Wednesday, December 12, 2012

यहाँ तो जुबान से झरती है माँ-बहन की इज्जत

चिन्तामणि मिश्र
उस दिन चौराहे पर भीड़ देख कर जब मैं नजदीक पहुंचा तो देखा कि दो युवक लड़ रहे थे। यह लड़ाई हाथ-पांव के माध्यम से कम किन्तु जुबान से ज्यादा हो रही थी। दोनों एक दूसरे की मां-बहिन-बेटी के साथ खुलेआम यौन सम्बन्ध जोड़ने की घोषणा कर रहे थे। निहायत गंदी और अश्लील गालियां उन बेकसूर औरतों के लिए बोली जा रही थीं, जो वहां नहीं थी और जिनका इन युवकों के झगड़े से कोई लेना-देना नहीं था।
यह लोक धारणा बनी है कि असभ्य समाज अपनी रूढ़ियों के कारण औरत को बेइज्जत करता है किन्तु जब सभ्य समाज औरत को केवल मादा मान कर अपनी मर्दानगी का पराक्रम दिखाता है तो अजीब लगता है और पीड़ा होती है। हमारे महान देश में औरतें दिन रात ऐसी गालियां सुनने के लिए शापित हैं जो सीधे उनसे यौन सम्बन्ध बनाने के लिए उछाली जाती हैं। एक दूसरे की मां-बहिन-बेटी की इस अदला-बदली में औरतों की फजीहत की जा रही है। यह सिलसिला पीढ़ी-दर-पीढ़ी से चल रहा है। औरत की हत्या भौतिक हथियारों के साथ-साथ बोली- भाषा के हथियारों से हर जगह की जा रही है। मर्दाना अहंकार हर हाल में अपनी तृप्ति मांगता है। किसी से बदला लेना है तो उसके घर की औरत के मान-सम्मान को तार-तार करके मर्दानगी फतह करने की डकार ली जाती है। औरत की देह गुनाह हो गई है। औरतों को शब्दों से दिगम्बर करने का भी शायद अपना ही सुख होता है। कौरव सभा में जब पांडव द्रोपदी को जुएं में हार गए थे तो द्रोपदी के बारे में इसी सुख को पाने के लिए कर्ण ने लज्जा-जनक शब्द कहे थे।
शब्दों का घिनौना खेल सामंती समाज से चलता हुआ उत्तर आधुनिक समाज तक कायम है। आज विज्ञापनों में औरतों को प्रस्तुत करने का ढंग बदला हुआ है। वहां देह,जवानी और चपलता है। नारी देह का इस्तेमाल पुरुषवाद और बाजारवाद की साङी साजिश का नतीजा है। औरत के दिल-दिमाग व हाथ-पैर को गायब किया जा चुका है, बचा है तो सिर्फ चेहरा, वक्ष और नितम्ब। ऐसे विज्ञापनों के केन्द्र में औरत केवल यौन सामग्री है।
आजादी को आए पैंसठ साल हो रहे हैं, किन्तु औरतों के मामले में सठिआई आजादी बांझ-बंजर है। बात कड़वी है, किन्तु हकीकत में आजादी मइया को औरतों के पास जाने ही नहीं दिया गया है। अभी भी हमारा समाज और हमारा देश मनु महराज से चिपका हुआ है। खाप पंचायतें फरमान जारी करती हैं कि औरतें मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करे। जीन्स-टाप न पहने। अपना जीवनसाथी खुद न चुने। देश में समानान्तर कानून और अदालतें खुले आम चल रही हैं और सरकारें इनके आगे समर्पण किए हैं।
जो औरत इनकी हुक्म-उदूली करती हैं, उसे सजाए-मौत दे दी जाती है। उस पर तेजाब डाल दिया जाता है। बाबा साहब अम्बेडकर के बनाए संविधान में औरत-मर्द को बराबरी का अधिकार दर्ज है, लेकिन संविधान की शपथ लेकर चलाई जा रही सरकारें इन महाबली पुरुष-कबीलों के आगे दंडवती मुद्रा में है। हर समाज और हर पुरुष खुद को सभ्य बताने और कहलाने के लिए मुनादी कर रहा है लेकिन औरतों की गरिमा की हिफाजत करने की जगह उसे रौंदने में जुटा है।
दरअसल, औरतों के सम्मान पर आधात करने की घटनाएं हर रोज, हर वक्त और हर जगह हो रहीं हैं। कानून ऐसी वारदातों के घटित होने के बाद जनता को डरपोक बता कर अपनी लाचारी बता देता है कि जनता ऐसी घटनाओं में दर्शक की भूमिका से आगे नहीं बढ़ती। उधर जनता की दलील होती है कि अगर गुंडों का प्रतिरोध किया तो गुंडे उन पर ही हमला कर देते हैं। कई मरतबा तो जान से भी हाथ धोना पड़ जाता है। पुलिस का संरक्षण नहीं मिलता है। इस प्रसंग में देश की बड़ी अदालत ने बहुत साफतौर पर जो दिशा-निर्देश जारी किए हैं,उनका ईमानदारी से पालन करने पर समस्या पर काबू पाया जा सकता है। अदालत ने कहा है कि ट्रेनों-बसों और भीड़-भाड़ वाली जगहों में पुलिस की तैनाती होनी चाहिए। स्कूल-कालेजों में आने-जाने के वक्त भी पुलिस तैनात की जानी चाहिए तथा बाजारों में सार्वजनिक जगहों पर कैमरे लगाए जाएं। निश्चय ही ऐसी व्यवस्था से औरतों की गरिमा पर आघात करने वाले मनमानी करने से हिचकेगें। लेकिन सामाजिक माहौल और प्रशानिक व्यवस्था पहल करने के लिए सक्रिय ही नहीं है। औरतों के यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ की वारदातों को लेकर सरकारें संवेदना-शून्य हो चुकी हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने वहां घटित कुछ बलात्कार की घटनाओं को बनावटी कह दिया। कई जिम्मेवार नेता छेड़छाड़ और बलात्कार के लिए औरतों को ही दोषी घोषित कर रहे हैं। इससे अपराधिक मानसिकता के पुरुषवादी दम्भ को बढ़ावा मिल रहा है। अश्लील फिकरेबाजी, छेड़खानी और बलात्कार कम होने की लगह बढ़ते जा रहे हैं।
अभी मध्यप्रदेश के गृहमंत्री ने विधानसभा में बताया कि प्रदेश में वर्ष 2010 में 3135 बलात्कार के मामले दर्ज हुए और वर्ष 2011 में बढ़ कर बलात्कार के माम¶े 3406 हो गए। ऐसे मामलों की भारी तादात है जो पुलिस के पास जाते ही नहीं है। यह एक प्रथा बन गई है कि पुलिस से पीड़ित पक्ष को अपेक्षित सहयोग भी नहीं मिलता है। कई मामले ऐसे भी हो चुके हैं कि जिनमें छेड़खानी से आहत लड़कियों ने आत्महत्या कर ली।
अभी इसी माह अमृतसर में एक पुलिस दरोगा को सत्तारूढ़ दल के जिलाध्यक्ष ने दिन-दहाड़े सैकड़ों नपुंसक गीदड़ों के सामने कई गोलियां चला कर मार डाला क्योंकि दरोगा अपनी बेटी को रोज छेड़खानी करने वाले इस हत्यारे को समझने गया था। सत्ता-बल,धन-बल और बाहु-बल से पगलाए लोग औरतों का भोग लगाने के लिए हर हद पार कर रहे हैं। कानून इनके आंगन में बैठा केवल प्रवचन दे रहा है और औरतों को नसीहत की पंजीरी थमा रहा है। अब तो इस सच्चाई को मान ही लेना चाहिए कि सरकार और समाज दोनों लव-ब्रेकरों के गिरोहों से डरे हुए हैं। इन हालातों में अगर गर्भ में ही कन्या वध करने का पाप लाचार मां-बाप कर रहे हैं तो उन्हें दोष देने का या बेटी बचाओ का कीर्तन करने का अधिकार हमें है, क्या? जिस समाज में और जिस देश में औरत यौन प्रताड़ना के लिए आसानी से उपलब्ध होने वाली लावारिस वस्तु समङी जाती हो उस समाज और देश में बेटी-बचाओ का नारा इसीलिए खोखला और बे-मानी हो रहा है। इन हालातों में एक ही रास्ता बचा है कि आत्म रक्षा के लिए लड़कियां कराटे का प्रशिक्षण लें और इन भेड़ियों की लू उतारें।
- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं।
सम्पर्क सूत्र - 09425174450.

