Thursday, November 22, 2012

प्यार और युद्ध / शलभ श्रीराम सिंह



नहीं किया जिसने प्यार
युद्ध नहीं कर सकता है वह

युद्ध में जाती है जान
जान देने की तमीज़ सिखाता है प्यार

युद्ध में घायल होता है शरीर
घाव की गहराई बताता है प्यार

युद्ध में जन्म लेता है जीत का विचार
विचार को ज़िन्दा रखता है प्यार

युद्ध है उत्सर्ग का आख़िरी त्यौहार
त्यौहार का आयोजन करता है प्यार

प्यार नहीं कर सकता है जो
युद्ध नहीं कर सकता है वह।


रचनाकाल : 1992 विदिशा

Tuesday, November 20, 2012

कबिरा हाय गरीब की..


मध्यप्रदेश के कटनी जिले के डोकरिया-बुजबुजा गांव में लहलहाते खेतों के बीच सजी चिताएं इस सूबे के भविष्य की मुकम्मिल तस्वीर पेश करती हैं। साथ ही इस बयान को भी तस्दीक करती हैं कि पूंजी निवेश की होड़ में जरूरत पड़े तो हमारी सरकारें किसानों की चिताओं पर कारपोरेट के लिए कारपेट दसाने में भी कोई हर्ज नहीं मानती।
जहां तक रहा प्रदेश में औद्योगिक पूंजी निवेश, भू- अधिग्रहण और विस्थापन का मामला तो भाजपा और कांग्रेस के चरित्र और सोच में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। जेपी की जेब में कांग्रेसी व भाजपाई दोनों हैं, तो अम्बानी के पेरोल पर दोनों पार्टियों के नेताओं के बेटे, दामाद और रिश्तेदार कमा- खा रहे हैं। ऐतिहासिक संदर्भाें व तथ्यों पर जाएं तो मौजूदा भाजपा की सरकार कांग्रेस के किए-कराए का ही विस्तार दे रही है और समूचे देश के परिदृश्य में देखा जाए तो यही काम यूपी में बसपा ने किया तो सपा आगे बढ़ा रही है, उड़ीसा में बीजद, तो हरियाणा में कांग्रेस। कुल मिलाकर जो सरकारें जहां हैं, वहीं उद्योगपतियों की गोदी पर बैठकर, जल-जंगल-जमीन को लूटने और जन को पीटकर उनकी खेती-बारी, स्वत्व व मिल्कियत से बेदखल कर रही हैं। इस काम में पार्टी लाइन और विचारधारा कहीं आड़े नहीं आती। सिर्फ कर्मकाण्ड बदल जाते हैं। दरअसल विस्थापन एक ऐसा शब्द है जिसे कानूनी और कागजी तौर पर परिभाषित तो किया जा सकता है, किन्तु उसके दंश और पीड़ा की तीव्रता को वही महसूस कर सकता है, जो खुद विस्थापित हुआ है। मेरा मानना है कि विस्थापन मृत्युदण्ड से भी भीषण सजा है जिसमें विस्थापित जीते-जी किश्तों में मरता है। सिंगरौली और हरसूद के विस्थापितों के बीच एक दिन गुजारिए पता चल जाएगा। विस्थापन के साथ सिर्फ जमीन भर नहीं छिनती जिसमें उसकी वंशनाल गड़ी होती है, अपितु स्मृतियां, संस्कार, संस्कृति, परम्परा, आबोहवा सबकुछ छिन जाता है। सभी का अस्तित्व या तो बड़े बांधों की अथाह जलराशि में डूब जाता है या खदानों से निकलने वाले धूहे में दब जाता है, या फिर सीमेंट या थर्मल पॉवर की चिमनियों से धुंआ बनकर बादलों में समा जाता है, अस्तित्व के नाम पर शेष बचती है तो सिर्फ राख। इसलिए जब शासन- प्रशासन या उद्योगपति कोई भी, विस्थापितों के साथ जोर- जबरदस्ती या मजाक करता है तो ऐसा लगता है जैसे किसी के पार्थिव शरीर पर पद प्रहार किया जा रहा हो।
देश में विस्थापन की स्थितियां भयावह हैं। असम के समाजशास्त्री वाल्टर फर्नाडीस ने विस्थापितों और पुनर्वास के बारे में महत्वपूर्ण अध्ययन किया है। फर्नाडीस के मुताबिक आजादी के बाद विभिन्न विकास परियोजनाओं ने 6 करोड़ लोगों को विस्थापित किया है। इनमें से महज 20 फीसदी लोगों का ही पुनर्वास हो पाया है वह भी आंशिक। यानी कि पांच में से एक विस्थापित परिवार का घर बसा है। सबसे ज्यादा मरन तो आदिवासियों-जनजातियों की है। देश के कुल कोयले भंडार का 80 फीसदी और खनिज संपदा का तकरीबन 50 फीसदी हिस्सा आदिवासी बहुल इलाके में है, औद्योगिक विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए जाहिर है इन्हें हटाया जाएगा। कहने को 11 अक्टूबर 2007 को केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय पुनर्वास नीति 2007 घोषित की। इस नीति ने परियोजना प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की राष्ट्रीय नीति-2003 की जगह ली। नई नीति के विस्थापन की प्रक्रिया के परीक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। इसमें मानकर चला गया है कि विस्थापन तो होना ही है। भूमि अधिग्रहण कानून 1894 में जो संशोधन किए भी गए हैं उसमें अंग्रेजों के जमाने की नीयति अभी भी साफ झलकती है। इसमें ..सार्वजनिक उद्देश्य.. को फिर से परिभाषित करने की कोशिश असल में गरीबों और हाशिए पर लोगों के ऊपर निजी और बड़ी कंपनियों के हितों को तरजीह देने का हिस्सा है। सार्वजनिक उद्देश्य की फिर से परिभाषा इस तरह की गई है कि राज्य सरकारों के लिए किसी निजी कम्पनी, व्यक्तियों के संघ या संस्था के लिए जमीन के अधिग्रहण की इजाजत मिल जाती है बशर्ते वह ..आम जनहित.. में है। किसी कम्पनी के निजी मुनाफे को ..आम जनहित.. के साथ जोड़कर काश्त की जमीन छीनने का काम प्रदेश में बेशर्मी से चल रहा है। डोकरिया-बुजबुजा में वेलस्पन पॉवर प्लांट के लिए जमीन का अधिग्रहण ताजा व ज्वलंत उदाहरण है। प्रदेश के लिए जो चिन्ता का विषय है वह यही है कि काश्त की जमीन का पूंजीपतियों के लिए छीना जाना और दूसरी गंभीर बात यह है कि यदि उद्योग को 100 एकड़ जमीन की वास्तविक जरूरत है तो 1 हजार एकड़ की मांग करना और सरकार का आंख मूदकर इस मांग को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक गुजर जाना है। अब एक नजर डालें मध्यप्रदेश में पूंजी निवेश और औद्योगिकीकरण की हवश के आंकड़ों पर। सूचना के अधिकार के आधार पर विकास संवाद केन्द्र ने इन्दौर इनवेस्टर मीट के पहले एक ब्योरा जारी किया था। इसके अनुसार 2007 से इन्दौर की इनवेस्टर मीट के पहले तक म.प्र. सरकार ने 376 कम्पनियों के साथ 6 लाख 33 करोड़ रुपये से ज्यादा के निवेश का अनुबंध किया है।
इनमें से 130 कम्पनियों को करीब चार लाख 50 हजार हेक्टेयर जमीन दी है जिसमें से 1 लाख 25 हजार हेक्टेयर वनभूमि है।
कम्पनियों ने करीब 4 लाख हेक्टेयर निजी जमीन भी प्राप्त की है।
सार्वजनिक प्रयोजन के नाम पर ली गई इन जमीनों का लैण्ड यूज बदलकर उद्योगों को दे दिया गया। जमीनों और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के सबसे ज्यादा शिकार हुए महाकौशल व विन्ध्य क्षेत्र।
महाकौशल में 1 लाख 72 हजार हेक्टेयर भूमि गई जबकि विन्ध्य (बघेलखण्ड) से 1 लाख 12 हजार हेक्टेयर। इन क्षेत्रों की तीन चौथाई जमीन काश्त की, व उपजाऊ हैं। एक ओर जहां प्रदेश सरकार किसानों की जमीन छीनकर उद्योगपतियों को जमीदार बना रही है वहीं जब भूमिहीनों को बसाने की बात आती है तो उतनी ही कृपण बन जाती है। सिकुड़ती हुई खेती का असर भी साफ नजर आने लगा है। प्रदेश में कुल सालाना आय में खेती का हिस्सा जहां 94.95 में 43.19 प्रतिशत था वहीं 2005-06 में घटकर 32.09 रह गया। किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े भी कम भयावह नहीं हैं। पिछले 11 वर्षो में प्रदेश के करीब 17 हजार किसानों ने आत्महत्या की। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2011 में देश भर में जान देने वाले 14024 किसानों में मध्यप्रदेश के 1326 किसान हैं, यानी कि 4 किसान रोज प्रदेश के किसी कोने में मौत को गले लगा रहे हैं।
किसानों की हितचिंतक बनने वाली प्रदेश सरकार की छाया में जो आज डोकरिया में हुआ है, वो कल चुटका (मंडला) में होगा, तो परसों छिन्दवाड़ा में सिंगरौली-सीधी और सतना में। तो क्या? हालातों के मारे किसानों के आगे दो ही रास्ते बचते हैं, मरे या मारे। पर मुश्किल यह कि मरता है तो बुजदिल और मारता है तो नक्सली। कहां-जाए-क्या करे..। फिलहाल महान राजनीतिक दार्शनिक प्लेटो को याद करते हुए मसला सरकारों पर छोड़ते हैं। ...विकास का सवरेत्तम रास्ता है कि सब कुछ राज्य पर (राष्ट्र के हित-अनहित) पर निर्भर हो। यदि राज्य की सुरक्षा हुई तो बाकी सब सुरक्षित रहेगा और यदि राज्य को नष्ट किया गया तो शेष सभी नष्ट हो जाएगा।... लेखक - स्टार समाचार के कार्यकारी सम्पादक हैं। संपर्क-9425813208

