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Thursday, April 17, 2014

जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं ? --हरिशंकर परसाई

जगत के कुचले हुए पथ पर भला कैसे चलूं मैं ?  

किसी के निर्देश पर चलना नहीं स्वीकार मुझको
नहीं है पद चिह्न का आधार भी दरकार मुझको
ले निराला मार्ग उस पर सींच जल कांटे उगाता
और उनको रौंदता हर कदम मैं आगे बढ़ाता

शूल से है प्यार मुझको, फूल पर कैसे चलूं मैं?

बांध बाती में हृदय की आग चुप जलता रहे जो
और तम से हारकर चुपचाप सिर धुनता रहे जो
जगत को उस दीप का सीमित निबल जीवन सुहाता
यह धधकता रूप मेरा विश्व में भय ही जगाता

प्रलय की ज्वाला लिए हूं, दीप बन कैसे जलूं मैं?

जग दिखाता है मुझे रे राह मंदिर और मठ की
एक प्रतिमा में जहां विश्वास की हर सांस अटकी
चाहता हूँ भावना की भेंट मैं कर दूं अभी तो
सोच लूँ पाषान में भी प्राण जागेंगे कभी तो

पर स्वयं भगवान हूँ, इस सत्य को कैसे छलूं मैं?



क्या किया आज तक क्या पाया?
.......................................

मैं सोच रहा, सिर पर अपार
दिन, मास, वर्ष का धरे भार
पल, प्रतिपल का अंबार लगा
आखिर पाया तो क्या पाया?

जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा
जब थाप पड़ी, पग डोल उठा
औरों के स्वर में स्वर भर कर
अब तक गाया तो क्या गाया?

सब लुटा विश्व को रंक हुआ
रीता तब मेरा अंक हुआ
दाता से फिर याचक बनकर
कण-कण पाया तो क्या पाया?

जिस ओर उठी अंगुली जग की
उस ओर मुड़ी गति भी पग की
जग के अंचल से बंधा हुआ
खिंचता आया तो क्या आया?

जो वर्तमान ने उगल दिया
उसको भविष्य ने निगल लिया
है ज्ञान, सत्य ही श्रेष्ठ किंतु
जूठन खाया तो क्या खाया?

Tuesday, August 6, 2013

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों

- गोपालदास "नीरज" (Gopaldas Neeraj)
छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है |
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है |
माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है |
खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चाँदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों, चाल बदलकर जाने वालों
चँद खिलौनों के खोने से, बचपन नहीं मरा करता है |
लाखों बार गगरियाँ फ़ूटी,
शिकन न आयी पर पनघट पर
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल पहल वो ही है तट पर
तम की उमर बढ़ाने वालों, लौ की आयु घटाने वालों,
लाख करे पतझड़ कोशिश पर, उपवन नहीं मरा करता है।
लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी ना लेकिन गंध फ़ूल की
तूफ़ानों ने तक छेड़ा पर,
खिड़की बंद ना हुई धूल की
नफ़रत गले लगाने वालों, सब पर धूल उड़ाने वालों
कुछ मुखड़ों के की नाराज़ी से, दर्पण नहीं मरा करता है।

Saturday, June 22, 2013

सेबक राम मरा कबसे

अलसुबह भैय्याजी को रोने की सामूहिक आवाजों ने नींद से जगा दिया। वे घर के बाहर निकले तो सड़क पर पानी छिछला था। कान सामूहिक विलाप के समवेत स्वरों की ओर थे और आंखें छिछले पानी में कुछ खोज रहीं थीं। अचानक उनकी छठी इन्द्रिय ने सूचना दी कि भैय्याजी ये पानी नहीं है, आपकी प्रिय क्षेत्रीय जनता के आंखों का आंसू है जो यहां तक बहकर पहुंच गया। भैय्याजी की आत्मा में बैठा भावुक समाजसेवी यकायक जाग उठा। उन्होंने कुर्ता-पाजामा पहना, ड्रायवर को गाड़ी लगाने के लिए आवाज दी। पत्नी ने पूछा- सुबह-सुबह कहां चल दिए। भैय्याजी ने बताया, पड़ोस के गांव रोने के लिए जाना है। सामने चुनाव हैं सो रोनेवालों के साथ रोना तो पड़ेगा ही। किसी कुशल प्रबंधक की तरह पत्नी ने भैय्याजी के कलफदार कुर्ते को एक दो जगह ब्लेड से चीरा और पाजामें में कीचड़ मल दिया। भैय्याजी पत्नी की अकल के मुरीद थे आखिर वे सजधज के रोने जाते तो लोग क्या कहते?
रोना भी एक कला है। इसके लिए गला भर नहीं गति-लय, आरोह और अवरोह भी चाहिए होता है। गांवों में महिलाएं रोने के अन्दाज के लिए जानी जाती है। बेटी किसी की बिदा हो रही हो, स्वर जानकर दूर से पूरा गांव जान जाता कि फलाने की बहू रो रही है। ज्यादातर मामलों में लोगों को मजबूरी में रोना होता है। दिल हंसता है, मुंह से रुदन के  स्वर निकलते हैं और आंखों से आंसू। जो ऐसे गमगीन मसले पर रोने के लिए अभ्यस्त नहीं है वे फिल्मों से प्रेरणा प्राप्तकर पिपरमेंट का प्रयोग करते हैं। मुंह से कैसी भी आवाज निकले आंखों से टप्प-टप्प आंसू गिरे, लोग इसे रोना ही मानेंगे। भैय्याजी के जेब में पिपरमेंट की डिबिया थी। गांव के सीवान तक पहुंचे ही रोने की आवाजें तेज व साफ सुनाई दे रही थीं। उन्होंने देखा एक घर के चौगान पर गांव के लोग स्त्री-पुरुष-बच्चे जमा थे। ज्यादा देर से रोने वाले सुबक रहे थे, कुछेक के मुंह से विलाप के मद्धिमसुर निकल रहे थे, जो हाल में आए थे वे तेज-तेज रो रहे थे। भैय्याजी नवागंतुक थे, लिहाजा पिपरमेंट लगी रूमाल आंखों में रखकर जोर-जोर से रोने लगे। भैय्याजी को रोते देख सब चुप हो गए और कौतुकी नजरों से देखने लगे। दरअसल भैय्याजी इलाके के सबसे ज्यादा रसूखवाले आदमी थे। दो बार एमएलए रह चुके थे। आखिरी के छ: महीनों में मंत्री भी रहे। इन आखिरी के छ: महीनों में क्षेत्र की जनता को इतना रुलाया कि जब चुनाव हुआ तो भैय्याजी के तिबारा चुनाव जीतने के अरमां आंसुओं में बह गए। सो इसलिए वे आंसू और रोने के महात्म को भली भांति समझने लगे थे। वे किसी के जश्न में शामिल हों या नहीं पर इलाके के मरे-जरे लोगों के दाह संस्कार, दशगात्र, तेरही-बरखी में जरूर जाते थे। भले ही बेटा की मनउती में बुढ़ऊ मरे हों और वह दिल ही दिल खुश हो, पर भैय्याजी उसका भी कंधा पकड़कर दो-चार टुप्प आंसू बहा लेते और भर्राई आवाज में कहते चिन्ता न करो बेटा 'मैं हूं न..। भैय्याजी उस दिन जाते ही रोने में भिड़ गए। ज्यादा लोग, ज्यादा रुदन, ज्यादा आंसू, ज्यादा असर। वे पूछ ही नहीं पाए कि आखिर सब लोग रो क्यूं रहे हैं? ऐसे में पूछना जोखिम भरा रहता है। लोग मान सकते हैं कि भैय्याजी जैसे रसूख वाले नेता को इतनी भी खबर नहीं कि उनके क्षेत्र में क्या हो रहा है। 
वह गांव के मुखिया का घर था। भैय्याजी ने नजरें दौड़ाईं तो देखा मुखिया, उनके बेटे, मुखियाइन और सभी लोग सकुशल थे। उनमें से किसी की आंखों में आंसू की एक लकीर तक नहीं! मुखियाजी जैसे ही किसी नए आने वाले को ढांढस बंधाते हुए घटना बताने की चेष्टा करते वह फफक-फफक कर रो पड़ता। फिर उसे रोते हुए देख, नया आने वाला रोने लगता। बस सुबह से यही सिलसिला चल रहा था। मुखिया क्या... किसी ने कुल्ला-मुखारी तक नहीं की थी। और मुखिया के घरवाले व उनके मुंहलगे नौकर के अलावा कोई जान भी नहीं पा रहा था कि असली वजह क्या है? भैय्याजी के आने के बाद शोक का ग्लैमर भी बढ़ गया था। पड़ोस के गांवों से भी लोगों के आने का सिलसिला शुरू हो गया था। मुखिया सांसत में थे। वे तो नौकर की बेवकूफी के चक्कर में फंस गए थे। यदि दरवाजे पर शोक मनाने वाले सैकड़ों लोगों की भीड़ न लगी होती तो वे अपने नौकर को इतने जूते मारते कि वह किसी काम का न बचता। इस बीच वहां इलाके के दूसरे समाजसेवियों की मोटरें आती दिखीं। भैय्याजी को गमगीन व रोते देख नए उत्साही समाजसेवी व चुनाव की उम्मीदवारी के उम्मीदवार और तेज से रोने लगते। मुखियाजी को लगा कि इलाके के सारे लोग एक साथ रोएंगे तो उनके आंसुओं की धारा से मेरी ये बखरी ही बह जाएगी। मुखिया ने दिल मजबूत किया.. और शांति-शांति-शांति की आवाज लगाई। सब चुप... सन्नाटा छा गया। मुखिया ने रहस्य खोला दरअसल सुबह-सुबह मेरा ये हरामजादा नौकर मुझसे यह कहते हुए लिपटकर रोने लगा.. कि सेबकराम मर गया.. बाबूजी.. सेबकराम के बिना आप कैसे जी पाएंगे..। बस उसके तेज रोने की आवाज से पड़ोसी आ गए.. रोते गए.. दरअसल सेबकराम - मेरे एलसीसियन कुत्ते का नाम था। यह बात सही है कि मैं उसे बहुत चाहता था। मुखिया के चुप होते ही.. भैय्याजी बोले- भाइयों मैं भी जानता था कि 'सेबकरामजी..ही मरे हैं और मेरे आंसू भी उन्हीं को समर्पित हैं। आज के दौर में जब आदमी-आदमी को ही सांप की तरह डसता है। चुनाव आने पर वोटर नेताओं की खाल 
में भुस भरता है, ऐसे दौर में ... आदमी से जानवर ज्यादा वफादार है। आइए हम सब दो मिनट की मौन श्रद्धांजलि दें। इन दो मिनटों में भैय्याजी मन ही मन अपने नेता होने पर रो रहे थे।