Tuesday, December 11, 2012

नकद सब्सिडी का कमजोर आधार


जयंतीलाल भंडारी 

देश में नीतिगत आर्थिक सुधारों के तहत सब्सिडी के दुरुपयोग को रोकने के लिए केंद्र सरकार द्वारा अगले वर्ष पहली जनवरी से देश के 15 राज्यों के 51 जिलों में 'आपका पैसा आपके हाथ' यानी नकद सब्सिडी (कैश सब्सिडी) की योजना प्रायोगिक रूप से शुरू की जा रही है। इस योजना को एक अप्रैल, 2014 से पूरे देश में लागू करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत रसोई गैस, मिट्टी का तेल, छात्रवृत्ति, मनरेगा की मजदूरी और कमजोर वर्ग की मदद संबंधी 29 योजनाएं शामिल हैं। अभी खाद्यान्न और उर्वरक सब्सिडी को इसके बाहर रखा गया है।

इस व्यवस्था को इलेक्ट्रॉनिक बेनिफिट ट्रांसफर (ईबीटी) नाम दिया गया है। वस्तुतः देश में कमजोर, जरूरतमंद वर्ग को सब्सिडी देना सरकार की सामाजिक जिम्मेदारी है। देश में प्रतिवर्ष करीब 10 करोड़ गरीब परिवारों को लगभग 3.20 लाख करोड़ रुपये से अधिक की सब्सिडी दी जाती है। कमजोर तबके के लोगों को सब्सिडी देना जरूरी है, लेकिन उसका भारी दुरुपयोग भी चिंतनीय है। इसका अधिकांश भाग भ्रष्ट लोगों की जेबों में चला जाता है।

विभिन्न आर्थिक-सामाजिक अध्ययनों में यह बात उभरकर सामने आ रही है कि 100 रुपये में से 15 से 20 रुपये ही जरूरतमंदों तक पहुंच पाते हैं। नवंबर, 2012 में राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान (एनआईपीएफपी) ने विश्लेषण किया कि नकद सब्सिडी योजना से सरकार को 52.85 फीसदी की दर से फायदा हो सकता है। राजकोषीय सुदृढ़ीकरण पर सितंबर, 2012 में प्रकाशित विजय केलकर समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि सब्सिडी और राजकोषीय घाटे में भारी कमी लाने के लिए सरकार को सब्सिडी का दुरुपयोग रोकना होगा।

सब्सिडी का दुरुपयोग रोकने के लिए नंदन नीलेकणि कमेटी का साफ कहना है कि जिन लोगों को सब्सिडी की जरूरत है, उन्हें इसे नकद सहायता (कैश ट्रांसफर) के रूप में ही दिया जाना चाहिए। हमारे देश के राजकोषीय घाटे एवं सब्सिडी की स्थिति दक्षिण यूरोपीय देशों की तरह चिंताजनक होने की डगर पर आगे बढ़ रही है। ऐसे में सरकार द्वारा नकद सब्सिडी दिए जाने से संबंधित नीति में जो तब्दीली की गई है, उसकी आवश्यकता लंबे समय से बनी हुई थी।

चालू वित्त वर्ष के बजट में रखी गई 6.5 फीसदी विकास दर की प्राप्ति जिन कारणों से मुश्किल बताई जा रही है, उनमें सब्सिडी भी एक बड़ी वजह है। स्टैंडर्ड ऐंड पुअर्स और मूडीज जैसी वैश्विक रेटिंग एजेंसियों ने भारत की विकास दर का अनुमान पांच से साढ़े पांच फीसदी तक सीमित कर दिया है। कहा जा रहा है कि यदि भारी-भरकम सब्सिडी और राजकोषीय घाटे जैसी आर्थिक बुराइयों को शीघ्र नियंत्रित नहीं किया गया, तो देश की आर्थिक स्थिति और बिगड़ सकती है और देश में कर्ज संकट पैदा हो सकता है।

नकद सब्सिडी योजना की एक महत्वपूर्ण बाधा यह है कि इस समय सरकार के पास ऐसा कोई मूलभूत पैमाना नहीं है, जिसके आधार पर वह विभिन्न योजनाओं पर बढ़ते हुए महंगाई स्तर को माप सके और सरकारी योजना की लाभ राशि में वृद्धि कर सके। मसलन, सरकार वर्तमान बाजार मूल्य के मुताबिक वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए लोगों को नकद सब्सिडी का हस्तांतरण शुरू कर सकती है, लेकिन कीमतों में होने वाले फेरबदल के अनुरूप सब्सिडी की धनराशि बढ़ाने या घटाने से संबंधित कोई मूल्यांकन प्रणाली नहीं है।

निस्संदेह नकद सब्सिडी की योजना लाभप्रद और महत्वाकांक्षी है, परंतु इसकी डगर में कई मुश्किलें हैं। वस्तुतः यह योजना प्रमुखतः तीन बातों पर केंद्रित है- एक लाभार्थी का आधार कार्ड, दो, लाभार्थी का बैंक खाता और तीन, मजबूत आईटी आधार। स्थिति यह है कि आधार कार्ड का परिदृश्य कमजोर है। देश के 121 करोड़ लोगों में से अब तक सिर्फ 21 करोड़ लोगों के आधार कार्ड बने हैं। इतना ही नहीं, फर्जी आधार कार्ड भी बने हैं।

हैदराबाद में 800 आधार कार्ड फर्जी मिले हैं। जिस आधार कार्ड को लेकर सरकार इतना बड़ा ताना-बाना बुन रही है, उसे अभी कानूनी जामा नहीं पहनाया गया है। आधार कार्ड के डाटा की सुरक्षा पर भी सवाल उठ रहे हैं। नकद सब्सिडी योजना के दूसरे महत्वपूर्ण आधार बैंक खातों की स्थिति भी अच्छी नहीं है। देश में इस समय करीब 40 फीसदी लोग ही बैंक खाता रखते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो बैंक खाता रखने वाले लोगों की संख्या मात्र 18 फीसदी ही है।

