाख 42 हज़ार हो जाएगी तो हो सकता है कि भारत की समृद्धी को देख आपको खुशी हो.
लेकिन वो कहते हैं ना, कुछ आंकड़े पूरी तस्वीर पेश नहीं करते.
वित्तीय मामलों की बड़ी कंपनी क्रेडिट सूइस के शोध संस्थान द्वारा पेश किए गए इन्ही आंकड़ो का दूसरा पक्ष ये है कि आज भी भारत में 95 फ़ीसदी लोगों की संपत्ति पांच लाख तीस हज़ार रुपए से कम है.
एक लाख डॉलर यानी लगभग 53 लाख के अधिक संपत्ति वालों की संख्या कुल आबादी का केवल शून्य दश्मलव तीन (0.3) प्रतिशत है.

अमीर या गरीब?

"भारत में धन दौलत तेज़ी से बढ़ रही है, भारत में अमीरों और मध्यम वर्ग की संख्या भी बढ़ती जा रही है लेकिन इस विकास में हर कोई हिस्सेदार नहीं है और भारत में अब भी गरीबी एक बड़ी समस्या है."
क्रेडिट सूइस शोध संस्थान
भारत के अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ती खाई के ये आंकडे हैं क्रेडिट सुसी रिसर्च इंस्टिट्यूट की विश्व संपत्ति रिपोर्ट में सामने आए हैं.
इस रिपोर्ट में कहा गया है, “भारत में धन दौलत तेज़ी से बढ़ रही है, भारत में अमीरों और मध्यम वर्ग की संख्या भी बढ़ती जा रही है लेकिन इस विकास में हर कोई हिस्सेदार नहीं है और भारत में अब भी गरीबी एक बड़ी समस्या है.”
भारत में 1500 ऐसे अमीर है जिनकी संपत्ति 500 करोड़ डॉलर यानी लगभग 25000 करोड़ रुपये है और 700 अमीरों के पास 100 करोड़ डॉलर यानी 50000 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति है.
विश्व भर के अमीरों की बाती की जाए तो 2012 से 2017 के बीच विश्व के अमीरों की संख्या दो करोड़ अस्सी लाख से बढ़कर चार करोड़ 60 लाख लोगों तक पहुंच जाएगी. यानी आने वाले पांच साल में विश्व में एक करोड़ 80 लाख अमीर और बढ़ जाएंगे.
वहीं चीन में अमीरों की संख्या 2017 तक दोगुनी होने का अनुमान लगाया गया है. 2017 में चीन में 20 लाख अमीर होगें.
बाकी जिन देशों में अमीरों की संख्या में इज़ाफ़ा होगा उनमें मेक्सिको, इंडोनेशिया, सिंगापुर शामिल है.

मंचीय साहित्य की दशा एवं दिशा


पिछले एक दशक से मैं कवि सम्मेलनों और काव्य गोष्ठियों में जाने से कतराता-बचता रहता हूं, क्योंकि मंचों में पढ़ी जाने वाली कविताएं सुनकर मन खिन्न हो जाता है। इन कवि सम्मेलनी मंचों पर सब कुछ होता है, केवल कविता नदारत रहती है। चुटकुलों का कविता में बदल जाना मंचीय कविता का चमत्कार भी होता है और फरेब भी। मौजूदा समय के तनाव को मंचीय कविता हंसोड़ किस्म के जुमलों में बदल कर बेशक उपस्थित भीड़ में हास्य पैदा करती हो किन्तु वह सरोकारों से वंचित सरोकारों का ही रचाव करती है। मंचीय कविता में हमेशा राष्ट्रवाद की दहाड़ सुनाई देती है। सारा खेल बाजार के डिमांड और सप्लाई के फार्मूले जैसा होता है। मंच पर कश्मीर, कारगिल, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, पाकिस्तान की अच्छी खपत होती है। कश्मीर हमारी राजनीति का ही नहीं, मंचीय कवियों के लिए भी कभी खतम न होने वाला मुद्दा है- "दूध मांगोंगे तो खीर देगें/ कश्मीर मांगोंगे तो चीर देगें" जैसी कविताएं मंचों पर छन कर आई और ट्रकों के पीछे लिखे नारों में