Friday, June 14, 2013

रूपए की इज्जत का सवाल है बाबा

उस दिन जब रुपया धड़ाम से नीचे गिरा तो अर्थशास्त्रियों के बीच हाहाकार मच गया। तेजडिय़ों, मंदडिय़ों के चेहरे सूख गए। शेयर बाजार में सेनसेक्स और निफ्टी के कांटे हार्टअटैक नापने की मशीन के कांटे की तरह ऊपर-नीचे हो रहे थे। टीवी चैनलों से चिन्तित आवाजें आ रही थीं। देश की अर्थव्यवस्था हांफ रही है, वित्तमंत्री जी कुछ करिए। वित्तमंत्री जी देश को दिलासा दे रहे थे कि सब कुछ ठीक हो जाएगा... डॉलर की अकड़ जल्दी ही ढ़ीली पड़ जाएगी। अभी हमारे बंदे पता लगा रहे हैं कि कौन-कौन सा क्षेत्र एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) के लिए बचा है। उन इलाकों की भी खोज की जा रही है जहां मल्टीनेशनल्स या अमेरिकी पूंजी से चलने वाले कारपोरेट घरानों को तेल-गैस- कोयला - हीरा और अन्य खनिज खोदने के पट्टे दिए जाएं। इनका पता लगते ही डालरों की बरसात होने लगेगी और अपना रुपया फिर तन जाएगा।
अपुन अर्थशास्त्री नहीं है, लिहाजा पहले तो रुपए गिरने की खबर सुनी तो लगा.. रिजर्व बैंक के खजाने से रुपए की पेटी या ट्रंक धड़ाम से नीचे गिरा होगा। रुपए का गिरना और उठना अपन बीपीएल (बिलो पॉवर्टी लाइन) वालों को समझ में नहीं आता। वैसे भी हम गरीबी रेखा के नीचे गिरे हुए लोग हैं। फिर भी अपने मोहल्ले में रहने वाले और सरकारी स्कूल में इकॉनामिक्स-कॉमर्स पढ़ाने वाले मास्साब से पूछा कि सर जी ये रुपया गिरता कैसे है? मास्साब संविदाकर्मी थे, डीईओ-बीईओ को रिश्वत देकर नौकरी पाई थी, .. सो उस टीस को अपनी व्याख्या में घोलते हुए कहा कि जैसे मेरा प्रिन्सिपल डीईओ के, डीइओ शहर के नेता के, नेताजी-मुख्यमंत्री के,  मुख्यमंत्री आलाकमान के चरणों पर पाटापसार गिरते हैं, वैसे ही अपना रुपया डॉलर के चरणों में गिर गया है। मास्साब बोले- जब समूचे देश में ही नीचे गिरने की होड़ मची हो तो बेचारा रुपया कब तक थमा-तना रहेगा। हाल ही में देखा ... कि क्रिकेटर रुपए के लिए कितना नीचे गिर सकते हैं। सरकार के कई नेता मथानी घपले घोटालों में फंसकर नीचे गिर गए। कोई चारित्रिक रूप से नीचे गिरता है तो कोई नैतिक रूप से। इसे ऐसई गिरे रहने दो। मैंने कहा - मास्साब सवाल ये है कि अपना रुपया डॉलर के सामने गिरा है, ये अपने देश के स्वाभिमान से जुड़ा मामला है। गांधीजी चर्चिल के सामने तो नहीं गिरे। विवेकानंद ने शिकागो में भूखे भारत की धार्मिक व अध्यात्मिक शान के झण्डे को फहराया। धमकी पर धमकी के बाद भी इन्दिरा जी अमेरिका के आगे नहीं गिरी। मास्साब आखिर अपने रुपए का कुछ तो स्वाभिमान होना चाहिए। जब देखो तब डॉलर के आगे पसर जाता है। मास्साब ने ज्ञान की पिटारी खोली और जानकारी दुरुस्त करते हुए बताया अपने प्रधानमंत्री कौन है? डा. मनमोहन सिंह हैं न। ये वही मनमोहन सिंह है कभी जिनके दस्तखत रिजर्व बैंक के नोट पर रहते थे। फिर ये आईएमएफ (इन्टरनेशनल मनिटरी फंड) और वल्र्ड बैंक में नौकरी करने गए। इन दोनों जगहों में डॉलर का ही बोलबाला है। फिर इन्डिया लौटे तो नरसिंहराव के खजांची बन गए। जब खजांची बने तो देखा खजाने में एक डॉलर भी नहीं। चन्द्रशेखर जी देश का सोना गिरवी करवा गए थे। मनमोहनजी ने जुगत लगाई और देश के खिड़की -दरवाजे डॉलर के प्रवेश के वास्ते खोल दिए। इन्डिया आओ, डॉलर दो, लूटो खाओ, डॉलर दो। इसी को आर्थिक उदारीकरण यानी कि ग्लोबलाइजेेशन कहते हैं। यूरोपी कम्पनियां इन्डिया आईं डॉलर दिया, प्राकृतिक संसाधनों को लूटा। अपने प्रधानमंत्री का डॉलर प्रेम या डॉलर भय पुराना है। सो जब डॉलर अपने फॉर्म पर आता है तो अपनी अर्थव्यवस्था के रंग उड़ जाते है और रुपया डॉलर के चरणों पर बिछ जाता है। और यह तब तक बिछा रहता है जब तक अमेरिका, यूरोप के मल्टीनेशनल्स डॉलर की नई खेप लेकर इन्डिया नहीं पहुंचते। यानी कि जब रुपया गिरे तो समझिए कोई नया विनिवेश-आर्थिक समझौता और व्यापारिक सौदा होने वाला है। मास्साब का अर्थशास्त्र आपके पल्ले पड़ा या नहीं ये आप जाने... अपुन के तो सिर के ऊपर से निकल गया।

Wednesday, June 12, 2013

बड़े वेगमय पंख हैं रोशनी के

धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
बहुत बार आई-गई यह दिवाली
मगर तम जहां था वहीं पर खड़ा है,
बहुत बार लौ जल-बुझी पर अभी तक
कफन रात का हर चमन पर पड़ा है,
न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न टूटे
उषा को जगाओ, निशा को सुलाओ!
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
सृजन शान्ति के वास्ते है जरूरी
कि हर द्वार पर रोशनी गीत गाये
तभी मुक्ति का यज्ञ यह पूर्ण होगा,
कि जब प्यार तलावार से जीत जाये,
घृणा बढ रही है, अमा चढ़ रही है
मनुज को जिलाओ, दनुज को मिटाओ!
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
बड़े वेगमय पंख हैं रोशनी के
न वह बंद रहती किसी के भवन में,
किया क़ैद जिसने उसे शक्ति छल से
स्वयं उड़ गया वह धुंआ बन पवन में,
न मेरा-तुम्हारा सभी का प्रहर यह
इसे भी बुलाओ, उसे भी बुलाओ!
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
मगर चाहते तुम कि सारा उजाला
रहे दास बनकर सदा को तुम्हारा,
नहीं जानते फूस के गेह में पर
बुलाता सुबह किस तरह से अंगारा,
न फिर अग्नि कोई रचे रास इससे
सभी रो रहे आँसुओं को हंसाओ!
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
                              "नीरज" 

मौसरे भाईयों का अरण्यरोदन

जिस दिन से सूचना आयुक्त ने फरमा दिया कि सभी राजनीतिक दलों के भीतर खाने में भी झांकने की कानूनी इजाजत है उसी दिन से सभी मौसेरे भाई फिर एक सुर से बोलने लगे। आमतौर पर जब-जब एेसे किसी अनिष्ट की आशंका होती है, तमाम बैरभाव भुलाकर सभी मौसेरे भाई एक छतरी के नीचे आ जाते हैं। पिछली मर्तबे अन्नाजी के खिलाफ एक हुए थे। अन्नाजी ने राजनीति में ऑपरेशन क्लीन की बात उठाई। कहा लोकपाल बना दो और उसकी जद में प्रधानमंत्री से लेकर मंत्री, संत्री, सांसद, विधायक सभी को ला दो। अन्ना के खिलाफ भी सभी मौसेरे भाई एक हो गए। लोकपाल बिल में पलीता लगा दिया। टीम अन्ना में तोड़भांज करवा दी।
लोग सोचते है कि ये मौसेरे भाई विधानसभा लोकसभा में तो एक-दूसरे के खिलाफ जमकर भुजा भांजते हैं तो क्या वो दिखावा है? नहीं वो बाजीगरी है। नागपंचमी के दिनों में आपने बाजीगरी देखी होगी। किसी बस्ती में बाजीगर लोग अलग-अलग रास्तों से नुक्कड़ में पहुंचते है। एक बाजीगर अपनी मंत्र शक्ति से चुनौती देता है। भीड़ में छुपा हुआ दूसरा प्रकट होता है। फिर मंत्र शक्तियों का प्रहार शुरू होता। कभी एक मुर्छित होता है तो कभी दूसरे के मुंह में बीन घुस जाती है। घंटों यह खेल चलता है। हम तमाशबीन चकित होकर बाजीगर को रुपया, पैसा, द्रव्य देते हैं। शहर से निकलते ही दोनों प्रतिद्वंद्वी एक हो जाते हैं। तमाशे के पैसे को मिलकर बांटते हैं, दारू मुर्गा छानते हैं, और फिर किसी दूसरे शहर में हम जैसों को मूर्ख बनाने पहुंच जाते हैं। बाजीगरों का खेल जारी है और इधर हमारा मूर्ख बनते रहना भी उसी तरह। कभी-कभी लगता है कि पार्लियामेंट या विधानसभाओं में कोई बिल एक झटके से पास क्यों हो जाता है और जनहित के कई बिल सालों साल लटके रहते हैं। जैसे महिला आरक्षण विधेयक। दस साल से सुन रहे हैं यह विधेयक न हुआ जैसे कोई कर्मकाण्ड हो गया। सत्र के आखिरी दिनों मे यह सदन में रखा जाता है। कई दल के लोग बीच में उठते हैं हंगामा करते हैं, सदन स्थगित और बिल फिर अगले सत्र के लिए। पर जब सांसदों, विधायकों के वेतन-भत्ते व सुविधाओं की बात होती हे तो सभी मौसेरे भाई फौलादी एकता के साथ प्रकट होते हैं और बिल एक झटके में पास होता है।
अपने देश के मौसेरे भाईयों की अंदरूनी गाणित को अंर्तयामी भी नहीं जान सकता। सदन के बाहर-मायावती-मुलायम कैसे विषवमन करते हैं, एक-दूसरे के खिलाफ और केन्द्र की सत्ता के खिलाफ भी। सदन में जब सरकार गिरने की बारी आती है तो सभी एक पाले में खड़े हो जाते हैं। और सामने वाला भी कौन सरकार गिराना चाहता है। वह तो सरकार को गिराते हुए दिखाना चाहता है। सो हम देख लेते हैं और मान भी लेते हैं। इसीलिए अन्नाजी कहते हैं एक नागनाथ तो दूसरा सांपनाथ। नागनाथ को हटाओं तो सांपनाथ आ जाएंगे। अन्नाजी देश के नागरिकों में नेवलानाथ की सूरत देखते हैं, जो सांपनाथ और नागनाथ के फन को कुतर सके।  जनता नेवलानाथ कैसे बने। नागनाथ सांपनाथ भी तो उसी के बीच से ही गए हैं। सो बड़ी मुश्किल हैं। मौसेरे भाई देश के खजाने को मौसिया के श्राद्ध के महाभोज में उड़ाने में लगे हैं। बड़े भाई ने गरीबों को सस्ते से सस्ता अन्न देने की प्रणाली बनाई। छोटे भाई ने कहा हम इसे और सस्ता कर देंगे। मेहनतकश कामकाजी वर्ग के टैक्स का पैसा है, उड़ाने में क्या जाता है। एक दिन की मजदूरी माहभर का भोजन। शेष 29 दिन कबड्डी खेलों, चाहे ताश। भरपेट भोजन का इंतजाम। कभी मशीन के खिलाफ मानव के जंग की बात होती थी। अब काम के लिए मशीनों का रास्ता साफ कर रहे हैं। चीन अपने यहां से सस्ते रोबट भेज देगा। जो आपके घर के छोटे-मोटे काम करेगा। खेत से मजदूरों को वैसे भी टै्रक्टर और हारवेस्टर ने बेदखल कर दिया है। सभी काम मशीने हथिया लेंगी, श्रम की संस्कृति खत्म हो जाएगी। फिर एक दिन का भी काम आदमी के लिए नहीं बचेगा। तो सरकारें क्या करेंगी। एक गढ्ढा खोदेगा फिर उसी को पाटेगा। जैसे अलादीन ने अपने जिन्न को खंभे से उतरने व चढऩे का काम दिया था। जिन्न आज भी वही कर रहा है। इधर कर दाताओं के पैसे से मौसिया की श्राद्ध के महाभोज रचे जा रहे हैं। राजनीति के कुल गोत्र और उस की वंशावली को यूं समझएि। राजनीति सब की दादी अम्मा है। पार्टियों को उसकी बेटियां समझें और उनके नेता उनकी संतानें, इस नाते सभी मौसेरे भाई हुए। गोत्र और गृहस्थी भले ही अलग-अलग हों पर गर्भनाल तो राजनीति की दादी अम्मा से जुड़ी है। सो गाढ़े वक्त पर ये मौसेरे भाई एेसे ही एक होते रहेंगे, भले ही नुक्कड़ में ये प्रतिद्वंदी बाजीगर दिखे, या सदन के अखाड़ों में भुजा भांजते पराक्रमी योद्धा।