इन सबके अलावा आशंका यह भी है कि सब्सिडी नकद रूप में प्राप्त करने के बाद यह जरूरी नहीं है कि उस पैसे का उपयोग उसी कार्य के लिए किया जाए, जिसके लिए अनुदान दिया गया है। परिवारों का मुखिया प्राप्त नकदी को जरूरी कामों के बजाय नशे, जुए तथा सामाजिक कुरीतियों जैसे कार्यों में खर्च कर सकता है। चूंकि अब भी बड़ी संख्या में ग्रामीण अशिक्षित हैं और वे सरकारी तंत्र से निपट पाने में सक्षम नहीं हैं।

ऐसे में बैंकों और अन्य वित्तीय कार्यों में मध्यस्थों की भूमिका बनी रहेगी। इससे गरीबों के नकदी से वंचित होने का खतरा बढ़ जाएगा। निश्चित रूप से नकद सब्सिडी योजना की डगर पर कई बाधाएं हैं। लेकिन इस योजना की उपयोगिताओं को देखते हुए इन बाधाओं को कारगर प्रयासों से दूर करना होगा।

देश के करोड़ों गरीब और जरूरतमंद लोग सामाजिक न्याय और सामाजिक सुरक्षा के लिए इस योजना से भारी उम्मीदें लगाए हुए हैं, तो दूसरी ओर अर्थव्यवस्था को जर्जर होने से बचाने, भ्रष्टाचार और महंगाई रोकने की इच्छा रखने वाले करोड़ों लोग इस योजना से भारी अपेक्षाएं रखते हैं। ऐसे में इतनी आशाओं और अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए सरकार की पुख्ता तैयारी, प्रशासनिक दक्षता तथा विश्वसनीयता के साथ त्वरित कदम और लाभार्थियों की जागरूकता जरूरी होगी।

लॉबिंग का काला कारोबार

सी. गोपीनाथ 
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वॉलमार्ट की लॉबिंग से जुड़ी खबर ने संसद में हंगामा खड़ा कर दिया। लेकिन सभी जानते हैं कि आज के दौर का सच यही है। अमेरिका में कॉरपोरेट लॉबिंग को कानूनी मान्यता मिली हुई है। भारत में लॉबिंग छुपछुपाकर अलग-अलग नामों का लबादा ओढ़कर की जाती है। लेकिन सभी का काम एक जैसा है-जनता से जुड़ी नीतियों और अहम आर्थिक निर्णयों को प्रभावित करना। इस क्रम में भले ही लोकतंत्र के मूल तत्वों को दबाना ही क्यों न पड़े। कृषि क्षेत्र से जुड़ा व्यवसाय, खाद, बीज, खेती में काम आने वाली मशीनें, डेयरी, ऊर्जा, विज्ञान और तकनीक और खुदरा जैसे क्षेत्र किसी भी देश की खाद्यान्न सुरक्षा को तय करते हैं। यही क्षेत्र कॉरपोरेट लॉबिस्ट के निशाने पर रहते हैं। भारत में घुसने के लिए हाल के कुछ सालों में दुनिया की नामी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए हैं। अक्सर कई नीतियां दिखने में तो सरकार के आर्थिक फैसले का नतीजा लगती हैं, लेकिन कई बार वे जबर्दस्त लॉबिंग का परिणाम होती हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अमेरिका लॉबिस्ट का गढ़ है। 
 ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के आंकड़ों के मुताबिक औसतन अमेरिकी कॉरपोरेट कंपनियां सिर्फ लॉबिंग पर हर महीने 1,234 करोड़ रुपये खर्च कर देती हैं। इतना बड़ा निवेश, कंपनियों को मोटा मुनाफा दिलाता है।  यह बात सही है कि वॉलमार्ट इस खेल में अकेला नहीं और तकरीबन शीर्ष की 100 फॉर्चून कंपनियां लॉबिंग पर जमकर खर्च कर रही हैं। इनमें आईटी दिग्गज इंटेल, गूगल, फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट और आईबीएम तक शामिल हैं। एग्रीबिजनेस, फार्मा, ऊर्जा और विमानन क्षेत्र शीर्ष पर इसलिए है क्योंकि यहां मुनाफा कमाने की गुंजाइश बहुत ज़्यादा है। आप पूछ सकते हैं कि लॉबिंग से कंपनियों को फायदा कैसे होता है? जवाब बहुत सरल है। लॉबिंग के जरिए कॉरपोरेशन को मिल रहे टैक्स छूट को हासिल किया जाता है। कंसास यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक वॉलमार्ट, हेवलेट-पैकर्ड, आईबीएम, फाइजर जैसे 93 बड़े कॉरपोरेशन 1,456 करोड़ रुपये की रकम लॉबिंग पर खर्च कर रहे हैं। इस रकम को लगाकर इन कंपनियों ने करीब  3.2 लाख करोड़ रुपये का टैक्स छूट हासिल किया। इतना मुनाफा होने की वजह से कंपनियां लॉबिंग के महत्व को मानती हैं। 
 अमेरिका में वॉलमार्ट का लॉबिंग को लेकर खुलासा सिर्फ एक झांकी भर है। कोई आश्चर्य नहीं कि मौजूदा वक्त में ब्रसेल्स के करीब 15,000 लॉबिस्ट यूरोपियन यूनियन के विधायी कामकाज को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। इनमें कंस्लटेंट, वकील, संगठन, कॉरपोरेशन, एनजीओ शामिल हैं। विकीपीडिया के मुताबिक ब्रसेल्स में करीब 2,600 ऐसे दफ्तर हैं , जो यूरोपियन यूनियन को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे पता चलता है कि कॉरपोरेट लॉबिंग अमेरिका और यूरोप और अब भारत में आर्थिक नीतियों को तय कर रही है। आर्थिक फैसले लोगों की जरुरत की वास्तविक स्थिति को देखकर नहीं बल्कि इस बात पर लिए जा रहे हैं कि कौन सी कंपनी नीति को प्रभावित करने में कितना निवेश कर सकती है। 
(लेखक सफल्क यूनिवर्सिटी, बोस्टन में स्ट्रेटेजी एंड इंटरनेशनल बिजनेस में प्रोफेसर हैं)  

Sunday, December 9, 2012

अंग्रेजो भारत आओ!

