Wednesday, June 12, 2013

मौसरे भाईयों का अरण्यरोदन

जिस दिन से सूचना आयुक्त ने फरमा दिया कि सभी राजनीतिक दलों के भीतर खाने में भी झांकने की कानूनी इजाजत है उसी दिन से सभी मौसेरे भाई फिर एक सुर से बोलने लगे। आमतौर पर जब-जब एेसे किसी अनिष्ट की आशंका होती है, तमाम बैरभाव भुलाकर सभी मौसेरे भाई एक छतरी के नीचे आ जाते हैं। पिछली मर्तबे अन्नाजी के खिलाफ एक हुए थे। अन्नाजी ने राजनीति में ऑपरेशन क्लीन की बात उठाई। कहा लोकपाल बना दो और उसकी जद में प्रधानमंत्री से लेकर मंत्री, संत्री, सांसद, विधायक सभी को ला दो। अन्ना के खिलाफ भी सभी मौसेरे भाई एक हो गए। लोकपाल बिल में पलीता लगा दिया। टीम अन्ना में तोड़भांज करवा दी।
लोग सोचते है कि ये मौसेरे भाई विधानसभा लोकसभा में तो एक-दूसरे के खिलाफ जमकर भुजा भांजते हैं तो क्या वो दिखावा है? नहीं वो बाजीगरी है। नागपंचमी के दिनों में आपने बाजीगरी देखी होगी। किसी बस्ती में बाजीगर लोग अलग-अलग रास्तों से नुक्कड़ में पहुंचते है। एक बाजीगर अपनी मंत्र शक्ति से चुनौती देता है। भीड़ में छुपा हुआ दूसरा प्रकट होता है। फिर मंत्र शक्तियों का प्रहार शुरू होता। कभी एक मुर्छित होता है तो कभी दूसरे के मुंह में बीन घुस जाती है। घंटों यह खेल चलता है। हम तमाशबीन चकित होकर बाजीगर को रुपया, पैसा, द्रव्य देते हैं। शहर से निकलते ही दोनों प्रतिद्वंद्वी एक हो जाते हैं। तमाशे के पैसे को मिलकर बांटते हैं, दारू मुर्गा छानते हैं, और फिर किसी दूसरे शहर में हम जैसों को मूर्ख बनाने पहुंच जाते हैं। बाजीगरों का खेल जारी है और इधर हमारा मूर्ख बनते रहना भी उसी तरह। कभी-कभी लगता है कि पार्लियामेंट या विधानसभाओं में कोई बिल एक झटके से पास क्यों हो जाता है और जनहित के कई बिल सालों साल लटके रहते हैं। जैसे महिला आरक्षण विधेयक। दस साल से सुन रहे हैं यह विधेयक न हुआ जैसे कोई कर्मकाण्ड हो गया। सत्र के आखिरी दिनों मे यह सदन में रखा जाता है। कई दल के लोग बीच में उठते हैं हंगामा करते हैं, सदन स्थगित और बिल फिर अगले सत्र के लिए। पर जब सांसदों, विधायकों के वेतन-भत्ते व सुविधाओं की बात होती हे तो सभी मौसेरे भाई फौलादी एकता के साथ प्रकट होते हैं और बिल एक झटके में पास होता है।
अपने देश के मौसेरे भाईयों की अंदरूनी गाणित को अंर्तयामी भी नहीं जान सकता। सदन के बाहर-मायावती-मुलायम कैसे विषवमन करते हैं, एक-दूसरे के खिलाफ और केन्द्र की सत्ता के खिलाफ भी। सदन में जब सरकार गिरने की बारी आती है तो सभी एक पाले में खड़े हो जाते हैं। और सामने वाला भी कौन सरकार गिराना चाहता है। वह तो सरकार को गिराते हुए दिखाना चाहता है। सो हम देख लेते हैं और मान भी लेते हैं। इसीलिए अन्नाजी कहते हैं एक नागनाथ तो दूसरा सांपनाथ। नागनाथ को हटाओं तो सांपनाथ आ जाएंगे। अन्नाजी देश के नागरिकों में नेवलानाथ की सूरत देखते हैं, जो सांपनाथ और नागनाथ के फन को कुतर सके।  जनता नेवलानाथ कैसे बने। नागनाथ सांपनाथ भी तो उसी के बीच से ही गए हैं। सो बड़ी मुश्किल हैं। मौसेरे भाई देश के खजाने को मौसिया के श्राद्ध के महाभोज में उड़ाने में लगे हैं। बड़े भाई ने गरीबों को सस्ते से सस्ता अन्न देने की प्रणाली बनाई। छोटे भाई ने कहा हम इसे और सस्ता कर देंगे। मेहनतकश कामकाजी वर्ग के टैक्स का पैसा है, उड़ाने में क्या जाता है। एक दिन की मजदूरी माहभर का भोजन। शेष 29 दिन कबड्डी खेलों, चाहे ताश। भरपेट भोजन का इंतजाम। कभी मशीन के खिलाफ मानव के जंग की बात होती थी। अब काम के लिए मशीनों का रास्ता साफ कर रहे हैं। चीन अपने यहां से सस्ते रोबट भेज देगा। जो आपके घर के छोटे-मोटे काम करेगा। खेत से मजदूरों को वैसे भी टै्रक्टर और हारवेस्टर ने बेदखल कर दिया है। सभी काम मशीने हथिया लेंगी, श्रम की संस्कृति खत्म हो जाएगी। फिर एक दिन का भी काम आदमी के लिए नहीं बचेगा। तो सरकारें क्या करेंगी। एक गढ्ढा खोदेगा फिर उसी को पाटेगा। जैसे अलादीन ने अपने जिन्न को खंभे से उतरने व चढऩे का काम दिया था। जिन्न आज भी वही कर रहा है। इधर कर दाताओं के पैसे से मौसिया की श्राद्ध के महाभोज रचे जा रहे हैं। राजनीति के कुल गोत्र और उस की वंशावली को यूं समझएि। राजनीति सब की दादी अम्मा है। पार्टियों को उसकी बेटियां समझें और उनके नेता उनकी संतानें, इस नाते सभी मौसेरे भाई हुए। गोत्र और गृहस्थी भले ही अलग-अलग हों पर गर्भनाल तो राजनीति की दादी अम्मा से जुड़ी है। सो गाढ़े वक्त पर ये मौसेरे भाई एेसे ही एक होते रहेंगे, भले ही नुक्कड़ में ये प्रतिद्वंदी बाजीगर दिखे, या सदन के अखाड़ों में भुजा भांजते पराक्रमी योद्धा।

अव्वलहै मंच बनाया ऊँचा जनता नीची

mukut bihari saroj

एक ओर परदों के नाटक एक ओर नंगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

अव्वलहै मंच बनाया ऊँचा जनता नीची है
उस पर वर्ग-वर्ग में अंतर रेखा खींची है
समुचित नहीं प्रकाश-व्यवस्था अजब अँधेरा है
उस पर सूत्रधार को खलनायक ने घेरा है

पात्रों की सज्जा क्या कहिए, जैसे भिखमँगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

नामकरण कुछ और खेल का, खेल रहे दूजा
प्रतिभा करती गई दिखाई लक्ष्मी की पूजा
अकुशल असंबद्ध निर्देशन-दृश्य सभी फीके
स्वयं कथानक कहता है, अब क्या होगा जी के

संवादों के स्वर विकलांगी कामी बेढँगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

मध्यांतर पर मध्यांतर है कोई गीत नहीं
देश काल की सीमाओं को पाया जीत नहीं
रंगमंच के आदर्शों की यह कैसी दुविधा
उद्देश्यों के नाम न हो पाए कोई सुविधा

जन गण मन की जगह अंत में गाया हर गंगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।


इस आडम्बरवाणी को क्या समझें!

