Wednesday, March 2, 2011

सीधी के नाम को लेकर टेढ़ी बहस

फिलहाल-जयराम शुक्ल
सफेद बाघ और सिंगरौली की कोयला खदानों के लिए जगप्रसिद्ध सीधी जिले को लेकर इन दिनों दिलचस्प बहस चल रही है। मुद्दा है, क्यों न सीधी का नाम बाणभट्ट की प्रसिद्ध संस्कृत रचना कादम्बरी के नाम से कर दिया जाए। यानी कि जैसे यूपी में कई जिलों के पुराने नामों को विलोपित करके कौशाम्बी और गौतमबुद्धनगर धर दिया गया है वैसे ही सीधी को विलोपित करके इसे कादम्बरी जिला के नाम से जाना जाए। इस हेतु विधिवत प्रस्ताव भी पारित किए गए हैं और थ्रू-प्रापर-चैनल प्रदेश सरकार के समक्ष भेज दिया गया है या भेजे जाने की प्रक्रिया में है। सीधी को कादम्बरी बनाने को बेताब लोगों कहना है कि बाणभट्ट सोन नदी के किनारे भॅवरसेन-चंदरेह में पैदा हुए और उन्होंने कादम्बरी जैसी कालजयी कृति की रचना की है, इसलिए जिस तरह देवलोंद में सोन नदी पर बने बांध का नाम बाणसागर किया गया है उसी तरह सीधी का नाम कादम्बरी रख दिया जाए। राजनीति और साहित्य के अनूठे घालमेल वाली यह अधकचरी पहल यदि सफल होती है तो सीधी दुनिया का एेसा पहला अभागा जिला होगा जिसका नाम किसी उपन्यास की खातिर विलोपित कर दिया जाएगा।
सीधी को कादम्बरी में बदलने के खिलाफ भी साहित्य और राजनीति के घालमेल वाला मोर्चा कमर कसकर सामने आ गया है। इस मोर्चे ने बात को तार्किक ढंग से रखने के लिए अपने पूरे पराक्रम के साथ एक पुस्तिका ...कौन तुम बाणभट्ट... प्रकाशित की है। पुस्तिका में विभिन्न ग्रंथों का संदर्भ देकर यह साबित करने की कोशिश की गई है कि बाणभट्ट का सीधी से कोई वास्ता नहीं रहा, लिहाजा इतिहास में वर्णित सिद्ध-भूमि सीधी का नाम कादम्बरी रखना यहां के वासियों के साथ भावनात्मक अन्याय तो होगा ही, इतिहास को गलत परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का पाप भी बैठेगा। फिलहाल स्थिति यह है कि अध्ययन और तथ्यों से दूर-दूर का वास्ता रखने वाले बयानवीरों को परस्पर विरोधी साहित्यिक खेमे तर्क -कुतर्क की खुराक दे रहे हैं और जनता-जनार्दन की पीड़ा से बेखबर ये योद्धा सीधी से भोपाल तक मुद्दे की मुगदर भांजने में जुटे हैं।
कौन तुम बाणभट्ट?