फिर वही लोकप्रिय उदाहरण याद आता है..खौलते पानी में मेढ़क को डालेंगे तो वह पतीली से उछलकर बाहर आ जाएगा किन्तु ठन्डे पानी में तैर रहे मेढ़क सहित पतीली को मंद आंच में गरम करेंगे तो मेढ़क उसी में पककर विलीन हो जाएगा।.. खुदरा व्यापार में एफडीआई का दूरगामी असर ऐसे ही होने वाला है। आज एफडीआई के पैरोकार ऐसे दौर में उसके फायदे गिना रहे हैं जिस दौर में अमेरिका समेत दजर्नों पूंजीवादी अर्थव्यवस्था वाले देशों में निन्यानवे बनाम एक का आन्दोलन अंदर ही अंदर धधक रहा है। अमेरिका में आक्यूपाय द वॉल स्ट्रीट से इसका आगाज हो चुका है। उन पूंजीवादी देशों के लोगों को यह बात अच्छी तरह समझ में आ चुकी है कि उनके देश की अर्थव्यवस्था महज एक प्रतिशत लोगों की मुट्ठी में कैद है। यहां तो विषमता की स्थिति और विकट है। लोकतंत्र की परिभाषा ‘कारपोरेट की कारपोरेट के द्वारा कारपोरेट के लिए’ हो चुकी है। केन्द्र व राज्य सरकारों की नीतियां इन्हीं के हिसाब से बन-बिगड़ रही हैं।
अपने देश में रिटेल मार्केट में एफडीआई के प्रवेश से आने वाले दिनों में जो होना है सो होगा। पारंपरिक और कुटीर उद्योग धंधों को तो अपने देश के ही बड़े औद्योगिक घरानों और कम्पनियों ने पहले से ही समेट रखा है। आजादी के कुछ वर्षो बाद तक अपने गांवों की स्वतंत्र अर्थव्यवस्था थी। सुनार, लोहार- बढ़ई, ठठेर, पटवा, धोबी-नाई सबके पारंपरिक धंधे होते थे।
कृषि उत्पादों के विनमय के साथ लेन-देन होता था, किसान का काम भी मजे से चलता था और गांव के पारंपरिक उद्योग धंधे भी।
सभी परस्पर एक-दूसरे से सामाजिक-आर्थिक रिश्तों की डोर से बंधे हुए थे। आज सुनारी का धंधा तनिष्क जैसी दजर्नों ब्रांडेड ज्वेलरी की कम्पनियों ने छीन लिया। लोहारी के काम में टाटा िजन्दल जैसी कम्पनियां आ गईं। कांसे और पीतल के बर्तन इतिहास हो गए। नाई के धंधे को ब्यूटी पार्लर और मेंस पार्लर चलाने वाली बीएलसीसी जैसे चैन आउटलेट्स ने हजम करना शुरू कर दिया। क्या आप जानते हैं कि देश के मुर्गा-अंडा बाजार का कब्जा तीन कुलीन घरानों के पास है? जी हां जबलपुर के विश्वनाथ दुबे की फीनिक्स पोल्ट्री, पुणो के देशपाण्डे घराना और हैदराबाद का रेड्डी घराना देश की अंडा-मुर्गे की मांग का आधे से अधिक आपूर्ति करता है। देश के सबसे बड़े आधुनिक स्वीपर बिन्देश्वरी पाठक हैं, जिनके सुलभ इन्टरनेशनल ने अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति अजिर्त की है। सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आ रहा पारंपरिक कारीगरी और धंधे का हुनर बड़े औद्योगिक घरानों ने उसी तरह आहिस्ता-आहिस्ता छीना, जिस तरह ठंडे पानी में तैरता मेढ़क मंद आंच में पक जाता है उछलकर बाहर नहीं आ-पाता। खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का असर ऐसे ही धीरे-धीरे दिखेगा। फौरी तौर पर तो यह अच्छा लगता है कि किसानों का उत्पाद सीधे रिटेल मार्केट में जाएगा और बिचौलियों की जेब में जाने वाला पैसा किसानों और उपभोक्ताओं के मुनाफे व राहत में बंटेगा। पर उस दिन क्या होगा जब किसानों को विदेशी रिटेल मार्केट की शर्त पर उनकी थोपी गई गुणवत्ता के अनुरूप उत्पाद बेचने के लिए बाध्य किया जाएगा? तब तो कोई विकल्प नहीं होगा सिवाय इसके कि वह खेती रिटेल मार्केट के खिलाड़ियों को सौंप दे फिर उसका सुपरवाइजर और फिर मजदूर बन जाए।
गांधी ने ग्राम स्वराज्य की परिकल्पना की थी। मैनचेस्टर की मिलों के मुकाबले खादी और चरखे को खड़ा किया। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सशक्तीकरण का प्रतीकात्मक आंदोलन था।