आडवाणी जी को वक्त की चिन्ता है जो उनके पास बहुत कम है। वे अभी नहीं तो
कभी नहीं की मनोदशा से गुजर रहे हैं। वे इतिहास रचना चाहते हैं। वक्त
बेरहम होता है वह हमारे व आपके सुविधानुसार नहीं चलता। यह वक्त का ही
थपेड़ा है कि आडवाणी जी जीवन के उत्तरार्ध में एके हंगल सा फिल्मी चरित्र
जीने को अभिशप्त हैं, जिसे उनके बच्चे ही उपेक्षा की अंधी कोठरी में
पहुंचा देते हैं।

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लालकृष्ण आडवाणी के इस्तीफा प्रकरण में ऐसा कुछ नहीं है जिस पर गंभीर
विमर्श की जरूरत हो। सब कुछ साफ-साफ और सपाट। यह उनकी आहत आकांक्षा का
व्यक्तिगत मामला है, जिसका प्रकटीकरण वे समय-समय पर करते रहे हैं।
इस्तीफे में देश हित- देशवाशियों की चिंता और पार्टी की दिशा-दशा का
जिक्र अवश्य है, पर वास्तव में इनसे कुछ लेना देना नहीं। अव्वल यह
इस्तीफा है भी और नहीं भी। उसी तरह जैसे वे बीमार थे और बीमार नहीं भी
थे। उन्होंने एनडीए के अध्यक्ष पद से इस्तीफा नहीं दिया जबकि यहां तो वे
भाजपा का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। गोवा नहीं गए क्योंकि बीमार थे।
पार्लियामेंट कमेटी की बैठक में तीन घण्टे जमे रहे क्योंकि बीमार नही थे।
लोकसभा के पिछले तीन चुनावों से वे अभी नहीं तो कभी नहीं का खेल खेल रहे
हैं। सन् 2004 के चुनाव में वे स्वयं को भावी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार
के तौर पर देख रहे थे। फील-गुड और शाइनिंग इन्डिया उन्हीं का जुमला था।
वाजपेई जी के रिटायर होने की बातें भी आडवाणी खेमें ने उड़ाई थी। वाकपटु
वाजपेई जी ने यह कहकर आडवाणी की आकांक्षा के गुब्बारे में सुई चुबो दी कि
अभी न कोई टायर्ड हुआ है न रिटायर्ड, आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा का
विजय रथ मंजिल तक पहुंचेगा। 2004 के चुनाव का मायाजाल प्रमोद महाजन ने
बुना था। फिल्मी हस्तियों से लेकर साहित्यकार, विद्वान व दूसरे दलों के
नेताओं को शामिल करके मीडिया प्रबंधन के जरिए तिलस्म रचा गया था। भाजपा
के नीचे की जमीन खिसक चुकी थी फिर भी यकीन नहीं था। चुनाव में कांग्रेस
और उसके साथी दलों को सरकार बनाने लायक सीटें मिल गईं थी। भाजपा बेदखल
होकर सड़क पर खड़ी थी। आडवाणी फिर भी धारा के खिलाफ चलते रहे। नेता
प्रतिपक्ष न बन पाने की स्थिति में विरोध व अवरोधों के बावजूद अपने
चहेतों सुषमा स्वराज और अरुण जेटली को लोकसभा व राज्यसभा का नेता बनवाया।
जिन्ना एपीसोड आडवाणी जी का योजनाबद्ध कदम था। वे वाजपेई जैसा उदात्त
दिखने की गरज से मुसलमानों के आराध्य नेता की तारीफ कर आए। उम्मीद थी कि
2009 में उन्हें उदात्त दिखने की जरुरत पड़ेगी। प्रायमिनिस्टर इन वेटिंग
आडवाणी के समर्थकों का गढ़ा जुमला था। वे जल्दी में थे ओल्डमैन इन हरी के
अन्दाज में। प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री उनके चेले-चपाड़े बना सकते हैं,
जनता तो वहीं करेगी जो उसे करना है। उनके नेतृत्व में भाजपा हारी और
प्रायमिनिस्टर इन वेटिंग का जुमला मजाक बन गया। आडवाणी जी अपनी सभाओं में
बड़े गर्व के साथ कहा करते थे कि देश में आंतरिक लोकतंत्र सिर्फ दो
राजनीतिक दलों में हैं भाजपा और साम्यवादी दलों के पास। खैर भाजपा
साम्यवादी दलों की रीति-नीति और चरित्र के मामले में पासंग भी नहीं।  आज
आडवाणी उपेक्षा से आहत हैं तो भाजपा में भूचाल आ गया। पर लोकसभा के
स्पीकर रहते हुए सोमनाथ चटर्जी को माकपा ने पार्टी लाइन के खिलाफ जाने पर
सदस्यता से वंचित करने में दो मिनट भी नहीं लगाया।  इतने बड़े नेता के
निकाल बाहर किए जाने पर भी पार्टी में कोई चूं-चपड़ नहीं हुई। पालित
ब्यूरो ने ज्योतिर्मय बसु को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया। देश की
राजनीति के युगपुरुष ज्योति बाबू फैसला सम्मानपूर्वक जज्ब कर गए। आडवाणी
जी की तरह अपनी आहत आकांक्षा का इस्तीफे के पोस्टर चिपकवाकर प्रकटीकरण
नहीं किया।
मोदी कोई प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित नहीं किए गए हैं। उन्हें
भाजपा ने अपनी चुनाव अभियान समिति का उसी तरह अध्यक्ष बनाया है, जैसे कि
इसके पहले अरुण जेटली और प्रमोद महाजन को बनाया था। यदि पार्टी का बहुमत
मोदी को इस पद में बनाए जाने के पक्ष में है, तो आडवाणी जी को क्या
दिक्कत? वे जिस आंतरिक लोकतंत्र की दुहाई अक्सर दिया करते थे क्या वे
स्वयं उसके खिलाफ नहीं हैं ? वस्तुत:  आडवाणी अपनी ही कृति से भयभीत हो
गए हैं। पर मुश्किल यह है कि वे ऐसे सिद्ध पुरुष भी नहीं कि शेर बनाने के
बाद उसे ‘पुर्नमूषको भव:’ का अभिशाप दे सकें।  2 सीटों वाली भाजपा 17 साल
बाद सत्ता की दहलीज तक किसी सांगठनिक कौशल के बदौलत नहीं पहुंची। इस
सत्रह वर्षों में देश ने झूठ-फरेब, भ्रम-उन्माद के दौर देखे धार्मिक
भावनाओं का ज्वार उभारा गया, उसी ज्वार से उठी लहरों ने भाजपा को सत्ता
के करीब पहुंचाया। नि:संदेह इस पराक्रम के सूत्रधार और महारथी लालकृष्ण
आडवाणी थे। वे जब भाजपा के शून्य से शिखर तक पहुंचने की इबारत पर नजर
डालते हैं तो अब तक प्रधानमंत्री  न बन पाने के लिए दुखी हो जाते हैं।
मोदी ने आडवाणी के ही विचारों को गुजरात में घनीभूत किया। गोधरा के बाद
जब प्रधानमंत्री वाजपेयी जी आहत और संतप्त मन से मोदी को राजधर्म के पालन
की नसीहत दे रहे थे तब बतौर देश के गृहमंत्री आडवाणी जी मोदी को उनके
पराक्रम और अदम्य साहस के लिए नैतिक संबल दे रहे थे। कारपोरेट के
दिग्गजों और मीडिया ने मोदी का जिस तरह से आभासी चरित्र गढ़ा है, उसी
चरित्र से आडवाणी जी भयाक्रान्त है। भयाक्रान्त सिर्फ आडवाणी जी ही नहीं
गडकरी से लेकर राजनाथ और जेटली से लेकर सुषमा तक सभी है। महाबली मोदी के
इस आभासी चरित्र के आगे भाजपा भी बौनी है और संघ भी।  तभी वे चुटकियों
में संघ के प्रिय संजय जोशी को बाहर करवा देते हैं, और गोधरा के चर्चित
चेहरे अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनवा देते हैं। मोदी मीडिया
के जरिए खेल रहे हैं और मीडिया मोदी के जरिए धंधा कर रहा है। मोदी आधार
भी सोशल मीडिया की तरह आभासी है, छद्म है। अम्बानी और टाटा की सर्चलाइट
की चकाचौंध में उन्हें देश की हकीकत कभी नहीं दिखेगी। वे चकाचौंध को ही
अपने प्रभाव का चिलस्म मान रहे हैं। पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र की बात
करने वाले आडवाणी को तो खुश होना चाहिए कि उनकी राजनीति का वंशधर देश को
सम्हालने चल निकला है। उसका भी सपना और एजेन्डा वही है जो आडवाणी जी का।
पर आडवाणी जी को न देश की चिन्ता है न देशवासियों और न ही पार्टी की।
उन्हें वक्त की चिन्ता है जो उनके पास बहुत कम है। वे अभी नहीं तो कभी
नहीं की मनोदशा से गुजर रहे हैं। वे इतिहास रचना चाहते हैं। जो पद उस लौह
पुरुष से वंचित रह गया था वह पद यह लौहपुरुष पाना चाहता है। वक्त बेरहम
होता है वह हमारे व आपके सुविधानुसार नहीं चलता। यह वक्त का ही थपेड़ा है
कि आडवाणी जी जीवन के उत्तरार्ध में एके हंगल सा फिल्मी चरित्र जीने को
अभिशप्त हैं जिसे उनके बच्चे ही उपेक्षा की अंधी कोठरी में पहुंचा देते
हैं।
 - लेखक स्टार समाचार के कार्यकारी सम्पादक हैं। सम्पर्क-09425813208.