बदल गई। ऐसी कविताएं भावनाओं के डरावने खेल खेलती हैं। आखिर क्या वजह है कि संवेदनशील साहित्यकारों से लेकर तमाम बुद्धिजीवियों ने परमाणु बमों का विरोध किया, लेकिन मंचीय कविता परमाणु विस्फोटों पर जयकारे लगाती है। मंचीय कवि व्यवस्था विरोध का नाटक रचते हैं और उसी मंच पर विराजे मंत्रियों, सांसदों विधायकों, नौकरशाहों के आगे अपनी मुंडी झुका कर दो रुपए वाली माला पहनते हैं, शाल और नारियल लपक कर धन्य होते हैं। इन्हीं का आर्शीवाद लेकर कविता पढ़ते हैं। मंचीय कविता का व्यवस्था विरोध खूबसूरत मसखरी का रूप धारण कर चुका है।
मंचीय कवियों ने वातावरण इतना दूषित, विकृत और हास्यास्पद बना दिया है कि कवि सम्मेलन भी भगवती जागरण की फोटो-स्टेट कॉपी बन कर रह गए हैं। फर्क करना ही कठिन है। एक में रात भर डीजे का शोर- शराबा, भक्ति रस में डूबे भक्त जन और अनिद्रा के शिकार आस-पास के निवासी तो दूसरी ओर चुटकुलों की मशीनें, झग जैसा वीर रस और गीतकारों की आंसू उगलती भावुकता। बहुत सारे मंचों पर बहुत सारे कवि-गीतकार एक ही कविता का पाठ करते नजर आते हैं- वतन के सिपाही वतन बेच देगें, कलम के सिपाही कलम बेच देगें। कवि महोदय को यह भी बताना चाहिए कि वे क्या बेच देगें? सबसे ज्यादा धंधा करने वाले तो मंचीय कवि ही हैं। दुकानदारी का आलम यह है कि मंच के पापुलर हास्य कवि, गीतकार, गजलकार लगभग सारा साल बुक रहते हैं। वे अपनी बार-बार सुनाई गई कविताओं के बार-बार सुनाने में परहेज नहीं करते। एक ही उत्पाद बार-बार बिकता रहे, क्या हर्ज है? संकोच कैसा? शर्म कैसी?
मंचीय कवियों की बुकिंग का गणित जटिल होता है। एक सीधा-सादा कवि जब मंचीय होने लगता है, तो शुरू-शुरू में उसके पास कुछ ठीक-ठाक सी कविताएं और गीत होते हैं, लेकिन वही कवि जब मंचीय गणित सीख लेता है, तो उसके पास गणित होता है, किन्तु कविता और गीत नहीं होते। जोड़- तोड़ और आयोजकों को पटाना, कवि सम्मेलनों के आमंत्रण हासिल करना, बारगिनिंग और मार्केटिंग के सब तत्व मंचीय कवि सम्मेलनी कवियों में शामिल होते हैं। जो इन गुणों में पारंगत होते हैं उन्हें कवि सम्मेलनों का मंच और लिफाफा मिलता है, जिनमें ये तत्व विकसित नहीं हो पाते वे धीरे-धीरे मंचीय तंत्र द्वारा खारिज कर दिए जाते हैं। मंचीय कवियों की बिरादरी के बीच ठेकेदार नाम का एक कवि भी होता है जो आयोजकों और कवियों के बीच सूत्रधार बनता है। वह आयोजकों द्वारा बताएं गए कवियों की लिस्ट में दो-तीन अपने ऐसे कवियों के नाम घुसेड़ देता है, जिन्हें कविता की कुडंली भी नहीं मालुम। आज कल मंचीय कवियों की ठेकेदारी ऐसी ही होती है। तू मेरी पीठ खुजला और मैं तेरी पीठ खुजलाता हूं वाली कहावत इस तरह चरितार्थ हो जाती है। लगभग साल भर व्यस्त रहने वाले मंचीय कवियों के समीकरण अलग तरह के होते हैं। ऐसे कवि एक अदद शिष्या पाल कर रखते हैं और अपने पारश्रमिक के साथ शिष्या का भी पारश्रमिक बता देते हैं।