स्वतंत्रता संग्राम में सेनानियों की वस्त्र व अस्त्र रही खादी और चरखे को आजादी मिलने के साथ ही भुला दिया। गांधी की कल्पना थी गांव स्वतंत्र आर्थिक इकाई बनकर उभरें, इसके उलट नेहरू को भारत का भविष्य शहरों की चमक में दिखा।
कुटीर और परम्परागत उद्योगों के मुकाबले भारी उद्योग और सोवियत का इकॉनामी मॉडल। आरक्षण-सब्सिडी और वजीफे की नीतियों ने आम आदमी को स्वावलंबी बनाने की बजाय परजीवी बना दिया। सरकार ने इतनी उम्मीदें जगा दीं कि मोहल्ले में हैजा फैल जाए पर गंदगी मुनिस्पलटी ही उठाएगी। आरक्षण राजनीति में तुरप का इक्का बन गया। पारंपरिक उद्योग धंधों व कारीगरों में मूल्यवर्धित कला कौशल विकसित करने की बजाय सरकारी नौकरियों के सब्जबाग दिखाए। सबको नौकरी मिलना असंभव और पुराने उद्योग धंधे भी हाथ से गए। एनडीए सरकार में एससी एसटी कमीशन के अध्यक्ष प्रो. सूरजभान ने एक बार कहा था देश में परती पड़ी सरकारी भूमि को अनुसूचित जाति- जनजाति के परिवारों के बीच बांट दीजिए और आरक्षण, वजीफा, सब्सिडी सब वापस ले लीजिए। पांच साल के भीतर ये सब परिवार अपने पांवों पर खड़े हो जाएंगे। यही बात एकता परिषद के ओ. राजगोपाल कर रहे हैं। पर सरकार की संरक्षित भूमि कारपोरेट उद्योगों, सेज, मॉल्स के लिए हैं। जब इसके लिए किसानों को ही भूमिहीन बनाया जा रहा है तो भूमिहीनों को जमीन देने की क्या गरज पड़ी। सरकार की नीतियां साजिशन दो वर्ग पैदा कर रही हैं। मजदूर-मालिक, शोषित-शोषक, भारत-इन्डिया।
पार्लियामेंट में बहस और वोटिंग तो सिर्फ राजनीतिक कर्मकाण्ड है। एनडीए भी होती तो वह भी एफडीआई लाती। भूमिका तो उसी ने तैयार की थी। पूंजी जुटाने के लिए सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने वाला एक भरा पूरा मंत्रालय ही गठित किया था िवनिवेश मंत्रालय। कम्युनिस्टी जरूर इसके खिलाफ होंगे।
जाहिर बात है कि अमेरिका आज भी उनके लिए पूंजीवाद का प्रतीक है। यदि रिटेल मार्केट में चीन के निवेश की पहल होती तो कम्युनिस्टी क्या करते.? यह भी जानना दिलचस्प होगा।
थियानमन चौक पर छात्रों के संहार का समर्थन करने वाले हमारे कामरेड अमेरिका और चीन को लेकर अभी भी दो राहे पर हैं।
विदेशी रिटेल मार्केट हमारे खोमचों की कमर जब तोड़ेगा तब, पर चीन के सस्ते उत्पाद तो देशी बाजार की सूरत कबके बिगाड़ चुके हैं। दीवाली के दिये और होली की पिचकारी सब कुछ चीन निर्मित। हमारे बाजार में चीन का दखल भी उतना ही असरकारक होगा जितना कि अमेरिका का।
बहरहाल आज हमारी अर्थव्यवस्था जिस पटरी पर चल पड़ी है उसका अगला स्टेशन एफडीआई ही है। 1992 में जब देश ..अंग्रेजो भारत छोड़ो.. आंदोलन की अर्धशताब्दी मना रहा था तब बतौर वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ..अंग्रेजो भारत आओ.. की पटकथा लिख रहे थे बीस साल बाद उस पटकथा की परिणति एफडीआई को संसद में बहुमत से मिली स्वीकृति के रूप में हुई। ईस्ट इन्डिया कम्पनी के जहाज ने कलकत्ते के बंदरगाह में लंगर डालने के बाद व्यापार तब तक नहीं शुरू किया था, जब तक कि देशी राजाओं व नवाबों को घूंस देकर पटा नहीं लिया। जिस तरह तब के राजा और नवाब ईस्ट इंडिया के गुन गाते थे, उसी तरह आज के वे नेता और नौकरशाह वॉलमार्ट के गाते हैं। वॉलमार्ट ईस्ट इन्डिया कम्पनी का नया रूप धरकर सामने आ रहा है, अब दो ही विकल्प हैं या तो इसका स्वागत करें या डंडे खाएं..।
लेखक - स्टार समाचार के कार्यकारी सम्पादक हैं। संपर्क-9425813208