Thursday, November 15, 2012

उल्लू का पट्ठा और हमारी लक्ष्मी बहू

 उल्लू का पट्ठा जवान होता है तो उसे एक लक्ष्मी की जरूरत होती है, जो रूपवती हो, गुणवती हो, शीलवती हो, ऐश्वर्या जैसी सुन्दर हो, सावित्री जैसी पतिव्रता भी हो, मल्लिका शेरावत जितनी सेक्सी हो और सीता जैसी आज्ञाकारी भी हो। उल्लू को इसके साथ एक ऐसी बहू चाहिए, जिसका बाप कुबेर हो और बेटी साक्षात लक्ष्मी हो। उल्लू कहता है कि उल्लू के पट्ठे को आदमी बनाने में कोई कम खर्च नहीं हुआ है, पूरा का पूरा इंफ्रा-स्ट्रक्चर तैयार कर हम आपको सौप रहें हैं, बस उत्पादन भर की देर है। सरकारी विभाग में इंजीनियर लग गया है। देखते जाइए, दोनो हाथों से कमाता चला जाएगा
दीपावली के अवसर पर प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं और कलेंडरों में आज तक एक भी ऐसा चित्र नहीं देखा है जिसमें कोई पुरुष दीपक जला रहा हो। औरत ही दीपक जलाती है। औरत ही दीपक का थाल सजाती है। माडलिंग करने वाली जीन्स और टाप से हमेशा सज्जित औरत कितनी भी आधुनिका हो, इस घड़ी वह पारम्परिक वेश में ही दिखती है। वह कांजीवरम या बनारसी साड़ी में ही होती है। सिर पर आंचल होता है, माथे में बिन्दी होती है, कलाइयों में चूड़ियां और शरीर पर परम्परागत जेवर होते हैं। इस सज-धज में वह साक्षात लक्ष्मी दिखती है। तलवार और शिवाजी, फूल और शाहजहां, घोड़ा और लक्ष्मीबाई, बंडी और जवाहर लाल, नेता और हेराफेरी की तरह दीपक और औरत भी एक दूजे के लिए बने होते हैं।
जिस किसी ने दुनिया के पहले दीपक का अविष्कार किया होगा वह इसमें छिपी सम्भावनाओं को देख कर चमत्कृत हुआ होगा और उसने उस दीपक को अपने पास खड़ी औरत को थमा दिया होगा। शायद यही आदिम सच्चाई है कि सदियों से औरत हाथ में दीपक लिए खड़ी है और उसके चारों ओर घुप्प अंधेरा- ही-अंधेरा है। चित्रों में मैंने औरत को फुलझड़ी भी जलाते देखा है। पुरुष आमतौर पर फुलझड़िया जलाना पसन्द नहीं करता। वे पटाखा और बम फोड़ते हैं। पुरुष जिस आग से खेलते हैं उससे दूसरे जख्मी होते हैं। औरत जिस दीपक को पकड़े होती है, उसकी लौ उसके ही आंचल की ओर लपकती है, फिर भी वह अपने आँचल में इस जलते हुए दीपक को छुपाती-बचाती चलती है ताकि चारों ओर उजास फैल जाए। यही संस्कार उसे मिले हैं। लेकिन यह उजास उसके जीवन में कभी प्रवेश नहीं करती है। औरत को हमारे यहां लक्ष्मी के नाम से भी पुकारा जाता है। लक्ष्मी के आसपास एक उल्लू भी होता है। इसमें मुझे कुछ अटपटा नहीं लगता है। दूसरे देशों की तरह हमारे देश में भी उल्लुओं की सदैव उपस्थिति रही है। पश्चिम में उल्लू बुद्धिमान पक्षी समझ जाता है, लेकिन हमारे यहां उल्लू मूर्ख माना जाता है। शायद पश्चिम में उल्लू अंग्रेजी ज्ञान के कारण अक्लमन्द हो गए और हमारे देश के उल्लू मूर्ख रह गए। इसीलिए आज हमारे यहां भी अंग्रेजी जानने और बोलने के लिए होड़ मची है। परन्तु मुझे नहीं लगता कि हमारे यहां के उल्लू मूर्ख हैं हां वे धूर्त हैं, बस लक्ष्मी भर मिल जाए तो हमारे उल्लू उसे खुशी-खुशी अपने कन्धों पर चढ़ा लेंगे। अशोक-कालीन बौद्धों के भरहुत स्तूप में देवताओं के खजांची कुबेर की पत्‍नी की आदमकद प्रतिमा खुदाई में मिली थी, एक रामवन के संग्रहालय में तो दूसरी भटनवारा ग्राम के काली मंदिर में स्थापित हैं। इन प्रतिमाओं में कुबेर पत्‍नी को पुरुष अपने दोनो हाथों की हथेलिओं पर उठाए चित्रित किया गया है। इससे जाहिर होता है कि हमारे यहां लक्ष्मी सिर या हाथों में उठाने की परम्परा बहुत पुरानी है। हमारे यहां उल्लू पर लक्ष्मी की सवारी होने का मिथक है। भरहुत की इन दोनों प्रतिमाओं से स्पष्ट भी हो जाता है कि उल्लू पर लक्ष्मी सवार होती है।
पता नहीं हमारे देश में यह कैसी मान्यता बन गई है कि उल्लू मूर्ख होते हैं। इसके चलते कई गालियां और मुहावरे भी प्रचलन में हैं। चुटकुलों और लतीफों में पति प्राय: मूर्ख और जोरू के गुलाम के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। इन चुटकुलों को गढ़ने वाले पुरुष ही हैं और वे इतने मूर्ख नहीं हैं कि अपने को ही मूर्ख बताते चलें। यह भी इनकी धूर्तता का एक प्रमाण है कि वे पति होते हैं जिसका अर्थ मालिक होता है किन्तु पत्‍नी मालकिन नहीं होती है। हालांकि पुरुष मौके-बेमौके उसे मालकिन की पदवी से अलंकित करता रहता है, क्योंकि वह जानता है कि कहने भर से कोई मालकिन नहीं हो सकती है। शादी के बाद वह न औरत रह जाती है और न मालकिन बन पाती है। सात फेरों के बाद वह पति की जायजाद बना दी जाती है। वह सीता-सावित्री-द्रोपदी-मंदोदरी-गांधारी तो हो सकती है, किन्तु मालकिन नहीं हो सकती। हमारे देश में औरत को लक्ष्मी कहा गया है। उसके भी हाथ में एक दीपक होता है, उसे वह हर शाम तुलसी-चौरा और घर में विराजे भगवान के आगे संध्या-बाती करके प्रार्थना करती है, मनुहार करती है कि लक्ष्मी के गर्भ से लक्ष्मी पैदा न हो जाए।
लक्ष्मी का आना उसके उल्लू को पसन्द नहीं है। उसके उल्लू को लक्ष्मी नहीं, एक उल्लू का पट्ठा चाहिए। पहले किसी जमाने में नवजात लक्ष्मी को नदी में बहा दिया जाता था ताकि उल्लुओं के सिर और उनकी मूंछे तनी रह जाएं। विज्ञान की अनुकम्पा से आजकल लक्ष्मी की भ्रूण हत्या कर दी जाती है। नदी की बजाए आज उसे नाली में बहा दिया जाता है। उल्लू का पट्ठा जवान होता है तो उसे एक लक्ष्मी की जरूरत होती है, जो रूपवती हो, गुणवती हो, शीलवती हो, ऐश्वर्या जैसी सुन्दर हो, सावित्री जैसी पतिव्रता भी हो, मल्लिका शेरावत जितनी सेक्सी हो और सीता जैसी आज्ञाकारी भी हो। उल्लू को इसके साथ एक ऐसी बहू चाहिए, जिसका बाप कुबेर हो और बेटी साक्षात लक्ष्मी हो। उल्लू कहता है कि उल्लू के पट्ठे को आदमी बनाने में कोई कम खर्च नहीं हुआ है, पूरा का पूरा इंफ्रा-स्ट्रक्चर तैयार कर हम आपको सौप रहें हैं, बस उत्पादन भर की देर है। सरकारी विभाग में इंजीनियर लग गया है। देखते जाइए, दोनो हाथों से कमाता चला जाएगा।
दूसरा उल्लू कहता है, उल्लू के पट्ठे को आदमी बनना है। बिजनेस-उजनेस करने का इरादा है, पूंजी तो चाहिए होगी न? आप भी नहीं चाहेंगे कि आपका दामाद उल्लू का पट्ठा भर रह जाए। लक्ष्मी आ जाती है और उसके हाथ में दीपक थमा दिया जाता है। उल्लू परिवार, तराजू और बही-खाता लेकर बैठ जाता है। वह तराजू पर लक्ष्मी को तौलता है, लड़की वालों ने डंडी तो नहीं मार दी, घटतौली तो नहीं कर दी? खोटा सिक्का तो नहीं थमा गए? बही-खाता मिलाया जाता है। लक्ष्मी के हाथ सिर्फ एक दीपक है। वह अलादीन का चिराग नहीं है। उसमें सिर्फ आग है। अगर लक्ष्मी समझदार हुई तो आग ही उसकी समस्या का समाधान है। उल्लू का पट्ठा भगवान को प्यारा हो जाता है। अर्थी उठ जाने के बाद मिट्टी के बरतन बाहर फेंक दिए जाने हैं। बहू, तूने क्या तय किया है? टूटे बरतन की तरह एक कोने में पड़ी रहेगी, या बाहर फिक जाएगी? तेरे हाथ में दीपक है, सती क्यों नहीं हो जाती? हम मंदिर बनवा देंगे, सती-चौरा बनवा देंगे। सती होना गैर कानूनी घोषित है, इसकी तू फिक्र मत कर, तू तो सती- लोक चली जाएगी और हम लोग चांदी-सोने की नौका से सरकारी बैतरणी मजे से पार हो जाएंगे। तेरी पूजा होती रहेगी और इस उल्लू परिवार की रोजी-रोटी की समस्या भी कई पीढ़ियों के लिए हल हो जाएगी। तू तो हमारी लक्ष्मी है न बहू !
चिन्तामणि मिश्र
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं।