अव्वलहै मंच बनाया ऊँचा जनता नीची

mukut bihari saroj

एक ओर परदों के नाटक एक ओर नंगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

अव्वलहै मंच बनाया ऊँचा जनता नीची है
उस पर वर्ग-वर्ग में अंतर रेखा खींची है
समुचित नहीं प्रकाश-व्यवस्था अजब अँधेरा है
उस पर सूत्रधार को खलनायक ने घेरा है

पात्रों की सज्जा क्या कहिए, जैसे भिखमँगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

नामकरण कुछ और खेल का, खेल रहे दूजा
प्रतिभा करती गई दिखाई लक्ष्मी की पूजा
अकुशल असंबद्ध निर्देशन-दृश्य सभी फीके
स्वयं कथानक कहता है, अब क्या होगा जी के

संवादों के स्वर विकलांगी कामी बेढँगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।

मध्यांतर पर मध्यांतर है कोई गीत नहीं
देश काल की सीमाओं को पाया जीत नहीं
रंगमंच के आदर्शों की यह कैसी दुविधा
उद्देश्यों के नाम न हो पाए कोई सुविधा

जन गण मन की जगह अंत में गाया हर गंगे ।
राम करे दर्शक-दीर्घा तक आ न जाएँ दंगे ।


Sunday, June 2, 2013

देश रहे न रहे, क्रिकेट सलामत रहे

अपने फारुख अब्दुल्ला साहब का जवाब नहीं। क्या जबरदस्त आइडिया दी है। क्रिकेट में सट्टेबाजी को कानूनी मान्यता देकर वैधानिक बनाया जाए। वे केन्द्रीय मंत्री हैं, उन्हें देश की चिन्ता है। वे सही ही फरमाते हैं, जो रोका नहीं जा सकता उसे होने दिया जाए, उसी से मुनाफा भी कमाएं। सट्टे पर टैक्स लगाकर अरबों कमाए जा सकते हैं। जीडीपी को गति मिलेगी। अर्थव्यवस्था सुधरेगी। बेरोजगारों को काम मिलेगा। सब क्रिकेट की सट्टेबाजी में लग जाएंगे तो जाहिर है अपराध भी घटेगा। अपने प्रदेश में पटवा सरकार ने सरकारी लाटरी शुरू की थी। बड़ा जबरदस्त रिस्पांस मिला था। बाजार में सन्नाटा, दुकानें बंद, सुबह से लेकर रात तक लॉटरी। ओपन क्लोज के चक्कर में भूख प्यास बंद। अनाज व भोज्य पदार्थों की बिक्री व खपत कम हो गयी थी, और सबसे बड़ी बात की कई-कई थानों में अपराध निल हो गए थे। अपराधी भी लाटरी की टिकट बेचने-खरीदने में भिड़ गए थे। पटवा सरकार के समय तो समूचा रामराज ही उतर आया था मध्यप्रदेश में। सब तरफ एक ही भजन चलता था- सुबह लाटरी-शाम लाटरी, बोलो जयश्रीराम लाटरी। परिवार नियोजन ने जनसंख्या को जितना नियोजित नहीं किया उससे कारगर सरकारी लाटरी निकली। हर शहर-कस्बे गांव से खबरें आने लगी कि कहां कितने मरे। कुछ दिन बाद अखबारों में सिर्फ मौतों के अंक छपने लगे। मसलन- भोपाल-१0, उज्जैन १२, जबलपुर १६। लोग अखबारों में सुबह इन्हीं अंकों को लकी मानकर लाटरी का नंबर लगाते, और नम्बर लगाने वालों में से कई दूसरे दिन औरों के लिए लकी नम्बर बन जाते।
सो इन अनुभवों को ध्यान में रखते हुए फारूख अब्दुल्ला का यह गुडआइडिया है।  इससे कश्मीर समस्या का भी हल निकल सकता है। सभी आतंकवादी क्रिकेट के सट्टे में भिड़ जाएंगे। सेना-पुलिस भी बैरकों में क्रिकेट देखेगी और महीने में जो पगार मिलेगी उससे सट्टे खेलेगी। कश्मीर की वादियों में ट्यूलिप के फूल चहकेंगे और डल झील में शिकारों का आनंद लेते हुए पर्यटक भी क्रिकेट की सट्टेबाजी करेंगे। कश्मीर का पर्यटन विभाग, पर्यटन के साथ क्रिकेट के सट्टे का स्पेशल पैकेज देगा। दिल्ली में रेप की घटनाओं पर भी लगाम लगेगी। क्योंकि सभी लोफर क्रिकेट की सट्टेबाजी में भिड़े रहा करेंगे। क्रिकेट के सट्टे की बयार जंगलों तक पहुंचेगी। माओवादी बंदूकें धरकर नेट प्रैक्टिस करेंगे और अपनी वॉकी-टॉकी से सट्टे का उतार-चढ़ाव, नम्बर-सम्बर पूछा करेंगे। नेता व्यर्थ में नहीं मारे जाएंगे। नेतागण माओवादियों से एक दूसरे को मरवाने का आरोप नहीं गढ़ सकेंगे, लिहाजा अपनी राजनीति की गंगा भी गटर बनने से बच जाएगी।
कहते हैं प्यार-युद्ध और बाजार में सब जायज है। क्रिकेट प्यार का प्लेटफार्म है। क्रिकेट प्यार से लवा-लव है। आज से नहीं नवाब पटौदी के जमाने से। कहते हैं छक्के की शर्त पर शर्मिला टैगोर पटौदी को दिल दे बैठीं। रंगभेद को धोते हुए अभिनेत्री नीना गुप्ता विवियन रिटर्ड की बिनब्याही मिस्ट्रेस बन गईं। रीना राय को मोहसिन खान भा गया। अब क्रिकेट में प्यार ले-प्यार दे चल रहा है। क्रिकेट युद्ध भी है। बीसीसीआई में युद्ध चल रहा है। श्रीनिवासन् का तख्त पलटाने में सभी महारथी लगे हैं। श्रीनिवासन् है कि इन्डिया सीमेंट के मजबूत पलस्तर के साथ कुर्सी में चिपके हैं। ललित मोदी बगुले की भांति अवसर की मछली ताके बैठे हैं। मेरठ के मुफस्सिल पत्रकार राजीव शुक्ला को क्रिकेट ने ही फर्श से अर्श तक चढ़ाया। आज वे सत्ता और क्रिकेट की सेतु बनाने के मामले में शरद पवार के बाद दूसरे बड़े शिल्पी हैं। क्रिकेट का बाजार भी जबरदस्त है। जितना एक नम्बर का उससे कई गुना दो नम्बर का। जितना ऊपर ओपन वल्र्ड में उससे ज्यादा गहरा अन्डरवल्र्ड में। क्रिकेट ने ही पहली बार आदमी की कीमत तय की। पहले रेस के घोड़े नीलाम होते थे अब क्रिकेटर नीलाम होते हैं। उद्योगपति धंधा चलाता है उद्योगपत्नियां क्रिकेट चलाती हैं। क्रिकेट नहीं होता तो इन पत्नियों के पास किटी-पार्टी में रम्मी खेलते-खेलते ऊबने के बाद हिन्दमहासागर में कूदने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था। क्रिकेट के सट्टाबाजार ने इनके जीने की जिजीविषा को बनाए रखा। क्रिकेट में खेल मत देखिए, क्रिकेट का खेल देखिए। इससे होने वाले वारे-न्यारे देखिए। क्रिकेटर के रूप में चलता फिरता बाजार देखिए। मॉडल देखिए-मोहरा देखिए, चेहरा मत देखिए। चेहरे में क्या धरा है, मलिंगा, क्रिश गेल के आगे खूबसूरत चेहरा भी फेल। क्रिकेट हमारा धर्म है। क्रिकेट देश की धड़कन है, मर्म है। क्रिकेट पर लांछन लगाने वाला अधर्मी और काफिर है। अपन अधर्मी नहीं बनना चाहते सो देश रहे न रहे, देश का क्रिकेट सलामत रहे। http://starsamachar.com/Details.aspx