Sunday, June 2, 2013

देश रहे न रहे, क्रिकेट सलामत रहे

अपने फारुख अब्दुल्ला साहब का जवाब नहीं। क्या जबरदस्त आइडिया दी है। क्रिकेट में सट्टेबाजी को कानूनी मान्यता देकर वैधानिक बनाया जाए। वे केन्द्रीय मंत्री हैं, उन्हें देश की चिन्ता है। वे सही ही फरमाते हैं, जो रोका नहीं जा सकता उसे होने दिया जाए, उसी से मुनाफा भी कमाएं। सट्टे पर टैक्स लगाकर अरबों कमाए जा सकते हैं। जीडीपी को गति मिलेगी। अर्थव्यवस्था सुधरेगी। बेरोजगारों को काम मिलेगा। सब क्रिकेट की सट्टेबाजी में लग जाएंगे तो जाहिर है अपराध भी घटेगा। अपने प्रदेश में पटवा सरकार ने सरकारी लाटरी शुरू की थी। बड़ा जबरदस्त रिस्पांस मिला था। बाजार में सन्नाटा, दुकानें बंद, सुबह से लेकर रात तक लॉटरी। ओपन क्लोज के चक्कर में भूख प्यास बंद। अनाज व भोज्य पदार्थों की बिक्री व खपत कम हो गयी थी, और सबसे बड़ी बात की कई-कई थानों में अपराध निल हो गए थे। अपराधी भी लाटरी की टिकट बेचने-खरीदने में भिड़ गए थे। पटवा सरकार के समय तो समूचा रामराज ही उतर आया था मध्यप्रदेश में। सब तरफ एक ही भजन चलता था- सुबह लाटरी-शाम लाटरी, बोलो जयश्रीराम लाटरी। परिवार नियोजन ने जनसंख्या को जितना नियोजित नहीं किया उससे कारगर सरकारी लाटरी निकली। हर शहर-कस्बे गांव से खबरें आने लगी कि कहां कितने मरे। कुछ दिन बाद अखबारों में सिर्फ मौतों के अंक छपने लगे। मसलन- भोपाल-१0, उज्जैन १२, जबलपुर १६। लोग अखबारों में सुबह इन्हीं अंकों को लकी मानकर लाटरी का नंबर लगाते, और नम्बर लगाने वालों में से कई दूसरे दिन औरों के लिए लकी नम्बर बन जाते।
सो इन अनुभवों को ध्यान में रखते हुए फारूख अब्दुल्ला का यह गुडआइडिया है।  इससे कश्मीर समस्या का भी हल निकल सकता है। सभी आतंकवादी क्रिकेट के सट्टे में भिड़ जाएंगे। सेना-पुलिस भी बैरकों में क्रिकेट देखेगी और महीने में जो पगार मिलेगी उससे सट्टे खेलेगी। कश्मीर की वादियों में ट्यूलिप के फूल चहकेंगे और डल झील में शिकारों का आनंद लेते हुए पर्यटक भी क्रिकेट की सट्टेबाजी करेंगे। कश्मीर का पर्यटन विभाग, पर्यटन के साथ क्रिकेट के सट्टे का स्पेशल पैकेज देगा। दिल्ली में रेप की घटनाओं पर भी लगाम लगेगी। क्योंकि सभी लोफर क्रिकेट की सट्टेबाजी में भिड़े रहा करेंगे। क्रिकेट के सट्टे की बयार जंगलों तक पहुंचेगी। माओवादी बंदूकें धरकर नेट प्रैक्टिस करेंगे और अपनी वॉकी-टॉकी से सट्टे का उतार-चढ़ाव, नम्बर-सम्बर पूछा करेंगे। नेता व्यर्थ में नहीं मारे जाएंगे। नेतागण माओवादियों से एक दूसरे को मरवाने का आरोप नहीं गढ़ सकेंगे, लिहाजा अपनी राजनीति की गंगा भी गटर बनने से बच जाएगी।
कहते हैं प्यार-युद्ध और बाजार में सब जायज है। क्रिकेट प्यार का प्लेटफार्म है। क्रिकेट प्यार से लवा-लव है। आज से नहीं नवाब पटौदी के जमाने से। कहते हैं छक्के की शर्त पर शर्मिला टैगोर पटौदी को दिल दे बैठीं। रंगभेद को धोते हुए अभिनेत्री नीना गुप्ता विवियन रिटर्ड की बिनब्याही मिस्ट्रेस बन गईं। रीना राय को मोहसिन खान भा गया। अब क्रिकेट में प्यार ले-प्यार दे चल रहा है। क्रिकेट युद्ध भी है। बीसीसीआई में युद्ध चल रहा है। श्रीनिवासन् का तख्त पलटाने में सभी महारथी लगे हैं। श्रीनिवासन् है कि इन्डिया सीमेंट के मजबूत पलस्तर के साथ कुर्सी में चिपके हैं। ललित मोदी बगुले की भांति अवसर की मछली ताके बैठे हैं। मेरठ के मुफस्सिल पत्रकार राजीव शुक्ला को क्रिकेट ने ही फर्श से अर्श तक चढ़ाया। आज वे सत्ता और क्रिकेट की सेतु बनाने के मामले में शरद पवार के बाद दूसरे बड़े शिल्पी हैं। क्रिकेट का बाजार भी जबरदस्त है। जितना एक नम्बर का उससे कई गुना दो नम्बर का। जितना ऊपर ओपन वल्र्ड में उससे ज्यादा गहरा अन्डरवल्र्ड में। क्रिकेट ने ही पहली बार आदमी की कीमत तय की। पहले रेस के घोड़े नीलाम होते थे अब क्रिकेटर नीलाम होते हैं। उद्योगपति धंधा चलाता है उद्योगपत्नियां क्रिकेट चलाती हैं। क्रिकेट नहीं होता तो इन पत्नियों के पास किटी-पार्टी में रम्मी खेलते-खेलते ऊबने के बाद हिन्दमहासागर में कूदने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था। क्रिकेट के सट्टाबाजार ने इनके जीने की जिजीविषा को बनाए रखा। क्रिकेट में खेल मत देखिए, क्रिकेट का खेल देखिए। इससे होने वाले वारे-न्यारे देखिए। क्रिकेटर के रूप में चलता फिरता बाजार देखिए। मॉडल देखिए-मोहरा देखिए, चेहरा मत देखिए। चेहरे में क्या धरा है, मलिंगा, क्रिश गेल के आगे खूबसूरत चेहरा भी फेल। क्रिकेट हमारा धर्म है। क्रिकेट देश की धड़कन है, मर्म है। क्रिकेट पर लांछन लगाने वाला अधर्मी और काफिर है। अपन अधर्मी नहीं बनना चाहते सो देश रहे न रहे, देश का क्रिकेट सलामत रहे। http://starsamachar.com/Details.aspx