मेरी बस्ती में आधा दजर्न ऐसे मंचीय कवि जो बा-कायदे अपना रेट कार्ड छपवाए हुए हैं, इसमें उनका परिचय राष्ट्रीय कवि के रूप में छपा हैं। वैसे-मुहल्लों में होने वाले कवि सम्मेलनों को राष्ट्रीय नाम का लेबल चस्पा करने की परिपाटी चल रही है। मंचीय कवि सम्मेलनों में उठा-पटक की कूटनीति भी खूब चलती हैं। एक दूसरे को नीचा दिखाना, दाद न देना, तालियां न बजाना, अश्लील फिकरे कसना आम बात है। इसके विपरीत भी होता है। मंचीय दोस्ती भी निबाही जाती है। अगर कवि अपने अखाड़े का हुआ तो उसकी निकृष्ट कविता पर दाद लुटाई जाती है। कवि सम्मेलनों में अजब-गजब प्रपंच भी रचे जाते हैं। मंचीय कवि सम्मेलनों में नारी प्रताड़ना बिकाऊ माल होता है, जिसमें नारी विमर्श का तड़का भी लगा होता है। देखिए अदभुत नजारा- रात का सन्नाटा, कवि सम्मेलनी रात, उपस्थित और शिक्षित श्रोता, मंच पर माइक के सामने युवा कवियत्री साड़ी का पल्लू संवारे, आदर्श भारतीय नारी की छवि, ओढ़ी हुई मुद्राएं, मंजी हुई अदाकारी, सधा हुआ स्वर, आवाज में उतार-चढ़ाव। श्रोताओं के आगे नारी प्रताड़ना का नाटक जारी है- मां तूने दहेज में सभी उपयोगी वस्तुएं दे दी- तेरा आभार मां! कृतज्ञ हूं मै तेरी, कि तूने सारा साजो-सामान दिया। लेकिन एक चीज देना भूल गई मां! एक अदद कैरोसिन की बोतल कि वक्त जरूरत उसका उपयोग कर सकूं! फिर सन्नाटे को तोड़ती तालियां। कवियत्री, जिस चिथड़ा कविता के जरिये भावुक प्रपंच रचती हैं वह सफल होता है।
मंचीय कविता का निरन्तर पतन हुआ है और यह सिलसिला अभी भी चल रहा है। कविता और गीत के पिटने के लिए मंचीय कविता जिम्मेवार है। मंच ने कविता और गीत को इतना विकृत किया है कि वे कहीं के नहीं रहे। एक जमाना था जा पंत, निराला, बच्चन, नेपाली, नीरज, दिनकर आदि मंच पर गीत-कविता पढ़ते तो गरिमामय अनुशासित वातावरण बनता था और आज नौटंकी के आंगन में भड़ैती हो रही है। मेरी बस्ती में तो नव दौलतियों ने तेरहवीं-बरसी में, लल्ला के मुडंन, वर्षगांठ पर कवि सम्मेलनों का शौक शुरू कर दिया है और कविगण इनमें सशरीर उपस्थित होकर भडांरा भोज तथा गांधी बाबा के दो-चार फोटो वाले सरकारी कागज रखते हुए कविता का पिंडदान कर रहे हैं।
चिन्तामणि मिश्र
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं।

बेटिया पुरुष सत्ता की थोपी गई मान्यताओं की शिकार


चिंतामणि मिश्र
नवरात्रि में देवी के नौ स्वरूपों का पूजन भक्ति और श्रद्धा से सम्पन्न करके भक्तजनों ने माता-रानी के आशीर्वाद तथा उनकी कृपा पाने की आकांक्षा हेतु जप-तप, भजन-पूजन किया और कन्याओं को देवी मानकर घर में आमंत्रित करके उनके चरण पखारे, उन्हें भोजन कराया, वस्त्र और दक्षिणा देकर विदा किया। किन्तु कभी विचार किया कि क्या हमें देवी माता की कृपा- आशीर्वाद मिलेगा? क्या हम अजन्मी कन्याओं की गर्भ में ही हत्या के सहभागी बन कर असुर-संहारिनी की दया पाने के अधिकारी हैं? असलियत तो यह है कि लोग मौका पाते ही अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए समय के अनुकूल मुखौटे पहन लेते हैं। सच यह है, हमारे समाज की मानसिक बुनावट दुहरी है। गर्भ में ही कन्या का बध आसुरी सोच का नतीजा है। देवी ने तो असुरों का संहार करने के लिए ही शक्ति-स्वरूपा अवतार लिया था अजन्मी कन्याओं के बधिक माता रानी का