Friday, December 7, 2012

कब होई हमरे रिमही केर बिहान

चिन्तामणि मिश्र
 रीवा और शहडोल राजस्व संभाग में रिमही बोली का इस्तेमाल हिन्दी से अधिक है। शहरों की तुलना में इस क्षेत्र में गांवों से लेकर कस्बों,बाजारों में यह धड़ल्ले से बोली जाती है। शहरों में भी बंगलों के ड्राइंग रूमों को छोड़ कर हर जगह रिमही बोली का चलन है। असल में रिमही और बघेली दोनों एक ही बोली हैं। बघेली नाम से रिमही का सम्बोधन करने से यह भ्रम उपजाया जा सकता है कि इसका प्रभाव क्षेत्र बघेलखंड तक ही है, किन्तु हकीकत यह नहीं है। रिमही अवध, बांदा, चित्रकूट अंचल की भी बोली है। रिमही बोली अवधी,भोजपुरी, बुन्देली और वृज की तरह प्राचीन है। इसमें बड़ी मात्रा में सदियों से गीत, कविता, कथा-कहानी, नाटक, निबन्ध लिखे जा रहे हैं। लोक साहित्य का तो रिमही में प्रचुर भडांर है। डा0 हरांश राय बच्चन ने उत्तर प्रदेश के लोक गीतों का जो संकलन प्रकाशित किया था उसमें सर्वाधिक लोक गीत रिमही बोली के हैं। लेकिन रिमही बोली की धरोहर को खोजने, सभांलने और प्रकाश में लाने के लिए संगठित तरीके से प्रयास करना तो दूर की बात है।
बघेलखंड में एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय दो प्रदेश सरकार द्वारा नियंत्रित विश्वविद्यालय हैं। अभी-अभी एक प्राइवेट विश्वविद्यालय भी जन्मा है, किन्तु रिमही की लोक सम्पदा और इसके साहित्य को सहेजने के लिए व्यस्थित ढंग से काम ही नहीं शुरू किया गया। वैसे इस क्षेत्र में रिमही के प्रसार-प्रचार के लिए कई साहित्यिक संस्थाओं की उपस्थिति अखबारों के माध्यम से मिलती है, किन्तु इनका काम-काज कवि सम्मेलन और शाल- नरियल सम्मान की औपचारिकता के आगे नहीं बढ़ पाता है।
कवि सम्मेलन होते रिमही के नाम पर किन्तु रिमही थोड़ी देर बाद ही हाशिए की ओर धकेल दी जाती है।
हिन्दी तो हमारे ललाट केशर-चन्दन से रचा-बसा त्रिपुन्ड है। किन्तु अपने ही आंगन में बघेली का तिरस्कार कतई उचित नहीं कहा जा सकता। रीवा विश्वविद्यालय इस इलाके का पहला विश्वविद्यालय है और इसकी शुरूआत पर इस क्षेत्र के प्रबुद्धजनों को आशा थी कि वह रिमही के साहित्य, संस्कृति, पुरातत्व के संवर्धन व विकास के लिए सहेजने का काम करेगा किन्तु ऐसा नहीं हुआ और रिमही को बचाने, उसके साहित्य को उसकी लोक परम्परा को संरक्षित करने की विश्वविद्यालय ने ईमानदारी व लगन से काम करने की कभी जरूरत नहीं समङी।
हिन्दी के अर्न्तगत बघेली का एक पाठ या एक पेपर निर्धारित कर देने से विश्वविद्यालय का दायित्व समाप्त नहीं होता है। रिमही बोली पर गाहे-बगाहे कभी कोई शोध या प्रोजेक्ट होता है भी तो रिमही से अनजान लोगों के जिम्मे सौंप दिया जाता है। यहां गैर बघेली रीतिकालीन दरबारी कवि के लिए शोध पीठ स्थापित हो सकती है, किन्तु रिमही के लिए क्यों नहीं? विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति स्थानीय थे, किन्तु रिमही उपेक्षित ही रही। बाद में भी कई बार इस इलाके के कई नगीने कुलपति बने किन्तु किसी ने भी अपनों द्वारा मिली उपेक्षा से उपजी रिमही की सिसिकियों को नहीं सुना। बाहर से आयात होकर आए कुलपतियों से तो ऐसी बांझ आशा करना ही बेकार है। यह भी विडम्बना है कि विश्वविद्यालय का आधे से ज्यादा स्टाफ घर-बाहर रिमही बोलता-समझता है, किन्तु अपनी बोली-बानी के लिए कभी कुछ न करने की शपथ ले रखी है।
बघेलखंड के सतना, रीवा, सीधी, सिंगरौली, शहडोल, उमरिया और अनूपपुर जिलों में शहरी आबादी घर के बाहर हिन्दी बोलती है, लेकिन आपसी बातचीत में घर, खेत- खलिआन में रिमही का उपयोग होता है। इस तरह इस क्षेत्र में हिन्दी अल्पसंख्यक हैं, किन्तु एक मिथक यह पसर गया है कि यह इलाका हिन्दी भाषा-भाषी है जिसकी बोली-बानी भी हिन्दी है। लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। असल में हम बोली के मामले में अभी तक एक तरह की हीनता ग्रन्थि के शिकार हैं।
औपनिवेशक गुलामी ने हमारी सोच को भ्रष्ट किया है।
तथाकथित बुद्धिजीवियों ने पूरी ताकत से यह स्थापित करने में सफलता लूट ली है कि देशी भाषा-बोली का व्यवहार गंवार लोग करते हैं। सन् 1947 तक बघेलखंड देशी रियासत के आधीन रहा। यहां शिक्षा के साधन और सुविधाएं, खासतौर पर उच्च शिक्षा के लिए कोई इंतजाम नहीं रहा। यहां लोग प्राथमिक- माध्यमिक तक ही शिक्षा ले पाते थे। यह योग्यता इन्हें सिपाही, फारेस्ट गार्ड, पटवारी, क्लर्क, प्राइमरी का मास्टर, चपरासी बनाती थी। शासन चलाने के लिए बाहरी लोग आते, जिनका इस अंचल और अंचल की बोली रिमही से कोई लेना-देना व सरोकार कभी नहीं होता था। वे हिन्दी अंग्रेजी बोलते थे और उनके सम्पर्क में आए स्थानीय लोग भी इसी बोली-बानी को बरतने के लिए मजबूर थे।
रीवा के महाराजा गुलाब सिंह ने सिंहासन पर बैठते ही राज्य के सरकारी कामकाज की भाषा-बोली रिमही घोषित कर दी किन्तु शासन चलाने वाले बाहरी लोगों ने बेहद चतुराई से इसे होने नहीं दिया। रिमही उच्च वर्ग के जनान खाना और चूल्हा- चौके में परिक्रमा करती रही किन्तु आम आदमी और कुछ साहित्यकारों ने रिमही कसर पर बैठाया। लोक-मन रिमही के साथ रहा और बाजार ने अपनी छाती से लगा कर रखा। रिमही के सम्मान और अनुसंधान का अर्थ यह कतई नहीं है कि हिन्दी को क्षति पहुचाई जाए। बोलियों के विकास से तो हिन्दी का भाषाई लोकतंत्र स्थापित होगा और हिन्दी को रिमही के विशाल भंडार का खजाना मिल जाएगा। बोलियों के साथ हिन्दी की आवाजाही बढ़ेगी और हिन्दी में आया ठहराव टूटेगा।
रिमही के रस-कलश से एक बूंद भी जिन्हें नसीब नहीं हुई है पे अक्सर कहते हैं कि साहित्य के नाम पर रिमही में है क्या? यह सवाल गैर-लोकतांत्रिक और बोली-भाषा को लेकर सांमती सोच की उपज है। रिमही की सबसे बड़ी थाती उसका सहजसर ल सौन्दर्य है। कभी अपभ्रंश के कवि ने कहा था कि नायिका बिना किसी आभूषण और बनाव सिंगार के, फटे पुराने कपड़ों में भी ऐसी है कि आते-जाते रसिकों को उठक-बैठक कराती है।
रिमही में भी वही सामथ्र्य है। इसमें मौखिक परम्परा का विपुल साहित्य है और लिखित में भी हर विधा का साहित्य लिखा गया किन्तु साधनों का अभाव, क्षेत्र में जमीं स्थायी आर्थिक दरिद्रता ने मुद्रण-प्रकाशन-वितरण की राह रोक रखी है। आज रिमही के छितराए साहित्य को खोज कर सामने लाने की जरूरत है। रिमही में अपार सम्भावनाएं हैं। जरूरत केवल इतनी है कि उसके ही आत्मीय-जन एक जुट होर उसे गौरवपूर्ण स्थान पर विराजने के लिए सक्रिय हों। 
- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं।
सम्पर्क - 0925174450.