Monday, May 27, 2013

लाल आतंक के बुनियादी पहलू

नक्सलबाड़ी का जनविद्रोह इसलिए हुआ था क्योंकि वहां कि सरकार खेतिहर मजदूरों, आदिवासियों पर जुल्म ढ़ाने वाले जमींदारों के साथ खड़ी थी, आज केन्द्र व राज्य की सरकारें उद्योगों के नाम पर जंगल व पहाड़ों को पट्टे में लेने वाले कारपोरेट घरानों की लठैत बनी हैं। वन से बेदखल आदिवासी और जोत की जमीन से वंचित खेतिहर मजदूर व किसान जाएं तो जाएं कहां? हर कहीं माओवादी इन्हीं स्थितियों का लाभ उठा रहे हैं। माओवादी रक्तक्रांति के जरिए सत्ता हासिल करना चाहते हैं उनका कृत्य राष्ट्र के खिलाफ युद्धघोष है।
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बस्तर के सुकमा में घटी वीभत्स घटना के बहाने लाल आतंक की तह तक जाने के पहले जरुरी है कि कुछ तथ्य बिल्कुल साफ कर लिए जाएं। पहली बात नक्सलवाद और माओवाद दोनों एक नहीं है, जैसा कि मीडिया रिपोर्ट और बौद्धिकों के वक्तव्यों में दोनों को गुड्डम-गड्ड किया जा रहा है। दूसरी बात लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमले जैसे वक्तव्य, इस पर भी तफसील से जाने की जरूरत है, इसका वर्गीकरण होना चाहिए कि कौन मारे जाए तो उसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला माना जाएगा और किनके मरने पर नहीं। बात आगे बढ़ाएं कि इस बीच भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी) के मध्यप्रदेश के राज्य सचिव बद्रीप्रसाद का प्रेस नोट जो मुङो आज ही ई-मेल से मिला, का थोड़ा सा जिक्र कर लिया जाए। यह इसलिए भी जरुरी है क्योंकि नक्सलवादियों का सबसे पुराना और पैतृक संगठन इसे ही माना जाता है। माओवादियों की इस अराजक कार्रवाई का माकपा (माले) निन्दा करती है क्योंकि ऐसी कार्रवाईयों से 1967 में उत्तरी बंगाल में जमीन और सामाजिक बदलाव के लिए भूमिहीन-गरीब किसानों के नक्सलबाड़ी जनविद्रोह और उनके नेतृत्व में विभिन्न राज्यों में चल रहे जन संघर्षो की छवि धूमिल होती है।
दरअसल नक्सलवाद और माओवाद दोनों को अलग-अलग करके देखना जरूरी है। नक्सलवाद का जन्म विशुद्ध रुप से गरीब आदिवासियों व खेतिहर मजदूरों का जमीदारों और उनके संरक्षण देने वाली तत्कालीन पश्चिम बंगाल की सरकार के खिलाफ स्वफूर्त जनविद्रोह था। यह ऐतिसासिक घटना दार्जीलिंग के समीप नक्सलवाड़ी नाम के एक गांव में 1967 में घटी। पश्चिम बंगाल में जमीदारों का आतंक था, वहीं सरकार व प्रशासन में प्रतिनिधित्व करते थे। लैण्डहोल्डिंग की स्थिति यह थी कि राज्य की सारी जोत की जमीन महज 2 प्रतिशत जमीदारों के कब्जे में थी। खेतिहर मजदूर खेतों में काम करते थे, पर जिस अन्न को वो उपजाते थे उन पर उनका हक नहीं था। आवाज उठाने पर जमींदारों के कारिंदे पुलिस के साथ मिलकर जुल्म ढ़ाते थे। इस जुल्म और अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद की सिलीगुड़ी किसान सभा के अध्यक्ष जंगल संथाल ने और नेतृत्व संभाला कानू सन्याल ने। खेतिहर मजदूरों को जमीदारों के खेत की फसलें काटनें और कब्जा कर जोत लेने का आव्हान किया गया। आन्दोलन को संथाल परगना के आदिवासियों ने परवान चढ़ाया। जब यह जनविद्रोह शुरु हुआ तब इसकी कोई वैचारिक दृष्टि नहीं थी। पर चूंकि वहां कांग्रेस के सिद्धर्थशंकर रे की सरकार के खिलाफ कम्युनिस्टी लड़ रहे थे इसलिए वे इन विद्रोहियों के वैसे ही स्वाभाविक मित्र हो गए । चारू मजूमदार वो शख्स थे जिन्होंने नक्सलबाड़ी के जनविद्रोह को वैचारिक आधार दिया। मजूमदार ने इस विद्रोह के साथ- बुद्धिजीवियों व सृजनधर्मियों के साथ छात्रों को भी जोड़ा।
कलकत्ता विश्वविद्यालय का प्रेसीडेन्सी कालेज क्रांतिकारी छात्रों का मुख्यालय बन गया और यह वैचारिक क्रांति देश के कई नामचीन विश्वविद्यालयों के छात्रों तक पहुंच गई। नक्सली आन्दोलन पूरे पश्चिम बंगाल में फैल गया तो एक कमेटी गठित की गई। नाम था आल इण्डिया कोर्डिनेशन कमेटी आफ कम्युनिस्ट रिवाल्यूशनरिज (एआईसीसीआर) 1969 में इसी की कोख से माकपा (माले) का जन्म हुआ। इधर सन् 1977 में ज्योति बसु के नेतृत्व में कम्युनिस्ट गंठबंधन की सरकार के गठन के बाद पहला और सबसे बड़ा काम भूमि सुधार का हुआ लिहाजा नक्सल आन्दोलन की तीव्रता घटी। इसी बीच माओवादी कम्युनिस्ट सेन्टर (एमसीसी) का उदय हुआ- दक्षिण देशम ग्रुप इसी से निकला और प्रकाशन्तर में पीपुल्स वार ग्रुप बना फिर यही कम्युनिस्ट पार्टी आफ इन्डिया माओवादी में बदल गया। बस्तर की घटना के पीछे यही संगठन है।