आशीर्वाद तथा कृपा कैसै पा सकते हैं? बेटे की चाहत ने समाज की मानसिकता को किस हद तक विकृत कर दिया है उसकी भयावह तस्वीर चिकित्सा जगत की अंतरराष्ट्रीय स्तर की पत्रिका "लौसेट" ने अपने अध्ययन में बताया है कि पिछले तीन दशक के दौरान लगभग एक करोड़ इक्कीस लाख कन्याओं को गर्भ में ही मार डाला गया। कैसी विडम्बना है कि हम उस महान देश के निवासी हैं जहां कन्याओं को देवी माना जा कर उनकी पूजा की जाती है किन्तु वंश चलाने से लेकर हर हाल में दूसरी सामाजिक परम्पराओं के निर्वाह हेतु बेटा हासिल करने के लिए बेटी की बलि चढ़ाई जाती है। यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते का मंत्र जाप, देवी भागवत पुराण के साथ दुर्गा सप्तसदी का पारायण किया जाता है, यह ढोंग नहीं तो आखिर क्या है?
देश में कन्या भ्रूण हत्या की समस्या विकराल होती जा रही है। भारतीय समाज में बेटिया शुरू से ही पुरुष सत्ता की थोपी गई मान्यताओं की शिकार हैं। बेटियों को पराया धन समझने के संस्कार अभी भी बरकरार हैं। चांद और मंगल पर पहुंचने वाला समाज अभी भी बेटियों को बोझ मान रहा है। आर्थिक समपन्नता और शिक्षा आने पर भी बेटियों को हेय मानने की गांठ अभी भी बनी है। यही मनोवृति बेटियों को गर्भ में ही मार डालने के अपराध और पाप तक ले जाती है। तकनीक का दुरुपयोग किस बेशर्मी से हमारा समाज कर रहा है, उसका उदाहरण कोख में ही कन्या भ्रूण की हत्या है। इसकी रोकथाम के लिए कानून बना है किन्तु कानून को धता बता कर लिंग परीक्षण और अवैध गर्भपात का व्यापार खुले आम हो रहा है। यह धंधा अब शहरों की सीमा को पार करके कस्बों तक फैल गया है। कन्या भ्रूण हत्या जिन्दा रहने के अधिकार का हनन है। कानून अक्षम तो नहीं है किन्तु लाचार है। चार दशक पहले तक दाई-दादी और मां नवजात, अवांछनीय कन्या की हत्या सोबर में ही कर देती थी। अब लालची चिकित्सक से अपनी अजन्मी बेटियों की गर्भ में ही कब्र बनवाई जाने लगी है।
यह जितना मानवता, समाज और कानून के खिलाफ है, उससे बड़ी समस्या यह है कि लोगों की मानसिकता में यह इतने विकृत रूप में गहरे पैठ चुकी है कि इसका मुकाबला केवल कानूनी स्तर पर नहीं हो सकता है। इस महा पाप का अब भयावह असर भी दिखने लगा है। देश के कई प्रदेशों में शादी के लिए लड़कियों का मिलना कठिन हो गया है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान गुजरात सहित बुन्देलखंड में उड़ीसा, बंगाल, झरखंड के गरीब परिवारों से लड़कियां खरीद कर लाई जा रही हैं। पैसों की दम पर कम उम्र की गरीब-बेबस लड़कियों को किसी भी उम्र के आदमी के साथ विवाह का नाटक करके सौंप दिया जाता है। अब तो कुछ चालाक, चतुर लोगों ने इसे धंधा बना लिया है। सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक ढांचा भी इसके लिए जिम्मेवार है। सामाजिक मान्यता के अनुसार पुत्र ही पितरों को पिंडदान दे सकता है और वही पितरों को मोक्ष दिलावाने वाला होता है। बेटे के बिना परिवार पूरा नहीं माना जाता है। अमीर- गरीब, शिक्षित-अशिक्षित, ग्रामीण-शहरी सभी वर्ग में बेटों की चाह सर्वोपरि है। सम्पति में हिस्सा, विवाह