तुम्हारी मेज चांदी की, तुम्हारे जाम सोने के

चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र
प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर अपना भारत एक अमीर देश है। समूचा विश्व यहां उद्योग लगाने एवं व्यापार करने के लिए उतावला है। जहां गरीब लोग रहते हैं। प्रतिवर्ष बढ़ती गरीबी रेखा यहां चिंता का विषय नहीं है, देश इस बात पर गर्वित है कि विश्व के प्रमुख दस धनकुबेरों में भारतीय भी हैं। जिस देश की आबादी का बहुत बड़ा प्रतिशत गरीबी रेखा के नीचे खड़ा हो, उस देश के नेताओं का अरबों रुपया विदेशी बैंकों में जमा हो। गरीबी से निजात पाने पर बहसें न हों, बेरोजगारी भत्ता जैसी निष्क्रिय बनाने एवं मनरेगा जैसी निठल्ली योजना और मुफ्त भोजन देने की बातें, किस तरह से परजीवी नागरिक बनाकर सबसे बड़े लोकतंत्र का ढोल पीट रही हैं? कौन कहे? कर्ज से डूबे किसान आत्महत्या कर रहे हैं, आदिवासियों की पुश्तैनी जमीन छीनकर कंक्रीट के जंगल खड़े हो रहे हैं, और किसान मजदूर भुखमरी का प्रतिशत बढ़ा रहे हैं। लोकतंत्र को पूंजीतंत्र रूपांतरित होने की यह अद्भुत कहानी है। किसान की खेती योग्य जमीन का भी क्या कोई मुआवजा हो सकता है? जिस जमीन पर उनके अतीत के महल खड़े हैं, उन्हें न चाहते हुए भी बेचना पड़ता है क्योंकि पत्थर से मजबूत सिर नहीं होता। जमीन तो सरकार की है, किसान तो मात्र लगान देता है, वह भी बहुत कम। भुखमरी से मरने वाले लोग शहरी नहीं ग्रामीण हैं। अकाल, बाढ़- बूड़ा में मरने वाले ग्रामीण होते हैं। वे ग्रामीण ही हैं जो शहरों के किसी किनारे में रहते हुए शहर को गंदा कर रहे हैं, वे ही सर्दी और गर्मी में भी मरते हैं।
आज तक किसी डॉक्टर की ऐसी रिपोर्ट नहीं आई कि कोई भूख से मरा है। भूखा, भूख से व्याकुल होकर कुछ अखाद्य खा लेता है और डॉक्टर कुपोषण को दोष देते हैं। जब भूखे का पोषण ही पर्याप्त नहीं है फिर कुपोषण कैसा? भूख से मृत्यु संस्कार की बदनामी है। वह कब तक इस मुगालते में रहेगी कि वह विश्व की छठी बड़ी ताकत है। जिस व्यक्ति का आधा शरीर लकवाग्रस्त हो, वह भी ताकतवर हो सकता है, कौन जाने? अंग्रेजों के जमाने में भूख से मरने वालों की संख्या इतिहास में दर्ज है। बंगाल का अकाल, अट्ठासी का अकाल तो मुहावरों में दर्ज है। वैसे भी हमारे ऋषियों ने भूख दबाने के अभ्यास की शिक्षा आर्ष ग्रंथों में खूब दी है। उपवास हमारी साधना का अंग है। इससे आत्मा को संतुष्टि मिलती है और परमात्मा खुश होते हैं। "कृषक मेघ की रानी दिल्ली" आज यथार्थ है। अदम गोंडवी ने देश की स्थिति देखी है, वे आंकड़ों के कवि नहीं- "लगी है होड़ सी देखो, अमीरी औ गरीबी में। ये पूंजीवाद के ढांचे की बुनियादी खराबी है। तुम्हारी मेज चांदी की, तुम्हारे जाम सोने के। यहां जुम्मन के घर में आज भी फूटी रकाबी है।" शहर की गरीबी नापी गई तो आंकड़ा बत्तीस पर रुका। यदि आप शहर में रहते हैं और बत्तीस रुपये रोज कमाते हैं। गांव में रहकर छब्बीस रुपये रोज पाते हैं तो आप गरीब नहीं हैं। कितनी हास्यास्पद स्थिति है यह? प्रकृति ने भारत को अकूत सम्पदा दी है। परंतु उसका दोहन और वितरण हम ठीक से नहीं कर सके। नदी के पानी का समुचित उपयोग न करके उसके अमृत जल को प्रदूषित कर दिया।
कहने को नदियों को मां कहते रहे लेकिन उसके साथ मां जैसा व्यवहार नहीं किया। धरती के लौह अयस्क का सारा कच्चा माल लगभग मुफ्त में दे दिया और हजार गुने मंहगे दाम पर खरीदने को विवश हैं। गरीब की नमक रोटी को टाटा जैसी कम्पनियों को बेचकर गांधी के नमक सत्याग्रह का मजाक उड़ा रहे हैं। आखिर क्या जरूरत थी कि एक रुपये की लागत का नमक बीस रुपये के रैपर की ब्रांड में बिके। सार्वजनिक वितरण प्रणाली का ढिंढोरा पीटने वालों ने गांवों में जाकर क्या कभी मानीटरिंग की, कि गरीबी रेखा और अति गरीबी रेखा के नीचे जिनका नाम है। क्या वे वाकई पात्र हैं। गरीबी रेखा में नाम लिखाने की भीड़ में अच्छे खासे खाते पीते लोग हैं। गरीबी शर्म की नहीं गर्व का मानक बन गई है। सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक व्यक्ति तक पहुंच रहा है कि नहीं, इसकी जांच के लिए कोई ईमानदार कोशिश नहीं हो रही है। सच तो यह है कि आज हर अमीर दिल से गरीब है जबकि गरीब का दिल अमीर है, उसके अंदर संवेदना के भाव हैं। दूसरे के हक को हड़पने का भाव उसमें नहीं है। विश्व में सबसे श्रेष्ठ लोहा, कोयला हमारे पास है। सबसे सुन्दर बारहों महीने फसल देने वाले खेत हमारे पास हैं। इस विडम्बना पूर्ण स्थिति पर हमारे कर्णधारों को शर्म नहीं आती, इन पर बहसें नहीं होतीं। सांसद होने पर, भारतीय होने पर नेताओं को किंचित शर्म आने लगी है। किसानों के खेत देशी और विदेशी उद्योगपतियों ने खरीद लिए। नौकरी के लालीपाप ने धरती माता की संज्ञा छीन ली।
पुरखों की जमीन से विस्थापित होकर वह अपने जमीर की जमीन तलाश रहा है। कॉरपोरेटों की सुरक्षा में सरकार लगी हैं। अन्नदाता अन्न नहीं उपजा रहा है। नए सामंत तैयार हो रहे हैं। पुराने किसान का अनाज माटी के भाव जाता है, अब वही अनाज ब्रांड बनकर किसान के लिए मुहाल हो जाएगा। इसी देश में कभी ऐसा भी होता था कि राजा रात को भेष बदलकर जनता का सुख दुख जानने के लिए निकलता था। सुबह समस्याओं का निदान करता था। राजा की छोटी इकाई सरपंच हर गांव में है, परंतु उनको अपने अलावा किसी की चिन्ता नहीं। सरकारी कर्मचारी, सरपंच और मंत्रियों ने आपस में ऐसी साठ-गांठ कर ली है कि (गंदगी) ढूंढ़ते रह जाओगे। विकास का वह दौर कब आएगा जब बिना किसान की स्वीकृति के कोई सरकार उसकी जमीन पर कंक्रीट के महल खड़ा नहीं कर सकेगी और उसकी जमीन पर लगने वाले उद्योग में उसका एक निश्चित प्रतिशत तय होगा। किसान मजदूर बेरोजगार है। कृषि प्रधान देश का मुहावरा किसानों को चिढ़ाने के लिए बना एक जीवंत और शाश्वत व्यंग्य है। किसानों और मजदूरों की यही नियति है। इस व्यवस्था में न्याय और अदालत भी उसी के साथ है जिसके पास पैसा है। धन आधारित इस विकास के युग में सेवा, त्याग, बलिदान आदि मानवीय गुण अपना अर्थ बदल चुके हैं। सेवा-शासन और प्रशासन की, त्याग-तुम्हारा कुछ भी नहीं, बलिदान याने राजा बलि को छलिये बावन ने तीन पग में सब कुछ तो नाप ही लिया, बलि की देह भी नाप ली। संभवत: पुराणों में यह अप्रतिम दान था। ऐसा ही दान, किसानों को भी अपने प्रभुओं को देना होगा। कर्ज माफी, मुफ्त बिजली, लैपटाप, मोबाइल जैसे प्रलोभन देकर सरकारें कब तक गरीबी का मजाक उड़ाएंगी।