नक्सलवाद जहां गरीब आदिवासियों व खेतिहर मजदूरों के हक के लिए सामाजिक व आर्थिक बदलाव का आन्दोलन था वहीं माओवादी रक्तपात व हिंसक क्रांति के सहारे सत्ता में काबिज होने की लिप्सा रखते हैं। इनका आन्दोलन विशुद्ध राजनीतिक है और आदिवासी इनकी ढ़ाल है। इनका आदिवासियों के हक-हकूक और बेहतरी से कोई लेना-देना नहीं। जहां तक खूनी कार्रवाइयों का प्रश्न है- माओवादी माओ की विचाधारा क्यूबा के क्रांतिकारी चे- ग्वारा के तौर तरीकों से प्रेरित हैं ये बिगड़े और भ्रमित नौजवान नहीं है अपितु अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रतिबद्ध और वैचारिक तौर पर दृढ़ लोग हैं, इनकी आस्था देश, यहां की संस्कृति, संविधान, कानून प्रजातंत्र पर नहीं है। इस दृष्टि से इनकी हर कार्रवाई राष्ट्र के खिलाफ युद्ध है। इनसे निपटने की रणनीति वैसे ही बनानी पड़ेगी जैसे कि दुश्मन देश के खिलाफ बनाई जाती है।
एक पेंचीदा सवाल यह है कि इन्हें वनवासियों व ग्रामीणों का इतना समर्थन क्यों हासिल है? साफ जवाब है कि पश्चिम बंगाल में जहां सरकार गरीबों आदिवासियों के खिलाफ जमीदारों के साथ खड़ी नजर आती थी वहीं आज वह कारपोरेट घरानों की संरक्षक नजर आती है, चाहे वह केन्द्र की सरकार हो या राज्य सरकारें।
जयराम रमेश ठीक कहते हैं ज्यादा खदानें-ज्यादा माओवादी।
उड़ीसा, झरखण्ड, आंध्र में वहीं माओवादियों का बोलबाला है, जहां बड़े घरानों को जंगल, पहाड़, खनने-खोदने के लिए दे दिए गए हैं। बस्तर के आंचल में खदानों की अकूत संपदा छिपी है।
2006 में टाटा और एस्सार को यहां की लीजें दी गईं। बड़ी परियोजनाओं की वजह से वनवासियों का विस्थापन एक भयावह समस्या है। ये अपनी ही जमीन पर यतीम बना दिए जाते हैं और जब देखते हैं कि सरकार उद्योगपतियों के साथ खड़ी है तो अपना हमदर्द ये माओवादियों में ढूंढते हैं। दूसरे सुरक्षाबलों की कार्रवाई में यही शिकार होते हैं माओवादियों को पनाह देने के नाम पर क्या सरकार को ये नहीं मालुम कि गरीब आदिवासियों के घर पर हथियार बंद माओवादी आ जाएं तो विकल्प ही क्या सिवाय उन्हें आश्रय देने के।
आखिरी बात, लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमले की, जैसा कि मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी से लेकर विभिन्न दलों के लोग बार- बार दोहरा रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि कांग्रेस के निहत्थे नताओं कार्यकर्ताओं को आत्मसमर्पण के बाद भी गोलियों से भूनना वीभत्स व क्रूरकर्म है। लेकिन सीआरपीएफ के 74 जवानों को सुरंग लगाकर उड़ा देना या सुरक्षा एजेन्सियों के हाथों अनगिनत निदरेष आदिवासियों, महिलाओं और बच्चों का मारा जाना भी इतना ही दर्दनाक है। लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला तो वह भी घटना है जिसमें दंतेवाड़ा की एक आदिवासी शिक्षिका सोनी सोरी के गुप्तांग में पत्थर बालू गिट्टी का ठूस दिया जाना। सुप्रीमकोर्ट के आदेश पर जांच और उसमें दोषी पाए गए अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई ना होना। किसी फौरी कार्रवाई से समस्या का दीर्घकालिक हल नहीं हो सकता। अच्छी जीडीपी हासिल करने के लिए सरकार की अर्थनीति कारपोरेट के औद्योगिक विस्तार पर है। उसकी नीति के केन्द्र में किसान, खेतिहर मजदूर - आदिवासी और अपनी जमीन से बेदखल किये हुए लोग नहीं है। इसीलिए किसान आत्मघात करते हैं, विस्थापित आदिवासी माओवादियों के पाले में पहुंच जाता है। इन पेंचीदा मसलों को बातों से हल नहीं किया जा सकता है। जरुरत है नीतियों को लक्ष्य हासिल करने या तरक्की को गति देने भर के लिए नहीं अपितु मानवीय संवेदनाओं का ध्यान रखकर बनाया जाए।
- लेखक स्टार समाचार के कार्यकारी सम्पादक हैं। सम्पर्क-09425813208.Details  