Saturday, April 20, 2013

राजा की मंडी राजा के सांड़

उन दिनों छोटे इलाकेदार भी अपने इलाके के राजा हुआ करते थे। राजा यानी कि जो मर्जी हो सो करे, जो दिल में आए वो कहे। बस अपने ऊपर वाले महाराजा को नजराना देना पड़ता था। नजराना का तब भी वही मतलब था आज भी वही है। यानी कि आप कैसी भी उच्छिन्न करें ऊपर वाले को नजर नहीं आना है। एक दिन राजा के दिल में आया कि कुछ तूफानी किया जाए। तो उसने इलाके से एक जबरदस्त अन्डू सांड़ छंटवाया। सांड के पुट्ठे पर इलाके का राजचिन्ह दाग दिया। राजचिन्ह राजा का चलता-फिरता हुक्मनामा था। जहां जाए लोग रास्ता दे दें, डर के मारे। किसी को फुफकारे किसी को हुरपेटे किसी की क्या मजाल, सांड़ को डंडा मार सके। लोग यह मानने लगे कि सांड़ की आत्मा में राजा ही बसता है और सांड़ के रूप में राजा ही विचरता है। जब सांड़ का मन पड़े सब्जी मंडी में घुस जाए। पहली बार घुसा तो पूरी सब्जी मंडी को ही तहस-नहस कर दिया। जितना बन पड़ा उतना खाया जो बचा उस पर गोबर कर दिया। लोग किससे फरियाद करते, राजा का सांड था उस वक्त तो सांड़ ही राजा था। सांड़ इलाके में घूमने निकलता- लोग प्रेमपूर्वक उसे भोजन देते, वह घूरकर देखता, आगे बढ़ जाता। एक ठेलेवाले से एक बार चूक हो गई। उसने केले नहीं खिलाए तो सांड़ ने ठेला पलट दिया। सभी ठेले वालों को नसीहत मिल गई। अब जब वह कभी सब्जी मंडी घुसता तो दूकानदार पहले से ही हरी भाजी, ककड़ी-खीरा टोकनी में रख देते। सांड़ का जहां मन पड़ता वहां मुंह मारता। जहां इच्छा हुई गोबर कर दिया। 
राजा को लगा कि यह सांड़ कितने काम का है। मेरा फोकट का विज्ञापन हो जाता है। बिना पुलिस-फौज के मेरी दहशत बनाए रखता है। सो राजा ने सोचा कि अब एक सांड़ से काम नहीं चलने वाला, और न जाने कब वह बागी हो जाए इसलिए उसके कुछ एक विकल्प होने चाहिए। राजा ने रानी से सलाह ली। असल में इलाकेदारी की कमान परदे के पीछे रानी के हाथों में थी। सो रानी ने कहा ऐसा करिए- सभी महकमों के एक-एक सांड़ छोड़ दीजिए। वे अपने-अपने विभाग में मुंह मारे- गोबर करें और हमारी दहशत बनाए रखें, नाम रोशन करें। अब इलाके में कई तरह के सांड़ घूमने लगे। इस बार सबके पुट्ठे में राजचिन्ह दगा था साथ में उसकी सींगे रंग दी गईं थीं। रंगी हुई सींगों से पता चलता था कि यह सांड फला महकमे का है।
अखबारों ने सांड़ों पर टिप्पणियां करनी शुरू कर दीं। कौन सांड़ कितना बलिष्ठ है और अपने मोहकमें की खेती को कैसे चर रहा है। कुछ ने सांड़ों का वर्गीकरण भी कर दिया। ये राजनीतिक सांड़ है- ये प्रशासनिक सांड़ है, और ये आवारा लेकिन राजा के लिए काम के हैं। आवारा सांड़ों को छूट दी गई, कि वे माइनिंग-प्रापर्टी- कांस्ट्रक्शन महकमों में जाकर मनमाफिक चरें और हमारा नाम रोशन करें। सभी सांड़ अपने-अपने क्षेत्र में ईमानदारी से काम करने लगे। इलाके के राजा-रानी उनसे खुश थे। पर एक दिन गजब हो गया। जो सबसे सीनियर सांड़ था यानी कि राजचिन्ह के साथ इलाके में छोड़ा गया पहला सांड़, ने सोचा कि राजा की औकात ही क्या? उसके लिए इलाके में मैं दहशत फैलाता हूं और वह मेरी फैलाई हुई दहशत के आधार पर राज करता है। ये अब ज्यादा दिन नहीं चलने वाला। सांड़ ने सोचा कि यदि जंगल का राजा शेर हो सकता है, तो मैं इस इलाके का राजा क्यों नहीं? सांड़ ने इलाके में निकलना बन्द कर दिया, और राजा की कोठी के शानदार लान में जा बैठा। राजा-रानी के साथ शाम को टहलने निकला। सांड़ सींगें तानकर फुफकारता हुआ राजा-रानी की ओर घूरे जा रहा था। रानी सांड़ की नियति को ताड़ गई। वह पुचकारते हुए बोली धीरज रखो तुम्हें सभी सांड़ों का सरताज बना दिया जाएगा। फिर एक प्लान बना... और रातों-रात उस प्लान पर अमल हुआ। सुबह ड्योढीदारों ने देखा- सांड़ पस्त पड़ा था। बच्चे उसे पत्थर मारकर छेड़ रहे थे, वह चाहकर भी नहीं घूर पा रहा था। उसकी धारदार सींगे सिर का बोझ जैसी लगने लगीं थी। नथुनों से फुफकार नहीं निकल पा रही थी। एक उम्रदराज ड्योढ़ीदार ने कहा .. राजा-राजा होता है.. वो बड़े-बड़े अन्डुओं को यू हीं सड़ कर देता है .. आया समझ में।

Friday, April 19, 2013

इन्हें वोकल डायरिया है


लो ग पूछ रहे हैं अजीत पवार को कौन सी बीमारी हो गई है? मुंह से दुर्गन्धित शब्द निकल रहे हैं। कोई न कोई बीमारी तो है। बीमारियों का क्या? वे किसी को संक्रमित कर सकती हैं और कैसे भी हो सकती हैं। वैज्ञानिक हर साल कोई न कोई नई बीमारी खोज लाते हैं। एक दशक पहले एड्स का नाम सुना था। वैज्ञानिकों ने बताया कि यह रोग व्यभिचार की कोख से पैदा होता है। पहले-पहल येे बीमारी हॉलीवुड अभिनेता में खोजी गई थी। जैसे हॉलीवुड की फिल्में चोरी से बॉलीवुड आ जाती हैं वैसे ही चोरी-छुपे एड्स भी आ गया। यानी रोग की भी पाइरेसी। अजीत पवार मुंबई में रहते हैं। किसी भी रोग की ग्रहण क्षमता इस शहर में अद्भुत है। दंगा रोग भी यहीं सबसे पहले फैलता है।
एड्स के बाद और कोई नई बीमारी आई या नहीं डॉक्टरों को भले ही पता न हो, पर मुझे है। इस बीमारी का नाम है 'वोकल डायरियाÓ या 'माउथ डायरिया..Ó। इसे देसी जबान में 'मुंह पोकनाÓ रोग भी कह सकते हैं। इस रोग का लक्षण यह कि जिस तरह पेचिश से पहले आंत में मरोड़ होती है, पेट दर्द होता है.. फिर प्रेशर बनता है.. और आदमी बार-बार बाथरूम आता-जाता रहता है। उसी तरह इस रोग में भी जीभ में मरोड़ और ऐठन होने लगती है। पेचिश तब होती है जब आदमी संक्रमित भोज्य पदार्थ का भक्षण करता है और आंते उसे पचाने से मना कर देती हैं। ठीक उसी तरह जब हमारे नेता-अभिनेता कोई संक्रमित शब्द दिमाग में बैठा लेते हैं, व दिमाग उसे खपा नहीं पाता तो वह शब्द मुंह से पेचिश की भांति निकलता है। यही लक्षण शरद पवार के भतीजे मंत्री अजीत पवार में उभरा.. मुंह से दुर्गन्धित शब्द झर पड़े.. ''पानी नहीं है बांध में तो क्या पेशाब करके उसे भर दूं। अपने यहां इन दिनों वोकल डायरिया के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। जैसे कालरा और प्लेग के वायरस दूसरों को संक्रमित कर बीमार बना देते हैं वैसे ही इस रोग का वायरस! महाराष्ट्र बहुत पहले से ही वोकल डायरिया से संक्रमित प्रदेश रहा है। 'मातोश्रीÓ के दरबारहाल से इसकी परपराहट भरी ध्वनि सत्तर के दशक से ही आनी शुरू हो गई थी। बाल ठाकरे के मुंह से फुल प्रेशर के साथ दख्खिनियों के लिए ऐसे ही अल्फाज निकला करते थे। भतीजे ने भूगोल बदलते हुए उत्तरियों पर जब तब 'वोकल फारिगÓ करना जारी रखा है। नितिन गड़करी भी इसी संक्रमण में यदा-कदा फंस जाते हैं। 
'वोकल डायरियाÓ हाई प्रोफाइल रोग है। हार्ट अटैक, ब्लड प्रेशर की भांति ऊंची सोसायटी में पाया जाता है। इसलिए इसके सबसे ज्यादा लक्षण अपने दिग्विजय सिंह पर प्रकट होते हैं। क्योंकि वे सूबे के दस साल चीफ मिनिस्टर रहे और अब आला कमान के आला महासचिव हैं। कभी-कभी तो 'वोकल डायरियाÓ के इतने क्रॉनिक पेशेन्ट हो जाते हैं कि मुंह से आदरणीय हाफिज सईद साहब और माननीय ओसामा जी जैसे शब्द झरने लगते हैं। दिग्विजय सिंह को इस रोग का ब्रान्ड एम्बसडर भी माना जा सकता है। दिग्विजय सिंह ने यूपी को इस रोग से संक्रमित कर दिया। इसके पहले शिकार बेनी प्रसाद वर्मा उर्फ बेनीबाबू बन गए। इनके मुंह में भी जब चाहे तब प्रेशर बन जाता है और कुछ बोल-बाल के फारिग हो जाते हैं। बेनी बाबू ठहरे मुलायम सिंह के पुराने समाजवादी सखा - सो 'वोकल डायरियाÓ के वायरस से उनके कुनबे को संक्रमित कर आए। शिवपाल-रामगोपाल इन सबमें इस हाईप्रोफाइल रोग के कीटाणु पहुंच चुके हैं और जब चाहे तब प्रेशर बनाकर मुंह को गंदा करते रहते हैं। रही बात बहन मायावती की तो वे मनुवादियों के लिए शुरू से ही इस रोग की क्रानिक पेशेन्ट रही हैं और उन्हें इसका अफसोस भी नहीं। 
हार्टअटैक-ब्लडप्रेशर की भांति वोकल डायरिया कोई नेताओं की बपौती नहीं है। राजेन्द्र यादव जैसे साहित्यकार और महेश भट्ट-शाहरुख खान जैसे फिल्मी दुनिया के कलाकार भी इसी बीमारी से पीडि़त हैं। जब चाहे तब और जहां चाहे वहां ये 'वोकल फारिगÓ होते रहते हैं। 'वोकल डायरियाÓ के फायदे बड़े हैं। एक बार फारिग करो पूरा मीडिया लपक लेगा और आपकी एक फारिग को दिन-भर कई-कई बार दिखाएगा। हर्रा-फिटकरी के बिना आपके प्रचार का रंग चोखा बन जाएगा।
पागलों के लिए मेंटल हॉस्पिटल है, विकलांगों के लिए अलग चिकित्सालय, जितने मर्ज उतने क्लिनिक। समझ में नहीं आता कि 'वोकल डायरियाÓ के मरीजों के लिए मुफीद चिकित्सालय कहां हो सकता है। 
'आधुनिक भविष्य पुराणÓ के रचयिता आचार्य रामलोटन शास्त्री ने 'भविष्य के लोकतंत्रÓ नामक अध्याय में लिखा है कि - इसका कारगर इलाज जनता के ही पास है। पूछिए कैसे ... जैसे बजबजाती नालियों की दुर्गन्ध रोकने के लिए हम फिनाइल डालकर कीटाणुओं को मारते हैं उसी तरह यदि आप तक किसी नेता-अभिनेता के मुंह से निकली शाब्दिक दुर्गन्ध पहुंचे, तो आप भी जवाब में विवेक के फिनायल का प्रयोग करें। 
ये अजीत पवार- दिग्विजय सिंह- गडकरी- बेनीबाबू- महेश भट्ट आदि-आदि, जितने मरीज हैं इनका इलाज अस्पतालों में नहीं जनता के तिरस्कार में है। एक बार आजमाइए- ऐसे रोगियों की समूची प्रजाति अपने-अपने घरों में बैठ जाएगी- ढोर-डंगर की तरह। ऐसा हम नहीं आचार्य रामलोटन शास्त्री कहते हैं।