के समय दहेज की मांग, ससुराल में उत्पीड़न, छेड़छाड़-बलात्कार का भय, पराई समझी जाने वाली लड़कियों की शिक्षा पर व्यय की सोच के चलते लड़कियों के प्रति उपेक्षा का पहाड़ लोगों की छाती पर खड़ा कर दिया है। माना जाता है कि पढ़े-लिखे सामाजिक समूहों में चेतना का विकास अधिक होता है। मगर कन्या भ्रूण हत्या के मामले में ऐसी धारणा खंडित हुई है। पिछली जनगणना के अनुसार पिछड़े अशिक्षित, गरीब और सबसे निचले तबकों के बीच कन्या शिशुओं की संख्या में खासी बढ़ोतरी हुई है, जबकि सम्पन्न इलाकों और शिक्षितों के बीच कन्या भ्रूण हत्या गम्भीर शक्ल में उपस्थिति है। यह हमारे विकास की उस समूची अवधारणा को दिग्भ्रमित करती है जिसमें आर्थिक समपन्नता और शैक्षणिक उपलधियों के बीच परम्परा से चले आ रहे पूर्वग्रहों के बने रहने में कोई परेशानी महसूस नहीं की जाती।
बेटियों को समाज में उनकी वाजिब जगह न मिल पाने के लिए हमारी पितृ-सत्तात्मक मानसिकता जिम्मेवार है। समस्या कितनी गम्भीर है, इसकी परवाह न परिवार को है और न ही समाज को। इसका समाधान सरकारी स्तर पर नहीं हो सकता। इस अवैध और समाज-विरोधी महापाप का उन्मूलन स्वंयसेवी संस्थाओं और सामाजिक तथा जातीय सगठनों के ईमानदार प्रयास से ही हो सकता है। इस दिशा में अंतिम उम्मीद मां से भी की जा सकती है। उसकी चेतना का द्वार खटखटाया जाए तो वह अवश्य अपनी अजन्मी बेटी को बचाएगी। दरअसल, समाज सुधार आन्दोलन गांधी वध के बाद हमारे यहां बन्द हो गए, अब तो समाज राजनैतिक ताकत जुटाने के लिए बोट बैंक का ही धतकरम कर रहे हैं। भ्रूण हत्या का महापाप महाभारत युद्ध के बाद अभिमन्यु की पत्‍नी उत्तरा की कोख में पल रहे परीक्षित पर गुरू द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने ब्रम्हास्त्र चला कर किया था किन्तु श्री कृष्ण ने अपने सुर्दशन चक्र से गर्भ की रक्षा की थी। यह सही है कि इसके पीछे शत्रुतापूर्ण बदले की कायर भावना थी। आज सन्दर्भ जरूर बदला है, किन्तु मानसिकता तो वही है। हम अपने नपुसंक घमंड के चलते कन्याओं के साथ शत्रुता ही तो भुना रहे हैं। हम भी अश्वत्थामा की भूमिका में हैं। उत्तरा के गर्भ को तो श्री कृष्ण ने बचा लिया था किन्तु आज इन अजन्मी कन्याओं को बचाने वाला कोई नहीं है। श्री कृष्ण तो नहीं आयेंगे, हमें ही उनके पथ पर चलना होगा।
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं एवं चिंतक हैं।)

मतलबी दुनिया में मित्रता के अवशेष


चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र
मित्रता (दोस्ती) संसार का सबसे प्यारा और खूबसूरत सम्बन्ध है। व्यक्ति का मित्रहीन बनकर रहना असम्भव है।
मित्रहीन जिन्दगी कोई जिन्दगी नहीं है, इसीलिए प्रत्येक प्राणी मित्र की आवश्यकता महसूस करता है। मित्रता में किंचित स्वार्थ तो है, अपेक्षाएं भी हैं, परंतु रिश्तों से कम। रिश्तों से हम अधिक अपेक्षाओं की आशा करते हैं इसीलिए उनके टूटने पर हाय तौबा मचाते हैं, परंतु मित्र से सम्बन्ध विच्छेद होने पर हम चुप रहते हैं, घुटते हैं, किसी से कह नहीं पाते क्योंकि यह अपनी सृष्टि का कच्चा माल है जो समझ के आंव में पकता है, टूटता है और फिर बनता है। प्यार की तरह मित्रता भी,की नहीं जाती, हो जाती है।
