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Thursday, November 29, 2012

कौन आजाद हुआ


@[100001906812341:2048:Digamber Ashu]r जी के पोस्ट से पता चला कि आज अली सरदार जाफरी जी का जन्म-दिन है ... उनकी नज्में अक्सर मुझे अपनी तरफ खींच लेती हैं ...उनके जन्मदिन के अवसर पर एक उनकी नज़्म 
 
कौन आज़ाद हुआ ?


किसके माथे से सियाही छुटी ?
मेरे सीने मे दर्द है महकुमी का 
मादरे हिंद के चेहरे पे उदासी है वही 
कौन आज़ाद हुआ ?

खंजर आज़ाद है सीने मे उतरने के लिए 
वर्दी आज़ाद है वेगुनाहो पर जुल्मो सितम के लिए 
मौत आज़ाद है लाशो पर गुजरने के लिए 
कौन आज़ाद हुआ ?

काले बाज़ार मे बदशक्ल चुदैलों की तरह 
कीमते काली दुकानों पर खड़ी रहती है 
हर खरीदार की जेबो को कतरने के लिए 
कौन आज़ाद हुआ ?

कारखानों मे लगा रहता है 
साँस लेती हुयी लाशो का हुजूम 
बीच मे उनके फिरा करती है बेकारी भी 
अपने खूंखार दहन खोले हुए 
कौन आज़ाद हुआ ?

रोटियाँ चकलो की कहवाये है 
जिनको सरमाये के द्ल्लालो ने 
नफाखोरी के झरोखों मे सजा रखा है 
बालियाँ धान की गेंहूँ के सुनहरे गोशे 
मिस्रो यूनान के मजबूर गुलामो की तरह 
अजबनी देश के बाजारों मे बिक जाते है 
और बदबख्त किसानो की तडपती हुयी रूह 
अपने अल्फाज मे मुंह ढांप के सो जाती है 


कौन आजाद हुआ ?
                                                                                                                       
सरदार ज़ाफरी को सलाम के साथ
..........................................

 
कौन आज़ाद हुआ ?

किसके माथे से सियाही छुटी ?

मेरे सीने मे दर्द है महकुमी का

मादरे हिंद के चेहरे पे उदासी है वही

कौन आज़ाद हुआ ?

खंजर आज़ाद है सीने मे उतरने के लिए

वर्दी आज़ाद है वेगुनाहो पर जुल्मो सितम के लिए

मौत आज़ाद है लाशो पर गुजरने के लिए

कौन आज़ाद हुआ ?

काले बाज़ार मे बदशक्ल चुदैलों की तरह\

कीमते काली दुकानों पर खड़ी रहती है

हर खरीदार की जेबो को कतरने के लिए

कौन आज़ाद हुआ ?

कारखानों मे लगा रहता है

साँस लेती हुयी लाशो का हुजूम

बीच मे उनके फिरा करती है बेकारी भी

अपने खूंखार दहन खोले हुए

कौन आज़ाद हुआ ?


रोटियाँ चकलो की कहवाये है

जिनको सरमाये के द्ल्लालो ने

नफाखोरी के झरोखों मे सजा रखा है

बालियाँ धान की गेंहूँ के सुनहरे गोशे

मिस्रो यूनान के मजबूर गुलामो की तरह

अजबनी देश के बाजारों मे बिक जाते है

और बदबख्त किसानो की तडपती हुयी रूह

अपने अल्फाज मे मुंह ढांप के सो जाती है

कौन आजाद हुआ

Monday, November 26, 2012

दो मुल्क, दो हमले, बदला भारत-अमरीका?


ज़ुबैर अहमद
 सोमवार, 26 नवंबर, 2012 को 17:14 IST तक के समाचार
मुंबई
मुंबई पुलिस को बेहतर हथियार दिए जाने के साथ-साथ कई दूसरी सुरक्षा एजेंसियों की स्थापना हुई है.
अमरीका में आम धारणा है कि 9/11 के हमलों के बाद देश और समाज हमेशा के लिए बदल गया.
चार साल पहले आज के दिन जब मुंबई पर तीन दिनों तक चरमपंथी हमले हुए थे, जिस दौरान लोगों ने टीवी पर हमला करने वालों को सीधे-सीधे देखा, तो कुछ विशेषज्ञों ने उस समय भी कहा था कि भारत अब हमेशा के लिए बदल जाएगा.
मैं अमरीका में हाल में पूरे साल भर रहा. मुंबई हमलों के दौरान मैं मुंबई में था और अभी भी मुबंई में रहता हूं. इन हमलों के बाद क्या बदलाव महसूस किया है मैं दोनों देशों में?
मुंबई हमलों में दौरान तीन दिनों तक टीवी पर लाइव हमलों की कवरेज ने देश के लोगों को झिंझोड़ दिया था. इसके एक हफ्ते बाद मुंबई और अन्य शहरों में आम लोग सड़कों पर उमड़ आए और सरकार के ख़िलाफ़ नारे लगाए.
लोगों ने कहा अब भारत हमेशा के लिए बदल जाएगा है. लेकिन क्या ऐसा हुआ है?