Friday, November 9, 2012

लगता है कि संवेदनाओं का अन्त हो गया है

अब तो दशरथ भोग रहे बनवास कहा जाता है कि बुढ़ापा अपने आप में महारोग है और मौत के आगमन तक इसे भोगने की विवशता होती है, किन्तु अगर यह रोग है तो इसका निवारण भी होना चाहिए। चिकित्सा विज्ञान के पास केवल शारीरिक व्याधि की रोकथाम का इलाज है, लेकिन आज का बुढ़ापा मानसिक तथा भावनात्मक रोगों से पीड़ित है जिसका इलाज किसी भी पैथी में नहीं है। आज वृद्ध जन परालम्बन, एकाकीपन, संवेदनहीनता और अवमानना के शिकार हैं। इसे उनके ही खून ने उनके ही आत्मीयजनों ने दिया है। बुढ़ापा अपने ही लोगों की हृदयहीनता का दंश भोगने के लिए शापित है। भरे-पूरे परिवार में भी रह कर बूढ़े मां-बाप के पास बैठने और दो-घड़ी बातें करने के लिए किसी के पास वक्त नहीं है। बुढ़ापे को यह एकान्त अपने नुकीले पंजों में दबोचे रेशा-रेशा नोंचता रहता है।
इस समय हमारे देश में करोड़ों बुजुर्ग ऐसे हैं, जो अपने परिवारों के रहमों-करम पर किसी तरह अपने जीवन का अवशेष समय काट रहे हैं। अपने ही घर में अपने बेटों, बहुओं से मिले तिरस्कार और अपमान को चुपचाप सहन कर रहे हैं। अभी हाल में ही एक सर्वेक्षण की रपट ने खुलासा किया है कि बहुओं की अपेक्षा बेटों के हाथों वृद्धजनों को ज्यादा प्रताड़ना मिल रही है। पिछले चार दशक से बुजुर्गो को परिवार की मुख्य धारा से बाहर धकेलने का काम तेज हुआ है। बच्चों से मिल रहे अपमान और अकेलेपन के बीच दीवारों तथा छत को घूरते रहने, बोझ समझे जाने, परिवार द्वारा बार-बार फालतू होने की मुनादी करने से बुजुर्ग मानसिक स्तर पर भी बीमार हो रहे हैं। परिवार द्वारा बूढ़ों के साथ अपराधी जैसा व्यवहार किए जाने से वे जिन्दगी और मौत के मध्य त्रिशंकु बना दिए गए हैं।
इन हालातों का जिम्मेवार जनरेशन गैप भी है, किन्तु यही इकलौता कारण नहीं है। यह बड़ी अजब बात है कि अपने ही जनमदाता को बोझ समझ जाए। जिस उम्र में वे अपने बेटों बहुओं तथा पोते-पोतियों के साथ जीवन काल की संध्या को गुजारना चाहते हैं, उन्हें इस खुशी से वंचित किया जा रहा है। उनसे संवाद के हालात ही नहीं हैं। बेटों ने अपने मां-बाप के साथ इक तरफा कुबोल का रिश्ता कायम कर लिया है।
हम दो और हमारे दो के स्वार्थ में बेटे भूल जाते हैं कि घर में एक वटवृक्ष भी हैं जिसकी छांव में उनका बचपन, जवानी में परिवर्तित हो सका है। कितना विचित्र है कि जिसने अपनी जरूरतों से विमुख हो कर अनेकों कष्ट सह कर घर बनाया, उसके लिए उस घर में हम एक कमरा भी नहीं दे रहे हैं। हमारे नौकरों, हमारे कुत्तों हमारे मेहमानों के लिए अलग कमरों की व्यवस्था है किन्तु बूढ़े मां-बाप घर के पिछवाड़े गैलरी में पटक दिए जाते हैं और महीनों उनके कलेजे के टुकड़े पुत्र-रत्न अपने जन्मदाता से मिलने, दो बातें करने को जरूरी कर्तव्य ही नहीं मानते हैं। नौकरों के माध्यम से दो वक्त का खाना, कपड़ा तथा दवाएं उपलब्ध करा देना बुढ़ापे की समस्या का समाधान नहीं हैं। इनकी समस्या है कि उन्हें गूंगा-बहरा बना कर तनहाई का दंड, दिया जाना और संवाद शून्यता का व्यवहार है। कैसी नीच-हीन और स्वार्थी मानसिकता उस देश में पैर जमा चुकी है जहां श्रवण कुमार जैसे पुत्र हुए हैं।
हर उम्र में अकेलापन बहुत कष्ट देता है किन्तु बुढ़ापे में तो तन्हाई किरिच-किरिच तोड़ती है और यह टूटन बहुत भीतर ऐसी धस जाती है कि बुढ़ापा नर्क जैसा लगने लगता है। कोढ़ में खाज वाली हालत उस समय ज्यादा कष्टकारी हो जाती है जब इन बूढ़ों की जोढ़ी में से एक संसार से विदा हो जाता है तब बातें करने और एक दूसरे को संभालने के लिए कोई नहीं होता है। बेटों,बहुओं तथा पोतों के पास मोबाइल पर लम्बी बातें करने, इन्टरनेट पर घन्टों चैटिंग के लिए वक्त होता है। बहुएं समाज सेवा, धार्मिक सत्संग में हाजरी दे रही हैं, बेटे राजनीति पर घन्टों बतिआ रहें हैं, किन्तु घर में लावारिस पड़े बूढ़ों के लिए न समय है और न भावना बची है। जब कभी किसी अन्य सूत्र से बूढ़ों को वक्त देने की बात आती है तो इनकी भृकुटी चढ़ जाती है। आज का दौर उपभोगतावादी तथा स्वार्थ की गोद में बैठा है। हमारे पुराने संस्कार और हमारी विरासत विदा हो गई है। अब तो आज के राम ही अपने पिता को वनवास दे रहे हैं। इस वनवास की कोई अवधि नहीं है। इसका अन्त तभी होता है जब बूढ़े की अंतिम विदाई होती है। यह देख-सुन कर दुख होता है कि अपने बूढ़ों के लिए खाए-अघाए परिवारों में चुटकी भर दया, ममता, अपनापन, दायित्व- बोध नहीं बचा है। ऐसे कई बेटों को मैं जानता हूं कि अपने जनम-दाता के साथ एक ही छत के नीचे रह कर भी महीनों अबोले बने रहते हैं। अभागे बूढ़े घर के किसी कोने में जो उनको एलाट कर दिया गया है, सहमें से टुकुर-टुकुर खिड़की से बेटे को आते-जाते देखते रहते हैं। यह राहत की बात है कि गरीब घरों में अभी बूढ़ों से संवाद का नाता टूटा नहीं है।
मेरे मुहल्ले में इंजीनियर के पिता का निधन हुआ, रात के आठ बजे उनकी पत्‍नी और विधवा मां भूतल में बने बैठका में शोक प्रगट करने वालों से मिलती रही और फिर बहू-बेटे ने उन्हें अपने कमरे में जाने को कह कर नौकरानी के हाथ कमरे में हमेशा की तरह खाना भिजवा दिया। मां का कमरा दूसरी मंजिल की छत पर था, जहां दोनों बूढ़े-बुढ़िया रहते थे। पति से बिछुड़ी बुढ़िया सारी रात अकेली छत के कमरे में रही, यह सिलसिला एक रात का नहीं था, हमेशा का है। किसी में मानवता का थोड़ा भी अंश नहीं था कि कम से कम कुछ दिन तो मां के साथ बेटा रह कर मां को दुख से उबारने में सहयोग करता। मुझे यह बात मेरे नौकर ने बताई वह इंजीनियर के भी घर में काम करता है। जिस महिला का पति आज ही उसे छोड़कर कभी वापस न आने के लिए चला गया हो, उसके अपने बेटे और बहू ने इस तरह बेसहारा और अकेला कैसे छोड़ दिया? जिन बेटों के अच्छे जीवन के लिए मां-बाप अपना खून-पसीना एक कर देते हैं, कितनी ही रातें आंखों में काट देते हैं। जीवन के अंतिम दौर में वही बेटे एक रात भी उनके पास रहने को राजी नहीं होते। लगता है कि संवेदनाओं का अन्त हो गया है। हम जेब से जरूर भारी होते जा रहें हैं, पर मन से बेहद हल्के हो गए हैं।
चिन्तामणि मिश्र
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं।