Sunday, April 7, 2013

लोकतंत्र के भविष्य पर आखिरी किताब

आचार्य रामलोटन शास्त्री की विद्वता का कोई जवाब नहीं। वे पुराण कथाओं के साथ नित नये नवाचार करते रहते हैं। हाल ही में वे अपनी नई कृति आधुनिक भविष्य पुराण (रंगीन चित्रों सहित सजिल्द) के साथ मिले। आचार्य जी ने बताया कि इस ग्रंथ में लोकतंत्र के भविष्य का विषद् वर्णन किया गया है। मेरी उत्सुकता बढ़ी तो उन्होंने लोकतंत्र के भविष्य वाला अध्याय खोलकर बांचना शुरू कर दिया। ...वह दिन अब दूर नहीं जब शहर और जंगल की सामाजिक व्यवस्था और परिस्थितिकी (इकोसिस्टम) में अदलाबदली हो जाएगी। यानि कि जो जंगल में हो रहा है वह शहर में होने लगेगा और शहरी सभ्यता जंगल में फैल जाएगी। आदमी जानवर की तरह व्यवहार करने लगेगा और जानवरों में आदमियत के अंश झलकने लगेंगे। शहरों में पुरुष जानवरों की तरह महिलाओं का भोग करेगा। जिसको जहां पाया चलती बस में, चौराहे में, खेत, दुकान-मकान, मंदिर, जिसको जहां मौका मिलेगा जानवरों की तरह हवस बुझाएगा। इधर जंगल में गिरगिट रंग बदलना बंद कर देंगे। सांप डसना छोड़कर साधु बन जाएगा। दूध पिएगा तो उसका कर्ज उतारना भी जानेगा। इधर गिरगिट और सांप के गुण सभ्य आदमियों में ट्रांसफर हो जाएंगे। जो राजनीति में जाना चाहेगा उसके बायोडाटा में ये दोनों गुण पाए गए तो उन्हें बोनस अंक मिलेगा। कुत्ते सत्याग्रही हो जाएंगे और भेडिय़े शाकाहारी। उन्हें आदमखोर कहने पर मानहानि का मुकदमा चलाने का प्रावधान होगा। उधर आदमी बिना दुम का कुत्ता हो जाएगा। दुष्यंत कुमार की गजल की वह पंक्ति- अब नई तहजीब के पेश-ए-नजर हम आदमी को भूनकर खाने लगे हैं, अक्षरश: चरितार्थ होने लगेगी। लोमड़ी चालाकी करना बंद कर देगी और खरगोशोंं के साथ मजे से क्रिकेट या कबड्डी खेलेगी। बाज कबूतरों के अंडों की रखवाली किया करेगा। इधर पुलिस में जंगलियत के लक्षण और तेज हो जाएंगे। जिसकी रक्षा का जिम्मा मिलेगा उसे ही लूट लिया करेंगे। इस पर सरकार उन्हें नगद इनाम दिया करेगी। 
व्यवस्थाओं की अदला बदली के अनुसार रंगरूप में भी बदलाव होगा। जैसे जंगल में जितने जीव होंगे उनके मुंह तो आदमियों के होंगे शेष भाग पहले जैसा ही रहेगा। मैंने गिरगिट का चित्र देखा, तो मुंह टोपी लगाए एक पुराने नेता का था। पीठ और पूंछ गिरगिट ही जैसे। इसी तरह सांप, कुत्ते, भेडिय़े, लोमड़ी और खरगोश के चित्र थे। सबके सिर आदमी जैसे और धड़ जानवरों की तरह। शहरी लोगों में ठीक इसका उल्टा था। सिर जानवरों के थे और धड़ आदमी के। आचार्य ने तर्क दिया एेसा इसलिए कि आचार विचार और दिमाग सिर पर ही रहता है। चूंकि जानवर और आदमी का परस्पर व्यवहार बदल जाएगा, इसलिए ये रूप रंग अपने आप बदल जाएंगे। पुराण कथाओं में इसका जिक्र है। आचार्य जी ने कैफियत दी कि यदि एेसा इतिहास में वर्णित है तो भविष्य में इतिहास खुद को दोहराएगा। लोकसभा, विधानसभा जैसी संस्थाएं रहेंगी, पर उनकी कार्यप्रणाली बदल जाएगी। जंगल में भी एेसी संस्थाएं खुलने लगेंगी। वोटिंग होगी और राजा चुना जाएगा। जंगल में यह काम बिना किसी दखल के होगा। जैसे जंगल में सब जानवर सुअर को राजा बनाना चाहें तो सुअर ही बनेगा- शेर को विपक्ष में बैठना पड़ेगा। इधर शहर में गिरगिट-सांप-कुत्ते और भेडिय़ों के चरित्रवाले लोग शेर के इशारे पर चुनाव लड़ेंगे और कैसे भी जीतकर शेर को राजा बनाएंगे। कभी कभी चुनाव की घोषणा की जाएगी, और अगले ही दिन चुनाव सम्पन्न हुआ बता दिया जाएगा। सब कागज में ही निपटा लिया जाएगा ताकि यह भ्रम बना रहे कि लोकतंत्र जिन्दाबाद है। आचार्य जी ने अपने ग्रंथ में एक अदभुत दृश्य का वर्णन किया है, राजा के दरबार की एक कार्यवाही का। राजा जिसका मुंह बाघ का है, शेष शरीर आदमी का, एक सिंहासन पर बैठा है। आधी बंडी पहने गले में कई कंठी मालाएं हैं। संविधान की पुस्तक से राजा की गद्दी बनाई गई है। चारों पांवों  के बीच में संदूक है। उस संदूक में चारों पांवों (स्तंभों) के संचालन की चाभी बंद है। संदूक के ताले की चाभी राजा के गले में लटकी। दरबार सजा है। दरबारियों में किसी का मुंह भेडि़ए जैसा, किसी का सांप तो कोई कुत्ता या गिरगिट पर सब कुर्सी पर बैठे हैं हाथ बांधे। राजा एक ऊंटनुमा आदमी को बुलाता है और यूं ही पूछ बैठता है- सही-सही बता, मेरे मुंह से कैसी गंध आ रही है। ऊंट ने जवाब दिया -हजूर, बदबू आ रही है, लगता है शिकार के बाद दातून नहीं किया...। राजा क्रोध से तमतमाया -साले तेरी ये मजाल... मेरे मुंह में बदबू। ऊंट पर इतनी गोलियां दागी गईं कि उसका शव पोस्टमार्टम लायक नहीं बचा। कुछ देर बाद एक सुअरनुमा प्रतिनिधि को बुलाया- और कहा- अब ले तू संूघ, मेरे मुंह से कैसी गंध आती है। डरे हुए सुअर ने कहा जहांपनाह आपके मुंह से इलायची व केशर की खुशबू आती है। राजा फिर भड़क गया-अबे सुअर, क्या सोचता है मेरी खुशामद करके बचा रहेगा। हलाल करो इसे, सुअर को लोथड़े में बदल दिया गया। गिरगिट-भेडिय़े-कुत्ते सभी हर बार ताली बजाते और जिन्दाबाद का नारा लगाते। इस बार राजा ने इशारे से आम जनता के बीच से खरगोशनुमा आदमी को बुलाया और पूरे प्रेम के साथ बोला... आप तो जरा मेरा मुंह सूंघकर सबको बताइए कैसी गंध आ रही है। खरगोश जैसे पहले से ही जवाब तय करके आया हो... मुंह सूंघकर बोला- मालिक मुझे न तो बदबू समझ में आ रही है न ही खुशबू- दरअसल मुझे पैदायशी जुखाम है। जवाब सुनते ही राजा खुश हो गया। गिरगिट-सांप-भेडि़ए व कुत्तेनुमा सभासदों ने नारा लगाया- जनता-जनार्दन की जय।

Saturday, March 23, 2013

पनघट पर पहरे और बेचारे नंदलाल

देश भर के दीवानों को शरद यादव का शुक्रगुजार होना चाहिये कि उन्होंने सियासत के इस बेरहम दौर में दीवानों के व्यथा की परवाह की। पार्लियामेंट में जब ये कानून पास हो रहा था कि लड़कियों को देखना और घूरना जुर्म होगा, तब बहुतों की जुबान पर साठोत्तर दशक का वो फिल्मी गीत आ गया होगा 'दीवानों से मत पूछो, दीवानों पे क्या गुजरी है। दिल को सुकून मिला कि शरद यादव जी भी ऐसा सोचते हैं। उन्होंने कहा कि यह कानून तो मोहब्बत के अंत की उद्घोषणा है। भला कोई किसी को नहीं देखेगा, पीछा नहीं करेगा तो प्यार का अंकुरण कैसे प्रस्फुटित होगा। शरद बाबू ने मार्के की बात कही। साठोत्तर दशक की हर दूसरी रोमांटिक फिल्मों में छेड़छाड़-पीछा करना और चुहुलबाजी केन्द्रीय थीम हुआ करती थी। जब कानून पास ही हो गया तो लगे हाथ उन फिल्मों को सेंसर की हवालात में डाल देना चाहिये। क्या पता नारी उत्थान संगठनों का अगला मुद्दा यही हो और हमारे नेता फिर पसीज जाएं। कवियों को त्रिकालदर्शी यूं ही नहीं कहा जाता। फिल्म गीतकार आनंद बक्षी कोई तीस साल पहले भावी समाज व सरकार का रुख भांप चुके थे, तभी तो लिखा 'तेरा पीछा न छोड़ंूगा शोणिये, भेज दे चाहे जेल में या 'अब चाहे लग जाए हथकडिय़ां यारा मैंने तो हां कर दी। अब सरकार ने आनंद बक्षी की भविष्यवाणी के अनुरूप पूरे इंतजाम कर दिये हैं।
हर कानून के साथ एक अर्थगणित भी जुड़ी होती है। निश्चित ही मनमोहन, चिदम्बरम और अहलूवालिया की यही सोच होगी। कानून कड़ाई से लागू हुआ तो सौंदर्य और फैशन बाजार पर इसका असर दिखेगा। सौंदर्यशास्त्र कहता है कि महिलायें इसलिये श्रृंगार करती हैं और सजती हैं कि पुरुष रीझें। पुरुष रीझेगा तो घूरेगा, पीछा करेगा और यह सब करेगा तो जेल जाएगा। संभव है इस कानून की सीधी मार सौंदर्यबाजार पर भले पड़े पर मंदी के दौर में मध्यवर्गीय परिवार के अपव्यय को बचाएगा। गांवों की बारातों में अभी भी बाराती और घराती महिलाओं के बीच बताशे और चावल के आदान-प्रदान और देखा-देखी के चलन का रिवाज बचा है। अब बताशेबाजी की तो सीधे हवालात में। सो अब बारात भी जाइये तो सोच समझकर हरकतें करिये, वरना.... हां। मुझे लोकप्रिय मंचीय कवि सुनील जोगी की पंक्तियां याद आ रही हैं 'कलयुग में न आना मेरे कृष्ण कन्हैया। कल्पना करिये कि वही गोकुल- वही गोपी- वही ग्वाल- वही कृष्ण आज के दौर में होते तो क्या होता। जैसे ही कोई गोपी फरियाद करती कि 'मोहे पनघट में नंदलाल छेड़ गयो रे। बस इतना ही पुलिस को संज्ञान लेने के लिये काफी और नंदलाल हवालात में। खुदा न खास्ता बंहियां मरोड़ी और गगरी फोड़ी जैसा बयान दे देतीं तो, जमानत के लाले पड़ जाते।  द्वापर में कंस की जेल से तो वे जन्मते ही सटक लिये थे, कलयुग में तो जितनी बार गगरी फोड़ते उतनी बार अंदर होते और बेचारे नंदबाबा को खसरा मिसिल लेकर अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते। सो सुनील जोगी के अलाप में मेरा भी एक स्वर समझिये कि 'कलयुग में न आना रे मेरे कृष्ण कन्हैया। 
आदमी-औरत के जन्म से ही मोहब्बत का सिलसिला शुरू हुआ होगा व वक्त के साथ इसके रंग-ढंग बदले होंगे। हमारे दौर में मोहब्बत की कहानी एक रूमाल से शुरू होती थी, उसे मैच्योर होने में दशकों लग जाते थे। धरमवीर भारती के उपन्यास 'गुनाहों का देवता में तो नायक-नायिका जिंदगी भर साथ में रहने के बाद भी प्यार का इजहार नहीं कर पाते। अब तो फास्टफूड की तरह लव फटाफट। इजहार करने के लिये फेसबुक तो है न। सो फास्ट फूड, फेसबुक ने लव फटाफट का दौर ला दिया। जब समाज की वर्जनाएं टूटती हैं, मर्यादायें मरती हैं, संवेदना आंकड़ों में बदल जाती है, लोकलाज और लोकभय, पब डिस्कोथेक व रियल्टी शो की रंगीनियों में खो जाता है। तब ऐसा ही दौर शुरू होता है जिसके पेश-ए-नजर आज हम हैं। वैसे बता दें लोक की अदालत और उसके कानून से बड़ी अब तक न कोई अदालत हुई है और न कोई दण्डाधिकारी। उसकी सजा इतनी करारी है कि उससे न तो देवताओं का लंपट राजा इंद्र बचता और न वह सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा को बख्शती। और उस लोक की चेतना अभी मरी नहीं है, संवेदनाओं के समापन और इतिहास के अंत की यूरोपीय घोषणा के बावजूद भी। 