Saturday, May 25, 2013

वर्ण, आश्रम और पुरुषार्थ के अंतरभेद!


 चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र
सं सार के सभी जीवों में मनुष्य सबसे असंतुष्ट प्राणी है।
संतुष्टि को वह क्रियाहीनता या मृत्यु मानता है। भारतीय मिथक कहते हैं कि अन्य जीव जन्तुओं के समान ही उसे भी उम्र मिली थी। जीव जंतु अपनी लम्बी उम्र से दुखी थे परंतु मनुष्य अपनी कम उम्र से परेशान और दुखी था। उसने ब्रrा से मदद मांगी और जीव जन्तुओं से उनसे उम्र उधार ली, परंतु वह उधार न कभी देने वाले ने वापस मांगी न उसने दी। इसी कारण अपनी जन्मजात उम्र को पारकर मनुष्य ने परकाया प्रवेश किया और गंध और कुत्ते और कीड़े मकौड़ों की उम्र जीता हुआ शतायु से चिरायु होने के लिए जीवन रक्षक दवाइयो पर टिका है, जो स्वयं का उत्पाद है, लेकिन सांस की डोर किसी और के हाथ है जिसे वह जानने में आदिकाल से लगा है। गॉड पार्टिकल्स भी उसका समाधान नहीं है। कब, जातियां बनी, वर्ण बने, आश्रम बने और पुरुषार्थ कौन श्रेष्ठ है, इस पर लम्बे बहस की गुंजाइश सदैव से रही है। गीता के कृष्ण कहते हैं- चारों वर्ण मेरी सृष्टि हैं जो गुण और कर्म आधारित हैं। कृष्ण-युग और उनके कुछ दिन बाद की कथाओं तक गुण कर्म निर्धारित वर्ण व्यवस्था मिलती है परंतु कालांतर में ब्राrाण के घर में पैदा होने और अपढ़ वेद विहीन होने वाले पुत्र को जाति च्युत नहीं किया गया और धनुर्धर सूत पुत्र को क्षत्रिय नहीं माना गया। तपस्वी शबरी और शम्बूक को जातीय श्रेष्ठता नहीं मिली, शम्बूक की हत्या तो ब्राrाणों के कहने से स्वयं भक्त वत्सल श्रीराम ने की। कृष्ण के युग में ही गुण कर्म की उपेक्षा हुई। एकलव्य, अजरुन से श्रेष्ठ धनुर्धर है, यह द्रोणाचार्य जानते थे अत: बिना गुरु हुए दक्षिणा मांगने के अधिकारी कैसे हो गए? जातीय परिभाषा की स्वीकृति और अस्वीकृति दोनों महाभारत में पर्याप्त हैं। व्यास धीवर कन्या के ऋषि पुत्र हैं और समाप्त होते कुरुवंश के पिता हैं। उन्हें महर्षि का पद प्राप्त है।
महाभारत के कथाकार हैं। सारा कथासूत्र उनके हाथ में है।
आर्य सभ्यता की इस जाति व्यवस्था में बहुत बड़ा प्रश्न है शिल्प और कलाओं का संबंध त्रिवर्णो से नहीं था। विश्वकर्मा को भगवान माना गया परंतु उनकी जाति की हद भी बता दी गई।
यह मानने से गुरेज नहीं होना चाहिए कि कारीगरों, शिल्पकारों को स्वार्थवश आर्येतर जातियों से खींचकर, चौथे वर्ण में लाया गया। ये ही कलाकार आदिकाल से सभ्यता और संस्कृति की कहानी कह रहे हैं। पुरातत्वों में प्राप्त शिल्प त्रिवर्णो के बनाए शायद ही हों। आज भी मिस्त्री अंत्यजों से ही आते हैं। यदि कर्म आधारित जाति होती तो सारे इंजीनियर शूद्र होते। शिल्प और कला नागरिक सभ्यता के चिह्न् हैं। खुदाई में प्राप्त प्राचीन ईंटे किस जातीय सभ्यता की सूचना देती हैं। इन्हें भी जातीय संदर्भ में देखने की जरूरत है। जाति च्युत होने और जातीय श्रेष्ठता के उदाहरण वाल्मीकि और व्यास से लेकर सूत महाराज तक भरे पड़े हैं। तत्वदर्शियों को जाति से ऊपर माना गया। दाऊ बलराम का राज अभिमान इतना जागृत हुआ कि सूत महाराज के व्यास पीठ से उठकर उनका स्वागत न करने के अपराध में हत्या कर दी, फलत: ऋषियों द्वारा निर्धारित दण्ड बलराम को भोगना पड़ा।