अमरीका में बने नए क़ानून

अमरीका में 9/11 के बाद कुछ बाहरी बदलाव आया जैसेकि अमरीकी हवाई अड्डों पर सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम. भारत में भी सुरक्षा का प्रबंध बढ़ा लेकिन उस तरह से नहीं जैसा कि अमरीका में हुआ है.
मुंबई
मुंबई के हमलों मे जान के साथ-साथ अरबों रूपए का नुक़सान भी हुआ.
अमरीका ने पेट्रियट एक्ट जैसे कई नए कानून बनाए और होमलैंड सिक्यूरिटी जैसे कई नए विभाग वहां खोले गए. भारत ने कोई नया कानून तो नहीं बनाया गया मगर जांच एजेंसी नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी का गठन ज़रूर हुआ.
वाशिंगटन पोस्ट अख़बार के अनुसार 9/11 के बाद अमरीकी प्रशासन ने 260 से अधिक नए विभाग खोले या पुराने विभागों को फिर से संगठित किया. आतंक निरोधी काम में 1200 सरकारी महकमें और 1900 निजी कंपनियां जुडी हैं.
भारत में इतना बड़ा परिवर्तन अब तक नहीं देखने को मिला है.
मुंबई में एनएसजी की शाखा स्थापित की गई और मुंबई पुलिस को आधुनिक हथियार दिए गए हैं.
इसके इलावा भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसियों और अमरीकी ख़ुफ़िया संस्थाओं के बीच ताल मेल बढा जिससे चरमपंथियों पर नज़र रखने की क्षमता में कई गुणा इज़ाफ़ा हुआ है.
मुंबई पुलिस का दावा है कि चार साल के अरसे में मुंबई हमलों की तरह या दूसरा कोई बड़ा आतंकी हमला नहीं हुआ जो इस बात का संकेत है कि अब चरमपंथियों पर सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी बढ़ी है.

समाज विभाजित

अमरीका
अमरीका में एयरपोर्ट पर सुरक्षा बहुत कड़ी हो गई है.
लेकिन अमरीका में असल बदलाव महसूस होता है वहां रहने के बाद.
कहते हैं 9/11 के बाद समाज दो हिस्सों में विभाजित हो गया - एक हिस्सा मुस्लिम विरोधी समझा जाने लगा और दूसरा हिस्सा वो जो मुस्लिम विरोधी नहीं माना गया.
मुसलमानों के खिलाफ़ हमले 9/11 के बाद कई गुना बढे़ हैं.
भारत में ऐसा कुछ नहीं हुआ.
मुंबई हमलों के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराया गया. भारतीय मुसलमानों के खिलाफ जज़बात नहीं भड़काए गए. न हीं भारत का समाज उस तरह से विभाजित हुआ.
मैं 9/11 के पहले भी कई बार अमरीका जा चूका हूं. पहले की तुलना में 9/11 के बाद वाले अमरीका में व्यक्तिगत स्वतंत्र कम हुई है.
रिपब्लिकन पार्टी की धारणा ये है कि एक व्यक्ति की निजी ज़िन्दगी में सरकरी दखल कम से कम हो लेकिन लोगों की निजी जिंदगी में दख़ल देने का काम भी रिपब्लिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के काल में शुरू हुआ.

सरकार का दख़ल

मैं कुछ दिन पहले अमरीका में था. वहां मैंने कई अमरीकियों से पूछा कि क्या अब वो उस तरह से आज़ाद महसूस करते हैं तो लगभग सभी की राय थी कि अमरीकी हुकुमत का निजी जीवन में अब पहले से काफी ज़्यादा दखल है.
अमरीका
अमरीका में समाज में विभाजन और बढ़ा है.
भारत में कोई ऐसा कानून नहीं बनाया गया जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रा को ठेस पहुंचे.
आतंकवाद के बारे में लिखने वाले एक वरिष्ठ अमरीकी पत्रकार सेबेस्टियन रोटेला कहते हैं 9/11 के बाद आम अमरीकी बाहर की दुनिया के बारे में अधिक जानकारी हासिल करने की कोशिश करने लगा.
रोटेला ने बीबीसी को बताया, "एक आम अमरीकी पहले अपने घरेलू मामलों में अधिक उलझा हुआ था. वो बाहर की दुनिया से कटा हुआ था. वो पूछने लगा दुनियां अमरीकियों से नफरत क्यों करती है?"
विशेषज्ञों का कहना है कि 9/11 के बाद खुफिया एजेंसी एफ़बीआई और सीआईए के काम करने का तरीका बदल गया है.
एफबीआई ने संदिग्ध संगठनों और व्यक्तियों के बीच खुफिया तरीके से घुसना शुरू किया और उनके नापाक इरादों पर से पर्दाफाश किया है जिसके नतीजे में कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं हैं.
मुंबई हमलों के चार साल बाद सुरक्षा के दृष्टिकोण से कुछ बदलाव तो आया है लेकिन ये कहना सही नहीं होगा की देश हमेशा के लिए बदल गया है