Thursday, November 8, 2012

इस शिक्षा से कैसी अपेक्षा

आज अमेरिका, ईराक, ईरान को भले आंख दिखाए, क्यूबा की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं कर सकता। इसलिए कि उनकी साक्षरता में देश भक्ति की भावना है। क्या हमारी शिक्षा प्रणाली भी देशभक्ति का एक भी पाठ सिखा रही है। यदि ऐसा हुआ होता तो लाखों लोग विदेश न भागते। प्रतिभा पलायन अपने देश से अधिक किसी अन्य देश में नहीं है क्यों? क्या किसी की दृष्टि इन बिन्दुओं की ओर कभी जाती है।
 अपने देश में आजादी के बाद जितना बड़ा मजाक शिक्षा के साथ हुआ उतना किसी अन्य व्यवस्था के साथ नहीं।
आजादी के पहले शहरी विद्यालयों में भले ही मैकाले के काले अंग्रेज तैयार होते रहे हों, ए.वी.एम. स्कूल रहे हों, परन्तु गांवों में हिन्दी मिडिल स्कूल होते रहे। शिक्षा का अधिकार कानून नहीं था। शिक्षा से लाभ का अर्थ होता था सरकारी नौकरी पाना।
उत्तीर्ण होने का कोई शार्ट कट नहीं था। पाठ याद करने पड़ते थे, परीक्षा अपने दम पर उत्तीर्ण करनी पड़ती थी, नकल चोरी से होती थी सीनाजोरी से नहीं। आजादी के बाद शिक्षा में इतने प्रयोग हुए कि शिक्षा का मूल उद्देश्य ही गायब हो गया। शिक्षा देश का सबसे सुरक्षित व्यवसाय है, इस व्यवसाय में लगे लोगों का हर्र और फिटकरी तो बहुत कम लगता है परन्तु रंग बहुत चोखा आता है।
देश का मानक वही संस्थान बनता है जहां के छात्र देश के सच्चे नागरिक नहीं कुशल प्रशासक बनते हैं। के.टी.शाह बापू के प्रिय थे, शिक्षाविद् थे। बापू ने पूछा- आजाद भारत के लिए कैसी शिक्षा तैयार कर रहे हो। बापू के आगे कौन सुझव दे। के.टी. शाह ने कहा- आप बताइये न, कैसी शिक्षा हो। बापू ने कहा - के.टी.!
अगर मैं किसी कक्षा में जाकर यह पूंछू कि मैंने एक सेब चार आने में खरीदा और उसे एक हजार में बेच दिया तो मुङो क्या मिलेगा? बापू ने कहा- अगर पूरी कक्षा के छात्र यह कहें कि आपको जेल की सजा मिलेगी तो मैं मानूंगा कि आजाद भारत के बच्चों के सोच के मुताबिक यही शिक्षा सवरेत्तम है। बापू का आशय था कि किसी व्यापारी को यह अधिकार नहीं है कि चार आने की वस्तु को बारह आने का लाभ कमाये। यदि ऐसी नैतिक समझ छात्र में नहीं आई तो शिक्षा का क्या मतलब? क्या इस तरह की शिक्षा का कोई संस्थान अपने बापू के देश में हैं? शिक्षा का अधिकार कानून शत्-प्रतिशत उन कॉरपोरेटों के संस्थान में क्यों नहीं है। दस पांच प्रतिशत का लॉलीपॉप हीन भावना के सिवाय छात्रों को क्या देगा। नौकरशाह और अंग्रेज बनाने वाली शिक्षा के चलते पद और पैसे ही व्यक्ति की हैसियत तय करते हैं। शिक्षक बनने की होड़ खत्म हो चुकी है, पटवारी की नियुक्ति स्थाई और शिक्षक की नियुक्ति संविदा / कर्मी/ मित्र के रूप में होती है। शिक्षक राष्ट्र निर्माता हैं, जैसे शब्द बेमानी हो गए हैं। सेंट्रल एडवाजरी बोर्ड आफ एजुकेशन की 59वीं बैठक में मानव संसाधन मंत्री ने साफ कहा कि शिक्षक बिरादरी उतनी शिक्षित नहीं है जितनी कि इसे होना चाहिए। केन्द्र और राज्य दोनों स्तरों पर सरकारें सबसे अच्छी प्रतिभाओं को शिक्षा से जोड़ने में नाकाम रही हैं। पता नहीं यह सुभाषित किसके लिए कहा जा रहा है और इस व्यवस्था को कौन अंजाम देता रहा है यह सिर्फ कपिल सिब्बल साहब जानते हैं। विदेशी शिक्षा संस्थानों से शिक्षा प्राप्त नेता भारत को इंडिया बनाने में लगे हैं।
संसार के सभी शिक्षा शाी प्राथमिक शिक्षा अपनी मातृभाषा में देने की बात करते हैं परन्तु भारत में प्राथमिक कक्षाओं में ही अंग्रेजी पढ़ाने की बात ज्ञान आयोग करता है और सरकारें उसको ‘सिरसा नमामि’ स्वीकार करती हैं। अंग्रेजी शिक्षा संस्थानों में आरटीई के तहत भर्ती छात्रों की पहचान अन्य छात्रों की तरह नहीं ‘आरटीई वाले बच्चों’ के रूप में करके उन्हें दलित, पिछड़े, गरीब और अंत्यज की परिभाषा का व्यावहारिक रुप दिया जाता है। सरकारी स्कूलों में रामानुजम्, कलाम और राधाकृष्णन बनने की कल्पना अब नहीं की जा सकती। पाठय़क्रमों के इतर छात्र को नौतिकता की शिक्षा कौन देगा।
देश भर के प्राथमिक और जूनियर विद्यालय मध्यान्ह भोजन के लिए चल रहे हैं, अध्ययन विद्यालयों में दोयम दज्रे पर है।
स्कूलों को गरीबी-अमीरी में बांच कर विषमता की खाई कौन खोद रहा है। प्रायवेट स्कूलों के परिणाम सरकारी स्कूलों से बेहतर क्यों आ रहे हैं। पढ़ने में सबसे कमजोर, जुगाडू किसी सरकारी या प्रायवेट काम लायक नहीं लेकिन नेता होकर शिक्षा नीति पर व्याख्यान दे रहा है। शिक्षकों पर तंज कसने वाले लोग हर जगह मिलेंगे। कर्ज लेकर पढ़ने पाले प्रतिभाशाली छात्र, विदेशों में प्रतिभा का उपयोग कर रहे हैं। मातृभूमि का कर्ज पटाने का कोई पाठ उन्हें पढ़ाया ही नहीं गया। अपमान सहते हुए भी वे विदेश के गुण गा रहे हैं। मां-बाप और देश की जीवन शैली ही भूल गए।
नि:शुल्क प्राथमिक शिक्षा दिलाने का कानून बने दो वर्ष हो गए परन्तु उसके कार्यान्वयन की स्थिति कुछ ऐसी है कि किसी भी स्कूल में पूरे शिक्षक नहीं हैं। कुछ वर्ष पहले स्कूलों में ओवर स्टाफ की समस्या रहती थी अब ऐसा क्यों हो रहा है, यह आम आदमी का प्रश्न है। शिक्षकों का प्रशिक्षण भी मात्र औपचारिकता बनकर रह गया है। केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित राष्ट्रीय शिक्षक दक्षता जांच में शामिल तिरानवे प्रतिशत शिक्षक फेल हो गए। राज्यों की हालत इससे भी बदतर हैं।
जिन शिक्षकों के सिर पर संविदा की अनिश्चियी तलवार लटकती हो, उनसे राष्ट्र निर्माण की कल्पना कैसे की जा सकती है। शिक्षा का अधिकार कानून को संवैधानिक दर्जा देकर सरकार निश्चिंत है कि इस जादुई छड़ी से साक्षरता शत्-प्रतशित हो जाएगी। मध्यान्ह भोजन के कारण गांवों की सरकारी स्कूलों में संख्या वृद्धि अवश्य हुई है परंतु शहरों में दूसरे के घरों में बर्तन साफ करने वाली का लड़का सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ता। वह अपने लड़के को किसी अंग्रेजी प्रायवेट स्कूल में महंगी फीस देकर पढ़ाती है।
लैटिन अमेरिका का एक छोटा सा देश क्यूबा, जिसने संयुक्त राज्य अमेरिका की तमाम धमकियों के बावजूद अपना अस्तित्व पूरी शिद्दत से बना रखा है, शत्-प्रतशित साक्षर है। राष्ट्रपति फिदेल काो ने अनौपचारिक शिक्षा का अप्रतिम प्रयोग करते हुए, बच्चों में देशभक्ति की भावना कैसे उत्पन्न की। उन्होंने देश के बच्चों से पूछा- क्या आपको अच्छा लगेगा कि कोई आपके देश को अनपढ़ कहे। यदि आप अपने देश को पढ़ा लिखा देशभक्त देखना चाहते हों तो आप सबको शिक्षक बनना पड़ेगा।
कक्षा आठ पास सभी बच्चे स्कूल के बाद लालटेन, किताब-पट्टी लेकर पहाड़ी गांवों-नगरों में निकल पड़े बच्चों, प्रौढ़ों को पढ़ाते ये बच्चे अपने नियमित स्कूल भी जाते। तीन वर्ष में तेरह से पंद्रह साल के बच्चों में क्यूबा को शिक्षित कर दिया। आज अमेरिका, ईराक, ईरान को भले आंख दिखाए, क्यूबा की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं कर सकता। इसलिए कि उनकी साक्षरता में देश भक्ति की भावना है। क्या हमारी शिक्षा प्रणाली भी देशभक्ति का एक भी पाठ सिखा रही है। यदि ऐसा हुआ होता तो लाखों लोग विदेश न भागते। प्रतिभा पलायन अपने देश से अधिक किसी अन्य देश में नहीं है क्यों? क्या किसी की दृष्टि इन बिन्दुओं की ओर कभी जाती है।
- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।
सम्पर्क सूत्र - 09407041430.