जिस तरह योजना बनाकर प्यार नहीं किया जाता, उसी तरह मित्रता भी सोच समझकर नहीं की जाती। मित्रता मनुष्य की जागृत अवस्था है, जबकि प्रेम स्वप्नवस्था। फिर भी मित्र और प्रेम को किसी फ्रेम में बांधकर परिभाषित नहीं किया जा सकता।
भगवत रावत निजी सम्बन्धों (मित्रता) के बड़े कवि हैं, उन्होंने कहा है- ‘अगर कभी ऐसा समय पड़े मुझ पर/ कि कविता और दोस्ती के बीच/ किसी एक को चुनना पड़ जाए/ तो मैं खामोशी से/ बिन कुछ कहे चुपचाप/ विदा मांग लूंगा कविता से/और गुम हो जाऊंगा/’ मित्रता प्रकृति का वरदान है, जिसे यह वरदान मिलता है उनके लिए कबीर ने भी जग से जाने पर रोने की बात कही है। मित्रता समान स्वभाव, लक्ष्य कर्म के कारण होती है। इसकी शुरुआत में कुछ तो तपाक से गले लगकर मिलते हैं, कुछ धीरे-धीरे सूर्य के सुबह और शाम को पड़ने वाली छाया की तरह समय के साथ विकसित होते हैं। बचपन से लेकर वृद्ध होने तक मित्रता का अबाध सिलसिला चाहे अनचाहे चलता रहता है। जिस मित्र ने मित्रता को वृद्धावस्था में सहेज लिया वह देहत्याग के बाद भी जीवित रहता है।
मित्रता जीवन का सहारा है,भाव है। जीवन संगीत में यह भाव संवादी और विवादी सुरों के बावजूद आनंदमयी है। मित्रता मिथक भी है, यूटोपिया भी। इतिहास, पुराणों एवं उपनिषदों तक में अनेक कहानियां इसके इर्द-गिर्द रची गई हैं। जिन्दगी के क्रम में उनका पुनर्पाठ होता रहता है। आमतौर से भारतीय जीवन में मित्रता के उदाहरण रामायण-महाभारत के संदर्भ से दिये जाते हैं।
राम काव्य में मित्रता का प्रारंभ केवट प्रसंग से शुरु होता है। राम के बाल्यकाल में कोई मित्र नहीं है। चारो भाई ही आपस में ही मित्र हैं। घर और राज्य में मित्र नहीं, वन में मित्रता की शुरुआत होती है, कार्य कारण और स्वार्थ वश। वंचितों का समूह राम में सहारा पाता है। दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। बिना बालि की बात सुने सुग्रीव पर राम का विश्वास डगमगाता दिखता है जब राम कहते हैं- ‘अचल करौं तन राखहुं प्राना’विभीषण की मित्रता भले ही राम को सिद्धि दिलाए, लोक विभीषण को न मित्र मान सका न भक्त, अलबत्ता ‘मानस’ को धर्मग्रंथ मान बैठा।
हनुमान को राम मित्र बनाना चाहते हैं, लेकिन वे दास बनना बेहतर मानते हैं। बिना किसी अपेक्षा, निष्काम भाव से, हालांकि राम का स्वार्थ था। मित्रों के अभाव में व्यक्ति अहंकारी एवं दमनी हो जाता है। रावण न भाई कुम्भकर्ण की बात मानता है न मंदोदरी की। तुलसीबाबा ने मित्र के बारे में कहा है- ‘कुमति निबारि सुयंश चलाबा/गुन प्रकटै अवगुनहिं दुराबा।’ देवताओं के पास मित्र भाव सिर्फ स्वार्थ वश ही हुआ करता था या संकटग्रस्त होने पर, वह भोगवादी जाति थी। महाभारत में कृष्ण और अजरुन की मित्रता रिश्तों पर ज्यादा केन्द्रित थी। कृष्ण और श्रीदामा की मित्रता सहपाठी की मित्रता थी। श्रीदामा की मित्रता धारदार थी।
