Friday, May 3, 2013

किसानों के साथ बेईमानी


किसानों के साथ बेईमानी अब फिर देश का किसान सरकार के निशाने पर है। केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के नाम पर दस लाख किसानों के गले में रस्सा बांध कर कारपोरेट कम्पनियों के हाथों में सौपने का फैसला किया है। अकूत मुनाफे के लिए इन कम्पनियों के सामने जिस तरह किसानों को परोसा जा रहा है उसका जो नतीजा निकलेगा, वह बेहद भयावह होगा। इनको अपने ही खेत में गिरमिटिया-बंधुआ मजदूर की तरह सपरिवार काम करना होगा और कर्ज के सांप-सीढ़ी वाले खेल में इनके पुरखों के खेत कम्पनियों की मिल्कियत हो जाएंगे । सरकार इन कारपोरेट घरानों को इसके लिए तीन हजार करोड़ रुपए भी दान में दे रही है। यह परियोजना सत्रह राज्यों की बारह लाख हेक्टर जमीन पर चलेगी। इसके लिए ग्यारह लाख किसानों का चयन किया गया है। इस काम के लिए कभी किसानों की रजामन्दी नहीं ली गई, सब कुछ पुलिसिया अंदाज में किया जा रहा है। आजादी के बाद भी किसानों के साथ सरकारें उसी तरह का जुल्म करती जा रही हैं, जैसा गुलामी के समय राजा, जागीरदार और महाजन करते थे। सरकारों ने खेती को घाटे का सौदा बना दिया और बढ़ती मंहगाई की तुलना में अनाज का समर्थन मूल्य घटाया जाता रहा। सन 1953 में देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का येागदान तिरपन प्रतिशत था और अब कृषि का योगदान घटा कर चौदह फीसद कर दिया गया है। सरकार किसानों को उनके खेतों से बाहर निकालने के लिए जानबूझ कर खेती की लागत से समर्थन मूल्य कम निर्धारित करती है। इसके परिणाम बेहद चिन्ताजनक है। छोटे और सीमान्त किसान आत्महत्या करते जा रहें हैं या अपने गावं से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं जहां दिहाड़ी मजदूर बनने के लिए रोज सुबह मजदूरों की मंडी में गुलामों की तरह खुद को किराए पर चढ़ा रहे हैं। रोज यह भी सम्भव नहीं है। कई बार इन्हें काम नहीं मिलता और भूखे रह कर दिन काटने पड़तें हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक 1995 से 2011 तक भारत के तीन लाख किसानों ने कर्ज में डूब जाने के कारण खुदकुशी की है। सरकार जानबूझ कर ऐसे हालात बनाती जा रही है कि छोटे और मझोले किसान अपनी जमीन से पलायन कर दें और व्यापारिक घराने तथा काले धन से बजबजाते नव-दौलतिओं के गोदामनुमा पेट जमीनों का भोग लगाते रहे। सन 1960 में दस ग्राम सोना का भाव 112 रुपए और एक क्विंटल गेहूं का भाव 41रुपए था। अभी सोना 10 ग्राम बत्तीस हजार रुपए में तो एक क्विंटल गेहूं का भाव 1285 रुपए है। क्या करें किसान और कैसे जिन्दा रहे किसान ? अंग्रेजों ने भूमि अधिकरण कानून सन 1894 में बनाया था।
जो सरकार के हितों के संरक्षण के लिए था। इस कानून की धारा चार के अन्तर्गत सरकार एक अधिसूचना जारी करके सार्वजनिक हित के लिए किसी भी सम्पति का अधिग्रहण कर सकती है। संविधान बनाते समय सितम्बर 1949 को मूल अधिकार में सम्पति के अधिकार को जोड़ने के लिए विस्तार से चर्चा हुई किन्तु इसे मूल अधिकार में नहीं जोड़ा गया। इस प्रसंग में अन्तर इतना रहा कि सरकार को अब जमीन अधिग्रहित करने पर मुआवजा देना होगा। लेकिन इससे पीड़ित पक्ष को कोई राहत आज भी नही है। हांलाकि आज हम स्वतंत्र और सार्वभौमिक गणराज्य के