Sunday, November 4, 2012

खादी, मखमल और टाट के पैबन्द


 सत्तर के दशक में हम लोग एक कविता की दो पंक्तियों को दीवारों पर नारे की तरह लिखा करते थे ..खादी ने मखमल से ऐसी सांठ-गांठ कर डाली है, टाटा, बिड़ला, डामिलया की बरहों मास दिवाली है। उन दिनों किसी भी नेता के खिलाफ सबसे बड़ा लांछन यही माना जाता था कि वह पूंजीपरस्त है और उद्योगपतियों से उसकी सांठगांठ है। सन् 75 में देश पर इमरजेंसी थोपने वाली इंदिराजी पर भी खुलेआम कोई आरोप नहीं लग पाया कि वे पूंजीपतियों की हितचिन्तक है। इंदिराजी ने तो निजी क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों व बैंकों के राष्ट्रीयकरण करने का दुस्साहसिक फैसला लिया था। पर उसी कांग्रेस की वंश परम्परा के मंत्री सलमान खुर्शीद को यह कहने में कोई शर्म नहीं आती कि यदि उद्योगपतियों को इसी तरह जेल भेजा जाता रहा तो देश में पूंजी निवेश कौन करेगा।
यदि केजरीवाल का टेप के जरिये (अटलजी के मानस दामाद रंजन भट्टाचार्य और कारपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया के बीच बातचीत) किया गया खुलासा सही है, जिसमें मुकेश अंबानी के हवाले से यह कहते हुए सुना गया कि कांग्रेस तो उनकी दुकान है, तो यह खादी और मखमल के बीच सांठ-गांठ की कवि की भविष्योक्ति का प्रमाणीकरण है। पिछले साल नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जगदीश भगवती संसद में हीरेन मुखर्जी मेमोरियल व्याख्यान देने आए थे। भ्रष्टाचार के मामले में चर्चा करते हुए कहा कई ऐसे देश होंगे जहां टूजी स्पेक्ट्रम स्तर के भ्रष्टाचार होते होंगे। अमेरिका में यदि कोई पकड़ लिया जाए तो उसे भगवान भी नहीं बचा सकता, करोड़ों हिन्दू देवी-देवता भी नहीं।
ऐसा नहीं कि उद्योगपतियों के नेताओं व राजनीति से सम्बन्ध नहीं रहें हों, ऐसे संबंध रहे हैं कि आज भी उनकी दुहाई दी जाती है। मुगल सल्तनत के खिलाफ लड़ते हुए राणा प्रताप ने जब आर्थिक मदद का आह्वान किया तो भामाशाह ने अपनी समूची मिल्कियत उनके कदमों पर रख दी। सुभाषचन्द्र बोस ने जब आजाद हिन्द फौज का गठन किया तो उन्हें आर्थिक मदद देने में तत्कालीन पूंजीपति पीछे नहीं रहे। महात्मा गांधी ताउम्र बिड़ला घराने के अतिथि रहे। डॉक्टर राममनोहर लोहिया हैदराबाद के सेठ ब्रदीविशाल पित्ती और पटना के सेठ रामसहाय के मेहमान रहे और ये समाजवादी आंदोलन की आर्थिक जरूरतों को पूरी करते रहे। सम्पूर्ण क्रांति का बिगुल फूंकने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण और उनके सहयोगी नानाजी देशमुख के पीछे की आर्थिक पृष्ठिभूमि में गोयनका घराना व टाटा का ट्रस्ट रहा है। कमल मोरारका चन्द्रशेखरजी के करीबी रहे हैं। इन नेताओं ने कभी अपने संबंध छुपाए नहीं, अपितु उद्योगपतियों को समाजसेवा व राष्ट्रप्रेम के साथ जोड़ा।
दरअसल खादी और मखमल के बीच घालमेल का खेल नब्बे के दशक से आर्थिक उदारीकरण के साथ शुरू हुआ। पूंजी बाजार के खेल में जहां नेताओं की उद्योग धंधों के प्रति रुचि पैदा हुयी, वहीं उद्योगपतियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं जागी। क्षेत्रीय दल उभरे और कारपोरेट घरानों में बदलते गए। इस नई बयार में विजय माल्या जैसे लिकरकिंग धन बल के दम पर राज्यसभा में चले गए, तो भाजपा और कांग्रेस ने अपने-अपने कोटे से उद्योगपतियों को राज्यसभा में भेजने का काम शुरू किया। काशीराम और मायावती ने तो राजनीति को बाकायदा कारोबार में बदल दिया। बसपा एक राजनीतिक संगठन के रूप में आज किसी कारपोरेट हाउस से कम नहीं, जिसकी सुप्रीमो मायावती वैसे ही सीईओ हैं, जैसे कि शिवसेना के बाल ठाकरे व अब उनके वंशज उद्धव व राज ठाकरे। मुलायम सिंह और करुणानिधि क्यों पीछे रहते। करुणानिधि घराने ने उद्योगपतियों से सांठ-गांठ तो किया ही खुद का विशाल कारोबार खड़ा कर लिया। इस सदी के सत्ता के सबसे बड़े दलाल अमर सिंह ने राजनीतिक दलों को यह सिखाया कि औद्योगिक घरानों का कैसे राजनीतिक इस्तेमाल किया जा सकता है और राजनीति अपने आप में कैसे एक स्वतंत्र उद्योग हो सकती है। शरद पवार और नितिन गड़करी भी इसी लाइन के ध्रुवतारा हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सुप्रीमो पवार व उनके परिवार का भी ऐसा ही सुव्यवस्थित कारोबार है जैसा कि नितिन गड़करी का जिनकी फर्जी कम्पनियों के खुलासे ने मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के भीतर की सड़ांध तक झंकने का मौका दिया है। भाजपा को कारपोरेट संस्कृति से जोड़ने का श्रेय स्वर्गीय प्रमोद महाजन को जाता है जिन्होंने उद्योगपतियों व भाजपा के बीच सेतु का काम किया। राबर्ट बाड्रा और डीएलएफ के गठजोड़ के खुलासे ने कांग्रेस के चरित्र के ढंके परदे को खोला है।
एसोसियेटेड जर्नल्स को कांग्रेस द्वारा दिए गए लोन ने देश के सबसे बड़े राजनीतिक घराने के कारोबारी चरित्र को रेखांकित किया है।
दरअसल कांग्रेस-भाजपा समेत किसी भी दल में अब आन्तरिक लोकतंत्र बचा नहीं है इसलिए धीरे-धीरे सभी राजनीतिक दलों का कायान्तरण औद्योगिक घरानों की तर्ज पर हो गया है। पार्टी की प्रदेश व जिले की शाखाएं आउटलेटस और शोरूम में तब्दील हो गईं।
राजनीतिक दलों के इस चलन ने भ्रष्टाचार व कालाबाजारी के जरिए कुबेर बने अपराधियों व असमाजिक तत्वों को तहेदिल से प्रोत्साहित किया है। कर्नाटक में भाजपा सरकार के मंत्री रहे रेड्डी बन्धु और हरियाणा के गृह राज्यमंत्री रहे गोपाल काण्डा कोई विरले चरित्र नहीं हैं, विधायक, सांसद बनने के लिए अब किसी वैचारिक पृष्ठभूमि व राजनीतिक संस्कार की जरूरत नहीं रह गई। हर प्रदेश में हर राजनीतिक दल में रेड्डियों व काण्डाओं की भरी पूरी जमात है।
इसी नई व्यवस्था का परिणाम है कि आज नेताओं व उद्योगपतियों के पास 10 लाख करोड़ रुपयों की घोषित संपत्ति है। यानि के भारत के कुल संपत्ति का 95 प्रतिशत जो 5 प्रतिशत ऐसे लोगों के पास है। टाइम मैग्जीन के मुताबिक सत्ता के दुरुपयोग के मामले में शीर्ष दस मामलों में भारत दूसरे नम्बर पर है। दुनिया में अमीरों की संख्या के मामले में भी भारत अमेरिका के बाद दूसरे नम्बर पर है। वहीं दूसरी ओर अर्थशास्त्री अरुण सेन गुप्ता की अध्यक्षता वाले आयोग का अध्ययन बताता है कि 77 प्रतिशत भारतवासी 20 रुपये प्रतिदिन में गुजारा करते हैं।
शायद स्वतंत्र भारत के भविष्य का आंकलन करते हुए ही 10 फरवरी 1936 के यंग इंडिया के अंक में महात्मा गांधी ने स्वराज के संदर्भ में लिखा था..सच्चा स्वराज मुट्ठीभर लोगों द्वारा सत्ता प्राप्ति से नहीं आएगा, बल्कि सत्ता का दुरुपयोग किए जाने की सूरत में उसका प्रतिरोध करने की जनता की सामथ्र्य विकसित होने से आएगा।.. क्या आप नहीं मानते कि व्यापक जन प्रतिरोध का अब वह वक्त दस्तक दे रहा है? लेखक - स्टार समाचार के कार्यकारी सम्पादक हैं। संपर्क-9425813208

Saturday, November 3, 2012

क्यों गरीब है भारत? एजेंडा नए भारत के लिए


भारत के लोग स्मार्ट और सृजनात्मक होते हैं. उन्होंने यह साबित किया है कि वे परिश्रमी और मितव्ययी होते हैं. भारत की धरती को कई तरह की नेमतें मिली हुई हैं, जिनमें एक अच्छी जलवायु और ढेर सारे प्राकृतिक संसाधन शामिल हैं. इस देश का लोकतंत्र शानदार है जिसकी जड़ें बेहद मजबूत हैं और यहां का शासन कानून-सम्मत है. लेकिन अब सवाल यह है कि आज़ादी के 53 साल बाद भी भारत एक बेहद गरीब देश क्यों है?