खेल में दांव न देने पर वह कृष्ण से भिड़ जाता है- ‘या अधिकार जनाबत मोंसो, अधिक तुम्हारे हैं कछु गैयां।’श्रीदामा का पता लगाने कभी कृष्ण गए होते तो मित्रता निहाल होती? मित्रता गर्व का भाव है। द्रुपद और द्रोण भी सहपाठी थे। द्रुपद राजा हुए, द्रोण आचार्य और अभावग्रस्त। द्रुपद के राजदरबार गए, उन्होंने द्रोण को पहचाना अवश्य लेकिन मित्रता की परिभाषा बता दी, मित्रता समान लोगों की होती है, राजा की भिखारी से कैसी मित्रता? पूरे महाभारत में एक ही मित्रता के सामने सारे मित्र छोटे पड़ जाते हैं कर्ण और दुर्योधन की मैत्री। दोनों के स्वभाव, चरित्र में कहीं भी मेल नहीं। एक अहंकारी, दम्भी, दूसरा विनीत, मितभाषी एवं व्यवहारी, तमाम दुरभिसंधियों से असहमत होते हुए भी दुर्योधन के लिए जीवन देने के लिए सदैव कर्ण उद्धत रहता है।
कृष्ण से कहता है कि ‘मित्रता बड़ा अनमोल रतन/कब इसे तोल सकता है दान/ धरती की तो है क्या बिसात/ आ जाय अगर बैकुंठ हाथ/ उसको भी न्यौछावर कर दूं/ कुरुपति के चरणों पर धर दूं/ यदि चले बज्र दुर्योधन पर/ ले लूं बढ़कर अपने ऊपर/ कृष्ण के किसी प्रलोभन का कर्ण के ऊपर कोई असर नहीं पड़ता। रश्मि रथी के कृष्ण स्वयं कहते हैं’ बड़ा बेजोड़ दानी था, सदय था। युधिष्ठिर! कर्ण का अद्भुत हृदय था।मित्रता को काल ही कसौटी पर कसता है। ब्रूट्स पर अनन्य विश्वास करने वाला जूलियस सीजर अब अपने विरुद्ध युद्ध में उसे देखता है तो आश्चर्य से कहता है- ‘बूट्रस यू टू’ मित्र के धोखे से हार के अतिरिक्त क्या? उद्देश्य पूर्ति के लिए बनाए जाने वाले समय सापेक्ष मित्र कालातीत और समय पर हस्ताक्षर नहीं करते।
बाल और युवावस्था में मित्रों की भीड़ मिलती है। टूटने, रूठने मनाने और मुंह फुलाने के दिन बड़े मनोरंजक होते हैं।
काम काज के दिनों के मित्र कार्य की निवृत्ति के बाद निरपेक्ष हो जाते हैं। वृद्धावस्था में जब मित्रों की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, मित्र कम होने लगते हैं, अत: लोग धर्म, प्रवचन, सत्संग के स्थल तलाशते हैं और एकांत में बैठ दूसरों की निंदा में अपनी ऊर्जा लगाते हैं। तीसरी चौथी कक्षा का मेरा अभिन्न मित्र जो आगे नहीं पढ़ सका था। शहर से जब भी गांव जाता उससे मिलने अक्सर जाता। उसने एक दिन छुट्टी के बाद घर पहुंचने के पहले हुई भारी ओलावृष्टि पर पेड़ के तने से मुङो चिपकाकर मेरा रक्षा कवच बन जिन्दगी बचाई थी। पांच वर्ष पहले जब उससे मिलने गांव जा रहा था, पूछने पर एक ने बताया, वे अब नहीं हैं- मैंने पूछा कब? बोला- सात महीने हो गए। संयोग से वही पेड़ था जहां उसने मेरे प्राण बचाए थे, मैं देर तक बैठा रहा उसी की यादों में खोया। उसी तने से उढ़का उसका ताप महसूस करता रहा। देखता हूं, हमारे ही बच्चों के अब कोई मित्र नहीं हैं, हैं भी तो सिर्फ स्वार्थ वश या पेशे के। अब क्या कोई कभी, किसी से ऐसा पूछता दिखता है जैसा भगवत रावत पूछते हैं- ‘सुनिये! आप बता सकते हैं/मैं/उसके बचपन का साथी/मुङो उससे कोई काम नहीं/इस तरफ निकला/तो सोचा/पता लेता चलूं/बिना किसी काम के यदि कोई किसी मित्र को पूछे तो बताइएगा, वह हमारा मित्र होगा।
- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।
सम्पर्क - 09407041430. 