सूत, सर्वश्रेष्ठ व्याख्याकार थे, किसी भी ब्राrाण से बढ़कर? ऋषियों ने चार काम्य निर्धारित किये, जिन्हें पुरुषार्थ कहते हैं।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। संसार के आवागमन से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य ने मोक्ष की कामना की। भारतीय मनीषा का एक बहुत बड़ा वर्ग पुनजर्न्म में विश्वास करता है और मानता है कि जीवन चौरासी लाख योनियों में जन्म लेकर अनेक तरह के कष्ट भोगता है, उससे मुक्ति का उपाय तप योग साधना है। प्रहलाद ने ईश्वर से इसी मोक्ष की कामना की थी और कहते हैं कि आज भी आकाश में सप्तर्षि उनकी अभ्यर्थना करते हैं। व्यक्ति का धर्म रिश्तों, सम्बन्धों, समाज और सम्पूर्ण प्रकृति के चर अचर के प्रति कैसा होना चाहिए, यह जानते हुए भी वह धर्म से विरत है। मोक्ष अब किसी पीठाधीश्वर के चिंतन में नहीं है। अर्थ और काम ही वर्तमान पुरुषार्थ के केन्द्र में है। इन दोनों में अच्छा तालमेल है।
जहां अर्थ है वहीं काम का साम्राज्य है। हमारे यहां स्वर्ग की कल्पना में भी यही भौतिक सुख ही तो है। देवराज इंद्र के लोक में समुद्र मंथन के अधिकतर र8 वहीं विराजते हैं। कामधेनु, कल्पवृक्ष, ऐरावत, उच्चैश्रृवा, रम्भा नृत्य सब वहीं तो है। जहां अर्थ है, वहीं काम है, वहीं स्वर्ग भी है। सारे देश के अर्थपतियों की दृष्टि देवराज का जीवन जीने के लिए सारे संसाधन जुटा रही है। अर्थ और काम से मनुष्य कभी संतुष्ट नहीं हुआ। मनुष्य के धतकरमों को हम पशुवत कहकर पशु धर्म का अपमान करते हैं।
पशु पक्षी, वनचर आज भी प्राकृतिक नियमों, अपने धर्म से बंधे हैं, परंतु मनुष्य ने दानवता की सारी सीमाएं लांघी हैं। यह सब प्रत्येक दिन देश संसार देख रहा है। काम एक अनुशासन था, साल, महीने, दिन तय थे, पशुओं पक्षियों के आज भी तय हैं, परंतु मनुष्य विकास के चरम पर खड़ा सभी जातियों से हीन है। अनेक प्राणियों के कुकर्मो का संगम है आज का विकास पुरुष।
आश्रम व्यवस्था भी पक्षपात पूर्ण रही। त्रिवणोर्ं को ही इस व्यवस्था में शामिल किया गया। ब्रrाचर्य आश्रम, पठन-पाठन, खेलने-कूदने, नाते-रिश्तों के पहचानने की उम्र की समयावधि थी। आश्रम व्यवस्था एक जीवन पद्धति थी, एक व्यवस्थित जीवन के लिए। ब्रrा के प्रति जिज्ञासा का भावारोपण इसी उम्र में होता था। पच्चीस वर्ष के बाद वह गृहस्थी बसाता था, पूरे मनोयोग से ब्रrाचर्य की शिक्षा का व्यवहारिक प्रयोगशाला गृहस्थ आश्रम ही था। संतान परिवार के प्रति लगाव इस आश्रम की शर्ते थीं।
पचास वर्ष की इस उम्र तक पुत्र पुत्रियों को दायित्व सौंप, वानप्रस्थ की ओर उन्मुख होना मोह-माया से धीरे-धीरे मुक्त होने की प्रक्रिया थी। वन में रहते हुए भी गृहस्थी में आना जाना लगा रहता था। निर्देश नहीं सलाह देने के लिए, जिस मां बाप ने लड़कों की गृहस्थी में ज्यादा हस्तक्षेप किया और वानप्रस्थी होते हुए भी उन्हें स्वतंत्रता से जीने की आजादी नहीं दी वे ही अधिक दुखी हुए। अंतिम अवस्था सन्यास की थी, जहां वह बोध हो जाता है, जो कि ‘ब्रrा सत्य जगत मिथ्या’ यदि ऐसा नहीं हुआ तो सन्यास का अर्थ ही विकृत हो जाता है।
देश भर में सन्यासी माया मोह में इतने लिप्त हैं जितना शायद ही कोई गृहस्थ हो। सब कुछ छोड़ने की उम्र में वे सर्वाधिक आसक्त हैं। अब इन वृद्धों को कौन समझए कि कहीं भी दो चार इकट्ठे होकर बेटे-बहुओं का दुख रोते वर्तमान समय को दोष देते हर जगह मिल जाएंगे। उनको लगता है कि मेरी गाढ़ी कमाई का उपयोग करते हुए पुत्र बहुएं हमारी सलाह क्यों नहीं लेते? उनके दुखों के अनंत कारण हैं, जिनका समाधान महर्षि व्यास के पास भी नहीं है। अपने रचे हुए सृष्टि से शिकायत का दोषी कौन है? - लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।
सम्पर्क सूत्र - 09407041430.Details