वे क्या कारण हैं जो भारत को गरीब और अमेरिका को एक अमीर देश बनाते हैं- ऐसे में जबकि एक समान राजनैतिक ढांचा है, काम के मोर्चे पर समान उदार विचारधाराएं और मान्यताएं हैं. इतना ही नहीं, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों देशों में मेधावी और परिश्रमी मानव संसाधन के समृद्ध स्रोत हैं. ऐसा क्यों है कि भारत का प्रति व्यक्ति जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) 500 अमेरिकी डॉलर है जबकि अमेरिका का करीब 40,000 डॉलर? क्यों एक अमेरिकी नागरिक 80 गुना अधिक उत्पादक है? एक शिक्षित भारतीय अमेरिका में बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्धात्मक होता है, यह बात इस तथ्य से प्रमाणित होती है कि एक भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक का औसत जीडीपी 60,000 डॉलर है. दरअसल, ऐसा अमेरिका में क्या है कि ज्यादातर मामलों में वह भारतीयों को अपनी घरेलू जमीन से बेहतर प्रदर्शन करवाता है, वह भी इतना अच्छा काम कि कई मामलों में भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक अपने साथी मूल अमेरिकियों से भी ज्यादा अच्छा काम करते हैं.
मैंने सुना है कि भारत अपनी औपनिवेशिक वजहों के कारण गरीब है. लेकिन हकीकत यह है कि अपनी आजादी के 53 वर्ष के बाद भारतीय अमेरिकियों की तुलना में खराब स्थिति में हैं. ज्यादा पुरानी बात नहीं है जब भारत की हालत भी एशियन टाइगर्स या चीन के समान ही थी. पिछले 40 वर्षों में इन सभी देशों ने भारत को पीछे छोड़ दिया है.
अपने तर्क को स्थापित करने की खातिर हम फिलहाल अपनी बात को अमेरिका और भारत पर ही फोकस करेंगे. मेरा मानना यह है कि भारत जान-बूझकर गरीब है और वह गरीब बने रहने के लिए कड़ी मेहनत करता है जबकि इसके विपरीत अमेरिका अमीर इसलिए है क्योंकि वह न केवल अपनी संपत्ति को बनाए रखने के लिए बल्कि हर रोज खुद को ज्यादा धनवान बनाने के लिए कठोर परिश्रम करता है. भारत गरीब इसलिए है क्योंकि उसने खुद को आत्मघाती रूप से गरीबी पर पूरी तरह केंद्रित कर रखा है. देश के अथाह संसाधनों का इस्तेमाल गरीबों को आर्थिक सहायता और रोजगार मुहैया करवाने में किया जाता है. दरअसल भारत में नौकरियों को अति पवित्र माना जाता है और यह देश अनुत्पादक नौकरियों को बचाने के लिए काफी हद तक कुछ भी करने के लिए तैयार रहता है. इसके विपरीत अमेरिका में जहां उत्पादकता को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है और उत्पादक लोग सबसे ज्यादा कमाई करते हैं. संक्षेप में कहा जाए तो उत्पादकता से मिलने वाले फायदों के लिये  किए जाने वाले अथक प्रयास अमेरिकी समृद्धि की हकीकत है जबकि नौकरियों को सुरक्षित बनाए रखना भारतीय गरीबी की असलियत है. इस बात को यदि और सरल शब्दों में कहा जाए तो अमेरिका उस राजनीति का अनुसरण करता है जिससे संपत्ति का सृजन होता है जबकि भारत उस राजनीति के पीछे बढ़ता है जिसमें संपत्ति का पुनर्वितरण होता है. राष्ट्रीय संपदा के अभाव में भारत गरीबी का पुनर्वितरण करता है और गरीब ही बना रहता है जबकि अमेरिका ज्यादा अमीरी से और भी ज्यादा अमीरी की ओर बढ़ता है.
नौकरियां बनाम उत्पादकता
भारत में जॉब एक ऐसी चीज है जिस पर जरूरत से ज्यादा ध्यान दिया जाता है. मैंने वरिष्ठ मंत्रियों और नौकरशाहों (ब्यूरोक्रेट्स) से सुना है कि सरकार के लिए सबसे बड़ा काम है रोजगार उपलब्ध करवाना. भारत में कल-पुरजों को जोड़ कर असेंबल्ड गुड्स बनाने संबंधी असेंबली जॉब्स उपलब्ध करवाने की कवायद के लिए बड़े-बड़े पदों पर लोगों की नियुक्तियां की जाती हैं. अस्सी के दशक के शुरू में "स्क्रूड्राइवर असेंबली प्लांट" चलन में थे जब एक मैन्यूफेक्चरर महज एक ही पूंजीगत उपकरण (केपिटल इक्विपमेंट) की सप्लाई करता था, वह था पेंचकस यानी स्क्रूड्राइवर.
अत्यधिक संरक्षणवादी श्रम कानूनों ने अन्य सभी लोगों और पक्षों की कीमत पर संगठित श्रमिक क्षेत्र को अधिकतम संरक्षण दे रखा है. ऐसे कानूनों की वजह से कारोबार करने के लिए नौकरी देने वाले बहुत ज्यादा हतोत्साहित होते हैं. आगे बताई जाने वाली कहानियां मुझे अपनी यह बात साबित करने में मदद करेंगी कि क्यों अनुत्पादक रोजगार गरीबी की दिशा में ले जाते हैं.
मैं सबसे पहले 80 के दशक के मध्य की उस स्टोरी की चर्चा करूंगा जो मेरा अपना अनुभव है. कंप्यूटर नेटवर्किंग बोर्ड्स के सप्लायर्स के रूप में हमें एक भारतीय कंप्यूटर उत्पादक की ओर से 200 अनअसेम्बल्ड कंप्यूटर बोर्ड्स या जिसे भारत में "खुले हुए पुर्जों के किट्स" (“knocked down kits”) कहा जाता है, के लिए एक “निवेदन“ (“request for quote”) मिला. हमने अपने अनअसेम्बल्ड बोर्ड्स नहीं भेजे और 20 फीसदी स्पेशल हैंडलिंग चार्जेस की मांग की जिसे देने के लिए वे तैयार थे. भारत सरकार ने पूरी तरह असेम्बल्ड बोर्ड्स पर लगे 300 फीसदी आयात शुल्क की तुलना में पुर्जों पर 70 फीसदी आयात शुल्क लगा रखा था. ताकि स्थानीय स्तर पर लोगों के लिए रोजगार के अवसर मिल सकें. 20 फीसदी ज्यादा देकर कम हासिल करना, कैसा सौदा है यह? यानी बगैर असेम्बल किए, बगैर जांचे-परखे बोर्ड आर्थिक रूप से कैसे लाभप्रद हो सकते हैं? ऐसे जॉब्स को किस आधार पर उत्पादक माना जाए?
पिछले दिनों अपने भारत प्रवास के दौरान दिल्ली की कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने मुझे चर्चा के दौरान बताया कि भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर है. उन्होंने बताया कि आजादी के बाद हुई अपनी आर्थिक प्रगति पर भारत को गर्व है. मेरा यह मानना है, भारत की आबादी का 70 फीसदी हिस्सा कृषि आधारित आजीविका से जुड़ा है, इससे खेती करने वाला एक भारतीय अपने लिए पर्याप्त खाद्यान्न का उत्पादन करता है और जिस अतिरिक्त अनाज का वह उत्पादन करता है उससे महज एक व्यक्ति की आधी भूख मिटाई जा सकती है. खेती करने वाले भारतीय की खर्च करने योग्य औसत आय अगर देखी जाए यह औसतन आधे भारतीय के खाने के बजट जितनी है. यानी उसकी खर्च करने योग्य आमदनी इतनी भी नहीं है कि एक व्यक्ति भरपेट भोजन कर सके. इसलिए वह हमेशा गरीब ही रहेगा. अगर इसकी अमेरिका से तुलना की जाए तो दो फीसदी से भी कम अमेरिकी आबादी खेती या इससे जुडे काम करती है. एक अमेरिकी किसान खुद को मिलाकर 50 लोगों के लिए अन्न का उत्पादन करता है और इतना खाद्यान्न बच जाता है कि उसका निर्यात होता है. यानी तुलनात्मक रूप से अमेरिकी किसान बहुत ज्यादा उत्पादक और अत्यधिक धनी है. प्रसंगवश, यदि कोई व्यक्ति पिछले 53 वर्षों में भारत के रेकॉर्ड के बारे में गर्व का यदि कोई दावा करता है तो वह अपने बारे में ही अनजान और आत्मप्रशंसा करने वाला है.
  • एक आम भारतीय की तुलना में एक अमेरिकी नागरिक 80 गुना अधिक उत्पादक है
  • एक मुक्त बाजार बाजार का लोकतंत्र है, जहां उपभोक्ता पैसे के तौर पर रोज वोट देता है
  • चीन सहित एशियन टाइगर्स ने पिछले 40 वर्ष में भारत को काफी पीछे छोड़ दिया है
  • भारत में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां अनुत्पादक रोजगार गरीबी की दिशा में ले जाते हैं
  • आवश्यकता इस बात की है कि यह उद्यमिता को प्रवर्तित करने वाला एजेंडा हो
  • ऐसे कई उद्योग हैं जिनमें भारत पूरी दुनिया को पछाड़ सकता है
मेरे पास इतने किस्से हैं कि वे खत्म ही नहीं होंगे. उदाहरण के लिए, एक आंकड़े की तुलना कीजिए- प्रति हवाई जहाज एयर इंडिया 800 से ज्यादा कर्मचारियों की नियुक्ति करती है जबकि युनाइटेड एयरलाइंस में प्रति हवाई जहाज करीब 40 लोगों को काम पर रखा जाता है. अमेरिकी कर्मचारी करीब 20 गुना ज्यादा उत्पादक हैं! अनुत्पादक रोजगार निश्चित रूप से गरीबी के गर्त में ले जाते हैं. फिर सवाल यह उठता है कि उन लोगों की उस भीड़ का क्या किया जाए जिसे रोजगार की जरूरत है? बहुत से लोगों का यह मानना है कि हमारी समस्याओं की जड़ में हमारी बहुत बड़ी आबादी या यूं कहें जरूरत से ज्यादा आबादी है. यह वही लोग हैं जो यह भी मानते होंगे कि इस समस्या का कोई समाधान नहीं है क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है. मैं इन मुद्दों को जायज मानूंगा यदि हम अपनी इन समस्याओं के समाधान के लिए वह सब कुछ कर रहे हैं जो कि किया जा सकता है और किया जाना चाहिए. हमारा नेतृत्व बेहद कमजोर है, जिसने गरीबों की मदद के नाम पर लंबे समय तक खराब साबित हो चुकी नीतियों को लंबे समय तक अपनाया. हमारा समाजवादी और राष्ट्र की महत्ता पर केंद्रित राष्ट्रीय एजेंडा विनाशकारी साबित हुआ है. आवश्यकता इस बात की है कि यह उद्यमिता को प्रवर्तित करने वाला एजेंडा हो जहां राष्ट्र की भूमिका उद्योग और वाणिज्य में कम से कम हो. फिर हम शायद आबादी को एक बहाने के रूप में इस्तेमाल न करें. इस समस्या का समाधान अपने आप हो जाएगा जब हमारा देश समृद्ध हो जाएगा, जैसा कि अन्य जगहों पर भी हुआ है. इसी बीच हमें अपनी जनता की उत्पादक और प्रतिस्पस्पर्धात्मक ऊर्जा को प्रवर्तित करने की जरूरत है. और महत्वपूर्ण बात यह है हमें यह काम इसी क्षण शुरू करना है.