Friday, March 22, 2013

दोमुंहे और सांप की कलेजी

नेताजी हाल ही में चार धाम की तीर्थयात्रा और गंगाजी में पितरों का तर्पण करके लौटे। देवस्थानों में कुछ न कुछ छोड़ने का संकल्प लेने का दस्तूर है। मसलन तम्बाकू, शराब, कोई बुरी लत, खानपान की चीजें। मैंने पूछा क्या छोड़ आए... नेताजी ने बताया ‘सांप की कलेजी, कभी नहीं खाऊंगा?’ मैंने कहा जो सम्भव नहीं उसे छोड़ने का संकल्प कैसा? पितरों की गति का खयाल तो रखना चाहिए था... वाह... छोड़ा भी तो क्या... सांप की कलेजी! नेताजी बोले- भैय्ये खुदा न खास्ता, चीन   वीन जाने का फॉरेन टूर मिला तो वहां तो आदमी सांप ही खाते हैं! सो मैंने भविष्य का ध्यान रखा। मैंने कहा -नेताजी यदि गयाधाम में जीवनभर सच नहीं बोलने का संकल्प ले आते तो यह तो आपके काम की भी बात होती और पितर भी मजे से तर जाते! नेता जी बमके- तुम पत्रकार लोग उलटवांसी ही बोलते हो... जानते नहीं गांधीजी कह गए ‘सत्य अहिंसा परमोधर्म:। यह तो हमारी पूंजी है कि हम निरा सच बोलें!’ फिर वे राजा बिसुनाथ प्रताप सिंह की कहानी पर उतर आए! राजा मांडा ने बोफोर्स का भांडा फोड़ा... कहा राजीव गांधी व उनकी मण्डली ने कमीशन खाया। जनता ने सच माना। राजीव गांधी को सत्ता से उतार दिया। कमीशन से चौगुनी रकम जांच में खर्च हो गई। जांच राजीव गांधी तक पहुंच ही न पाई। जनमोर्चा बना तो राजा मांडा ने कहा-‘वे चुनाव नहीं लड़ेंगे!’ पर इलाहाबाद से चुनाव भी लड़ा-कैफियत दी कि जनभावना के आगे मजबूर था। फिर जनता दल बनाते समय बोला हम प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे, ताऊ देवीलाल को बनाएंगे। फिर प्रधानमंत्री भी बन गए कैफियत दी कर्त्तव्य के आगे मजबूर था। ताऊ देवीलाल को भी फेंटे से लगा दिया। सो सच ऐसे ही बोलिए, फिर आपकी सुविधानुसार भावनात्मक तरीके से मजबूर करने के लिए लोग हैं ही। 
अपने सूबे के भैयाजी ने महीने भर पहले कहा था कि इंटरनेट, सिन्टरनेट, फेसबुक-ट्विटर युवाओं को बरबाद करने वाली बातें हंै। युवाओं को चाहिए कि वे कसकर लंगोट बांधा करें, विवेकानन्द के बताए मार्ग पर चला करें। रोज सबेरे ईश विनय कर शीश नवाएं। सूर्य नमस्कार करके उसकी अजस्त्र ऊर्जा को ग्रहण करें। देश के निर्माण में योगदान दें। बाद में  पता चला भैयाजी खुद ट्विटर में टूट पड़े और अब कार्यकर्ताओं को ट्वीट किया करते हैं।  एक आईटी सेल खुल गया है जो उनके फेसबुक और ट्विटर के एकाउन्ट को अपग्रेड व मेन्टेन करता है। सो भैय्या बातें हैं बातों का क्या? बोलने में क्या जाता है, बोल दो... फिर जनता के सामने अपने कर्त्तव्य के सामने, वक्त के साथ मजबूर हो जाओ। अपना नफा-नुकसान देखकर जो मन पड़े सो बोलो- वक्त उसे उसी तरह परिभाषित कर देगा- जैसे विक्रमादित्य के दरबार में मूरख कालिदास के वक्तव्यों को विद्योत्तमा परिभाषित करती थी। अब देखो न विधानसभा में यूपीएससी में हिन्दी के लिए संकल्प पारित हो रहा है। संकल्प के साथ होंगे- मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक सभी। पर पूछो तो किसके बच्चे हिन्दी में पढ़ते हैं। कितनों के नाम सरकारी स्कूलों में लिखा है? अरे जब सरकारी चपरासी अपने बच्चों को पब्लिक स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाता है... तो इनकी क्या बात करना, जिनकी ख्वाहिश रहती है कि बच्चा पैदा होते ही इंग्लिश में किलकारी भरे। पर संकल्प लेने में क्या... ले लो। वक्त इस संकल्प को भी परिभाषित कर देगा... देखा ये लोग कितने महान हैं, अपने बच्चों की अंग्रेजी को कुर्बान करते हुए... अंतिम छोर पर खड़े उस मजदूर के बच्चे के भविष्य के लिए कितना महान संकल्प ले रहे हैं, जो फुटही सरकारी स्कूल में ट्विंकल-ट्विंकल लिटिल स्टार की बजाए... सिरी गानेसाए नमहा, से क ख ग घ डं. पढ़ने की शुरुआत करता हैं।

Monday, March 11, 2013

बम शंकर बोलो हरी हरी...

ले सब्रो कानाअत साथ मियां, सब छोड़ यह बातें लोभ भरी.
जो लोभ करे उस लोभी की, नहीं खेती होती जान हरी.
संतोख तवक्कुल हिरनों ने, जब हिर्स की खेती आन चारी.
फिर देख तमाशे कुदरत के, और लूट बहारें हरी भरी.
जब आशा तिश्ना दूर हुई, और आई गत संतोख भरी.
सब चैन हुए आनंद हुए, बम शंकर बोलो हरी हरी.
टुक अपनी किस्मत देख मियां, तू आप बड़ा दातारी है.
पर हिर्सो तमाअ के करने से, अब तेरा नाम भिखारी है.
हर आन मरे है लालच पर हर साअत लोभ अधारी है.
ऐ लालच मारे, लोभ भरे, सब हिर्सो हवा की ख्वारी है.
जब आशा तिश्ना दूर हुई, और आई गत संतोख भरी.
सब चैन हुए आनंद हुए, बम शंकर बोलो हरी हरी.
गर हिर्सो हवा और लालच की, है दौलत तेरे पास धरी.
तू ख़ाक समझ इस दौलत को, क्या सोना रूपा लाल ज़री.
हाथ आया जब संतोख दरब, तब सब दौलत पर धुल पड़ी.
कर ऐश मज़े संतोखी बन, जय बोल मुरलिया वाले की.

जब आशा तिश्ना दूर हुई, और आई गत संतोख भरी.
सब चैन हुए आनंद हुए, बम शंकर बोलो हरी हरी.

अब इस दुनिया में कुछ चीज़ नहीं, इस लोभी के निस्तारे की.
है कीचड़  उस पर लिपट रही, सब हिर्सो हवा के गारे की.
क्या कहिये व की बात "नजीर", उस लूभी लोभ सवांरे की.
सब यारों मिल कर जय बोलो,  इस बात पे नंद  दुलारे की .

जब आशा तिश्ना दूर हुई, और आई गत संतोख भरी.
सब चैन हुए आनंद हुए, बम शंकर बोलो हरी हरी.
-नज़ीर अकबराबादी

Tuesday, December 18, 2012

नफ़स-नफ़स कदम-कदम

नफ़स-नफ़स कदम-कदम
बस एक फिक्र दम-ब-दम
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए!
जवाब दर सवाल है कि इंकलाब चाहिए!
इंकलाब जिन्दाबाद!
जिन्दाबाद इंकलाब!
जहां अवाम के खिलाफ साजिशें हो शान से
जहां पे बेगुनाह हाथ धो रहे हों जान से
जहां पे लफ़्ज-ए-अमन एक खौफनाक राज हो
जहां कबूतरों का सरपरस्त एक बाज हो
वहां न चुप रहेंगे हम
कहेंगे, हां, कहेंगे हम
हमारा हक! हमारा हक! हमें जवाब चाहिए!
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए!
जवाब दर सवाल है कि इंकलाब चाहिए!
इंकलाब जिन्दाबाद!
जिन्दाबाद इंकलाब!
यकीन आँख मूंद कर किया था जिन पर जान कर
वही हमारी राह में खड़े हैं सीना तान कर
उन्हीं सरहदों में कैद हैं हमारी बोलियां
वही हमारे थाल में परस रहे हैं गोलियां
जो इनका भेद खोल दे
हरेक बाल बोल दे
हमारे हाथ में वही खुली किताब चाहिए!
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए!
जवाब दर सवाल है कि इंकलाब चाहिए!
इंकलाब जिन्दाबाद!
जिन्दाबाद इंकलाब!
वतन के नाम पर खुशी से जो हुए हैं बे-वतन
उन्हीं की आह बे-असर, उन्हीं की लाख बे-कफन
लहू पसीना बेचकर जो पेट तक न भर सके
करें तो क्या करें भले न जी सकें, न मर सकें
सियाह जिंदगी के नाम
उनकी हर सुबह ओ शाम
उनके आसमां को सुर्ख आफताब चाहिए!
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए।
जवाब दर सवाल है कि इंकलाब चाहिए!
इंकलाब जिन्दाबाद!
जिन्दाबाद इंकलाब!
होशियार! कह रहा लहू के रंग का निशान
ऐ किसान होशियार! होशियार नौजवान!
होशियार! दुश्मनों की दाल अब गले नहीं
सफेदपोश रहजनों की चाल अब चले नहीं
जो इनका सर मरोड़ दे
गुरूर इनका तोड़ दे
वह सरफरोश आरजू वही जवाब चाहिए!
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए!
जवाब दर सवाल है कि इंकलाब चाहिए!
इंकलाब जिन्दाबाद!
जिन्दाबाद इंकलाब!
तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर
निगाह डाल, सोच और सोच कर सवाल कर
किधर गये वो वायदे? सुखों के ख्वाब क्या हुए?
तुझे था जिनका इन्तजार वो जवाब क्या हुए?
तू झूठी बात पर न और एकबार कर
कि तुझको सांस-सांस का सही हिसाब चाहिए!
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए!
जवाब दर सवाल है कि इंकलाब चाहिए!
इंकलाब जिन्दाबाद!
जिन्दाबाद इंकलाब!