56 साल पूरे हुए विंध्यप्रदेश का सितारा अस्त होने के

क्षेत्रीय विषमता की खाई तो पाटना ही होगा!
मध्यप्रदेश का स्थापना दिवस हर साल विंध्यप्रदेश का सितारा अस्त होने का शोक संदेश भी दे जाता है। साथ ही यह भी ताकीद मिल जाती है कि क्षेत्रीय विषमता पर विजय पाने का गुर कोई छत्तीसगढ़ियों से सीखे। मध्यप्रदेश प्रौढावस्था में है, तो छत्तीसगढ़ के बाल्यकाल के दिन चल रहे हैं। इन दोनों प्रदेशों की वर्षगांठ के मौके पर एक तुलनात्मक अध्ययन पर नजर गई।
अध्ययन का निष्कर्ष था कि 12 साल का छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश से 12 मानकों में आगे है। ये मानक, साक्षरता, स्वास्थ्य, उर्जा, अधोसंरचना विकास, विकास दर, उत्पादकता, पर्यटन के क्षेत्रों में है। एक छोटा और स्वायत्त राज्य किस तेजी के साथ विकास की रफ्तार पकड़ता है, छत्तीसगढ़ इसकी मिसाल है। आज वह भी 12 साल की पूर्व की स्थिति में होता तो उसका हश्र अपनी ही तरह होता। आज वहां शिक्षा के सभी राष्ट्रीय स्तर के संस्थान हैं, जो नही हैं, वो प्रस्तावित हैं या खुल रहे हैं। रायपुर की चमक के आगे भोपाल की दमक फीकी होने को है। बस नए रायपुर को एक बार बस जाने दीजिए। छत्तीसगढ़ के हर शहरों के तोरण द्वार में गर्व व स्वाभिमान के साथ एक वाक्य टंका मिलेगा। . ‘छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया’।
वाकय.. छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया है। क्योंकि उन्होंने क्षेत्रीय विषमता के विरुद्ध आवाज बुलंद की और मुकाम तक पहुंचाया। हम विंध्यप्रदेशी.. मवेशी के माफिक भोपाल का मुंह ताके पिछले छप्पन सालों से सिर्फ जुगाली कर रहे हैं।
सत्ताएं किसी भी दल की रही हों, वो हमे जिधर हांकती है हम चल देते हैं।
अविभाजित मध्यप्रदेश में विंध्य क्षेत्र की खनिज सम्पदा से अजिर्त राजस्व का हिस्सा 27 प्रतिशत था। आज की तारीख में 65 से 70 फीसदी है। सीमेण्ट और ऊर्जा क्षेत्र के सभी बड़े करार इसी क्षेत्र की खदानों के आधार पर हुए। 30 हजार मेगावाट बिजली और प्रदेश में 90 फीसदी सीमेंट का उत्पादन हमी करने जा रहे हैं।
धूल-धुआं, जल संकट- प्रदूषण और नाना प्रकार की बीमारियां हमी व हमारे बच्चे ङोलने वाले हैं। ये सरकार उद्योगों में पूंजीनिवेश की बात तो करती हैं पर सुविधा संसाधनों में निवेश भूल जाती हैं।
यहीं से कमाने वाले उद्योगपति भोपाल- इंदौर में कारपोरेट सोशल रिस्पांसबिल्टी की बात करते हैं। क्या विंध्यवासियों को एम्स, आईआईटी, एनआईटी, आईआईएम जैसे संस्थान नहीं चाहिए? क्या छोटी बीमारियों के इलाज के लिए ताउम्र ऐसे ही जबलपुर-नागपुर भागते रहेंगे..? यदि प्रदेश सरकार और उसके मुखिया अब तक यह नहीं समझ पाए तो वे मुगालते में हैं..। वक्त आ जाए तो मवेशी भी सांड़ की तरह फुफकारता है और सींगे चलाता है। विकास के मामले में क्षेत्रीय विषमता की खाई को पाटने की पहल नहीं हुई तो एक दिन वह वक्त भी आयेगा। देखते रहिए।