एक नए राष्ट्रीय एजेंडा की मांग
संक्षेप में मैं यह कहना चाहूंगा कि भारत अपनी गलत आर्थिक नीतियों और दृष्टिकोण के कारण गरीब है. हम अपनी संपदा को अनुत्पादक कामों में जाया कर रहे हैं. हमने अपने यहां उद्यमियों का दमन किया है और नौकरशाहों की ताकत में इजाफा किया है. सरकार ने जिस उद्योग को छूआ उसने उसे अनुत्पादक बना दिया. हमने अपने लोगों को मछली खाना तो सिखा दिया लेकिन यह नहीं सिखाया कि खाने के लिए उसे पकड़ते कैसे हैं. क्या हमने इसी पैसे का इस्तेमाल लोगों को शिक्षा देने में किया, अगर हम प्रभावी ढंग से ऐसा करते तो आज हम एक समर्थ और सक्षम लोगों का समूह होते. मेरा यह मानना है कि भारत के पास वह सब कुछ है जो उसे एक महाशक्ति बनने के लिए जरूरी है, लेकिन इसके लिए बहत बड़े पैमाने पर राजनैतिक इच्छाशक्ति के साथ ही प्रभावी नेतृत्व की दरकार होगी ताकि हमारे देश को आगे बढ़ाया जा सके.
भारत के ज्यादा समृद्ध बनने का एक ही तरीका है कि वह अपनी श्रम शक्ति और भौतिक पूंजी की उत्पादकता पर अपना ध्यान केंद्रित करे. हमें अपने संसाधनों का भरपूर दोहन करते हुए अधिकतम उत्पादन करना होगा. यह एक गलत धारणा है कि उत्पादकता बढ़ाने से बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ेगी और यह बात दुनिया में कहीं भी साबित नहीं हुई है. जब हम आर्थिक विकास दर में 6 फीसदी बढ़ोतरी की बात करते हैं, और हमारी आबादी 2 फीसदी की दर से बढ़ रही है, तब हम हमारी मानव पूंजी की उत्पादकता में 4 फीसदी इज़ाफे की बात कर रहे हैं. कौशल या दक्षता (जैसे- शिक्षा) और प्रति व्यक्ति पूंजी निवेश को बढ़ा कर हम मानव उत्पादकता में काफी हद तक बढ़ोतरी कर सकते है. पूंजी की उत्पादकता तब बढ़ती है जब आप इस पूंजी का सर्वाधिक उत्पादक इस्तेमाल करते हैं.
प्रतिस्पर्द्धा बढ़ाएं
उत्पादकता को तेजी से बढ़ाने वाला सबसे प्रमुख कारक है प्रतिस्पर्धा- मुक्त और निर्बाध. इससे लोगों पर अपनी दक्षता बढाने का दबाव रहता है ताकि वे प्रतिस्पर्धा में बने रहें. इससे पूंजी पर भी दबाव रहता है कि वह सही दिशा में लगती रहे ताकि इसके निवेश से अधिकतम रिटर्न्स हासिल हो सकें बजाए इसके कि राजनीतिज्ञ और नौकरशाह इसका इसका अपनी मर्जी से प्रबंध करते रहें. यदि आप किसी आदमी को एक ट्रैक पर दौड़ते हुए सबसे अच्छा प्रदर्शन करने के लिए कहें तो बड़े आराम से 15 मिनट में एक मील तक दौड़ेगा. लेकिन यदि आप इस पर एक और व्यक्ति को साथ में दौड़ने के लिए कहते हैं और यह चुनौती देते हैं कि दोनों में से कौन ज्यादा तेज दौड़ता है तो जो व्यक्ति हारेगा उसका प्रदर्शन भी उस दौड़ से बेहतर होगा जिसमें उसे अकेले दौड़ने के लिए कहा जाता. यानी प्रतिस्पर्धा में हारने वाले का भी प्रदर्शन बेहतर हो जाता है. बाजार में प्रतिस्पर्धा के अच्छे परिणाम मिलते हैं क्योंकि सप्लायर व्यापार में अपना स्थान बनाए रखने के लिए कम कीमत पर अच्छा सामान या सेवाएं देने के लिए बाध्य रहते हैं. यदि बाजार में मांग की गारंटी रहती है तो उत्पादों और सेवाओं की गुणवत्ता कमजोर होना तय है. भारत में लाइसेंस राज के दौरान हमारा अनुभव ठीक वैसा ही था जिसकी किसी अर्थशास्त्री ने कभी भविष्यवाणी की होती. लाइसेंस राज के सफल उद्यमी कौन थे- निश्चित ही न तो राष्ट्र और न ही जनता. भारत को चाहिए कि अर्थव्यवस्था को नियमों-कानूनों से बांध कर रखने की बजाए वह बाजार शक्तियों को बने रहने दे.
सीधे शब्दों में कहा जाए तो दुनिया में श्रेष्ठ होने के लिए हम दुनिया के श्रेष्ठ से प्रतिस्पर्धा करें. संयोगवश, हमें इस मसले पर किसी से घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि हमने यह दिखा दिया है कि दुनिया के बाजार में भारतीय बेहद प्रतिस्पर्धी हैं और हमें किसी के संरक्षण की जरूरत नहीं.
मैं इस बात का जिक्र भी करना चाहूंगा कि नौकरी की गारंटी का मतलब बाजार की गारंटी नहीं होता। अगर निजी तौर पर देखा जाए तो रोजगार की गारंटी व्यक्ति से अपने कौशल में बेहतरी के साथ समाज में उसकी तरक्की का माद्दा ही छीन लेती है। साथ ही उस व्यक्ति को नौकरी बचाने के लिए न तो कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और न ही उस पर किसी लक्ष्य को हासिल करने का कोई दबाव ही होता है। अनुत्पादक और आलसी कर्मचारियों से छुटकारा पाने के तौर-तरीकों में ज्यादा गुंजाईश का न होना ही कई कंपनियों की राह की एक बड़ी बाधा होती है। बचीखुची कसर नौकरी की गारंटी पूरी कर देती है। ऐसा होने के बाद लोग अनुत्पादक कामकाज में जुट जाते हैं और उनका उत्साह और आत्मसम्मान भी खत्म होता जाता है।
कृषि प्रधान समाज से दूरी
केवल अस्तित्व कायम रखने के प्रयास करने वाली अर्थव्यवस्था, जहां ज्यादातर लोग खाद्य उत्पादन और अन्य आजीविका से जुड़े काम में जुटे हों, मूलतः गरीबी की चपेट में होती हैं। इस हाल में पहुंचने के लिए उत्पादन क्षमता की ज्यादा जरूरत नहीं होती। आज गरज तो इस बात की है कि तमाम खाद्य सामग्री और जीवनोपयोगी सामान को कम से कम मानव श्रम के जरिये हासिल किया जाए। इससे हमारा मानव संसाधन दूसरे ऐसे नये कामों के लिए उपलब्ध हो जाएगा, जो पहले संभव नहीं थे। ये नये काम क्या हैं? यहां संभावनाएं अंतहीन हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, सेनिटेशन, मनोरंजन, ट्रेवल, इंश्योरेंस, बैंकिंग और खेल जैसी सेवाएं शामिल है। समाज जब अधिक उत्पादक बन जाता है तो वह सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) पर ज्यादा ध्यान देने लगता है, जो अंततः उसके जीवन स्तर को सुधारने में अहम भूमिका निभाता है। एक आम आदमी का दिन तीन बार खाकर गुजर सकता है, लेकिन जहां तक सुविधाओं की बात है तो वह एक दिन में अनगिनत इस्तेमाल कर सकता है।
खरी-खरी कहूं तो सौ फीसदी मानव संसाधन को कृषि में ही झोंक देना हास्यास्पद है। अगर हम तरक्की करना चाहते हैं तो ऐसा केवल इन लोगों को खेतों से निकालकर उत्पादन क्षेत्र में लगाने से ही हो सकेगा। उन्हें किसानी की बजाय ज्यादा आर्थिक संबल देने वाले कामों में जुटना चाहिए। हाशिये पर खड़े इन लोगों को अगर सरकार से कुछ चाहिए तो वह है केवल शिक्षा। शिक्षा हासिल करने के बाद यही अकुशल श्रमशक्ति हमारे देश का कायापलट कर सकती है। ठीक अमेरिका की तरह, केवल खेती किसानी में भागीदारी कम होने के बाद लोग ऐसे दूसरे कामकाज से जुड़ेंगे जिससे उनका जीवन स्तर ऊपर उठ सकेगा। आज अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत है तो मजबूत सर्विस सेक्टर के कारण। अमेरिका में सबसे बड़ा उद्योग है स्वास्थ्य सेवाएं, इसके बाद शिक्षा, फिर मनोरंजन। भारत को अमेरिकी अर्थव्यवस्था के मॉडल को अपनाकर उससे सीखना चाहिए।
नौकरियां बनाना, बचाना नहीं
नये उत्पादक रोजगार तैयार करना ही भारत की राष्ट्रीय नीति होनी चाहिए। सारी ताकत केवल नौकरियों को बचाने की नीति में ही झोंक देना घाटे का सौदा साबित हुआ है। रोजगार निर्माण का ढोल 53 साल पीटने के बाद भी भारत उद्योगों में आज तक केवल एक करोड़ नौकरियां दे सका है, जो उसकी एक अरब की आबादी को देखते हुए कुछ भी नहीं है। इतने ही वक्त में चीन ने उद्योग क्षेत्र में 20 करोड़ लोगों के लिए रोजगार तैयार किया है। हमारे विकास के साथ ही हमारे यहां अनुत्पादक या कम उत्पादन वाले रोजगार कम होते जाएंगे और उत्पादकता रोजगार का मुख्य आधार बन जाएगी। यही वह बात है जिससे किसी देश की उत्पादकता का सर्वांगीण विकास होता है। अपने काम और कौशल में निवेश करने वाले लोगों को फायदा होगा और वह आर्थिक तरक्की भी करेंगे। जो काम को लेकर निरूत्साही होंगे वो पीछे छूट जाएंगे। विकल्प सबके लिए खुला होगा!