नागरिक हैं। सरकार पर मुआवजा देने के लिए बाजार मूल्य की बाध्यता नहीं है और सार्वजनिक हित की भी कोई परिभाषा नहीं है। इसके चलते सरकार किसानों की खेती वाली भूमि चाहे जब सार्वजनिक हित के नाम पर अधिग्रहित करके निजी उद्योगपतियों को सौंपती जा रही है। सामान्य बुद्धि वाला भी यह तो समझता है कि सड़क, रेल, बांध, नहर, अस्पताल, स्कूल आदि के लिए जमीन का अधिग्रहण सार्वजनिक हित है किन्तु निजी उद्योगपतियों को कारखाने लगाने, कालोनी बनाने के लिए सार्वजनिक हित कैसे हो सकता है। देश की कई हजार हैक्टर कृषि भूमि सरकार ने माटी-मोल मुआवजे पर निजी हाथों में सौंप दी है। सरकारी शोषण के कारण और उसके पुलिस पावर के चलते किसान अपने ही पुरखों की जमीन से बेदखल कर दिया गया है। उसे जमीन के वास्तविक बाजार मूल्य की जगह आधा मूल्य भी नसीब नहीं हुआ है।
सरकारी दादागीरी के कारण किसान जमीन हड़पने वालों से किसी भी प्रकार की सौदेबाजी कीमत को लेकर भी नहीं कर पाता है। होना तो यह चाहिए था कि सरकार को निजी उद्योगपतियों और किसान के मध्य आना ही नहीं चाहिए । दोनों पक्ष बातचीत करके जमीन की कीमत तय करते । ऐसा होने पर किसान दिन- दहाड़े की जा रही सरकारी डकैती से बच जाता। जमीन हस्तांतरणीय सम्पदा है। जिसे भूमि चाहिए उसे भूमि की पूरी कीमत भी चुकानी चाहिए। भूमि के मालिकों को भूमि अधिग्रहण की वही कीमत मिलनी चाहिए जो उन्हें अपने लिए भूमि खरीदने के लिए दूसरों को देनी पड़ती है। यही न्याय का तकाजा है।
लेकिन किसानों से कौड़ियों के भाव जमीन लेकर उद्योगपतियों और कारपोरेट घरानों को सरकारें सौंप रही हैं। खेती लायक जमीन का रकबा घटता जा रहा है और कारखाने, मॉल, मनोरंजन स्थल कालोनियों का जंगल फैल रहा है। सरकारें किसान को नाममात्र की सहायता या सबसिडी देकर दहाड़ मार कर रोती है कि सबसिडी के कारण देश की अर्थ व्यवस्था लड़खड़ा रही है, किन्तु कॉरपोरेट कम्पनियों को हजारों करोड़ रपए उदारता से दान दे रही है। देश की आर्थिक नीतियां समाजवाद की परिधि से बाहर निकाल कर उदारवाद के साथ नत्थी कर दी गई है। आर्थिक उदारवाद हर किसी को अपनी मेहनत और जायजाद की कीमत लगाने का हक देता है तो किसान को यह अधिकार क्यों नहीं दिया जा रहा है। खेती भूख मिटाने की व्यवस्था, है तिजोरी भरने की नहीं है। इसे धनतंत्र का हिस्सा बना कर दौलत बटोरने और गिद्ध-भोज के लिए जो गिरोह निकल पड़े हैं उनको रोका जाना चाहिए किन्तु यहां तो इनको सरकार ही सुविधाएं और संरक्षण दे रही है। इनको रोकेगा कौन? किसान को पराश्रित और लाचार बना कर राष्ट्रीय विकास योजना के नाम पर उसकी धरती से शहरों की तरफ रगेदने का षड़यंत्र शुरू है। खेती-किसानी के प्रति सरकारों का रवैया और नजरिया बदलना चाहिए। यह समझना ही होगा कि प्रकृति में किसान का खेत ही ऐसी जगह है जहां उत्पादन होता है। कारखानों में प्रकृति के उत्पादनों का केवल रूप-परिवर्तन भर होता है। पैदा कुछ भी नहीं होता है। यह सच्चाई भी समझनी चाहिए कि खेतों में जो उपजता है वह जीने के लिए आवश्यक है। विकल्पहीन है। खेती ही वह आधार है जिसके ऊपर समृद्धि के महल खड़े हैं।
- लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक हैं। सम्पर्क-09425174450.

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