-शलभ श्रीराम सिंह

Friday, December 14, 2012

हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में, हड़ताल हमारा नारा है !

शैलेंद्र
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में, हड़ताल हमारा नारा है !

तुमने माँगे ठुकराई हैं, तुमने तोड़ा है हर वादा
छीनी हमसे सस्ती चीज़ें, तुम छंटनी पर हो आमादा
तो अपनी भी तैयारी है, तो हमने भी ललकारा है
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है !

मत करो बहाने संकट है, मुद्रा-प्रसार इंफ्लेशन है
इन बनियों चोर-लुटेरों को क्या सरकारी कन्सेशन है
बगलें मत झाँको, दो जवाब क्या यही स्वराज्य तुम्हारा है ?
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है !

मत समझो हमको याद नहीं हैं जून छियालिस की रातें
जब काले-गोरे बनियों में चलती थीं सौदों की बातें
रह गई ग़ुलामी बरकरार हम समझे अब छुटकारा है
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है !

क्या धमकी देते हो साहब, दमदांटी में क्या रक्खा है
वह वार तुम्हारे अग्रज अँग्रज़ों ने भी तो चक्खा है
दहला था सारा साम्राज्य जो तुमको इतना प्यारा है
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है !

समझौता ? कैसा समझौता ? हमला तो तुमने बोला है
महंगी ने हमें निगलने को दानव जैसा मुँह खोला है
हम मौत के जबड़े तोड़ेंगे, एका हथियार हमारा है
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है !

अब संभले समझौता-परस्त घुटना-टेकू ढुलमुल-यकीन
हम सब समझौतेबाज़ों को अब अलग करेंगे बीन-बीन
जो रोकेगा वह जाएगा, यह वह तूफ़ानी धारा है
हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है  !

*** महान कवि-गीतकार शैलेंद्र का यह क्रांतिकारी गीत कितना प्रासंगिक लगता है...

Wednesday, December 12, 2012

‘यूटोपिया’ किस चिड़िया का नाम है?



गुलीवर ट्रावेल्स
जोनाथन स्विफ़्ट ने अपनी किताब में कई नए शब्द दिए हैं
क्या आपको मालूम है ‘याहू’ शब्द कहाँ से आया और इसका क्या अर्थ है या फिर ‘यूटोपिया’ किस चिड़िया का नाम है?
एक ज़माने बाद फिर से हम आपके रूबरू हैं, लर्निंग इंग्लिश की एक नई सीरीज़ के साथ, एक नई कोशिश और नए उत्साह के साथ.
तो बात कहाँ से शुरू करूँ. चलिए दिल्ली के पुस्तक मेले से बात करते हैं जो पिछले दिनों प्रगति मैदान में लगा हुआ था. लेकिन आप कहेंगे कहीं मैं इस मेले का विज्ञापन या किसी कंपनी की किताब के बारे में तो आपको नहीं बताने जा रहा हूँ. नहीं साहब, ऐसा कुछ नहीं है.
जहाँ बात सीखने सिखाने की होगी वहाँ पुस्तक तो आएगी ही लेकिन आज की बात में दिल्ली पुस्तक मेले का ज़िक्र सिर्फ़ इसलिए आ गया कि हम आप के पास जो चुनिंदा शब्द लेकर आए हैं वे सारे किसी शानदार किताब का नतीजा हैं.
आप को तो मालूम ही होगा कि बाइबिल की बहुत सी चीज़ें रोज़ाना की शब्दावली में शामिल हो चुकी हैं. जैसे एडेन (Eden) का प्रयोग स्वर्ग, जन्नत या बहिश्त के लिए करते हैं, उसी प्रकार गोलियथ (Goliath) का दानव, विशाल आकृति वाले के लिए करते हैं तो मेथुसेलाह (Methuselah) बूढ़े व्यक्ति के लिए या फिर सैमसन (Samson) शक्तिशाली इंसान के लिए, जैसे हम किसी को रुस्तम या दारा सिंह उसके पहलवान और ताक़तवर होने के लिए कह देते हैं.
आज हम नीचे दिए गए शब्दों के बारे में बात करेंगे
Armageddon (आर्मेगेडन) का अर्थ है महायुद्ध, धर्म और अधर्म के बीच युद्ध का प्रतीक रणक्षेत्र, रिवेलेशन (Revelation) में इसे इस प्रकार ब्यान किया गया है

And he gathered them together into a place called in the Hebrew tongue Armageddon. And there were voices, and thunders, and lightings; and there was a great earthquake, such as was not since men were upon the earth, so mighty an earthquake, and so great.
आरमेगेडन
आज के दौर में आरमेगेडन का प्रयोग nuclear armageddon के तौर पर कर सकते हैं
यानी बिल्कुल प्रलय जैसे दृश्य का नक़्शा खींच कर शब्दों में ढाल दिया गया है.
हम आज के दौर में इसका प्रयोग nuclear Armageddon के तौर पर कर सकते हैं.
Behemoth (बेइमॉथ) यानी एक विशाल काय पशु है जिसके बारे में यहूदियों और मुसलमानों के पैग़ंबर अय्यूब (यानी जॉब) की किताब ‘बुक ऑफ़ जॉब’ में इन शब्दों में वर्णन मिलता है
Behold now behemoth, which I made with thee (you); he eateth (eats) grass as ox… Behold, he drinketh (drinks) up a river and hasteth not (does not make haste): he trusteth (trusts) that he can draw up Jordan into his mouth.
आज के दिन किसी भी बड़ी चीज़ के लिए बेइमॉथ (behemoth) का प्रयोग कर सकते हैं.
Brobdingnagian (ब्रॉबडिंगनैगियन) बेइमॉथ की तरह इसका भी प्रयोग अत्यधिक विशाल आकृति के लिए होता है, वास्तव में इसका प्रयोग जोनाथन स्विफ़्ट कि किताब गुलिवर्स ट्रावेल्स (Gulliver’s Travels) में मिलता है. ब्रॉबडिंगनैग (brobdingnagian) गुलिवर ट्रावेल्स में एक काल्पनिक जगह का नाम हैं जहाँ देवाकार लोग बसते हैं और हमारे ज़माने का एक सामान्य आकृति का इंसान वहां के लोगों के सामने चींटी और मच्छर के बराबर नज़र आता है. स्विफ़्ट की यह किताब बहुत सारी किताबों, कहानियों और फ़िल्मों का स्रोत बनीं.
Hulk, the famous cartoon character, is brobdingnagian in his appearance and activities. Saboo of chacha chaudhri may also be depicted as brobdingnagian character.
Leviathan (लेवाईथान), लेवाईथान ऐसे प्रेत या दानव को कहते हैं जो दुष्टता का पर्याय हो, बाईबल में इसका कई जगह वर्णन आया है, ईसाइया (Isaiah) में इसका प्रयोग इस प्रकार है-
In that day the lord with his sore and great and strong sword shall punish leviathan the piercing servant, even leviathan that crooked servant.
बौना
लिलीपूटियन बहुत छोटे आकार के आदमी या वस्तु के लिए प्रयोग किया जा सकता है
वैसे आज के दौर में किसी भी monstrous और बड़ी चीज़ के लिए लेवाईथान का प्रयोग किया जा सकता है.
थॉमस हॉब्स ने इस का प्रयोग अपनी किताब ‘द लेवाईथान’ (1651) में किया है. और लेवाईथान स्टेट का प्रयोग निरंकुश, नौकरशाही और अत्याचारी राज्य के लिए किया है. इस प्रकार लेवाईथान का figurative प्रयोग निरंकुश अत्याचारी राजा के लिए भी हो सकता है.
Lilliputian (लिलीपुटियन) बहुत ही छोटा, बौना के अर्थों में हम इसका प्रयोग करते हैं, जैसे भारत में किसी ठिगने आदमी को भूटिया कह दिया जाता है उसी प्रकार जोनाथन स्विफ़्ट की किताब गुलिवर्स ट्रावेल्स में एक ऐसे काल्पनिक क्षेत्र का ज़िक्र है जिसके लोग बहुत ही छोटे हैं और उसी के कारण क़द काठी में बहुत ही छोटे व्यक्ति के लिए लिलीपूटियन (Lilliputian) का प्रयोग किया जाता है. छोटा, तुच्छ, मामूली के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है. इसका संज्ञा और विशेषण दोनों रूप में प्रयोग होता है.
Utopia (यूटोपिया) यह शब्द सर थॉमस मोर की प्रसिद्ध किताब Of the Best State of a Republic, and of the New Island Utopia से लिया गया है, यह किताब 1516 ई. में लिखी गई थी और इसमें आदर्श राज्य का सपना बुना गया था. इसी सबके कारण हर उस चीज़ को यूटोपिया कहा जा सकता है जो कहने में तो ठीक हो लेकिन उसको वास्तविक्ता में लाना संभव न हो. हम आदर्श राज्य, रामराज्य, स्वप्नलोक, काल्पनिकलोक और काल्पनिक इत्यादि के लिए इसका प्रयोग करते हैं.
When you dismiss someone’s plan as being ‘utopian’, you are ridiculing it because you believe that it is unrealistic. प्रयोग We have exhausted much of our energy in pursuing a utopian dream of world peace.
मज़े की बात है कि सैमुएल बटलर ने 1872 में एक उपनयास Erehwon के नाम से लिखा जिसमें यूटोपिया का बहुत मज़ाक़ उड़ाया गया. दरअसल Erehwon अंग्रेज़ी के शब्द nowhere को उलट कर लिखेंगे तो बन जाएगा. यूटोपिया जिस यूनानी शब्द से बना है उसका अर्थ भी nowhere यानी कहीं नहीं होता है.
Yahoo (याहू) इससे तो ऑनलाइन वाले सभी लोग परिचित होंगे लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह क्या है और इसका अर्थ क्या है, कहीं हिंदी भाषी इसे फ़िल्म जंगली के गीत से लिया हुआ शब्द तो नहीं समझ लेंगे जिसे शम्मी कपूर ने मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में बहुत ही तेज़ आवाज़ में गाया है.
याहू
याहू जहां एक सर्च इंजन है वहीं स्विफ़्ट ने जंगली और दुष्ट के लिए इसका प्रयोग किया है.
यह याहू वेब साइट भी नहीं है क्योंकि उसका पूरा नाम तो इस प्रकार है यट अनदर हाइरार्किकल ऑफ़िशियस ओरैकिल, जिसका संक्षिप्त रूप बनता है याहू.
याहू भी जोनाथन स्विफ़्ट की उसी किताब में मिलने वाला शब्द है, इस किताब में ह्वाहिम्न्स के निवासियों को याहू कहा गया है जो मानव की तरह दिखते हैं लेकिन सारी दानव की विशेषता रखते हैं, ये मनुष्य जाति के सबसे बुरे और दुष्ट लोग हैं.
जब इसे स्मॉल लेटर्स के साथ लिखा जाता है तो इसका अर्थ होता है an uncultivated or boorish person, lout; philistine, yokel वग़ैरह यानी जाहिल उजड् गंवार के लिए इसका प्रयोग होता है.
और जाते जाते एक बच्चों की एबीसीडी की किताब पर नज़र पड़ गई तो याद आया कि एक शब्द तो Abecedarian भी होता है जिसका अर्थ होता है वर्णमाला सीखने और अक्षरों की पहचान करने वाला यानी प्रारंभिक.
We know we are not abecedarian, still dedicated to improve our English.