बाणभट्ट सम्राट हर्षवद्र्धन के मगध में पैदा हुए या सोन नदी के किनारे भॅवरसेन-चंदरेह में यह बहस बेमानी है। लोकमानस से जुड़ी सर्वसिद्ध बात यह कि सोन नदी सीधी की आत्मा में रची बसी है वही सोन नदी सातवीं सदी में शोणभद्र के रूप में बाणभट्ट के रगों में भी जीवनधारा बनकर बहती थी। इस नाते सीधी और बाणभट्ट का रिश्ता अटूट है। वैसे भी किसी कालजयी व्यक्तित्व को समय-काल और सीमा में बांधना उसकी साधना के साथ अन्याय है। आदि शंकराचार्य केरल में जन्मे थे पर आज वे चारों धामों और देश भर के मठ-मंदिरों और साधु-संतों के अखाड़ों में अमर हैं। कहने को महर्षि वाल्मीक तमसा(टमस) के तट पर पैदा हुए पर पंजाब और हरियाणा के दलितों के बीच उनकी प्राण प्रतिष्ठा ईश्वर तुल्य है। महर्षि अगस्त्य के बारे में जितना तमिल, तेलगू और मलयाली साहित्य में लिखा गया है उतना हिंदी-संस्कृत में नहीं। कारण अगस्त्य जी का जीवन और पराक्रमकाल बड़ा हिस्सा दक्षिण भारत में बीता। कहने का आशय यह कि सूरदास या तुलसीदास का जन्म कहां हुआ यह मायने नहीं रखता, मायने यह रखता है कि हम उनके व्यक्तित्व को कितनी निकटता से महसूस करते हैं और उनके कृतित्व से कितनी प्रेरणा लेते हैं। इसलिए बाणभट्ट कहीं पैदा हुए हों उनका रिश्ता सीधी से उतनी ही निकटता का है जितनी कि मगध से। अब सवाल उठता है कि सीधी का नाम कादम्बरी क्यों रखा जाए। सीधी के नाम में क्या खोट है और कादम्बरी में क्या विशेषता है? कादम्बरी संस्कृत में बाणभट्ट की कोई पौराणिक या अध्यात्मिक रचना तो है नहीं जिसे हम गीता, महाभारत या रामायण की श्रेणी में रख सकें और उसका पाठ करके दैविक अनुभूति कर सकें। कादम्बरी एक रहस्य और रोमांस से भरी प्रेमकथा है जिसका शिल्प और विन्यास इतना उत्कृष्ट है कि समालोचकों ने उसे संस्कृत की कालजयी रचनाओं में से एक माना है। आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी ने इसका सरस हिंदी अनुवाद किया है। यह एक काल्पनिक कथा है। जिसमें चंद्रपीड़ और पुंडरीक नामक पात्रों के तीन जन्मों का उल्लेख है। अतीव सुंदरी चांडाल कन्या और एक वैशम्पायन नाम का तोता है। कहानी इन्हीं पात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है। पूरी कथा दो भागों में विभक्त है। पूर्वभाग बाणभट्ट ने लिखा है और उत्तरभाग उसके पुत्र भूषण भट्ट ने। कादम्बरी उपन्यास के जरिए बाणभट्ट नायक और नायिका के प्रारंभिक लौकिक प्रेम को शापवश जन्मातंर में समाप्त कर पुन: अलौकिक प्रेम द्वारा मानव के लिए आदर्श प्रेम का दिव्य संदेश देते हैं। हिंदी में कादम्बरी का अनुवाद पढ़ते हुए देवकीनंदन खत्री की चंद्रकांता संतति याद आएगी। हिंदी फिल्मों में दिलीप कुमार- वैजयंतीमाला की मधुमती और सुनीलदत्त-नूतन की फिल्म मिलन में कादम्बरी की झलक देखने को मिलती है। वैसे हिन्दी शब्दकोष मे कादम्बरी का अर्थ है कदम्ब के फूल से बनी हुई शराब।
भला नाम में क्या धरा है
सीधी जिले को कादम्बरी जिला बना देने की मांग ठीक वैसे ही है जैसे इलाहाबाद के लोग मांग करें कि हमारे जिले का नाम मधुशाला धर दिया जाए। हरिवंश राय बच्चन ने तो यहीं हिंदी साहित्य की सबसे ज्यादा पढ़ी व गाई जाने वाली कृतियों में से एक मधुशाला की रचना यहीं की थी। किसी का नाम बदल देने से क्या उसका चाल-चरित्र और चेहरा बदल जाता है? मायावती ने नोयडा का नाम बदल कर गौतमबुद्ध नगर धर दिया तो बलात्कार-हत्याएं बंद हो गईं? गंभीर अपराधों को अंजाम देने वाले जालिमों का क्या अंगुलिमान की तरह ह्रदय परिवर्तन हुआ? नहीं, निठारी जैसे पैशाचिक कृत्य इसी गौतमबुद्ध नगर में हुआ। पश्चिम बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार फंडामेंटलिस्टों के ढर्रे पर चलती हुई कलकत्ता को कोलकाता बना दिया। क्या नाम बदल जाने के बाद वहां आदमी ने आदमी पर सवारी करना बंद कर दिया? नहीं न.. वही भुखमरी वही बेरोजगारी। उसी कोलकाता की सडक़ों पर हाथों में झुनझुना बजाते आदमी घोड़ों की तरह नधकर बग्घी खींचता है। नाम बदलने से कुछ भी नहीं बदलता। इस तरह की पहल दिल और सोच की संकीर्णता को प्रदर्शित करती है। डीएमके ने मद्रास को चेन्नई करवा दिया और शिवसेना ने बंबई को मुंबई। दोनों ही दल देश में अपनी संकीर्ण सोच के लिए जाने जाते हैं। सीधी तो प्यारा सा सरस और संगीतमयी ध्वनि गुंजित करने वाला दो अक्षरों का मासूम सा नाम है। क्या तकलीफ हो सकती है इस नाम से भला किसी को। सीधी को कादम्बरी बना देने से भला इसके किस गौरव की बहाली हो जाएगी भाई। क्या कादम्बरी इसकी दरिद्रता के दुर्भाग्य को मिटा देगी? है कोई गारंटी?