विदेशी निवेश और कारोबार को प्रोत्साहित करें
विदेशी निवेश में सुधार के लिए केवल दो ही मापदंड होने चाहिए। या इससे भारत में रोजगार का निर्माण होगा? या इस निवेश से भारतीय उपभोक्ता के लिए उत्पादों की गुणवत्ता और सेवाओं में सुधार होगा? अगर हम इन मापदंडों का खयाल रखेंगे तो हम जल्द ही जान जाएंगे कि खराब निवेश जैसी कोई बात होती ही नहीं है। भारत में तमाम निवेश समृद्धि और रोजगार ही लाएंगे। स्वदेशी के ही विकास का इकलौता रास्ता होने की धारणा गलत है। आर्थिक खुलेपन और दरवाजे खुले रखने की नीति के प्रति सौ फीसदी समर्पण ही भारत के विकास को गति दे सकता है।
मुक्त अंतरराष्ट्रीय कारोबार में कोई पराजित नहीं होता। देश अपनी तुलनात्मक बेहतरी का फायदा उठाते हुए ज्यादा कार्यक्षम बन जाते हैं। भारत की आयात के विकल्प खोजने और उचित प्रौद्योगिकी (मतलब पुरानी प्रौद्योगिकी) की पूर्व की कोशिश हास्यास्पद थी। इसने हमसे हमारे बेहद प्रतिभाशाली इंजीनियर छीन लिए और उन्हें फिर आदिम युग में पहुंचा दिया जहां से उन्हें पुरानी और उधार की प्रौद्योगिकी के साथ सब नये सिरे से करना पड़ा। जैसा कि हमारे यहां आईटी और हीरा पॉलिशिंग उद्योग में देखा जा सकता है, हम अच्छी तनख्वाह पर कई लोगों को रोजगार दे सकते हैं, ताकि पूरी दुनिया की मांग को पूरा कर सकें। इन उद्योगों में हम बेहतर स्थिति में हैं। मुझे लगता है कि ऐसे कई उद्योग हैं जिनमें भारत पूरी दुनिया को पछाड़ सकता है।
जहां तक भारतीय नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों की बात है तो वह मल्टीनेशन कार्पोरेशन (एमएनसी) को हेयभाव से देखते हैं। उन्होंने विश्व बाजार को भारत को सस्ते श्रम के केंद्र की तरह इस्तेमाल नहीं करने दिया है। इसके लिए उन्होंने भारतीय श्रमशक्ति के शोषण की आशंका को इस्तेमाल किया। जबकि भारत के पास मानव संसाधन की अकूत संपदा है जिसे उत्पादक काम में लगाए जाने की दरकार है। दुनिया भर के बाजारों के लिए उत्पाद बनाने में भारत को केंद्र बनाने की विदेशी रोजगारदाताओं को अनुमति दी जानी चाहिए। भारतीयों को हर बात में आर्थिक मदद से बेहतर होगा कि उन्हें रोजगार दिया जाए।
उद्यमिता का विकास करें
अर्थव्यवस्था की तरक्की के लिए जरूरी है कि सरकार नीतियों में खुलापन लाए और भारतीय उद्यमियों को भी खुलकर काम करने दे। उसे उद्यमिता को प्रोत्साहन देना चाहिए और लोगों को काम के लिहाज से नफा-नुकसान पाने का रास्ता खोल देना चाहिए। हालांकि हमारी लघु उद्योगों की नीतियां उद्यमिता को प्रोत्साहित करने का ही प्रयास हैं, लेकिन वास्तविकता में यह अजीबोगरीब नियामक प्रणाली के चलते तरक्की और अधिक उत्पादक बनने की राह में बाधा ही साबित होती हैं। इन नीतियों के तहत छोटे-बड़े का फैसला, आकार ‌नहीं, लगाई गई पूंजी तय करती है। पूंजी निवेश कम रखने के लिए हतोत्साहित करने वाली कई बाधाएं हैं। बाजार में कामयाबी पर कड़े अर्थदंड का प्रावधान है। इन्हीं अजीब नीतियों के कारण भारत उस विश्व बाजार में भी नाकामयाब है जहां आसियान और पूर्व एशिया के ही उद्यमियों की तूती बोलती है। सरकारी नीतियों के कारण भारतीयों की प्रगति में बाधा का यह एक सटीक उदाहरण है। उद्यमी बुनियादी तौर पर मेहनती और किसी काम को बेहतर तरीके से करने के लिए समर्पित लोग होते हैं। उद्यमियों के बीच प्रतिस्पर्धा ही अर्थव्यवस्था को गति देती है। ऐसे में जहां वे खुद तरक्की करते हैं वहीं समाज के लिए रोजगार निर्माण करके उसे आर्थिक संबल देते हैं। अर्थव्यवस्था की ट्रेन को खींचने में उनकी भूमिका इंजिन की तरह होती है।
मुनाफे का सम्मान करो
समाजवादियों के शब्दकोष में मुनाफा एक नकारात्मक शब्द है। मुझे याद है कि 50 और 60 के दशक में हर बात की कमी से जूझ रहे भारत में मुनाफा कमाना घोर पाप माना जाता था। जबकि मुनाफा तो किसी की कार्यक्षमता और उत्पादकता का पैमाना है। यह मुनाफा ही तो है जो पूर्व तंत्र को आत्मनिर्भर बनाता है। उद्यमियों के लिए मुनाफा ही मुख्य लक्ष्य होता है और मुनाफे में कमी नाकामी की ओर ले जाती है। हमारी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का कम मुनाफा ही भारत की तरक्की की राह की बाधा है। मुनाफा कमाने की बजाय वो सरकारी खजाने को भी खाली करती जा रही हैं।
सरकार की भूमिका
रोजगार न दे या गरीबों को आर्थिक मदद न दे तो आखिर सरकार करे क्या? मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि अच्छी से अच्छी सरकार भी न तो उत्पादक रोजगार दे सकती है और न ही संपदा बना सकती है। ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहां यह निरंतर हुआ हो। सरकार का काम तो एक स्थायी और निष्पक्ष माहौल देना है ताकि हर नागरिक अपने बूते उसमें जीवनयापन कर तरक्की कर सके।
जहां तक सरकार की बात है तो उसे सबको प्राथमिक और उच्चतर शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य और खासतौर पर प्राथमिक ढांचे पर पूरा ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। यहां पूरा जोर प्राथमिक शब्द पर है। उद्यमी अपने लाभ का कहां, कैसे इस्तेमाल करना चाहते हैं, यह उन पर छोड़ देना चाहिए। सरकार को तो उनके लिए बाजार में एक निष्पक्ष और स्वस्थ प्रतिद्वंद्विता का माहौल सुनिश्चित करना चाहिए। साथ ही सरकार को उत्पादकता की राह में आड़े आने वाली नीतियों और नियमों को भी खत्म कर देना चाहिए।
अब हर तरह के अनुदान को खत्म करने का वक्त आ गया है। अनुदान अनुपयोगी हैं और ऐसी निर्भरता को बढ़ावा देते हैं जो न तो स्वस्थ है और न ही लंबे समय तक फायदेमंद। अनुदानों की बजाय इस धन का उपयोग समाज में निवेश के लिए करना चाहिए। एक पढ़ा-लिखा भारतीय ही एक प्रतिस्पर्धी भारतीय है।
अंत में, सरकार की नीति हर तरह के निवेश को बढ़ावा देने की होनी चाहिए। हमें किसी भी एक उद्योग विशेष को ही प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। 1998 में भारतीय जनता पार्टी का यह स्लोगन 'आलू के चिप्स नहीं, कंप्यूटर चिप्स' मुझे अजीब लगा। इसका साफ आशय था कि आलू के चिप्स नहीं कंप्यूटर के चिप्स में निवेश को ज्यादा प्रोत्साहन दिया जाएगा। जबकि भारत को कंप्यूटर चिप्स से ज्यादा आलू के चिप्स में निवेश की दरकार है, क्योंकि यह कृषि आधारित उद्योग है। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को इस वक्त ऐसे निवेश की ज्यादा दरकार है जो उसके महत्व को और अधिक बढ़ा सके।
हमारा राष्ट्रीय मंत्र होना चाहिए ज्यादा उत्पादक रोजगार और नये निवेश के जरिये नये उत्पादक रोजगार।
भ्रमित विचारधारा के लिए कोई जगह नहीं
अपनी बात मैं इस निष्कर्ष के साथ समाप्त करना चाहूंगा कि कोई स्पष्ट आर्थिक दृष्टिकोण नहीं होने के कारण भारत ने आर्थिक और राजनीतिक दोनों ही क्षेत्रों में काफी कुछ सहा है। अब हमें राष्ट्रीय उत्पादकता बढ़ाने वाली बातों पर ध्यान देने की जरूरत है। यहां आधे-अधूरे मन से तय या रूमानी विचारधाराओं के लिए कोई जगह नहीं है। समाजवाद के प्रति हमारा समर्पण एक गलत कदम था जो बुरी तरह से नाकामयाब रहा है। अब वक्त आगे बढ़ने का है और अभी भी देर नहीं हुई है। उद्योगों का सरकारीकरण सौ फीसदी फ्लॉप शो रहा है। अब वक्त आ गया है कि उद्योगों पर से सरकार का सर्वशक्तिमान नियंत्रण हटा लिया जाए। साथ ही स्वदेशी जैसे किसी निरर्थक विचार का भी यह वक्त नहीं है। भारत की जीडीपी की वार्षिक विकास दर छह फीसदी है। इस गति से तो हमें आज के मैक्सिको के करीब पहुंचने में पचास साल और लग जाएंगे। आखिर हम 10 फीसदी की वार्षिक विकास दर क्यों हासिल नहीं कर सकते? उस दर से भी हम आज के अमेरिका तक पचास साल में पहुंचेंगे।
53 साल के समाजवाद ने न तो हमें विकास दिया है और न ही समता। भारत सरकार को यह बात समझना ही होगी कि लोकतंत्र और मुक्त बाजार दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। आप एक के बगैर दूसरे को पूरी तरह से हासिल कर ही नहीं सकते। एक मुक्त बाजार आखिरकार बाजार का लोकतंत्र है, जहां उपभोक्ता अपने पैसे के तौर पर हर रोज वोट देता है।
अब भारत में संपदा समृद्धि की नीति का वक्त आ गया है। एक बार इसे हासिल करने के बाद इसके वितरण के लिए हमारे पास पर्याप्त वक्त होगा, लेकिन पहला काम पहले ही करना होगा।