Wednesday, March 28, 2012

प्रभु जी हम गरीब, तुम पालनहार

tejinder.gagan
पिछले सप्ताह दो खबरें पूरे समाचार जगत में अनर्थ के अंधकार की तरह छाई रहीं। एक तो यह कि नव-धनाढय वर्ग के जीवित देवता श्रीश्री रविशंकर ने यह कहा कि सरकारी स्कूल बंद कर दिए जाने चाहिए और शिक्षा का दायित्व निजी हाथों में सौंप दिया जाना चाहिए और दूसरे योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने 'गरीबी की रेखा' की जो नई परिभाषा गढ़ी, और यह 'सुखद' समाचार दिया कि उनकी गणना के मान से भारत में गरीबों की संख्या में सात प्रतिशत की कमी आई है। उनके बुध्दिजीवी साथियों जिन में लार्ड मेघनाथ देसाई शामिल हैं, ने उनकी इस गणना का समर्थन किया। हालांकि अपनी बात के समर्थन में वे सड़कों पर नहीं उतरे क्योंकि अगर कहीं वे सड़क पर उतर आते तो अपने समर्थन के तर्कों पर उन्हें पुनर्विचार करना पड़ता। गरीब आदमी के चेहरे पर रोशनी लाने में इन अर्थशास्त्रियों के चमकते चेहरे कतई समर्थ नहीं हैं। इस बात को वे भी समझते हैं। 'टाईम्स ऑफ इंडिया' के अपने एक आलेख में बच्ची करकरिया ने श्री मोंटेक सिंह का नाम उचित ही 'मनी टेक सिंह' लिखा है। यह विडंबना है कि भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष को देश में गरीबी की रेखा के मापदंड को समझने के लिए वर्ष भर में दर्जनों बार संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्राएं करनी पड़ती हैं। गरीबी की रेखा गरीब आदमी के चेहरे पर अपनी पूरी पारदर्शिता के साथ दिखाई देती है, उसे पढ़ने के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यता नहीं होनी चाहिए। गरीबी की रेखा गरीब आदमी की धमनियों में धीमी गति से चलती है और उसे पकड़कर उसमें जरूरी खाद-पानी डालना कोई मुश्किल काम नहीं है पर योजना आयोग में बैठे नौकरशाह अपनी गिनती और अपने आंकडों में मुंह छिपाए बैठे रहते हैं और अपना एक छद्म संसार रच लेते हैं। उन्हें लगता है कि देश की पूरी धन सम्पदा का स्रोत वे हैं। वे यह भूलते हैं कि तथ्य इसके ठीक विपरीत है। देश का मेहनतकश आदमी, किसान, मजदूर, रिक्शेवाला, फल और सब्जी के ठेले लगाने वाला, तकनीशियन, छोटा-मोटा सरकारी कर्मचारी-चपरासी, क्लर्क और लेखापाल, यह सारी जनता जो शहरों में, पहाड़ों पर और समुद्र के किनारे पर मछली पकड़ने वाले मछुआरे- ये सब जो काम करते हैं और टैक्स भरते हैं, यह सारा पैसा उनका है, जिस पर उनका हक बनता है। देश की लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत योजना आयोग सिर्फ एक संस्था है और उसका काम जनता के इस पैसे का हिसाब रखते हुए ऐसी नीतियां बनाना है कि देश का अर्थतंत्र विकसित हो सके या फिर इस बात की तटस्थ मीमांसा करना भी है कि किस राज्य ने किन योजनाओं के तहत आबंटित पैसे का उपयोग अपने राज्य की दूरगामी जन कल्याण योजनाओं के लिए खर्च किया है कि उनके राज्य के आम आदमी के जीवन-स्तर में पर्याप्त सुधार आ सके। योजना आयोग को राज्यों को उनके संसाधनों के मुताबिक पैसा आबंटित करना चाहिए न कि राजनैतिक पक्षधरता से या उस तरह कि जैसे हम किसी भिखारी को उस तरह से पैसे दें कि वह भीख मांगने का एक नया कटोरा खरीद सके। सारी गडबड़ी गरीबी की रेखा मापने के हमारे मानदंडों में है। संभवत: यह एक मानदंड है कि अगर किसी व्यक्ति के पास इतने संसाधन हैं कि वह एक नियत मात्रा में 'कैलोरींज' ले सकता है तो वह गरीब नहीं हैं। पता नहीं किन विवेकहीन लोगों की यह सोच थी या इसका वैज्ञानिक आधार क्या था पर एक मामूली तरह से सोचने वाले व्यक्ति की समझ में भी जो बात आती है वह यह कि- एक आदमी के पास रहने के लिए छत न हो, पहनने के लिए कपड़ा न हो, जिसकी सारी इच्छाएं मर चुकी हों, जो बहुत दूर तो क्या अपने पास तक देख न सकता हो, उसके पास कमाई का कोई साधन न हो- उसे कुछ 'कैलोरींज' देकर क्या कोई भी सरकार अपने कर्तव्य की इतिश्री कर सकती है। चूंकि यह किसी एक व्यक्ति का किस्सा नहीं है- सैकड़ों, हजारों, लाखों, करोड़ों की तादाद में, पूरे देश में एक बहुत बडा गरीब तबका गरीबी की उनकी खींची हुई रेखा के नीचे जीवनयापन करने पर विवश है, तो निश्चित ही यह सरकार की गलत आर्थिक नीतियों का नतीजा है। इन नीतियों को सुधारने की जगह सरकार उन पर पर्दा डालने की कोशिश लगातार करती है और यह आम आदमी को दिखाई दे रहा है पर योजना आयोग को दिखाई नहीं देता क्यों? ऐसे ही जैसे कि श्रीश्री रविशंकर को यह दिखाई नहीं देता कि देश के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे गरीबी की हालत में भी पढ़ तो रहे हैं। उनके पास साधन नहीं है फिर भी एक प्राथमिक पाठशाला उन्हें शरण देती है। जिस निजी क्षेत्र की शिक्षा की बात श्रीश्री रविशंकर करते हैं वहां तो पैसा मनुष्य को रौंदता हुआ चलता है। वे स्कूल तो अमेरिका से संचालित होते हैं, उनका तो भारतीयता और भारतीय जीवन तथा उसकी मूल्यबध्दता से कुछ भी लेना-देना नहीं है। श्रीश्री कहते हैं कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे नक्सली होते हैं। यह घोर आपत्तिजनक बात है और साथ ही झूठ भी। सच बात तो यह है कि जिस तरह देश में शिक्षा का निजीकरण हुआ है और एक नया युवा आभिजात्य वर्ग सामने आया है, जिसका देश की जड़ों के साथ कुछ भी लेना-देना नहीं है, उसके प्रतिफलन के रूप में नक्सलवाद का फैलाव हुआ है। आप देश के सारे निजी शिक्षण संस्थान बंद कर दीजिए और अमीर या गरीब की परवाह किए बगैर सबको शिक्षा के समान अवसर दे दीजिए तो आप देखेंगे कि नक्सलवाद की रेखा, अपने आप ही आप की हथेलियों से गायब होती दिखेगी।
इस बीच अन्ना हजारे ने एक बार फिर जन-लोकपाल बिल के लिए नई दिल्ली में एक दिन का सांकेतिक अनशन किया है। यह न केवल आश्चर्यजनक है बल्कि दु:खद भी है। देश की संसद को गौण करने की कोई भी कोशिश अंतत: एक तरह का राष्ट्र-द्रोह ही कहलाएगी। यह अलग बात है कि अगर आप को पूरी ईमानदारी से यह लगता है कि संसद में कुछ ऐसे लोग पहुंच जाते हैं जिनका आचरण नैतिक मूल्यों पर खरा नहीं उतरता या जिनका लोक-जीवन संदिग्ध है तो आपको उसके लिए जन-चेतना जागृत करने का काम करना चाहिए पर यह एक भोली सी इच्छा होगी क्योंकि आपके साथ तो श्रीश्री और बाबा रामदेव जैसे लोग खड़े है जिनका अपना नैतिक-संदेश ही संदिग्ध है या फिर आपके साथ अरविन्द केजरीवाल और सुश्री किरण बेदी हैं जो स्वयं नौकरशाह रहे हैं और अपना टैक्स समय पर न देने और फर्जी दौरा बिल भरने के आरोप झेल रहे हैं। अन्ना हजारे को देश की आम जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि जनलोकपाल बिल कोई ऐसा जादू का पिटारा नहीं है कि खुल जा सिमसिम कहते ही अलादीन का कोई चिराग बाहर आ जाएगा और देश की सभी समस्याओं का निदान कर देगा। यह पहला कदम भी नहीं है- पहला कदम है गरीबी की रेखा का पुनर्निर्धारण और सभी को शिक्षा के समान अवसर मुहैया कराना। जब तक यह नहीं हो जाता तब तक तो यह ठीक है कि - 'प्रभु जी हम गरीब, तुम पालनहार-'
tejinder.gagan@gmail.com

Thursday, February 16, 2012

. शहरयार


पहले नहाई ओस में फिर आँसुओं में रात
यूँ बूंद बूंद उतरी हमारे घरों में रात

कुछ भी दिखाई देता नहीं दूर दूर तक
चुभती है सूइयों की तरह जब रगों में रात

वह खुरदुरी चटाने*, वह दरिया वह आबशार
सब कुछ समेट ले गयी अपने परों में रात

आँखों को सब की नींद भी दी ख्वाब भी दिए
हम को शुमार करती रही दुश्मनों में रात 

बेनाम मंजिलों ने बुलाया है फिर हमें
सन्नाटे फिर बिछाने लगी रास्तों में रात..