अपने सीधेपन पर मारा गया सीधी
सीधी तो सचमुच अपने सीधेपन पे मारा गया। सिंगरौली को उससे काट कर अलग कर दिया गया। दुनिया के सबसे बड़े पॉवर काम्पलेक्स बनने का गौरव छिन गया। तब तो किसी ने उफ तक नहीं की। छोटी सी सीधी के विशाल ह्रदय ने इसे जज्ब कर लिया। इससे पहले की बात करेें तो सफेद बाघ मिला इसके बरगड़ी-कुसमी के जंगल में लेकिन दस्तावेजों में कहीं रीवा दर्ज है तो कहीं बांधवगढ़। यहां तक कि एक बार डाक विभाग ने टिकट जारी किया तो बताया गया कि सफेद बाघ बांधवगढ़ का है। मैंने संचार मंत्रालय को कड़ा विरोध पत्र लिखा था तब कहीं जाकर संशोधन किया गया। यानी कि जिसका जब भी मन आया सीदी-साधी सीधी के हितों के साथ खेल किया। वैसे भी सीधी के इतिहास के कालखंडों को आप तीन युगों में बांट सकते हैं। पहला शिकारगाह युग- राजा रजवाड़ों के इस युग में सीधी के जंगलों में जानवरों के शिकार हुए और बस्तियों में आदमियों के। दूसरा एेशगाह युग- स्वतंत्र भारत के पूर्वाद्ध में यह जिला राजनेताओं के ऐशगाह के रूप में इस्तेमाल हुआ। कहीं से किसी को यहां चुनाव लडऩे भेज गया गया। सतना के आनंदचंद्र जोशी, नरसिंहगढ़ के राजा भानुप्रकाश सिंह यहां आए और जीत कर दिल्ली पहुंचे, फिर कभी मुडक़र झांका नहीं। लोहियाजी ने तो बिहार के एक सेठ जी रामसहाय को चुनाव लडऩे भेज दिया था। इस एेशगाह युग में सीधी में स्कूल-अस्पताल से ज्यादा पहाडिय़ों व नदियों के किनारे आलीशान डाकबंगले बनाए गए। फिर आया चारागाह युग- इस युग में नौकरशाहों- इंजीनियरों-ठेकेदारों और नेताओं के संगठित समूह(या गिरोह)ने यहां की महत्वाकांक्षी योजनाओं- परियोजनाओं को चरा और अपनी तिजोरियों को भरा। आज कुसमी के आदिवासी मलेरिया से इसलिए मर जाते हैं कि उनके पास कुनैन की गोली तक खरीदने का सावकाश नहीं, वहीं दूसरी ओर एेसे भी लोग हैं जो इसी सीधी के संसाधनों से करोड़ों अरबों के साथ खेलते हैं। असली चुनौती तो इस दुर्भाग्य को मिटाना है न कि लोगों का ध्यान बटाकर उन्हें सीधी बनाम कादम्बरी के झगड़े में उलझाना।

14 फरवरी 2011 --लेखक स्टार समाचार के कार्यकारी संपादक हैं।

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