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक हैं।

Monday, December 3, 2012

कारपोरेट मीडिया का कला सच

ठहरे हुए पानी में पत्थर फेंकने से सिर्फ लहरें भर ही नहीं उठतीं, अपितु तलछट में जमी गंदगी भी उतराने लगती है। इन दिनों लोकतंत्र के भव सागर में पत्थरबाजी का दौर चल रहा है। कभी व्यवस्थापिका तो कभी कार्यपालिका और गाहे-बगाहे न्यायपालिका की गंदगी और सड़ांध को देश देखने व सूंघने के लिए अभिशप्त है। इन दिनों इन बजबजाहटों का बखान करने वाले मीडिया की गंदगी ऊपर तैर रही है। जी न्यूज के दो दिग्गज संपादक हिरासत में हैं। आरोप है कि जिन्दल समूह को कोयला घोटाले की खबर को लेकर ब्लैकमेल व भयादोहन किया। सौ करोड़ की रकम मांगी। कारपोरेट मीडिया का यह नया रंग है। अब तक खबर छापने या दिखाने के एवज में धन की मांग के आरोप लगते थे। इस बार खबर न दिखाने के लिए धन की मांग की गई। स्टिंग करके दूसरों को चौराहे पर नंगा करने वाले खुद स्टिंग के शिकार हो गए, यानी कि शिकारी खुद यहां शिकार हो गया।पूरे देश में मीडिया के इस चरित्र को लेकर चर्चा है। कारपोरेट मीडिया में सन्नाटा है। सोशल मीडिया मुखर है। देश असलियत जानना चाहता है। असलियत जानने के लिए कई बुनियादी बातों को समझना होगा। इन बुनियादी बातों में जानना होगा कि मीडिया का कारपोरेट के रूप में कैसे कायान्तरण हो गया और जब यह कारपोरेट का झण्डा और बाना संभाल ही चुकी है तो इसमें प्रेस के मूल तत्व कितना बचे हैं। और जब पत्रकारिता विशुद्ध रूप से धंधे में तब्दील हो चुकी है तो प्रेस की आजादी यानी कि अभिव्यक्ति एवं स्वतंत्रता को ये किस हद तक ढाल बना सकते हैं। ये सब चीजें ऊन के गोले की भांति उलझ चुकी हैं। पत्रकारिता का छात्र होने के नाते मीडिया के इस नए रूप को समझने व समझने का काम बड़ा दुष्कर सा लगने लगा है।
दरअसल, देश के भारत और इन्डिया के बीच विभाजित हो जाने का असर सभी क्षेत्रों में पड़ा है। मीडिया में भी उतना ही जितना कि अर्थव्यवस्था और राजनीति में। कारपोरेट मीडिया वस्तुत: इन्डिया का प्रवक्ता है और अपने रसूख तथा चमक-दमक के दम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को घर की दासी मानता है। भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पत्रकारिता अभी भी उन मूल्यों को लेकर चलने की कोशिश कर रही है जिससे 'प्रेस जैसी संस्था' की साख बनी थी। प्रकाशन व प्रसारण का व्यवसाय बड़े औद्योगिक घरानों के कब्जे में जाने के बाद व सोशल मीडिया संजीवनी बनकर अवतरित हुआ है। आजादी के पहले तक मिशन और उसके बाद प्रोफेशन बनने के बाद 'प्रेस' में जब से बड़े घरानों का वर्चस्व बना, तब से सामाजिक सरोकार तेजी से सिकुड़ते गए और मीडिया कारपोरेट वॉर का अस्त्र बनता गया। इसकी शुरुआत करने का श्रेय इन्डियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका को जाता है। अस्सी के दशक में नुस्ली वाडिया और धीरूभाई अम्बानी के विवाद में एक्सप्रेस समूह ने अम्बानी घराने के खिलाफ लम्बा अभियान चलाकर कारपोरेट जगत को मीडिया के बेजा इस्तेमाल का प्रादर्श प्रस्तुत किया। धीरे-धीरे 'मीडिया' प्रेस के रूप में सामाजिक सरोकारों को धता बताते हुए कब अपने शाब्दिक अर्थ 'दलाल' के रूप में कायांतरित हो गया, यह तब पता चला जब टू-जी स्पेक्ट्रम मामले में कारपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया का टेप जगजाहिर हुआ। इस टेप में बरखा दत्त (एनडीटीवी की वही महिला जांबाज पत्रकार जो कारगिल युद्ध को कवर करके चर्चित हुई थी) और वीर सिंघवी (हिन्दुस्तान टाइम्स के युवा तुर्क सम्पादक व भ्रष्टाचार पर वीर के तीर चलाने वाले) की असलियत सामने आई कि किस तरह मीडिया सत्ता के गलियारों में कारपोरेट जगत की दलाली करती है और देशहित को ताक पर रखकर सत्ता के फैसलों को प्रभावित करती है। कामनवेल्थ के घोटाले का पर्दाफाश टाइम्स आफ इन्डिया ने किया। यह भी सही है कि इस बड़े आयोजन में औने-पौने के सौदे में करोड़ों और अरबों रुपयों का गबन हुआ। लेकिन इसके पीछे की गाथा भी कम दिलचस्प नहीं थी। दिल्ली के एक वरिष्ठ व प्रतिष्ठित पत्रकार ने एक हिन्दी पत्रिका में तथ्यों व सबूतों के साथ खुलासा किया कि टाइम्स आफ इन्डिया की इवेन्ट कम्पनी भी कई ठेकों की दावेदार थी, उसे जब ठेके हासिल नहीं हुए तो कामनवेल्थ का घोटाला सामने आ गया।
अभी कुछ महीनों पहले जब पूर्व सेनाध्यक्ष वीके सिंह और सरकार के बीच विवाद चरम पर था तब इन्डियन एक्सप्रेस के सीईओ कम संपादक शेखर गुप्ता ने एक स्टोरी ब्रेक की कि भारतीय फौज ने दिल्ली पर कब्जा करने के लिए कूच कर दिया था। बाद में खबर गलत साबित हुयी। वह एक सैन्य अभ्यास का हिस्सा था। बाद में कहीं पढ़ने को मिला सैन्य साजोसामान की सौदेबाजी के लिए दबाव बनाने हेतु यह खबर जारी की गई क्योंकि वीके सिंह सौदे के लिए राजी नहीं थे और यह खबर वक्त से पहले उन्हें रिटायर्ड करने पर मददगार साबित हो सकती थी। कारपोरेट के हित साधने के लिए मीडिया का यह खेल सिर्फ दिल्ली भर में ही नहीं प्रदेश की राजधानियों में भी गाहे-बगाहे चलता है। प्रदेश में जब शिवराज सिंह की मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी हुई उसी दिन दिल्ली में गोविन्दाचार्य ने एक प्रेस कान्फ्रेंस करके इस बात का खुलासा किया कि प्रदेश के एक बड़े मीडिया घराने का उमा भारती से हित न सध पाने की वजह से यह प्रपंच रचा गया।
दरअसल जब हम प्रेस या मीडिया की बात करते हैं तो उसकी पृष्ठिभूमि में बाबू विष्णुराव पराड़कर, तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी या शिशिर घोष, तुषारकांति घोष जैसे पत्रकारों व इनके अखबारों की छवि होती है। दुर्भाग्य से हम धंधा बन चुके मीडिया को अभी भी धंधे से इतर देखने की कोशिश करते हैं। आज मुख्य धारा के मीडिया पर ऐसे उद्योगपतियों का कब्जा है जिन्हें चैनल चलाने या अखबार निकालने के अलावा, सीमेंट-स्टील-पॉवर प्रोजक्ट, रीयल स्टेट के भी धंधे चलाने हैं, अखबार या चैनल तो प्रभु वर्ग तक पहुंचने के लिए विजिटिंग कार्ड हैं और जरूरत पड़े तो प्रतिद्वंद्वियों और धंधे के आड़े आने वाले लोगों को सबक सिखाने का औजार। पण्डित नेहरू ने भारत में मीडिया के भविष्य को पहले ही आंक लिया था, तभी तो जब 60 के दशक में निखिल चक्रवर्ती और कुलदीप नैयर जैसे पत्रकारों के प्रतिनिधि मण्डल ने उनसे भारत में प्रेस की स्वतंत्रता (संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में ही प्रेस की स्वतंत्रता को मान लिया गया है।) के संदर्भ में अमेरिका की तरह विशेषाधिकार (अमेरिका में प्रेस की स्वतंत्रता अलग से परिभाषित है) दिये जाने की मांग की तो उन्होंने प्रतिप्रश्न किया कि इस स्वतंत्रता का उपभोग आप लोग करेंगे या आपके अखबारों के मालिक यह तय करके बताइयेगा? नेहरू के बाद से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह तक दुबारा कोई ऐसा प्रतिनिधि मण्डल नहीं गया प्रेस की स्वतंत्रता की अलग से मांग करने क्योंकि वास्तविकता सभी को मालुम है।
लेखक दैनिक स्टार समाचार के सम्पादक एवं वरिष्ठ साहित्यकार हैं.