और भाग्य भरोसे रह गए हम..

चंद्रिका प्रसाद चन्द्र 
अहं ब्रrास्मि’ और ‘स्वयमेव मृगेन्द्रता’ का उद्घोष करने वाला देश, ईश्वराधीन और भाग्यवादी कैसे हो गया? सब कुछ वह करता है, हम निमित्त मात्र हैं, ‘उसके’ हाथ की कठपुतली हैं, डोर उसी के हाथ में है, जैसा नचाता है,       नाचते हैं, कभी लकड़ी के डर से, कभी प्रेम भरी पुचकार से। उस नंदी बाबा की तरह जो पैर पर लाठी लगने से दाता को आशीष में पैर उठा देता है। परिवार और स्वजन मोह से ग्रस्त कुरुक्षेत्र के खड़े अजरुन को समझने के सारे तर्क जब निष्फल हो गए तब कृष्ण ने उसे अपना विराट रूप दिखाया। और सबको मरा हुआ दिखाया, तब भी अजरुन ने गांडीव नहीं उठाया। अंत में कृष्ण ने सब कुछ छोड़कर अपनी शरण में आने को कहकर आश्वस्त भाव से युद्ध के लिए प्रबुद्ध किया। गीता के उपदेश निश्चेष्ट और अकर्मण्यता के विरुद्ध प्रवृत्ति के मार्ग पर चलने के हैं। लोक में गीता पढ़ना वजिर्त है, शायद इसलिए कि वह महाभारत का अंश है और महाभारत पढ़ने की लोक स्वीकृति नहीं है, क्योंकि वह युद्ध ग्रंथ है और युद्ध की समाप्ति के साथ का निव्रेद भाव अशांति उपजाकर मरने के लिए स्वर्गारोहरण का छद्म करता है। भारतीय बहुसंख्यक वर्ग ‘गॉड पार्टिकल’ की सूचना के बावजूद ईश्वर की मूर्ति स्थापना में लगा है। ऋषियों ने ज्ञान बल से ईश्वर चिंतन की अनुभूति की परंतु अपनी शक्ति को कमतर नहीं माना और इसकी स्थापना से इंकार नहीं किया कि उसने ही ईश्वर को जन्म दिया। साकार, निराकार और ‘नहीं होने’ के तर्क भी दिये परंतु चिंतकों के तमाम निषेधों के बीच लोक ने ईश्वर को इंकार नहीं किया। वह धरती पर मरता खपता रहा, उसका भाग्य वह अदृश्य ईश्वर लिखता रहा । वह इसे ब्रrा वाक्य मानता रहा कि ‘जो विधना ने लिख दिया, छठी रात के अंक। राई घटे न तिल बढ़े, रहुरे जीव निशंक।’ लेकिन उस भाग्य-लेख की लिपि किसी के पल्ले कभी नहीं पड़ी। सब कुछ हो जाने पर ‘यही भाग्य में लिखा था’ का स्वीकार भाव की परिणति ही उसकी निष्पत्ति रही, इसे ही भाग्य-बोध कहा गया।
भाग्य पर जीने वालों ने भाग्य से समझोता कर प्रतिरोध की संस्कृति को द्वार के बाहर ही रखा। इसी कारण इतने विशाल देश का भाग्य हमेशा विदेशी आकर लिखते रहे। कितनी संख्या में यवन, शक और हूण आए और हमारी भाग्यवादिता का मजाक उड़ाते हम पर शासन करते रहे। सकिंदर भाग्यवादी नहीं था, वह अपनी शक्ति से अनेक देशों पर विजय करते अंत में भारत पहुंचा था। सीमावर्ती पश्चिमी जनपदों में विजयी हुआ था परंतु लड़ते लड़ते थक चुका था। अपने देश तक वापस नहीं पहुंच सका।
अपना भाग्य, अपने कर्मो से विश्व इतिहास में लिख गया। विश्व विजेता भले ही न रहा हो, विश्व विजेता कहलाया। बाबर कितनी सेना लेकर आया लेकिन उसकी सल्तनत ने कई पीढ़ियों तक हम पर शासन किया। कर्म का यह सिद्धान्त हमारे देश में राम और कृष्ण से पहले भी था, परंतु हमने उन्हें अमानवीय या अतिमानवीय मानकर हाशिए पर डाल दिया। पिद्दी जैसे लोगों के सामने घुटने टेकने की अनगिनत कहानियां हमारे इतिहास में दर्ज हैं। आपसी मनमुटाव और भेदभाव में अम्भीक बनकर यवनों को निमंत्रित करते रहे। मुहम्मद गोरी और महमूद गजनवी के दंश को देश भोगता रहा। अंधभक्ति की अति तो तब हुई जब सोमनाथ के महंतों ने शिव की मूर्ति पर ही विश्वास कर कि ‘स्वयं सोमनाथ ही गजनवी का संहार करेंगे’ महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करते रहे और मूर्ति गजनवी के गदे के प्रहार से खण्ड-खण्ड हो गई। मंदिर में स्थापित मूर्तियां अन्यायी को दण्ड देगी, यह मनोभावना आज भी हमारी आस्तिकता का मेरुदण्ड है? पद्मनाभि मंदिर के उस गर्भ गृह को खोलने की इजाजत देने की शक्ति किसी व्यवस्था के पास नहीं है। मंदिरों में जमा असंख्य र8राशि जो ‘डम्प’ पड़ी है वह किसकी है और किसके काम आएगी? क्या वह जनता की गाढ़ी कमाई नहीं है जिसे राजाओं ने छुपाकर धर्मप्राण जनता को ठगा था, ईश्वर और उसके घर के नाम पर।
परम्पराओं के अत्यधिक दबाव से अक्सर हमने वर्तमान को समझने में भूल की। व्यापार की भीख मांगने वालों ने न सिर्फ हम पर शासन किया, हमारा इतिहास भी लिखा, हमें अपनी तरह बाहर से आया हुआ घोषित भी किया और जाते जाते सम्प्रदाय का वह विष बो गए जो आज भी फलफूल रहा है। उनके आने के पहले हमारे सम्प्रदाय संघर्ष की कहानी इतनी विषाक्त नहीं थी। डेढ़ सौ वर्ष की अंग्रेजी संस्कृति ने हमारी हजारों वर्षो की भारतीय संस्कृति की चूलें हिला दीं। आज भी हम उनके स्वागत में लाल दरी बिछाते हैं। वे जो हमारा कोहिनूर, तख्त-ए-ताउस चुरा ले गए। वे जिन्होंने लाल किले की छतों के फानूस, हीरे, नग, नोच लिए । वे जो हमारे बादशाहों की कोर्निश, हाथ जमीन पर रख सिर घुटने तक झुकाकर करते थे, आज उनकी भाषा और धोखा देने वाली संस्कृ ति का गुणगान करते नहीं थकते और वे हमें अपना पिछलग्गू समझते हैं। गोरी और गजनवी ने हमारी संस्कृति नहीं छीनी थी, धन लूटा था जिसे हम हाथ का मैल कहते थे, वे देश के आदर्श नहीं बने थे लेकिन अंग्रेज हमारे आदर्श बने हैं, हम भारतीय भाषाओं का विशाल भण्डार लिए अंग्रेजी में सोच और लिखकर ‘बुकर पुरस्कार’ पाने पर गर्वित हैं। भोजन, भारत का करके इंग्लैण्ड, अमेरिका में सांस ले रहे हैं। किस मुंह से हम विवेकानन्द, गांधी, रवीन्द्र का नाम लेते हैं। नाम स्मरण भक्ति का स्वरूप हो सकती है। उनके कार्यो को समय की आवश्यकतानुसार नया स्वरूप देना ही उन्हें याद करना है। कितनी अजीब विसंगति है कि गीता का कर्मयोग संतों और सन्यासियों की व्याख्या तक सीमित रह गया। उसे गांधी विनोबा, तिलक और अरविन्द ने जिस तरह समझ, उस तरह देश के निर्माताओं ने नहीं समझ।
हमने इतिहास से कभी सबक नहीं लिया, कदाचित इसीलिए हम हर बार पराजित होते रहे। राष्ट्रीय गान की तरह शब्द के अर्थ से परहेज करते हुए गाते रहे- ‘एक धोखा खा चुके हैं, और खा सकते नहीं’परंतु कभी विश्वास करते हुए कभी दबाव वश वार्ताओं की परिणामहीन परम्परा का निर्वाह करते रहे, कर रहे हैं। कभी कच्छ के रण का, कभी सियाचिन का कभी मेघालय, नागालैण्ड की सीमारेखा का रोना देश के सामने रोते रहे। हम न तो ठीक से किसी के विरोधी हो सके न मित्र। यह जानते हुए भी कि अमेरिका और चीन किसी के मित्र नहीं हो सकते, एकतरफा दोस्ती का हाथ बढ़ाते रहे। अमेरिका विश्व के लिए सिरदर्द ‘दादाभाई’ है। भारत उसके लिए सिर्फ उसका कबाड़ खरीदने के लिए बाजार है, चीन का भी सबसे बड़ा बाजार भारत है। हमने अपनी अस्मिता से समझोता कर लिया। अमेरिका-चीन नहीं बन सके परंतु क्यूबा और इजराइल से भी कुछ नहीं सीख सके। रूस जैसे मित्र को भी हाशिए पर डाल दिए। ‘अहं ब्रrास्मि’ दार्शनिकों के हिस्से में चला गया लेकिन मृगेन्द्र तो हम स्वयं थे, कहां गए वे भाव जो हमारे जीवन मूल्य थे।
- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।
सम्पर्क सूत्र - 09407041430.